मंगलवार, 7 जनवरी 2020

👉 विश्व स्तरीय चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान


Note :
चालीस दिवसीय साधना अनुष्ठान की यह साधना साधकों को अपने घर पर रह कर ही संपन्न करनी है । इस के लिए शांतिकुंज  नहीं आना होगा । पंजीयन करने का उद्देश्य सभी साधकों की सूचना एकत्र करना एवं शांतिकुंज स्तर पर दोष परिमार्जन एवं संरक्षण एवं मार्गदर्शन की व्यवस्था करना है ।

प्रखर साधना किस लिये ??

#युग परिवर्तन के चक्र को तीव्र करने हेतु
#संक्रमण काल में युगशिल्पियों को तपाने हेतु
#आतंकवादी / आसुरी शक्तियों के निरस्तीकरण हेतु
#वंदनीया माता जी को श्रद्धांजलि हेतु
 # नव सृजन की गतिविधियों को शक्ति एवं संरक्षण प्रदान करने हेतु

आत्मीय परिजन,

सन् 2026 में परम वंदनीया माताजी के जन्म, अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन एवं श्री अरविन्द महर्षि के अति मानस अवतरण की शताब्दी मनाई जानी है। प्रखर साधना के अभाव में समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन धराशायी हो गये। युग निर्माण आन्दोलन इसलिये प्रखर है क्योंकि इसमें ऋषियुग्म का तप एवं युग साधकों की प्रखर साधना है। इस विषम बेला में और अधिक प्रखरता की अपेक्षा की जा रही है। इस हेतु शांतिकुंज ने  2026 तक वार्षिक चालीस दिवसीय अनुष्ठान की योजना बनाई है।

    क्या करें ??

 * चूँकि विश्व स्तर पर 24000 साधकों द्वारा साधना की जायेगी, इस हेतु जोन/ उप जोन / जिला समितियों को अपनी जवाबदारी सुनिश्चित करनी है।
*  सक्रिय 108 जिलों में 240 साधक प्रति जिले के हिसाब से एवं अन्य जिले में 108 या 51 साधक तैयार/सहमत/संकल्पित करें।
* तपोनिष्ठ पूज्यवर ने 24 लाख के 24 महापुरश्चरण किये थे तो हम छोटा- सा सवा लाख मंत्रों का चालीस दिवसीय अनुष्ठान तो करें ही।
*  पूज्यवर ने 24 वर्षों तक जौ की रोटी और छाछ पर तप किया, हम यथा संभव 40 दिनों तक नमक और (या) शक्कर का त्याग करें।
*  पूज्यवर ने जीवनकाल में 3200 के आसपास पुस्तकें लिखीं, हम चालीस दिनों में दो- तीन पुस्तकों का स्वाध्याय तो कर ही लें ।।
 * उन्होंने करोड़ों व्यक्तियों/साधकों का निर्माण किया, हम अपने जैसे / अपने से बेहतर 24 व्यक्तियों को साधक / कार्यकर्ता बना दें तभी हम उनके पुत्र कहलायेंगे, इससे कम में बात नहीं बनेगी।
*  शान्तिकुन्ज में पाँच दिवसीय मौन (अंत:ऊर्जा) शिविर चलते हैं, अपने जिले में चालीस दिनों में एक दिन, एक दिवसीय मौन शिविर इस दौरान संचालित करें।
 * पूर्णाहुति, समस्त शक्तिपीठों पर एक साथ एक समय पर संपन्न हो।

कैसे करें ?- अनुशासन, अणुव्रत :-

1.  उपासना :: न्यूनतम 33 मालाओं का चालीस दिनों तक जप प्रतिदिन करना है, भले ही
दो या तीन चरणों में हो। जप के साथ हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर उदीयमान भगवान
सविता का ध्यान। जप से पूर्व अनुलाम- विलाम अथवा प्राणसंचार प्राणायाम करें। जप गिनती के लिये नही, अपितु उसकी गहराई को बढ़ाते हुये, भावविह्वल होकर करें। अपनी ही माला से जप करें।
2. साधना :: चालीस दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन, हो सके तो एक समय उपवास, सात्विक, अस्वाद व्रत, न्यूनतम दो घंटे मौन, अपनी सेवा अपने हाथों से, मेरा अनुष्ठान है इस बात का सार्वजनिक प्रचार न करना, अर्थ संयम, विचार संयम के साथ समय संयम का पालन का प्रयास करना। भाव शुद्धि, चित्त शुद्धि का अधिकाधिक प्रयास। साधना का अहंकार न पालें, पूज्यवर करा रहे हैं, यही भाव प्रकट हो। मोह से पिंड छुड़ाने हेतु कभी कभी शक्तिपीठ पर विश्राम करें। लोभ निवारण हेतु अपनी प्रिय वस्तुयें बांटने का प्रयत्न करें। चालीस दिनों तक निंदा से बचना, परिजनों की प्रशंसा को लक्ष्य बनावें, गुण ग्राहक बनें। स्वास्थ्य के अनुकूल हो तो, गोझरण/गौमूत्र/तुलसी जल का सेवन करें इससे ध्यान सहज लगेगा।
3. स्वाध्याय :: स्वाध्याय से श्रद्धा संवर्धन होता है। अत: गायत्री महाविज्ञान, हमारी वसीयत विरासत, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया, लोकसेवियों हेतु दिशा बोध इन पुस्तकों का अनिवार्य स्वाध्याय हो। हमको सब मालूम है इस अकड़ में न रहें, पुस्तकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
4. आराधना :: समयदान, जन संपर्क एवं देवालय सेवा का लक्ष्य रखें। परिणाम की चिंता किये बगैर 40 दिनों में न्यूनतम 10 लोगों तक साहित्य पहुँचा कर उनका हालचाल पूछें एवं अच्छे श्रोता की तरह सुनें, यथोचित समाधान दें। साप्ताहिक रूप से शक्तिपीठ / प्रज्ञापीठ / केन्द्र की स्वच्छता करना। स्नानगृह, शौचालय अनिवार्य रूप से स्वच्छ रखना। प्रज्ञा संस्थान दूर हो तो ग्राम के ही देवालय की स्वच्छता करना। समय बचाने हेतु वाटस्एप एवं अन्य सोशल मीडिया का विवेकयुक्त उपयोग करना।
5. अखण्ड जप/दीपयज्ञ :: इन चालीस दिनों में प्रत्येक साधक अपने निवास पर एक दिन का अखण्ड- जप रखे जिसका समापन दीपयज्ञ से होगा। इस तरह 24000 अखण्ड जप एवं इतने ही दीपयज्ञ भी संपन्न होंगे।
6. अंशदान :: चाय का खर्चा बचा कर 5 रु प्रतिदिन जमा कर रू 200.00 पूर्णाहुति में लगायें। यह क्रम वर्ष भर एवं निरंतर चलने दें। इसका उपयोग विद्या विस्तार में करें।
7. विशेष :: साधना के दौरान सूतक, अशौच इत्यादि की बाधा आवे तो उतने दिन आगे बढ़ा देवें परंतु इसे बहाना न बनावें। ये समस्त अनुशासन घर के लिये हैं, यात्रा, कार्यक्रम, बीमारी आदि में आपद्धर्म का पालन करें। अपनी ही माला से जप करें, हो सके तो अपना ही आसन लें। गोमुखी का प्रयोग अर्थात् माला को ढंक कर जप करें। स्वच्छ वस्त्रों में, संभव हो तो पीले में ही जप करें। अनुष्ठान के पूर्व यज्ञोपवीत को बदल लें। साप्ताहिक रूप से घर पर, संभव हो तो शक्तिपीठ पर यज्ञ में भाग लेवें।
8. चिन्तन :: साधना में हैं तो सारे काम बंद, ऐसा न करें। गुरु कार्य हेतु ही साधना कर रहे हैं, अत: गुरु कार्य ही जीवन साधना है इसका ध्यान रहे। हर सुबह नया जीवन- हर रात नई मौत का चिंतन, आत्म बोध, तत्व बोध की साधना हो। अन्य विषयों पर बेकार की चर्चा में भाग न लें, विनम्रतापूर्वक वहाँ से हट जायें।
9. मौन साधना :: चालीस दिनों में एक बार, एक दिन के मौन शिविर में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
10. वृक्ष गंगा अभियान :: 24000 साधक, तरुपुत्र / तरुमित्र योजना में भाग लेकर वृक्ष देव की स्थापना का संकल्प करें। वृक्ष को पितृवत्, मित्रवत् पालने, रक्षा करने एवं संवर्धन करने हेतु तत्पर हों।
11. पूर्णाहुति :: समस्त शक्तिपीठों में एक साथ एक समय पर संपन्न होगी। न्यूनतम 108 आहुतियाँ देनी ही हैं। साधकों के यज्ञ में कृपणता न हो। लोक जागरण के यज्ञ सादगी, मितव्ययिता के साथ संपन्न करावें किंतु इस पूर्णाहुति को भाव श्रद्धा से युक्त होकर करें। समस्त साधक अपने घर पर तैयार किये गये मिष्ठान्न का गायत्री माता को भोग लगायें। पूर्णाहुति पर कार्यकर्ता सम्मेलन में अनुयाज के संकल्प किये जायें।
12. ब्रह्मभोज :: अनुष्ठान के समापन पर ब्रह्मभोज हेतु सत्साहित्य का वितरण करें।
13. अनुयाज :: 24000 साधक 10 याजकों को प्रशिक्षित कर न्यूनतम दस घरों में 7 मई 2020, गुरुवार  ( वैशाख पूर्णिमा- बुद्ध पूर्णिमा ) को गृहे- गृहे यज्ञ अभियान में यज्ञ करावें तो व्यक्ति निर्माण के साथ वातावरण परिशोधन का क्रम एक साथ चल पड़ेगा एवं कार्यकर्ताओं का सुनियोजन भी होगा।
14. उपरोक्त अनुशासनों के पालन में अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें, अधिक कठोर अभ्यास से स्वास्थ्य संबंधी कष्ट हो सकता है अत: तदनुसार कार्य करें।

‘तुम्हारी शपथ हम, निरंतर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे॥’
आईये, प्रखर साधना अभियान हेतु आपको भाव- भरा आमंत्रण ॥


Registration,@

www.awgp.org http://diya.net.in/
 
https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSd9pL7DFc8ybxUFpWQj5wK2ERbVn1BnlGyfRCI6NFdYMKXG5w/viewform

विस्तृत मार्गदर्शन हेतु प.पू गुरुदेव द्वारा लिखित गायत्री की अनुष्ठान एवं पुरश्चरण साधनाएँ,  का सन्दर्भ लें|
शंका समाधान हेतु शान्तिकुन्ज से पत्र अथवा मेल से सम्पर्क करें।

Contact US : 

For any Question Mail Us:-
 youthcell@awgp.org
Contact No - 9258360652,
                        9258360600


पूर्ण शान्ति की प्राप्ति
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Poorn Shanti Ki Prapti
Pt Shriram Sharma Acharya
👇👇👇
https://youtu.be/XWDPHgjYpEg


हे प्रभो जीवन हमारा यज्ञ मय कर दीजिये

प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी
👇👇👇
https://youtu.be/dg1ixwuvNvc


देवत्व को बचाने, संघर्ष भी किये हैं।
Devatwa Ko Bachane Sangharsh Bhi Kiye Hai
प्रज्ञा गीत संगीत
श्रद्धेया शैलबाला पंड्या जीजी 
👇👇👇
https://youtu.be/7nHWFLcWZS0

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

Vartman Paristhitiyan | वर्तमान परिस्थितियाँ | Pt Shriram Sharma Acharya



Title

👉 जिंदगी का सफर-ये कैसा सफर

एक प्रोफेसर अपनी क्लास में कहानी सुना रहे थे, जोकि इस प्रकार है–

एक बार समुद्र के बीच में एक बड़े जहाज पर बड़ी दुर्घटना हो गयी। कप्तान ने शिप खाली करने का आदेश दिया। जहाज पर एक युवा दम्पति थे। जब लाइफबोट पर चढ़ने का उनका नम्बर आया तो देखा गया नाव पर केवल एक व्यक्ति के लिए ही जगह है। इस मौके पर आदमी ने औरत को धक्का दिया और नाव पर कूद गया।

डूबते हुए जहाज पर खड़ी औरत ने जाते हुए अपने पति से चिल्लाकर एक वाक्य कहा।

अब प्रोफेसर ने रुककर स्टूडेंट्स से पूछा – तुम लोगों को क्या लगता है, उस स्त्री ने अपने पति से क्या कहा होगा? ज्यादातर विद्यार्थी फ़ौरन चिल्लाये – स्त्री ने कहा – मैं तुमसे नफरत करती हूँ! I hate you!

प्रोफेसर ने देखा एक स्टूडेंट एकदम शांत बैठा हुआ था, प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम बताओ तुम्हे क्या लगता है?

वो लड़का बोला – मुझे लगता है, औरत ने कहा होगा – हमारे बच्चे का ख्याल रखना!

