रविवार, 10 दिसंबर 2017

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 2)

🔶 गृहस्थी की सुघड़ व्यवस्था बच्चों का पालन-पोषण, श्रम-उद्योग और क्रियाशीलता का आधार सूत्र मोह होता है। इससे यह बात समझ में आती है कि अपनी मर्यादा के अन्दर संसार की कोई भी वस्तु बुरी नहीं है। सुख प्राप्ति की आकांक्षा भी इसी प्रकार बुरी नहीं। यह स्वाभाविक एवं उचित भी है कि लोग सुखों की कामना करते हैं। जीवन के विभिन्न व्यापार इसी से तो चलते हैं।
   
🔷 सुख की आकांक्षा न हो तो कौन परिश्रम करना चाहेगा? कड़ी धूप में अपनी चमड़ी कौन सुखाना चाहेगा? आठ घण्टे ड्यूटी बजाने में कौन-सा आनन्द रखा है? सुख की आकांक्षा के पीछे संसार की एक बहुत बड़ी व्यवस्था सन्निहित है, किन्तु यह है तभी तक जब तक सुख की प्राप्ति के साधनों में व्यत्तक्रम उत्पन्न न हो। इसे साधन न मानें, आसक्ति न हो। शक्ति के रूप में ही सुख का महत्व है।

🔶 ‘सुख’ एक दृष्टिकोण है—जो लोगों की रुचि के अनुरूप होता है। वस्तुतः संसार की किसी भी वस्तु में न सुख है, न दुःख। जिसके सन्तान नहीं होती है, वह इसके लिए बड़ा व्यग्र, दुःखी तथा बेचैन रहता है, उसकी दृष्टि में पुत्र-प्राप्ति का सुख ही संसार का बड़ा भारी सुख होगा। पर जिसके कई सन्तानें पहले ही हैं, घर में धन का अभाव है, उन्हें सन्तान का होना दुर्भाग्य जान पड़ता है। सुख का प्रधान साधन और आकांक्षा की प्रमुख वस्तु ऐसे लोगों के लिए धन होगी। धन और पुत्र दोनों अवस्थाओं में एक जैसे हैं। किन्तु भिन्न दृष्टिकोणों के कारण एक व्यक्ति धन कसे सुख का सार मानता है दूसरे के लिए ‘पुत्र’ सुख है।

🔷 इससे स्पष्ट हो जाता है कि संसार के किसी भी पदार्थ में सुख नहीं। रुचि के अनुकूल सुख का भाव अपने दृष्टिकोण में होता है। लोगों के दुःख का कारण पदार्थ के सुख की आसक्ति ही है। अधिकांश लोग इसी कारण दुःखी रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.26

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

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