प्रोफेसर को आश्चर्य हुआ, उन्होंने लडके से पूछा – क्या तुमने यह कहानी पहले सुन रखी थी ? लड़का बोला- जी नहीं, लेकिन यही बात बीमारी से मरती हुई मेरी माँ ने मेरे पिता से कही थी।

प्रोफेसर ने दुखपूर्वक कहा – तुम्हारा उत्तर सही है!

प्रोफेसर ने कहानी आगे बढ़ाई – जहाज डूब गया, स्त्री मर गयी, पति किनारे पहुंचा और उसने अपना बाकि जीवन अपनी एकमात्र पुत्री के समुचित लालन-पालन में लगा दिया। कई सालों बाद जब वो व्यक्ति मर गया तो एक दिन सफाई करते हुए उसकी लड़की को अपने पिता की एक डायरी मिली। डायरी से उसे पता चला कि जिस समय उसके माता-पिता उस जहाज पर सफर कर रहे थे तो उसकी माँ एक जानलेवा बीमारी से ग्रस्त थी और उनके जीवन के कुछ दिन ही शेष थे।

ऐसे कठिन मौके पर उसके पिता ने एक कड़ा निर्णय लिया और लाइफबोट पर कूद गया। उसके पिता ने डायरी में लिखा था – तुम्हारे बिना मेरे जीवन को कोई मतलब नहीं, मैं तो तुम्हारे साथ ही समंदर में समा जाना चाहता था। लेकिन अपनी संतान का ख्याल आने पर मुझे तुमको अकेले छोड़कर जाना पड़ा।
जब प्रोफेसर ने कहानी समाप्त की तो, पूरी क्लास में शांति थी।

इस संसार में कईयों सही गलत बातें हैं लेकिन उसके अतिरिक्त भी कई जटिलतायें हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं। इसीलिए ऊपरी सतह से देखकर बिना गहराई को जाने-समझे हर परिस्थिति का एकदम सही आकलन नहीं किया जा सकता।

◆ कलह होने पर जो पहले माफ़ी मांगे, जरुरी नहीं उसी की गलती हो। हो सकता है वो रिश्ते को बनाये रखना ज्यादा महत्वपूर्ण समझता हो।

◇ दोस्तों के साथ खाते-पीते, पार्टी करते समय जो दोस्त बिल पे करता है, जरुरी नहीं उसकी जेब नोटों से ठसाठस भरी हो। हो सकता है उसके लिए दोस्ती के सामने पैसों की अहमियत कम हो।

■ जो लोग आपकी मदद करते हैं, जरुरी नहीं वो आपके एहसानों के बोझ तले दबे हों। वो आपकी मदद करते हैं क्योंकि उनके दिलों में दयालुता और करुणा का निवास है।

👉 नव निर्माण हेतु विभूतियों का आह्वान (भाग १)

यों सभी मनुष्य ईश्वर के पुत्र हैं, पर जिनमें विशेष विभूतियाँ चमकती हैं उन्हें ईश्वर के विशेष अंश की सम्पदा से सम्पन्न समझा जाना चाहिए। गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान कृष्ण ने विशिष्ट विभूतियों में अपना विशेष अंश होने की बात उदाहरणों समेत बताई है। यों जीवनयापन तो अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी करते हैं, पर जिनके पास विशेष शक्तियाँ, विभूतियाँ हैं, कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य वे ही कर पाते हैं। इसलिए भावनात्मक नव निर्माण जैसे युगान्तरकारी अभियानों में उनका विशेष हाथ रहना आवश्यक है।

विभूतियों को सात भागों में विभक्त कर सकते हैं। (१) भावना (२) शिक्षा-साहित्य (३) कला (४) सत्ता (५) सम्पदा (६) भौतिकी (७) प्रतिभा। इन सातों के सदुपयोग से ही व्यक्ति और समाज का कल्याण होता है।

(१) भावना (धर्म एवं अध्यात्म)-व्यक्तित्व को उत्कृष्ट और गतिविधियों को आदर्श बनाने की अन्तःप्रेरणा को भावना कहा जाता है। धर्म धारणा और अध्यात्म साधना के समस्त कलेवर को इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। पिछले दिनों कुछ कर्मकाण्डों, परम्पराओं एवं विधानों को पूरा कर लेना भर धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता समझी जाती रही है। वस्तुतः चरित्र गठन का नाम धर्म और अपनी क्षमताओं को लोक मंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाओं के कल्पना लोक में नहीं उड़ते रहना चाहिए वरन् उन्हें अपने तथा समाज के समग्र निर्माण में संलग्न होना चाहिए। यही उनका वास्तविक प्रयोजन भी है।

धर्म की प्राचीनता और दार्शनिकता से प्रभावित लोगों को कहा जा रहा है कि अपने सम्प्रदाय की संख्या बढ़ाने, धर्म परिवर्तन के प्रति उत्साह में शक्तियों का अपव्यय न करें। हमारा सतत प्रयास है सब धर्मों के प्रति परस्पर सहिष्णुता, समन्वय की वृत्ति उत्पन्न करना। वे अपने स्वरूप को भले ही पृथक बनाये रहे, पर विश्वधर्म का एक घटक बनकर रहें और अपने प्रभाव को चरित्र गठन एवं परमार्थ प्रयोजन में ही नियोजित करें। प्रथा परम्पराओं वाले कलेवर को गौण समझें। सभी धर्म सम्प्रदाय अपनी परम्पराओं में से उत्कृष्टता का अंश अपनाकर विश्व एकता के, उत्कृष्ट मानवता और आदर्श समाज रचना के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़े और एक ही केन्द्र पर केन्द्रित हो। धर्मों के जीवित रहने का, अपनी उपयोगिता बनाये रहने का मात्र यही तरीका है।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 असम्भव में सम्भव

जीवन के हर पल में विषमताएँ विपन्नताएँ एवं द्वन्द्व हैं। ये इतनी अधिक हैं कि इनको मिटाना असम्भव जान पड़ता है। जीवन के हर तल में, यहाँ तक कि मनुष्य के कण-कण में महाभारत का महासमर छिड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति नित नये कौरवी चालों और आघातों को झेलने एवं इनसे जूझने के लिए कुरुक्षेत्र में खड़ा है। महाभारत के ऐतिहासिक क्षण बीत चुके, ऐसा नहीं है। यह महासमर तो अभी भी जारी है। नये बच्चे के साथ पैदा हो रहा है।
  
गीता में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा है, क्योंकि यहाँ निर्णय होता है धर्म और अधर्म का, प्रकाश और अंधकार का, प्रेम एवं घृणा का। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर निर्णायक घटना घटित होती है। इसीलिए तो भारी चिंता है, किसी को कहीं राहत नहीं है, आदमी बेचैन है। इस बेचैनी के बड़े कारण भी हैं, क्योंकि घृणा के पक्ष में, अंधकार और अधर्म के पक्ष में बड़ी फौज है। महाभारत में कृष्ण की नारायणी सेना कौरवों के ही साथ थी। केवल कृष्ण, वे भी पूरी तरह से निहत्थे पाण्डवों के साथ थे। यह बात बड़ी अर्थपूर्ण है। जिन्दगी के भी यही हाल हैं। संसार की सारी शक्तियाँ आज अधर्म एवं अँधेरे के पक्ष में हैं। संसार की शक्तियाँ यानि कि परमात्मा की सेना, कृष्ण की समूची नारायणी सेना। केवल कृष्ण भर अपने पक्ष में हैं, वे भी बिना किसी हथियार के । भरोसा नहीं होता कि जीत अपनी ही हो सकेगी। पूरी तरह से असम्भव लगता है कि निहत्थे परमात्मा के साथ विजय कैसे हो सकेगी।
  
कृष्ण अर्जुन के ही सारथी थे, ऐसा नहीं है। हमारी जिन्दगी के रथ पर भी जो सारथी बैठा है, वे कृष्ण ही हैं। प्रत्येक के भीतर परमात्मा ही रथ को सम्भाल रहे हैं। लेकिन सामने विरोध में दिखाई दे रही है, बड़ी सेनाएँ, घातक व्यूह रचनाएँ, चतुर चालों एवं षड्यंत्रों का बड़ा विराट् आयोजन। ऐसे असम्भव में घबराहट स्वाभाविक है। अर्जुन भी घबराया था। हमारे भी हाथ-पाँव थरथरा रहे हैं। सब तरह से, गणित के हर ढंग से, प्रत्येक तर्क से हार सुनिश्चित मालूम पड़ रही है और जीत असम्भव। लेकिन इस असम्भव में सम्भव घटित हो सकता है, यदि कृष्ण के ‘मामेकंशरण व्रज’ की स्वर लहरियों को सुना जा सके। जो कृष्ण को समर्पित हैं, जिनके जीवन के हर कर्म अपने हृदय में वास करने वाले परमात्मा को अर्पित हैं, जीवन में अंतिम विजय उन्हीं की होती है। उनके जीवन के प्रत्येक असम्भव में सम्भव साकार होते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५२

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 8)

Q.8. What is a Beej Mantra? How is it applied?

Ans. All religions of the world make use of a part of their scriptures as a representative Beej Mantra. Thus Mohammedans have their Kalma the Christians Baptism, and the Jains Namonkar Mantra. The Gayatri Mantra is the Beej Mantra for the Hindus.

An abbreviation of a Ved Mantra is also known as its Beej Mantra. Literally the word ‘Beej’ Means ‘Seed’. In the seed are inherent all the characteristics of the tree. The DNA of a person is also akin to the seed of a plant, since it contains all genetic characteristics of a living organism. Beej Mantras, like the microchips in the computer, are small but extraordinarily effective for invocation of specific streams of divine powers for particular objectives. The application of Beej Mantras, however , belongs to Tantrik System and these can only be made use of under the guidance of an expert.

In Gayatri Mantra as a whole, there are Beej Mantras Bhur, Bhuwaha and Swaha, corresponding to each of its three segments. Besides, each of its 24 letters has a beej Mantra of its own. The Beej Mantra in Gayatri is applied after the ‘Vyahriti’ (Bhur  Bhuwaha Swaha) prefixing “Tatsaviturvarniyam...” It is also used as a suffix (samput) after “Prachodayat. (Ref. “Gayatri Ka Har Akshar Shakti Shrot”).

Q.9. How is rishi Vishwamitra related to Gayatri Mantra?   

Ans. Vishwamitra was the first rishi of this kalpa (the present cycle of creation) who could access all powers of Gayatri. In spiritual parlance,  he was the first master of  Gayatri Sadhana. Rishi Vishwamitra standardised the procedures of Gayatri Sadhana for the common man.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 42

👉 गायत्री और यज्ञ

भारत की प्रसुप्त अंतरात्मा को जगाने के लिए ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना सर्वप्रथम कार्य है। इन दोनों के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इनमें से एक की भी कमी हो जाती है, तो अधःपतन आरंभ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है-विद्या बुद्धिमत्ता, विवेक दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्याय प्रियता। विज्ञान का अर्थ है- योग्यता, साधन, शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है, तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिए ज्ञान की और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
  
आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों तथा विज्ञान मशीनों पर अवलंबित है। भौतिक जानकारी तथा शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए भौतिक उपकरणों का ही आज के वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं यह तरीका बहुत खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्पफलदायक एवं अचिर-अस्थायी है जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंतःकरण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिए आत्म त्याग करने की भावना पैदा नहीं होती। आज का तथाकथित ज्ञान मनुष्य को अधिक स्वार्थी, खर्चीला एवं बनावट पसंद बनाता जा रहा है। दूसरी ओर जो वैज्ञानिक उन्नति हो रही है, उससे एक ओर जहाँ थोड़ा-सा लाभ होता है, दूसरी ओर उससे अधिक हानि हो जाती है।
  
प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे। आज जिस प्रकार हर वस्तुतः जड़ जगत् में से, भौतिक परमाणुओं में से खोजी जाती और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक बात, प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत् में से ढूँढ़ी जाती थी। आज का आधार भौतिकता है, प्राचीनकाल का आधार आध्यात्मिकता था।
  
ज्ञान और विज्ञान की हमारी प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होती थी, क्योंकि यही दोनों अध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं। गायत्री ज्ञान रुपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है। गायत्री मंत्र के ख्ब् अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार प्रदर्शन करने वाली शिक्षाएँ भरी हुई हैं। इसके अतिरिक्त इन अक्षरों का गुंथन रहस्यमय विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है। इन अक्षरों के नियमित उपासना से अलौकिक शक्तियाँ एवं आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सकता है।
  
यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। वेदमंत्रों की शब्द शक्ति को विशिष्ट कुण्डों, समिधाओं, हवियों चरुओं के साथ उत्पन्न की हुई विशेष सामर्थ्यवान अग्नि में सम्मिश्रित कर देने पर रेडियो सक्रिय शक्ति तरंगों का आविर्भाव होता है। यह शक्ति तरंगें रैडार यंत्र की तरह संसार के किसी भी भाग में भेजी जा सकती है, किसी व्यक्ति विशेष प्रयोजन के शरीर में भरी जा सकती है, प्रकृति के गुह्य गह्वर में किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रविष्ट कराई जा सकती है।
  
सांस्कृतिक पुनरुत्थान ज्ञान और विज्ञान के बिना असंभव है। भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र गायत्री है। उसकी शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। भौतिक माता-पिता हमें शरीर संपत्ति, शिक्षा सुविधा, आश्रय, सहयोग, स्नेह आदि बहुत कुछ देते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता की यदि हम प्रतिष्ठा और उपासना करें, तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

👉 जिसे आप नही पचा सकते हो उसे भला कोई और कैसे पचा पायेगा .....?

राजा अक्षय का राज्य बहुत सुन्दर, समृध्द और शांत था।  राजा महावीर और एक पराक्रमी योद्धा थे ! परन्तु सुरक्षा को लेकर अक्षय कुछ तनाव में रहते थे क्योंकि सूर्यास्त के बाद शत्रु अक्सर उनके राज्य पर घात लगाकर आक्रमण करते रहते थे परन्तु कभी किसी शत्रु को कोई विशेष सफलता न मिली क्योंकि उनका राज्य एक किले पर स्थित था और पहाडी की चढ़ाई नामुंकिन थी और कोई भी शत्रु दिन में विजय प्राप्त नही कर सकता था !

राज्य में प्रवेश के लिये केवल एक दरवाजा था और दरवाजे को बँद कर दे तो शत्रु लाख कोशिश के बावजूद भी अक्षय के राज्य का कुछ नही बिगाड़ सकते थे !
मंत्री राजकमल हमेशा उस दरवाजे को स्वयं बँद करते थे !

एकबार मंत्री और राजा रात के समय कुछ विशेष मंत्रणा कर रहे थे तभी शत्रुओं ने उन्हे बन्दी बनाकर कालकोठरी में डाल दिया !

कालकोठरी में राजा और मंत्री बातचीत कर रहे थे ......

अक्षय - क्या आपने अभेद्य दरवाजे को ठीक से बन्द नही किया था मंत्री जी ?

राजकमल - नही राजन मैंने स्वयं उस दरवाजे को बन्द किया था !

वार्तालाप चल ही रही थी की वहाँ शत्रु चंद्रेश अपनी रानी व उसके भाई के साथ वहाँ पहुँचा जब अक्षय ने उन्हे  देखा तो अक्षय के होश उड़ गये! और राजा अक्षय अपने गुरुदेव से मन ही मन क्षमा प्रार्थना करने लगे ! फिर शत्रु व उसकी रानी वहाँ से चले गये !

राजकमल - क्या हुआ राजन? किन विचारों में खो गये ?

अक्षय - ये मैं तुम्हे बाद में बताऊँगा पहले यहाँ से बाहर जाने की तैयारी करो !

राजकमल - पर इस अंधेर कालकोठरी से बाहर निकलना लगभग असम्भव है राजन !

अक्षय - आप उसकी चिन्ता न कीजिये कल सूर्योदय तक हम यहाँ से चले जायेंगे ! क्योंकि गुरुदेव ने भविष्य को ध्यान में रखते हुये कुछ विशेष तैयारियाँ करवाई थी !

कालकोठरी से एक गुप्त सुरंग थी जो सीधी राज्य के बाहर निकलती थी जिसकी पुरी जानकारी राजा के सिवा किसी को न थी और उनके गुरुदेव ने कुछ गहरी राजमय सुरंगों का निर्माण करवाया था और राजा को सख्त आदेश दिया था की इन सुरंगों का राज किसी को न देना, राजा रातोंरात वहाँ से निकलकर मित्र राष्ट्र में पहुँचे सैना बनाकर पुनः आक्रमण किया और पुनः अपने राज्य को पाने में सफल रहे।

परन्तु इस युध्द में उनकी प्रिय रानी, उनका पुत्र और आधी से ज्यादा जनता समाप्त हो चुकी थी! जहाँ चहुओर वैभव और समृद्धता थी राज्य शान्त था खुशहाली थी आज चारों तरफ सन्नाटा पसरा था मानो सबकुछ समाप्त हो चुका था!

राजकमल - हॆ राजन मॆरी अब भी ये समझ में नही आया की वो अभेद्य दरवाजा खुला कैसे? शत्रु ने प्रवेश कैसे कर लिया? जब की हमारा हर एक सैनिक पुरी तरह से वफादार है आखिर गलती किसने की ?

अक्षय - वो गलती मुझसे हुई थी मंत्रीजी! और इस तबाही के लिये मैं स्वयं को जिम्मेदार मानता हूँ यदि मैंने गुरू आदेश का उल्लंघन न किया होता तो आज ये तबाही न आती मॆरी एक गलती ने सबकुछ समाप्त कर दिया ..!

राजकमल - कैसी गलती राजन?

अक्षय - शत्रु की रानी का भाई जयपाल कभी मेरा बहुत गहरा मित्र हुआ करता था और उसके पिता अपनी पुत्री का विवाह मुझसे करना चाहते थे पर विधि को कुछ और स्वीकार था और फिर एक छोटे से जमीनी विवाद की वजह से वो मुझे अपना शत्रु मानने लगा! और इस राज्य में प्रवेश का एक और दरवाजा है जो गुरुदेव और मेरे सिवा कोई न जानता था और गुरुदेव ने मुझसे कहा था की शत्रु कब मित्र बन जाये और मित्र कब शत्रु, कोई नही जानता है इसलिये जिन्दगी में एक बात हमेशा याद रखना की जो राज तुम्हे बर्बाद कर सकता है उस राज को राज ही रहने देना कोई कितना भी घनिष्ठ क्यों न हो उसे भी वो राज कभी मत बताना जिसकी वजह से तुम्हारा पतन हो सकता है!

और बस यही पर मैंने वो गलती कर दी और वो राज उस मित्र को जा बताया जो शत्रु की रानी का भाई था! जो कभी मित्र था राजदार था वही आगे जाकर शत्रु हो गया इसीलिये आज ये हालात हो गये!

राजा राज्य को चारों तरफ से सुरक्षित करके मंत्री को सोप दिया और स्वयं वन को चले गये !

ऐसा कोई भी राज जो गोपनीय रखा जाना बहुत आवश्यक हो जिस राज के बेपर्दा होने पर किसी प्रकार का अमंगल हो सकता है सम्भवतः उसे घनिष्ठ से घनिष्ठ व्यक्ति को भी मत बताना क्योंकि काल के गर्भ में क्या छिपा कौन जाने? जिसे आप स्वयं राज नही रख सकते हो उसकी उम्मीद किसी और से क्यों करते हो की वो उस राज को राज बनाये रखेगा .......

आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (अन्तिम भाग)

आज की दुःखद परिस्थितियों के लिए भूतकाल की भूलों पर दृष्टिपात किया जा सकता है। इसी प्रकार सुखी समुन्नत होने के सम्बन्ध में भी पिछले प्रयासों को श्रेय दिया जा सकता है। इस पर्यवेक्षण का सीधा निष्कर्ष यही निकलता है कि अशुभ विगत को धैर्यपूर्वक सहन करें या फिर उसका प्रायश्चित करके परिशोधन की बात सोचें। शुभ पूर्वकृत्यों पर सन्तोष अनुभव करें और उस सत्प्रवृत्ति को आगे बढ़ाये। यह नीति निर्धारण की बात हुई। अब देखना यह है कि आधि-व्याधियों के रूप में अशुभ कर्मों की काली छाया सिर पर घिर गई है तो उसके निवारण का कोई उपाय है क्या?

जो कर्मफल पर विश्वास न करते हों, उन्हें भी मानवी अन्तःकरण की संरचना पर ध्यान देना चाहिए और समझना चाहिए कि वहाँ किसी के साथ कोई पक्षपात नहीं। पूजा प्रार्थना से भी दुष्कर्मों का प्रतिफल टलने वाला नहीं है। देव-दर्शन, तीर्थ-स्नान आदि से इतना ही हो सकता है कि भावनायें बदलें, भविष्य के दुष्कृत्यों की रोकथाम बन पड़े। अधिक बिगड़ने वाले भविष्य की सम्भावना रुके। पर जो किया जा चुका, उसका प्रतिफल सामने आना ही है। उसके उपचार के लिए शास्त्रीय परम्परा और मनःसंस्थान की संरचना को देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि खोदी हुई खाई को पाटा जाय। प्रायश्चित के लिए भी वैसा ही साहस जुटाया जाय, जैसा कि दुष्कर्म करते समय मर्यादा उल्लंघन के लिए अपनाया गया था। यही एकमात्र उपचार हैं, जिससे दुष्कर्मों की उन दुःखद प्रक्रियाओं का समाधान हो सकता है, जो शारीरिक रोगों, मानसिक विक्षोभों, विग्रहों, विपत्तियों, प्रतिकूलताओं के रूप में सामने उपस्थित हो कर जीवन को दूभर बनाये दे रही हैं। यह विषाक्तता लदी ही रही, तो भविष्य के अन्धकारमय होने की भी आशंका है। अस्तु प्रायश्चित प्रक्रिया को अपनाकर वर्तमान भविष्य को और सुखद बनाना ही दूरदर्शिता है।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 सम्भावनाओं की सुबह, संघर्षों के दिन

इक्कीसवीं सदी के इस नववर्ष ने देश और धरती को सम्भावनाओं की सुबह का अनूठा उपहार दिया है। इस नये वर्ष 2020 में सम्भावनाएँ हैं, भविष्य के नये उजाले की, नयी मुस्कराहटों की, नयी समृद्धि एवं खुशहाली की। लेकिन इन सम्भावनाओं को साकार करने में संघर्ष भी कम नहीं है। सुबह यदि सम्भावनाओं की है तो दिन संघर्षों का है। हाँ यह सच है कि नववर्ष की हर नयी सुबह-सम्भावनाओं के नये संदेश लायेगी, पर इन्हें साकार वही कर पायेंगे जो नये साल के हर दिन को अपने संघर्षों की चुनौती समझेंगे। यह सच व्यक्ति के जीवन का है तो परिवार के जीवन का भी। समाज, राष्ट्र और विश्व भी इससे अलग नहीं है।
  
नववर्ष के पटल पर उभर रहे दृश्यों की गहरी पड़ताल करें तो एक ही सच सब के लिए है कि प्रकृति एवं प्रवृत्ति में बढ़ रहे अंधाधुंध प्रदूषण को रोकना है। क्योंकि इसी ने उज्ज्वल भविष्य की सभी सम्भावनाओं को रोक रखा है। प्रकृति में असंतुलित प्रदूषण ने ही भूकम्प, बाढ़ जैसी विनाशकारी आपदाओं के भयावह दृश्य खड़े किये हैं। दिल-दहला देने वाली इन महा-आपदाओं से उपजी करुण-कराह की अनसुनी भला कौन कर सकता है? ठीक यही, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा तबाही इंसानी प्रवृत्तियों में आये प्रदूषण ने की है।
  
इंसान की अपनी ही प्रदूषित प्रवृत्तियाँ हैं जो रोज नये बम धमाके करती हैं। सामूहिक हत्या एवं खौफनाक संहार के विद्रूप आयोजन करती हैं। इंसानियत का संघर्ष इन्हीं से है। संवेदनशीलों को अपने अंदर बलिदानी साहस पैदा करना है। प्रकृति एवं प्रवृत्ति के इस विनाशकारी ताण्डव नर्तन को आज और अभी से रोकना है। अब यह न पूछें कि शुरुआत कहाँ से करनी है?
  
क्योंकि इसके जवाब में सारी ऊँगलियाँ हमारी अपनी ओर ही उठ रही हैं। व्यक्ति के रूप में हमें ही व्यक्तिगत शुरुआत करनी है। समाज के जिम्मेदार घटक के रूप में हमें ही इसके सामूहिक आयोजन करने हैं। यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय भी है और विश्व भर की भी। स्वस्थ प्रकृति एवं स्वच्छ प्रवृत्ति को अपना ध्येय वाक्य माने बिना उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ साकार नहीं होंगी। लेकिन इसे कर वही पायेंगे जो अपनी हर सुबह को सम्भावनाओं की सुबह और हर दिन को संघर्षों का दिन बना लेंगे।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५०

👉 गायत्री का अवलम्बन परम श्रेयस्कर

गायत्री उपासना से मानव शरीर में सन्निहित अगणित संस्थानों में से कितने ही जाग्रत एवं प्रखर हो चलते हैं। इस जागृति का प्रभाव मनुष्य के व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित होने में सहायक सिद्ध होता है।
  
व्यायाम से शरीर पुष्ट होता है, अध्ययन से विद्या आती है, श्रम करने से धन कमाया जाता है, सत्कर्मों से यश मिलता है। सद्गुणों से मित्र बढ़ते हैं। इसी प्रकार उपासना द्वारा अंतरंग जीवन में प्रसुप्त पड़ी हुई अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ सजग हो उठती हैं और उस जागृति का प्रकाश मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक विशिष्टता का रूप धारण करके प्रकट करता हुआ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री उपासक में तेजस्विता की अभिवृद्धि स्वाभाविक है। तेजस्वी एवं मनस्वी व्यक्ति स्वभावतः हर दिशा में सहज सफलता प्राप्त करता चलता है।
  
मानवीय मस्तिष्क में जो शक्ति केन्द्र भरे पड़े हैं, उनका पूरी तरह उपयोग कर सकना तो दूर, अभी मनुष्य को उनका परिचय भी पूरी तरह नहीं मिला है। मनोवैज्ञानिकों को अंतर्मन की जितनी जानकारी अभी तक विशाल अनुसंधानों के बाद मिल सकी है, उसे वे दो प्रतिशत जानकारी मानते हैं। इसी प्रकार शरीर शास्त्री डॉक्टरों ने बाहरी मस्तिष्क का केवल आठ प्रतिशत ज्ञान प्राप्त किया है शेष के बारे में वे अभी भी अनजान हैं। मस्तिष्क सचमुच एक जादू का पिटारा है। इसमें सोचने समझने की क्षमता तो है ही, साथ ही उसमें ऐसे चुम्बक तत्त्व भी हैं, जो अनंत आकाश में भ्रमण करने वाली अद्भुत सिद्धियों, विभूतियों एवं सफलताओं को अपनी ओर खींचकर आकर्षित कर सकते हैं, सूक्ष्म जगत् में अपने अनुकूल वातावरण बना सकते हैं। मनोबल बढ़ने से ऐसी विद्युत धारा अंतर्मन के प्रसुप्त क्षेत्रों में गतिशील हो जाती है कि अब तक अपने प्रयोजन में आया हुआ मस्तिष्कीय चुम्बक सक्रिय हो उठता है और वे उपलब्धियाँ सामने लाकर खड़ी कर देता है, जिन्हें आमतौर से सिद्धियाँ, विभूतियों का वरदान एवं दैवीय सहायता कहा जा सके।
  
उपासना में बरती गई तपश्चर्या से द्रवित होकर गायत्री माता ने अमुक सिद्धि या सफलता प्रदान की। यह भावुक भक्त का दृष्टिकोण है। इसी तथ्य का वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि कठोर नियम, प्रतिबंधों का पालन करने में जो प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ी, उसने मनोबल का विकास किया। उसने अंतर्मन के प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों का चुम्बकत्व जगाया और उसी जागरण ने अभीष्ट सफलताएँ खींचकर सामने ला खड़ी कर दीं। मनुष्य अपने आप में एक देवता है। उसके भीतर वे समस्त दैवी शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान रहती हैं, जो इस विश्व में अन्यत्र कहीं भी हो सकती हैं। अन्यत्र रहने वाले देवता अपनी निर्धारित जिम्मेदारियाँ पूरी करने में लगे रहते हैं। वे हमारे व्यक्तिगत कामों में इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं ले सकते कि अगणित उपासकों या भक्तों की अगणित प्रकार की समस्याओं के सुलझाने में सहयोगी हो सकें। हमारी समस्याओं को हल करने की क्षमता हमारे अपने भीतर रहने वाले देवता में ही होती है और उसी को किसी अनुष्ठान द्वारा सशक्त एवं गतिशील बना करके साधक को अपना प्रयोजन वस्तुतः आप ही पूरा करना पड़ता है।
  
गायत्री उपासना मनुष्य जीवन को बहिरंग एवं अंतरंग दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध और समुन्नत बनाने का राजमार्ग है। बाह्य उपचार से बाह्य जीवन की प्रगति होती है, पर अंतरंग विकास के बिना उसमें पूर्णता नहीं आ पाती। बाहरी जीवन की विशेषताएँ छोटा सा शोक, संताप, रोग, कष्ट अवरोध एवं दुर्दिन सामने आते ही अस्त-व्यस्त हो जाती है, पर जिस व्यक्ति के पास आंतरिक दृढ़ता, समृद्धि एवं क्षमता है, वह बाहर के जीवन में बड़े से बड़ा अवरोध आने पर भी सुस्थिर बना रहता है और भयानक भँवरों को चीरता हुआ अपनी नाव पार ले जाता है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक शांति के लिए उपासना की वैज्ञानिक प्रक्रिया अचूक साधना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

👉 ईश्वर और विज्ञान

1970 के समय तिरुवनंतपुरम में समुद्र के पास एक बुजुर्ग भगवद्गीता पढ़ रहे थे। तभी एक नास्तिक और होनहार नौजवान उनके पास आकर बैठा, उसने उन पर कटाक्ष किया कि लोग भी कितने मूर्ख है विज्ञान के युग मे गीता जैसी ओल्ड फैशन्ड बुक पढ़ रहे है। उसने उन सज्जन से कहा कि आप यदि यही समय विज्ञान को दे देते तो अब तक देश ना जाने कहाँ पहुँच चुका होता, उन सज्जन ने उस नौजवान से परिचय पूछा तो उसने बताया कि वो कोलकाता से है और विज्ञान की पढ़ाई की है अब यहाँ भाभा परमाणु अनुसंधान में अपना कैरियर बनाने आया है।

आगे उसने कहा कि आप भी थोड़ा ध्यान वैज्ञानिक कार्यो में लगाये भगवद्गीता पढ़ते रहने से आप कुछ हासिल नही कर सकोगे।

सज्जन मुस्कुराते हुए जाने के लिये उठे, उनका उठना था की 4 सुरक्षाकर्मी वहाँ उनके आसपास आ गए, आगे ड्राइवर ने कार लगा दी जिस पर लाल बत्ती लगी थी। लड़का घबराया और उसने उनसे पूछा "आप कौन है??"

उन सज्जन ने अपना नाम बताया 'विक्रम साराभाई' जिस भाभा परमाणु अनुसंधान में लड़का अपना कैरियर बनाने आया था उसके अध्यक्ष वही थे।

उस समय विक्रम साराभाई के नाम पर 13 अनुसंधान केंद्र थे, साथ ही साराभाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने परमाणु योजना का अध्यक्ष भी नियुक्त किया था।

अब शर्मसार होने की बारी लड़के की थी वो साराभाई के चरणों मे रोते हुए गिर पड़ा। तब साराभाई ने बहुत अच्छी बात कही, उन्होंने कहा
"हर निर्माण के पीछे निर्माणकर्ता अवश्य है। इसलिए फर्क नही पड़ता ये महाभारत है या आज का भारत, ईश्वर को कभी मत भूलो।"

आज नास्तिक गण विज्ञान का नाम लेकर कितना नाच ले मगर इतिहास गवाह है कि विज्ञान ईश्वर को मानने वाले आस्तिकों ने ही रचा है, फिर चाहे वो किसी भी धर्म को मानने वाले क्यो ना हो।
ईश्वर सत्य है।

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग ४)

न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों की भी इन दिनों बाढ़ आई हुई है। सिर दर्द, आधा शीशी, जुकाम, अनिद्रा, उन्माद, बेहोशी के दौरे आदि तो प्रत्यक्ष और प्रकट मस्तिष्कीय रोग हैं। चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, आत्महीनता जैसे अवसाद और क्रोध, अधीरता, चंचलता, उद्दण्डता, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रमण जैसे आवेश मनःसंस्थान को ज्वार-भाटों की तरह असंतुलित बनाये रहते हैं। फलतः मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग निरर्थक चला जाता है एवं अनर्थ बुनने में लगा रहता है। अपराधी दुष्प्रवृत्तियों से लेकर आत्म हत्या तक की अगणित उत्तेजनाएँ विकृत मस्तिष्क के उपार्जन ही तो हैं। तरह-तरह की सनकों के कितने ही लोग सनकते रहते हैं और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते हैं। दुर्व्यसनों और बुरी आदतों से ग्रसित व्यक्ति अपना तथा अपने साथियों का कितना अहित करते हैं, यह सर्वविदित है। पागलों की संख्या तो संसार में तेजी के साथ बढ़ रही है। जनसंख्या इसी चपेट में आई हुई दिखाई पड़ेगी। शारीरिक रोगों का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। दुर्बलता और रुग्णता से सर्वथा अछूते व्यक्ति ही बहुत स्वल्प संख्या में मिलेंगे।

रंगाई से पूर्व धुनाई आवश्यक है। यदि कपड़ा मैला-कुचैला है, तो उस पर रंग ठीक तरह न चढ़ेगा। इस प्रयास में परिश्रम, समय और रंग सभी नष्ट होंगे। कपड़े को ठीक तरह धो लेने के उपरान्त उसकी रंगाई करने पर अभीष्ट उद्देश्य पूरा होता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए की गई साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग-पग पर कठिनाई उत्पन्न करते है। दीवार बीच में हो तो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय-कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।

उपासना का प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्मशोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति, वस्ति, न्यौली-व्रजोली आदि क्रियाएँ करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम-नियमों में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका-चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण-कर्म को सुधारा जाय और पिछले जमा कूड़े करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के कायाकल्प विधान में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन आदि कृत्यों द्वारा पहले मल-शोधन किया जाता है, तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म-साधना के सम्बन्ध में भी आत्मशोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 What are “Vyahritis”?

Q.7. What are “Vyahritis”?

Ans.  The Gayatri Mantra begins with enunciation of “Om” (Amen in Christianity and Aameen in Islam are its variants). “Om” is believed to be resonating all over the cosmos as the primordial sound. Spiritual-science considers it as one of the cosmic representations of omnipresent GOD (Shabda Brahma or Nad Brahma). Devotees attempt to simulate “Om” in audible frequencies by blowing in a conch shell, sounding a gong, ringing a large bell or simply by pronouncing “O-O-O-M”.

The ‘Vyahritis’ Bhoor, Bhuwaha and Swaha are the three amongst the five elemental streams of primordial energy emanating from “Om” (Ref. Gayatri Tatva Bodh). Spiritual-science refers to these streams as Brahma (The Creator), Vishnu (The sustainer), Mahesh (The Destroyer). The three primary attributes of animate and inanimate components of the cosmos - Sat, Raj and Tam are also known as Vyahritis. Though not part of the text of ‘Gayatri Mantra’, the ‘Vyahritis’ are considered as the fountainhead (Shirsha) of this Mantra and are used as its prefix.
Q.8. What is a Beej Mantra? How is it applied?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 41

👉 क्या हम मनुष्य हैं?

क्या हम मनुष्य हैं? अटपटे से लगने वाले इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा है। संवेदना में जितनी हमारी गहराई होगी-मनुष्यता में उतनी ही ऊँचाई होगी। और संग्रह में जितनी ऊँचाई होगी, मनुष्यता में उतनी ही नीचाई होगी। संवेदना और संग्रह जिन्दगी की दो दिशाएँ हैं। संवेदना सम्पूर्ण हो तो संग्रह शून्य हो जाता है। और जिनके चित्त संग्रह की लालसा से घिरे रहते हैं, संवेदना वहाँ अपना घर नहीं बसाती।
  
अरब देश की एक मलिका ने अपनी मौत के बाद कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का हुक्म जारी किया- ‘इस कब्र में अपार धन राशि गड़ी हुई है। जो व्यक्ति अत्यधिक निर्धन, दीन-दरिद्र और अशक्त हो, वह उसे खोदकर प्राप्त कर सकता है।’ कब्र बनाये जाने के बाद से हजारों दरिद्र और भिखमंगे उधर से गुजरे लेकिन उनमें से कोई भी इतना दरिद्र नहीं था कि धन के लिए किसी मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदे। एक अत्यन्त बूढ़ा और दरिद्र भिखमंगा उस कब्र के पास सालों से रह रहा था। जो उधर से गुजरने वाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को कब्र पर लगे हुए पत्थर की ओर इशारा कर देता था।
  
और फिर आखिरकार वह इंसान भी आ पहुँचा, जिसकी दरिद्रता इतनी ज्यादा थी कि वह उस कब्र को खोदे बिना नहीं रह सका। अचरज की बात तो यह थी कि कब्र खोदने वाला यह व्यक्ति स्वयं एक सम्राट था। उसने कब्र वाले इस देश को अभी-अभी जीता था। अपनी जीत के साथ ही उसने बिना समय गँवाये उस कब्र की खुदाई का काम शुरु कर दिया। लेकिन कब्र की गहराई में उसे अपार धनराशि की बजाय एक पत्थर मिला, जिस पर लिखा हुआ था, ऐ कब्र खोदने वाले इंसान, तू अपने से सवाल कर-क्या तू सचमुच मनुष्य है?
  
निश्चय ही जो मनुष्य है, वह भला मृतकों को सताने के लिए किस तरह तैयार हो सकता है। लेकिन जो धन के लिए जिन्दा इंसानों को मुरदा बनाने के लिए तैयार हो, उसे भला इससे क्या फर्क पड़ता है। निराश व अपमानित वह सम्राट जब कब्र से वापस लौट रहा था तो लोगों ने कब्र के पास रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को जोर से हँसते देखा। वह कह रहा था-मैं सालों से इंतजार कर रहा था, अंततः आज धरती के सबसे अधिक निर्धन, दरिद्र एवं अशक्त व्यक्ति का दर्शन हो ही गया। सचमुच संवेदना जिस हृदय में नहीं है, वही दरिद्र, दीन और अशक्त है। जो संवेदना के अलावा किसी और सम्पत्ति के संग्रह के फेर में रहता है, एक दिन उसकी सम्पदा ही उससे पूछती है-क्या तू मनुष्य है? और आज हम पूछें अपने आपसे-क्या हम मनुष्य हैं?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४९

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (अन्तिम भाग)

चरित्रवान् बनने के लिये अपनी आत्मिक शक्ति जगाने की आवश्यकता होती है। तप, संयम और धैर्य से आत्मा बलवान बनती है। कामुकता, लोलुपता व इन्द्रिय सुखों की बात सोचते रहने से ही आत्म-शक्ति का ह्रास होता है। अपने जीवन में कठिनाइयों और मुसीबतों को स्थान न मिले तो आत्म-शक्ति जागृत नहीं होती। जब तक कष्ट और कठिनाइयों से जूझने का भाव हृदय में नहीं आता तब तक चरित्रवान् बनने की कल्पना साकार रूप धारण नहीं कर सकती।

चरित्र-निर्माण के लिये साहित्य का बड़ा महत्व है। महापुरुषों की जीवन कथायें पढ़ने से स्वयं भी वैसा बनने की इच्छा होती है। विचारों को शक्ति व दृढ़ता प्रदान करने वाला साहित्य आत्म-निर्माण में बड़ा योग देता है। इससे आन्तरिक विशेषताएं जागृत होती हैं। अच्छी पुस्तकों से प्राप्त प्रेरणा सच्चे मित्र का कार्य करती हैं। इससे जीवन की सही दिशा का ज्ञान होता है। इसके विपरीत अश्लील साहित्य अधःपतन का कारण बनता है। जो साहित्य इन्द्रियों को उत्तेजित करे, उससे सदा सौ कोस दूर रहें। इनसे चरित्र दूषित होता है। साहित्य का चुनाव करते समय यह देख लेना अनिवार्य है कि उसमें मानवता के अनुरूप विषयों का सम्पादन हुआ है अथवा नहीं? यदि कोई पुस्तक ऐसी मिल जाय तो उसे ही सच्ची रामायण, गीता, उपनिषद् मानकर वर्णित आदर्शों से अपने जीवन को उच्च बनाने का प्रयास करें तो चारित्रिक संगठन की बार स्वतः पूरी होने लगती है।

हमारी वेषभूषा व खानपान भी हमारे विचारों तथा रहन-सहन को प्रभावित करते हैं। भड़कीले, चुस्त व अजीब फैशन के वस्त्र मस्तिष्क पर अपना दूषित प्रभाव डालने से चूकते नहीं। इनसे हर घड़ी सावधान रहें। वस्त्रों में सादगी और सरलता मनुष्य की महानता का परिचय है। इससे किसी भी अवसर पर कठिनाई नहीं पड़ती। मन और बुद्धि की निर्मलता, पवित्रता पर इनका बड़ा सौम्य प्रभाव पड़ता है। यही बात खान-पान के सम्बन्ध में भी है। आहार की सादगी और सरलता से विचार भी वैसे ही बनते हैं। मादक द्रव्य मिर्च, मसाले, मांस जैसे उत्तेजक पदार्थों से चरित्र-बल क्षीण होता है और पशुवृत्ति जागृत होती है। खान-पान की आवश्यकता स्वास्थ्य रहने के लिए होती है न कि विचार-बल को दूषित बनाने को। आहार में स्वाद-प्रियता से मनोविकार उत्पन्न होते हैं। अतः भोजन जो ग्रहण करें, वह जीवन रक्षा के उद्देश्य से हो तो भावनायें भी ऊर्ध्वगामी बनती है।

चरित्र-रक्षा प्रत्येक मूल्य पर की जानी चाहिये। इसके छोटे-छोटे कार्यों की भी उपेक्षा करना ठीक नहीं। उठना, बैठना, वार्तालाप, मनोरंजन के समय भी मर्यादाओं का पालन करने से उक्त आवश्यकता पूरी होती है। सभ्यता का चिह्न सच्चरित्र, सादा जीवन और उच्च विचारों को माना गया है। इससे जीवन में मधुरता और स्वच्छता का समावेश होता है। जीवन की सम्पूर्ण मलिनतायें नष्ट होकर नये प्रकाश का उदय होता है जिससे लोग अपना जीवन लक्ष्य तो पूरा करते ही हैं औरों को भी सुवासित तथा लाभान्वित करते हैं। जीवन सार्थकता की साधना चरित्र है। सच्चे सुख का आधार भी यही है। इसलिए प्रयत्न यही रहे कि हमारा चरित्र सदैव उज्ज्वल रहे, उद्दात्त रहे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 11

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

👉 ज्ञान की प्राप्ति

ज्ञान की चाहत बहुतों को होती है, पर ज्ञान की प्राप्ति विरले करते हैं। दरअसल ज्ञान और ज्ञान में भारी भेद है। एक ज्ञान है-केवल जानकारी इकट्ठी करना, यह बौद्धिक समझ तक सीमित है और एक ज्ञान है-अनुभूति, जीवन्त प्रतीति। एक मृत तथ्यों का संग्रह है, जबकि दूसरा जीवन्त सत्य का बोध है। इन दोनों में बड़ा अन्तर है-पाताल और आकाश जितना, अंधकार और प्रकाश जितना। सच तो यह है कि बौद्धिक ज्ञान कोई ज्ञान ही नहीं है, यह तो बस ज्ञान का झूठा अहसास भर है। भला अंधे व्यक्ति को प्रकाश का ज्ञान कैसे हो सकता है? बौद्धिक ज्ञान कुछ ऐसा ही है।
  
ज्ञान के इस झूठे अहसास से अज्ञान ढँक जाता है। इसके शब्द जाल एवं विचारों के धुएँ में अज्ञान विस्मृत हो जाता है। यह तथाकथित ज्ञान अज्ञान से भी घातक है, क्योंकि अज्ञान दिखता हो तो उससे ऊपर उठने की चाहत पैदा होती है। पर वह न दिखे तो उससे छुटकारा पाना सम्भव नहीं रहता। ऐसे तथाकथित ज्ञानी अज्ञान में ही मर-खप जाते हैं।
  
सच्चा ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता, यह भीतर से जागता है। इसे सीखना नहीं उघाड़ना होता है। सीखा हुआ ज्ञान जानकारी है, जबकि उघाड़ा हुआ ज्ञान अनुभूति है। जिस ज्ञान को सीखा जाय, उसके अनुसार जीवन को जबरदस्ती ढालना पड़ता है। फिर भी वह कभी सम्पूर्णतया उसके अनुकूल नहीं बन पाता। उस ज्ञान और जीवन में हमेशा एक अंतर्द्वन्द्व बना ही रहता है। पर जो ज्ञान उघाड़ा जाता है उसके आगमन से ही आचरण सहज उसके अनुकूल हो जाता है। सच्चे ज्ञान के विपरीत जीवन का होना एक असम्भावना है। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता।
  
श्री रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों को एक कथा सुनाते थे। एक घने बीहड़ वन में दो मुनि जा रहे थे। सांसारिक सम्बन्धों की दृष्टि से वे पिता-पुत्र थे। पुत्र आगे चल रहा था, पिता पीछे था। तभी वन में सिंह का गर्जन सुनाई दिया। ब्रह्मज्ञान की बातें करने वाले पिता को घबराहट हुई, उसने पुत्र को सचेत किया- चलो! कहीं पेड़ पर चढ़ जाएँ, आगे खतरा है। पुत्र पिता की इन बातों पर हँसा। हँसते हुए वह बोला-आप तो हमेशा यही कहते रहे हैं कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर, साक्षी और द्रष्टा है। फिर भला खतरा किसे है, जो नश्वर है वह तो मरेगा ही और जो अमर है उसे कोई मार नहीं सकता। पर पिता के मुख में भय की छाया गहरा चुकी थी। अब तक वह पेड़ पर जा चढ़ा था। इधर पुत्र पर सिंह का हमला भी हो गया, पर वह हँसता रहा। अपनी मृत्यु में भी वह द्रष्टा था। उसे न दुःख था और न पीड़ा, क्योंकि उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी, जबकि उसके पिता के पास ब्रह्मज्ञान ज्ञान का झूठा अहसास भर था। इसीलिए कहा जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति विरल है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४८

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग ३)

आत्मा को कितना ही कुचला जाय वह न मरने वाली है और न हार मानती है। अनसुनी, उपेक्षित पड़ी रहने पर भी अन्तरात्मा की विरोधी आवाज उठती ही रहती है। दुष्कर्म करते समय जी धड़कता और पैर काँपते हैं। यह स्थिति कितनी ही दुर्बल क्यों न कर दी जाय, उसका अस्तित्व बना ही रहेगा और झंझट तब तक चलता ही रहेगा, जब तक दुष्प्रवृत्तियाँ उस घुसपैठ से अपना पैर वापस न लौटा लें।

अन्तर्द्वन्द्व जीवन की शान्ति और सुव्यवस्था को नष्ट करते हैं। प्रगतिपथ अवरुद्ध करते हैं और भविष्य को अन्धकारमय बनाते हैं। पापों की परिणति से किसी भी बहाने बचा नहीं जा सकता। यह शारीरिक संविधान की सामान्य क्रिया पद्धति हुई। इसके अतिरिक्त समाजगत, प्रकृतिगत एवं ईश्वरीय व्यवस्था के और भी ऐसे कितने ही आधार हैं, जिनके कारण कुमार्गगामी को अपने दुष्कृत्यों के दण्ड अनेक प्रकार से भुगतने के लिए विवश होना पड़ता है।

राजदण्ड की व्यवस्था इसीलिए है कि दुष्कर्मों की आवश्यक रोकथाम की जा सके और अनीति बरतने वालों को उनकी करतूतों का मजा चखाया जा सके। पुलिस, कचहरी, जेल, फाँसी आदि की शासकीय दण्ड व्यवस्था का अस्तित्व मौजूद है। चतुरता बरतने पर भी लोग अक्सर उसकी पकड़ में आ जाते हैं और आर्थिक, शारीरिक, मानसिक दण्ड भुगतते हैं, बदनामी सहते और नागरिक अधिकारों से वंचित होते हैं।

इतने पर भी पीछा नहीं छूटता। शारीरिक व्याधि और मानसिक आधि उन्हें घेरती है और तिल-तिल करके रेतने, काटने जैसा कष्ट देती है। शरीर पर मन का अधिकार है। अचेतन मन के नियन्त्रण में आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष, श्वास-प्रश्वास, रक्त-संचार, ग्रहण-विसर्जन आदि अनेकों स्वचालित समझी जाने वाली गतिविधियाँ चलती हैं। चेतन मन की शक्ति से ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ काम करती हैं। शरीर तभी तक जीवित है जब तक उसमें चेतना का अस्तित्व है। प्राण निकलते ही शरीर सड़ने और नष्ट होने लगता है। चेतना का केन्द्र स्थान मस्तिष्क है। मन के रूप में ही हम चेतना का अस्तित्व देखते एवं क्रिया-कलापों का अनुभव करते हैं। यह संस्थान मनोविकारों से पाप-ताप एवं कषाय-कल्मषों से विकृत होता है तो उसका प्रभाव शारीरिक आरोग्य पर भी पड़ता है और मानसिक सन्तुलन पर भी। नवीनतम वैज्ञानिक शोधों का निष्कर्ष यह है कि बीमारियों का केन्द्र पेट या रक्त में न होकर मस्तिष्क में रहता है। मन गड़बड़ाता है तो शरीर का ढाँचा भी लड़खड़ाने लगता है। बीमारियों में नित नई शोध होती है और आये दिन एक से एक प्रभावशाली उपचार ढूँढ़े जाने की घोषणाएँ होती हैं। अस्पताल तेजी से बढ़ रहे हैं और चिकित्सकों की बाढ़ आ रही है। आधुनिकतम उपचार भी खोजे जा रहे हैं, इतने पर भी स्वास्थ्य समस्या का समाधान निकल नहीं रहा है। तात्कालिक चमत्कार की तरह दवाएँ अपना जादू दिखाती तो हैं, पर दूसरे ही क्षण रोग अपना रूप बदलकर नई आकृति में फिर सामने आ खड़े होते हैं। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक कि मानसिक विकृतियों के फलस्वरूप नष्ट होने और अगणित रोग उत्पन्न होने के तथ्य को स्वीकार नहीं कर लिया जाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग ३)

काम-विषयक सदाचार चरित्र की सर्वश्रेष्ठ विशेषता और कसौटी मानी गई है। कुछ अर्थों में ‘‘चरित्र’’ शब्द से मर्यादित कामोपभोग का ही अर्थ लगाया जाता है। जिन देशों में स्त्री-पुरुषों के बीच की शील मर्यादाएं निश्चित नहीं, वहां भारी विश्रृंखल पैदा हुआ देखा जाता है। पाश्चात्य देश इस कुटिल प्रवंचना में ग्रसित होने के कारण अपना श्रेय खो चुके हैं। पाश्चात्य सिद्धान्तों पर आधारित इस घृणित दुष्प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति और समाज कम अस्त-व्यस्त नहीं हुआ। इस विषैली कामुकता की दुर्भाग्यपूर्ण स्वच्छन्दता ने आज सारे सामाजिक ढांचे को ही खोखला कर दिया है। इसके दुष्परिणाम भी बुरी तरह से लोगों को आहत बनाने में लगे हैं। स्वास्थ्य की दुर्दशा, अशक्तता, अपहरण, हत्या और आत्म-हत्याओं के आज जितने दृश्य दिखाई दे रहे हैं उन सबका अधिकांश कारण मनुष्य का चारित्रिक पतन ही है। सदाचार की सीमायें जब तक निर्धारित न होंगी और दुराचार पर जब-तक प्रतिबन्ध न लगेगा तब-तक समाज में सुख शान्ति और व्यवस्था का स्थापित होना प्रायः असम्भव ही है।

भीतर-बाहर से पवित्र रहने, शुद्ध आचरण करने, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय, सत्संग, शक्ति पुरुषार्थ, आत्मिक-प्रसन्नता के आधार पर ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। आत्म-नियन्त्रण, संयम और सम्भाषण से न केवल अपने को वरन् अपने पास-पड़ोस और सम्पर्क में आने वालों को भी सुख मिलता है। मानवता का विकास भी इसी से सम्भव है कि दूसरों को भी अपने ही समान समझें और सबके साथ सद्व्यवहार करें। यह सब चरित्रवान् व्यक्ति के लक्षण हैं। जिनके द्वारा दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिले वही चरित्र के सच्चे धनी कहे जा सकते हैं।

पर-निन्दा, छिद्रान्वेषण, झूठ, छल, कपट, व्यभिचार, लोलुपता ये सब आसुरी प्रवृत्तियां हैं। इनसे विनाशकारी परिणाम ही उपस्थित होते हैं। पर आत्म-संयम और स्वत्वाभिमान के द्वारा वैयक्तिक व सामाजिक सभी प्रकार की श्रेष्ठताओं का उदय होता है। चरित्र-साधना का मूलाधार मानसिक पवित्रता है। जीवन के प्रत्येक छोटे-मोटे व्यवसाय व क्रिया-कलापों में मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़ता ही है। आत्मिक पवित्रता का परिणाम सदाचरण है जिससे सुख मिलता है। कुविचारों से कुकर्म उठ खड़े होते हैं, जिससे कष्ट, क्लेश और मुसीबतें आ उपस्थित होती हैं। इसलिए छोटे-से-छोटे कार्य में भी पवित्रता का भाव बनाये रखने से चारित्रिक-विकास होता है। प्रातःकाल सोकर उठने से दिन भर कार्यरत रहने और सायंकाल निद्रा-माता की गोद में जाने तक जितने कर्म हमें करने पड़ें उनमें पवित्रता का भाव बना रहे तो ही किसी को चरित्रवान् कहलाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह एक साधना है जिसकी सिद्धियां अनन्त हैं।

चरित्र का आधार धर्म है। मन, वचन और कर्म के धार्मिक कृत्यों के निर्वाह को सदाचार कहा जाता है। इससे चरित्र बनता है। मानवता से ओत-प्रोत भावनाओं से चरित्र की रक्षा सम्भव है। अतएव अपने जीवन में उदारतापूर्वक धार्मिक भावनाओं को धारण किए रहने से चारित्रिक-बल प्रगाढ़ बना रहता है। बुद्धि, धन या शरीर बल तब तक सुख नहीं दे सकते जब तक चरित्र में मानवता, बुद्धि में धर्मभाव और शरीर से सत्कर्म नहीं बन पड़ते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 10

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.10

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 6)

Q.6. How many “Onkars” are included in the Gayatri Mantra?

Ans.  Gayatri Mantra is complete in itself. It is not at all necessary to supplement it by assigning three or five ‘Oms’ by way of  beej Mantra or samput. This is done only in the Tantrik system. The common man should not  bother about some odd references in scriptures which justify prefixing, inter-fixing or suffixing more than one Onkars (Om) with the  Gayatri Mantra The practice of using more than one  Onkar was probably adopted by different sects as a mark of distinction (as followers of various sects use uniform, Tilak chhap marking on forehead etc. to identify themselves).  

The standard Guru-Mantra, Gayatri comprises of three Vyahritis and three phrases of eight letters each pre-fixed by Om. Om is in fact, a symbol of reverence preceding all Ved Mantras, as Mr., Mrs., Miss, etc. are prefixed to the names of persons. However, there is no restriction in using more than one  Onkars though the standard practice of pre-fixing one Onkar (Om) is recommended for maintaining uniformity.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 41

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

👉 चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती हैं

एक साधु अपने शिष्य के साथ किसी अंजान नगर में घूमते हुए पहुंचे. रात बहुत हो चुकी थी इसलिए वे दोनों रात गुजारने के लिए किसी आसरे की तलाश कर रहे थे. तभी शिष्य ने अपने गुरु के कहने पर किसी के घर का दरवाजा खटखटाया. वो घर किसी धनी परिवार का था. दरवाजे की आवाज सुनकर घर के अंदर से परिवार का मुखिया बाहर निकलकर आया. वह संकीर्ण वृत्ति का था. साधु के आसरा मांगने पर उसने कहा – ”मैं अपने घर के अंदर तो आपको नहीं ठहरा सकता, लेकिन तलघर में हमारा गोदाम है. आप चाहें तो रात वहां गुजार सकते हैं, किंतु सवेरा होते ही आपको यहां से जाना होगा।”

साधु अपने शिष्य के साथ तलघर में रात गुजारने के लिए मान गये. तलघर के कठोर आंगन पर वे विश्राम की तैयारी कर ही रहे थे कि तभी साधु को दीवार में एक सुराख नजर आया. साधु ने सुराख को गौर से देखा और कुछ देर चिंतन के बाद उसे भरने में जुट गये. शिष्य ने सुराख को भरने का कारण जानना चाहा तो साधु ने कहा – ”चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती है.” दूसरी रात वे दोनों एक निर्धन किसान के घर आसरा मांगने पहुंचे।

किसान और उसकी पत्नी ने प्रेम व आदर पूर्वक उनका स्वागत किया. इतना ही नही उनके पास जो कुछ भी रूखा-सूखा था, वह उन्होंने अपने मेहमान के साथ बांटकर खाया और फिर उन्हें रात गुजारने के लिए अपना बिस्तर भी दिया और स्वयं नीचे फर्श पर सो गये. सुबह होते ही साधु व उनके शिष्य ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी बहुत रो रहे थे क्योंकि उनका बैल खेत में मृत पड़ा था. यह बैल किसान की रोज़ी-रोटी का सहारा था. यह सब देखकर शिष्य ने साधु से कहा – ”गुरुजी, आपके पास तो अनेक सिद्धियां हैं, फिर आपने यह सब कैसे होने दिया? उस धनी के पास तो इतना कुछ था, फिर भी आपने उसके तलघर की मरम्मत करके उसकी सहायता की. जबकि इस गरीब किसान के पास कुछ ना होते हुए भी इसने हमारा इतना सम्मान किया. फिर आपने कैसे उसके बैल को मरने दिया।”

साधु ने कहा – चीज़ें हमेशा वैसी नहीं होतीं, जैसी दिखती है।

साधु ने अपनी बात स्पष्ट कि – उस धनी के तलघर में सुराख से मैंने देखा उस दीवार के पीछे स्वर्ण का भंडार था. लेकिन वह धनी बेहद ही लोभी और कंजूस था. इस कारण मैंने उस सुराख को बंद कर दिया, ताकि स्वर्ण का भंडार गलत हाथ में ना जाएं. जबकि इस ग़रीब किसान के घर में हम इसके बिस्तर पर आराम कर रहे थे. रात्रि में इस किसान की पत्नी की मौत लिखी थी और जब यमदूत उसके प्राण हरने आए तो मैंने उन्हें रोक दिया. चूंकि यमदूत खाली हाथ नहीं जा सकते थे, इसलिए मैंने उनसे किसान के बैल के प्राण हरने के लिए कहा।

अब तुम ही बताओ, मैंने सही किया या गलत. यह सुनकर शिष्य अपने गुरु के समक्ष नतमस्तक हो गया।

दोस्तों, ठीक इसी प्रकार दुनिया हमें वैसी नहीं दिखती जैसी वह हैं, बल्कि वैसी ऩज़र आती हैं जैसे हम है. अगर सच में कुछ बदलना है तो सर्वप्रथम अपनी सोच, कर्म व अपने आप को बदलने की कोशिश करों।

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग २)

कर्म फलित होने में देर लगाते हैं। जौ बोने के दस दिन में ही उनके अंकुर छः इंच ऊँचे उग आते हैं। किन्तु जिनका जीवन लम्बा है, जो चिर स्थायी हैं, उनके बढ़ने और प्रौढ़ होने में देर लगती हैं। नारियल की गुठली बो देने पर भी एक वर्ष में अंकुर फोड़ती है और वर्षों में धीरे धीरे बढ़ती है। बरगद का वृक्ष भी देर लगाता है। जबकि एरंड का पेड़ कुछ ही महीनों में छाया और फल देने लगता है। हाथी जैसे दीर्घजीवी पशु, गिद्ध जैसे पक्षी, ह्वेल जैसे जलचर अपना बचपन बहुत दिन में पूरा करते हैं। मक्खी, मच्छरों का बचपन और यौवन बहुत जल्दी आता है, पर वे मरते भी उतने ही जल्दी हैं। शारीरिक और मानसिक परिश्रम का, आहार-विहार का, व्यवहार शिष्टाचार का प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता रहता है। उनकी उपलब्धि सामयिक होती हैं, चिरस्थायी नहीं। स्थायित्व नैतिक कृत्यों में होता है, उनके साथ भाव-संवेदनाएँ और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं। जड़ें अन्तरंग की गहराई में धँसी रहती हैं, इसलिए उनके भले या बुरे प्रतिफल भी देर में मिलते हैं और लम्बी अवधि तक ठहरते हैं, इन कर्मों के फलित होने में प्रायः जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है।

अन्तःकरण की संरचना दैवी तत्वों से हुई हैं। उसमें स्नेह-सौजन्य सद्भाव सच्चाई जैसी प्रवृत्तियाँ ही भरी पड़ी हैं। जीवन यापन की रीति उत्कृष्टता के आधार पर बनाने की प्रेरणा इस क्षेत्र में अनायास ही मिली रहती है। इस क्षेत्र में जब निकृष्टता प्रवेश करती हैं, तो सहज उसकी प्रतिक्रिया होती हैं। रक्त में जब बाहरी विजातीय तत्व प्रवेश करते हैं तो श्वेत कण उन्हें मार भगाने के लिए प्राणपण से संघर्ष छेड़ते हैं और परास्त करने में कुछ उठा नहीं रखते। ठीक इसी प्रकार अन्तःकरण की दैवी चेतना आसुरी दुष्प्रवृत्तियों को जीवन सत्ता में प्रवेश करने और जड़ जमाने की छूट नहीं देना चाहती। फलतः दोनों के बीच संघर्ष छिड़ जाता है। यही अन्तर्द्वन्द्व है, जिसके रहते आन्तरिक जीवन उद्विग्न अशान्त ही बना रहता है और उस विक्षोभ की अनेक दुःखदायी प्रतिक्रिया फूट-फूटकर बाहर आती रहती हैं।

दो साँड़ लड़ते हैं, तो लड़ाई की जगह को तहस-नहस करके रख देते हैं। खेत में लड़ें तो समझना चाहिए कि उतनी फसल चौपट ही हो गई। दुष्प्रवृत्तियाँ जब भी जहाँ भी अवसर पाती हैं वहीं घुसपैठ करने, जड़ जमाने में चूकती नहीं। घुन की तरह मनुष्य को खोखली करती हैं और चिनगारी की तरह चुप-चुप सुलगती हुई अन्त में सर्वनाशी ज्वाला बनकर प्रकट होती हैं। ठीक इसी प्रकार दुष्प्रवृत्तियाँ आत्मसत्ता पर आधिपत्य जमाने के लिए कुचक्र रचती रहती हैं, किन्तु अन्तरात्मा को यह स्थिति सह्य नहीं, अस्तु वह विरोध पर अड़ी रहती है। फलतः संघर्ष चलता ही रहता है और उसके दुष्परिणाम अनेकानेक शोक सन्तापों के रूप में सामने आते रहते हैं। मनोविज्ञानी इस स्थिति को दो व्यक्तित्व कहते हैं। एक ही शरीर में भले-बुरे व्यक्तित्व शान्ति सहयोग पूर्वक रह नहीं सकते। कुत्ते-बिल्ली की, साँप-नेवले की दोस्ती कैसे निभे? एक म्यान में दो तलवार ठूँसने पर म्यान फटेगी ही। शरीर में ज्वर या भूत घुस पड़े तो कैसी दुर्दशा होती है, इसे सभी जानते हैं। नशेबाजों की दयनीय स्थिति देखते ही बनती हैं। यह परस्पर विरोधी शक्तियों का एक स्थान पर जमा होना ही हैं, जिसमें विग्रह की स्वाभाविकता टाली नहीं जा सकती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 मन को साधने की साधना

मन के साधे-साधना है, सम्पदा है। मन न सधे तो बाधा है, विपदा है। अद्भुत है मनुष्य का मन। यही रहस्य है-सांसारिक सफलताओं का और आध्यात्मिक विभूतियों का। पाप-पुण्य, बन्धन-मोक्ष, स्वर्ग-नरक सभी कुछ इसी में समाये हैं। अंधेरा और उजाला सब इसी में हैं। इसी में जन्म और मृत्यु के कारण हैं। यही है द्वार बाहरी दुनिया का, यही है सीढ़ी अन्तस् की। इसको साधने की साधना बन पड़े तो मनुष्य सबसे पार हो जाता है।
  
जिनकी जिन्दगी में साधना का सच है, उनकी अनुभूति यही कहती है कि मन सब कुछ है। सब उसकी ही लीला और कल्पना है। यह खो जाय तो सारी लीला विलीन हो जाती है। एक बार महाकाश्यप ने तथागत से पूछा था-भगवन् मन तो बड़ा चंचल है, यह सधे कैसे? खोये कैसे? मन तो बड़ा गंदा है, यह निर्मल कैसे हो? इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् चुप रहे। हाँ अगले दिन वह महाकाश्यप के साथ एक यात्रा के लिए निकले।
  
इस यात्रा में दोपहर के समय वह एक वृक्ष की छाँव में विश्राम के लिए रुके। उन्हें प्यास लगी तो महाकाश्यप पास के पहाड़ी झरने से पानी लेने के लिए गये। लेकिन झरने में से अभी बैलगाड़ियाँ निकली थीं और उसका सब पानी गंदा हो गया था। महाकाश्यप ने सारी बात भगवान् को बताते हुए कहा-प्रभु! झरने का पानी गंदा है, मैं पीछे जाकर नदी से पानी ले आता हूँ। लेकिन बुद्ध ने हँसते हुए कहा-नदी दूर है, तुम फिर से वापस झरने के मूल में जाओ और पानी लेकर आओ। भगवान् के कहने से महाकाश्यप फिर से वापस लौटे-उन्होंने देखा अपने मूल स्रोत में झरने का पानी बिल्कुल साफ है, वे जल लेकर वापस आ गये।
  
उनके लाये जल को पीते हुए भगवान् ने उन्हें बोध दिया-महाकाश्यप मन की दशा भी कुछ इसी तरह से है। जिन्दगी की गाड़ियाँ इसे विक्षुब्ध करती रहती हैं। यदि कोई शान्ति और धीरज से उसे देखता रहे, उसके मूल स्रोत में प्रवेश करने की कोशिश करे तो सहज ही निर्मलता उभर आती है। बस बात मन को साधने की है। मन को साधने की साधना करते हुए ही जीवन निर्मलता, सफलता एवं आध्यात्मिक विभूतियों का भण्डार बन जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४७

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 5)

Q.5 Does Gayatri Mantra conform to the rules of Sanskrit Grammar?

Ans. At times points are raised about supposed grammatical inaccuracies in the composition of Gayatri Mantra. These misconceptions arise when the Shrutis (Richas of Vedas and Upnishads) are studied and evaluated as literary, human creations. Unlike the religious books and teachings of the Rishis compiled as Smritis, Puranas, Tantras etc., Shrutis are considered eternal divine revelations (A- paurusheya) dealing with inter-relationship of soul and God. Thus, Shrutis are not meant for literary comprehension and intellectual dissertations. Their compilers had explicitly stated that in order to understand and experience the mysteries of Vedas (i.e. Shrutis), it is essential to have adequate exposure to various related scriptural texts, commentaries of seers, interaction with seer scholars and above all the grace of God, This alone can purify the soul, making it receptive to the supreme wisdom revealed in the shrutis.

It is, thus, irrefutable that the Vedas (which include the Gayatri Mantra) are not governed by the laws of Sanskrit Grammar, which is a product of human endeavour and came into existence at a much later stage in human evolution.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 40

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग २)

समाज की सुव्यवस्था का आधार उज्ज्वल चरित्र के व्यक्तियों का बाहुल्य माना गया है। सुख-शान्ति और सन्तोष की परिस्थितियां नेक व्यक्तियों के सदाचार से बनती हैं। प्रेम, स्नेह, मैत्री, दया, आत्मीयता और सहानुभूति का वातावरण जहां भी रहेगा वहीं स्वर्ग जैसे सुखों की रसानुभूति होने लगती है। जो मनुष्य स्वभावतः दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार करते हैं, स्नेह वर्तते और परोपकार की भावना रखते हैं वे अपने चरित्र की उज्ज्वल छाप दूसरों पर भी छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है तो ऐसे स्थान विशेष में स्वर्गिक परिस्थितियों का उभार स्वयमेव होने लगता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। इसलिए चरित्र की महान महत्ता को सभी महापुरुषों ने स्वीकार किया है।

यह देखा जाता है कि लोग अपने बच्चों के नाम राम-कृष्ण, शिव-शंकर, राणाप्रताप, रणजीत आदि रखना अधिक पसन्द करते हैं। रावण, कंस या खरदूषण नाम रखना किसी को भी प्रिय नहीं। इससे प्रतीत होता है कि लोगों में चरित्रवान् की प्रतिष्ठा व सम्मान का भाव अधिक पाया जाता है। यह बात अपने यहां ही नहीं हर देश, जाति और संस्कृति में पाई जाती है। इससे चरित्र की महान् महत्ता प्रतिपादित होती है। मनुष्य की कीर्ति, यश और सम्मान का आधार बाह्यजगत की सफलताएं नहीं हैं। उसकी आन्तरिक श्रेष्ठता के आधार पर युगों तक यश शरीर अमर रहता है। सोलहवीं सदी में सबसे बड़ा पहलवान कौन हुआ, ईसा के जन्म से दो शताब्दी पूर्व कौन व्यक्ति सर्वाधिक धनी हुआ है यह कोई भी न जानता होगा, इतिहास में भी इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता किन्तु भगवान राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र, शिव, दधीच, अर्जुन आदि चरित्रवान् महापुरुषों की जीवनियां आज भी लोगों को मुंह जबानी याद हैं।

दुराचारी व्यक्ति अपनी बाह्य-शक्तियों को भी देर तक बनाए नहीं रख सकते। कुकर्मों पर चलने से उनकी दुर्दशा स्वाभाविक है। फलतः उनका जीवन दिन-दिन पतित होता जाता है और उन्हें निरन्तर नारकीय यन्त्रणायें भोगनी पड़ती हैं किन्तु चरित्रवान व्यक्तियों को बुरा-समय भी वरदान सिद्ध हुआ है। अपनी चारित्रिक विशेषता के कारण सत्यव्रती हरिश्चन्द्र ने अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया, उर्वशी का श्राप कालान्तर में अर्जुन के लिए वरदान सिद्ध हुआ। रावण के दुष्कर्मों का फल विनाश के रूप में मिला और विभीषण की नेकी का परिणाम यह हुआ कि उसे लंका की राजगद्दी मिली। चरित्र मनुष्य को सदैव ही ऊंचे उठाता है। परिस्थितियां तो चरित्रवान पुरुषों की चेरी कहीं गई हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

👉 अद्भुत पात्र Adbhut Patra

एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी किसी भिक्षुक ने राजा से भिक्षा मांगी थी राजा ने उससे कहा, जो भी चाहते हो मांग लो दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था उस भिक्षुक ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दे'।

राजा ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था वह तो जादुई था जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई वह उतना ही अधिक खाली होता गया राजा को दुखी देख वह भिक्षुक बोला न भर सकें तो वैसा कह दे मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा राजा! ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि राजा अपना वचन पूरा नहीं कर सके।

राजा ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था सभी उस पात्र में डाल दिया गया लेकिन अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा तब उस राजा ने पूछा भिक्षु तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है उसे भरना मेरी साम‌र्थ्य से बाहर है क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है..?

वह भिक्षुक हंसने लगा और बोला कोई विशेष रहस्य नहीं राजा यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय कभी भी भरा नहीं जा सकता..? धन से पद से ज्ञान से- किसी से भी भरो वह खाली ही रहेगा, क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है उतना ही दरिद्र होता जाता है हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं क्यों..? क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है और परमात्मा सत्य में बसता है शांति चाहते हो ? संतृप्ति चाहते हो..?  तो अपने संकल्प को कहने दो कि परमात्मा और सत्य के अतिरिक्त और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए......

👉 अन्तराल के परिशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया (भाग १)

कर्मफल एक ऐसी सच्चाई है जिसे इच्छा या अनिच्छा से स्वीकार ही करना होगा। यह समूची सृष्टि एक सुनियोजित व्यवस्था की शृंखला में जकड़ी हुई है। क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम कण-कण पर लागू होता है और उसकी परिणति का प्रत्यक्ष दर्शन पग-पग पर होता है।

भूतकालीन कृत्यों के आधार पर वर्तमान बनता है और वर्तमान का जैसा भी स्वरूप है, उसी के अनुरूप भविष्य बनता चला जाता है। किशोरावस्था में कमाई हुई विद्या और स्वास्थ्य सम्पदा जवानी में बलिष्ठता एवं सम्पन्नता बनकर सामने आती है। यौवन का सदुपयोग-दुरुपयोग बुढ़ापे के जल्दी या देर से आने, देर तक जीने या जल्द मरने के रूप में परिणत होता है। वृद्धावस्था की मनःस्थिति संस्कार बनकर मरणोत्तर जीवन के साथ जाती और पुनर्जन्म के रूप में अपनी परिणति प्रकट करती है।

कुछ कर्म तत्काल फल देते हैं, कुछ की परिणति में विलम्ब लगता है। व्यायामशाला, पाठशाला, उद्योगशाला के साथ सम्बन्ध जोड़ने के सत्परिणाम सर्वविदित हैं, पर वे उसी दिन नहीं मिल जाते, जिस दिन प्रयास आरम्भ किया गया था। कुछ काम अवश्य ऐसे होते हैं, जो हाथों-हाथ फसल देते हैं। मदिरा पीते ही नशा आता है। जहर खाते ही मृत्यु होती है। गाली देते ही घूँसा तनता है। दिन भर परिश्रम करते ही शाम को मजदूरी मिलती है। टिकट खरीदते ही सिनेमा का मनोरंजन चल पड़ता है। ऐसे भी अनेकों काम हैं, पर सभी ऐसे नहीं होते। कुछ काम निश्चय ही ऐसे हैं, जो देर लगा लेते हैं। असंयमी लोग जवानी में ही खोखले बनते रहते हैं, उस समय कुछ पता नहीं चलता। दस-बीस वर्ष बीतने नहीं पाते कि काया भी जर्जर होकर अनेक रोगों से घिर जाती है।

समय साध्य परिणतियों को देखकर अनेकों को कर्मफल पर अविश्वास होने लगता है। वे सोचते हैं कि आज का प्रतिफल हाथों-हाथ नहीं मिला तो वह कदाचित भविष्य में भी कभी नहीं मिलेगा। अच्छे काम करने वाले प्रायः इसी कारण निराश होते हैं और बुरे काम करने वाले अधिक निर्भय निरंकुश बनते हैं। तत्काल फल न मिलने की व्यवस्था भगवान ने मनुष्य की दूरदर्शिता, विवेकशीलता को जाँचने के लिए ही बनाई है। अन्यथा वह ऐसा भी कर सकता था कि झूठ बोलते ही मुँह में छाले भर जाय। चोरी करने वाले के हाथ में दर्द होने लगे। व्यभिचारी तत्काल नपुंसक बन जाय। यदि ऐसा रहा होता तो आग में हाथ डालने से बचने की तरह लोग पाप-कर्मों से भी बचे रहते और दीपक जलाते ही रोशनी की तरह पुण्य फल का हाथों-हाथ चमत्कार देखते। पर ईश्वर को क्या कहा जाय। उसकी भी तो अपनी मर्जी और व्यवस्था है। सम्भवतः मनुष्य की दूरदर्शिता विकसित करने एवं परखने के लिए ही इतनी गुंजायश रखी है कि वह सत्कर्मों और दुष्कर्मों का प्रतिफल विलम्ब से मिलने पर भी अपनी समझदारी के आधार पर भविष्य को ध्यान में रखते हुए आज की गतिविधियों को अनुपयुक्तता से बचाने और सत्साहस को अपनाने में जो अवरोध आते हैं, उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 किमाश्चर्य परमं?

किमाश्चर्य परमं? - ‘सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?’- युगों पहले यक्ष ने युधिष्ठिर से यह सवाल पूछा था। धर्म का मर्म जानने वाले युधिष्ठिर ने इस सवाल के उतर में यक्ष से कहा था- ‘हजारों लोगों को रोज मरते हुए देखकर भी अपनी मौत से अनजान बने रहना, खुद को मौत से मुक्त मान लेना, जीते रहने की लालसा में अनेकों दुष्कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा आश्चर्य है।’ अनेकों शवयात्राएँ रोज निकलती हैं, ढेरों लोग इनमें शामिल भी होते हैं। इसके बावजूद भी वे अपनी शवयात्रा की कल्पना नहीं कर पाते। काश! ऐसी कल्पना की जा सके अपनी मौत के कदमों की आहट सुनी जा सके, तो निश्चित ही जीवन दृष्टि संसार से हटकर सत्य पर केन्द्रित हो सकती है।
  
सूफी फकीर शेखसादी के वचन हैं- ‘बहुत समय पहले दज़ला के किनारे एक मुरदे की खोपड़ी ने कुछ बाते एक राहगीर से कही थी। वह बोली थी ः ऐ मुसाफिर, जरा होश में चल। मैं भी कभी भारी दबदबा रखती थी। मेरे ऊपर हीरों जड़ा ताज़ था। फतह मेरे पीछे-पीछे चली और मेरे पाँव कभी जमीन पर न पड़ते थे। होश ही न था कि एक दिन सब कुछ खत्म हो गया। कीड़े मुझे खा गए हैं और आज हर पाँव मुझे बेरहम ठोकर मारकर आगे निकल जाता है। तू भी अपने कानों से गफलत की रूई निकाल ले, ताकि तुझे मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत हासिल हो सके।’
  
सच में मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत को जो सुन लेता है, वह जान लेता है कि जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। उन दोनों के बीच जो है वह केवल जीवन का आभास भर है। यह जीवन की एक छाया भर है। क्योंकि जीवन तो शाश्वत है, और इसकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती। जन्म का अन्त है, जीवन का नहीं। और मृत्यु का प्रारम्भ है जीवन का नहीं। जीवन तो इन दोनों से पार है। इसे वही पाते हैं जो अनवरत तप और सतत सत्कर्मों से जीवन की छाया से पार शाश्वत में प्रवेश करते हैं। ऐसे लोग मौत से मुँह नहीं चुराते, बल्कि इसे शाश्वत जीवन का प्रवेश द्वार बना लेते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं हैं। और जो करने में समर्थ होते हैं, वे मर कर भी नहीं मरते।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४६

👉 जीवन-सार्थकता की साधना—चरित्र (भाग १)

मनुष्य जीवन की सार्थकता उज्ज्वल और उद्दात्त चरित्र से होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के भागीदार वे होते हैं जिनमें चारित्रिक बल की न्यूनता नहीं पाई जाती। जिस पर सभी लोग विश्वास करते हों, ऐसे ही लोगों की साख औरों पर पड़ती है। पर-उपदेश तो वाक्पटुता के आधार पर धूर्त व्यक्ति तक कर लेते हैं। किन्तु दूसरों को प्रभावित कर पाने की क्षमता, लोगों को सन्मार्ग का प्रकाश दिखाने की शक्ति चरित्रवान् व्यक्तियों में हुआ करती है। सद्-विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता को ही चरित्र कहते हैं। जिसके विचार देखने में भले प्रतीत हों किन्तु आचार सर्वदा भिन्न हों, स्वार्थपूर्ण हों, अथवा जिनके विचार छल व कपट से भरे हों और दूसरे को धोखा देने, प्रपंच रचने के उद्देश्य से चिन्ह पूजा के रूप में सत्कर्म करने की आदत होती है उन्हें चरित्रवान् नहीं कहा जा सकता। सत्कर्मों का आधार इच्छाशक्ति की प्रखरता है। जो अपनी इच्छाओं को नियन्त्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान् कहा जा सकता है। संयत इच्छा-शक्ति से प्रेरित सदाचार का ही नाम चरित्र है।

विपुल धन सम्पत्ति, आलीशान मकान, घोड़े-गाड़ी, यश, कीर्ति आदि कमाने एवं विविध भाग भोगने की इच्छा आम लोगों में पाई जाती है। बालकों का हित भी इसी में मानते हैं कि उनके लिए उत्तराधिकार में बहुत धन दौलत जमा करके रखी जाय। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि जिस धन से भावी सन्तान आत्म-निर्माण न कर सके वह धन क्या? बिना श्रम उत्तराधिकार में मिला धन घातक होता है। सच्ची बपौती व्यक्ति का आदर्श चरित्र होता है, जिससे बालक अपनी प्रतिभा का स्वतः विकास करते हैं। उज्ज्वल चरित्र का आदर्श भावी सन्तति के जीवन-निर्माण में प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है।

समाज का सौन्दर्य, सुख और शान्ति चरित्रवान् व्यक्तियों के द्वारा स्थिर रहती है। दुष्चरित्र और दुराचारी लोगों से सभी भयभीत रहते हैं। उनके पास आने में लोग लज्जा व संकोच अनुभव करते हैं। जो भी उनके सम्पर्क में आता है उसे ही वे अपने दुष्कर्मों की आग में लपेट लेते हैं। ऐसा समाज दुःख, कलह ओर कटुता से झुलसकर रह जाता है। अनेकों प्रकार की भौतिक सम्पत्तियां व सांसारिक सुख सुविधाएं होते हुए भी लोगों को शान्ति उपलब्ध नहीं होती। अधिकतर लोग कुढ़-कुढ़कर जीवन बिताते रहते हैं। यह सब चारित्रिक न्यूनता के कारण ही होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964 पृष्ठ 9

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/August/v1.9

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana/v1.12

👉 देव संस्कृति की गौरव गरिमा

सभ्यता और संस्कृति इस युग के दो बहु-चर्चित विषय हैं। आस्थाओं और मान्यताओं को संस्कृति और तदनुरूप व्यवहार, आचरण को सभ्यता की संज्ञा दी जाती है। मानवीय सभ्यता और संस्कृति कहें या चाहे जो भी नाम दें मानवीय दर्शन सर्वत्र एक ही हो सकता है, मानवीय संस्कृति केवल एक हो सकती है दो नहीं क्योंकि विज्ञान कुछ भी हो सकता है। इनका निर्धारण जीवन के बाह्य स्वरूप भर से नहीं किया जा सकता। संस्कृति को यथार्थ  स्वरूप प्रदान करने के लिए अन्ततः धर्म और दर्शन की ही शरण में जाना पड़ेगा।
  
संस्कृति का अर्थ है-मनुष्य का भीतरी विकास। उसका परिचय व्यक्ति के निजी चरित्र और दूसरों के साथ किये जाने वाले सद्व्यवहार से मिलता है। दूसरों को ठीक तरह समझ सकने और अपनी स्थिति तथा समझ धैर्यपूवक दूसरों को समझा सकने की स्थिति भी उस योग्यता में सम्मिलित कर सकते हैं, जो संस्कृति की देन है।
  
आदान-प्रदान एक तथ्य है, जिसके सहारे मानवीय प्रगति के चरण आगे बढ़ते-बढ़ते वर्तमान स्थिति तक पहुँचे हैं। कृषि, पशुपालन, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प-उद्योग विज्ञान, दर्शन जैसे जीवन की मौलिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित प्रसंग किसी क्षेत्र की बपौती नहीं है। एक वर्ग की उपलब्धियों से दूसरे क्षेत्र के लोग परिचित हुए हैं। परस्पर आदान-प्रदान चले हैं और भौतिक क्षेत्र में सुविधा संवर्धन का पथ-प्रशस्त हुआ है। ठीक यही बात धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में भी है। एक लहर ने अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित किया है। तो दूसरी लहर ने उसे आगे धकेला है। लेन-देन का सिलसिला सर्वत्र चलता रहा है। मिल-जुलकर ही मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ा है। इस सम्पर्क से धर्म और संस्कृति भी अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने एक-दूसरे को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित किया है।
  
यह सभ्यताओं का समन्वय एवं आदान-प्रदान उचित भी है और आवश्यक भी। कट्टरता के इस कटघरे में मानवीय विवेक को कैद रखे  रहना असम्भव है। विवेक दृष्टि से जाग्रत होते ही इन कटघरों की दीवारें टूटती हैं और जो रुचिकर या उपयोगी लगता है, उसका बिना किसी प्रयास या दबाव के आदान-प्रदान चल पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए कट्टरपन्थी प्रयास सदा से हाथ-पैर पीटते रहे हैं, पर यह कठिन ही रहा है। हवा उन्मुक्त आकाश में बहती है। सर्दी-गर्मी का विस्तार व्यापक क्षेत्र में होता है। इन्हें बन्धनों में बाँधकर कैदियों की तरह अपने ही घर में रुके रहने के लिए बाधित नहीं किया जा सकता है। सम्प्रदायों और सभ्यताओं में भी यह आदान-प्रदान अपने ढंग से चुपके-चुपके चलता रहा है।
  
धर्म और संस्कृति दोनों ही सार्वभौमिक हैं, उन्हें सर्वजनीन कहा जा सकता है। मनुष्यता के टुकड़े नहीं हो सके। सज्जनता की परिभाषा में बहुत मतभेद नहीं है। शारीरिक संरचना की तरह मानवी अन्तःकरण की मूल सत्ता भी एक ही प्रकार की है। भौतिक प्रवृत्तियाँ लगभग एक-सी हैं। एकता व्यापक है और शाश्वत। पृथकता सामयिक है और क्षणिक। हम सब एक ही पिता के पुत्र हैं। एक ही धरती पर पैदा हुए हैं। एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। एक ही सूर्य से गर्मी पाते हैं और बादलों के अनुदान से एक ही तरह अपना गुजारा करते हैं फिर कृत्रिम विभेद से बहुत दिनों तक बहुत दूरी तक किस प्रकार बँधे रह सकते हैं? औचित्य को आधार मानकर परस्पर आदान-प्रदान का द्वार जितना खोलकर रखा जाय उतना ही स्वच्छ हवा और रोशनी का लाभ मिलेगा। खिड़कियाँ बन्द रखकर हम अपनी विशेषताओं को न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न स्वच्छ हवा और खुली धूप में मिलने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं। संकीर्णता अपनाकर पाया कम और खोया अधिक जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT THE MANTRA (Part 4)

Q.4.  What is the basis of words in Gayatri Mantra adding upto 24 letters?

Ans. The confusion about Gayatri Mantra having a total of 23 letters only, arises mainly because of the word Nayam in Varenyam. In the composition of the Richas (couplets) of Vedas, meanings are subordinate to the syntax of words, which is according to specified musical notations. The chhandas (components of Vedas classified according to number of letters) in the Vedas are composed keeping in view the symphony to be created by the succession of words for a desired objective. Musicians change the pitch and duration of the tones to conform to a Raga. The mystery of difference between the “written” and pronounced Nyam in the Mantra lies in its sonic effect. In this way considering Nyam as a composite of Ni and Yam according to their musical notation, the first, second and third segments of the Mantra add up to 8 words each. Adya Shankaracharya endorses this view. The Pingal Shastra and Mantrartha Chandrodaya also support the grammatical conformity of Gayatri Mantra on the same principle. In this way, the letters in the Mantra are to be counted as follows:

TAT SA VI TU VAR RE NI YAM BHA RGO DEV SYA DHI       1+ 1+  1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+
MA HI DHI YO YO NAH  PRA  CHO  DA YAT         1+ 1+  1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1+ 1   =  24

For further reference please refer to the monthly periodical Akhand Jyoti, May 1983 issue.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 39

Chalak Bagula Aur Kekda | चालक बगुला और केकड़ा | Motivational Stories



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बुधवार, 25 दिसंबर 2019

👉 शांति की तलाश Looking For Peace

एक बार भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे। उनके प्रिय शिष्य आनंद ने मार्ग में उनसे एक प्रश्न पूछा -‘भगवान! जीवन में पूर्ण रूप से कभी शांति नहीं मिलती, कोई ऐसा मार्ग बताइए कि जीवन में सदा शांति का अहसास हो।

बुद्ध आनंद का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए बोले, तुम्हे इसका जबाब अवश्य देगे किन्तु अभी हमे प्यास लगी है, पहले थोडा जल पी ले। क्या हमारे लिए थोडा जल लेकर आओगे?

बुद्ध का आदेश पाकर आनंद जल की खोज में निकला तो थोड़ी ही दूरी पर एक झरना नजर आया। वह जैसे ही करीब पंहुचा तब तक कुछ बैलगाड़िया वहां आ पहुची और झरने को पार करने लगी। उनके गुजरने के बाद आनंद ने पाया कि झील का पानी बहुत ही गन्दा हो गया था इसलिए उसने कही और से जल लेने का निश्चय किया। बहुत देर तक जब अन्य स्थानों पर जल तलाशने पर जल नहीं मिला तो निराश होकर उसने लौटने का निश्चय किया।

उसके खाली हाथ लौटने पर जब बुद्ध ने पूछा तो उसने सारी बाते बताई और यह भी बोला कि एक बार फिर से मैं किसी दूसरी झील की तलाश करता हूँ जिसका पानी साफ़ हो। यह कहकर आनंद जाने लगा तभी भगवान बुद्ध की आवाज सुनकर वह रुक गया। बुद्ध बोले-‘दूसरी झील तलाश करने की जरुरत नहीं, उसी झील पर जाओ।

आनन्द दोबारा उस झील पर गया किन्तु अभी भी झील का पानी साफ़ नहीं हुआ था । कुछ पत्ते आदि उस पर तैर रहे थे। आनंद दोबारा वापिस आकर बोला इस झील का पानी अभी भी गन्दा है। बुद्ध ने कुछ देर बाद उसे वहाँ जाने को कहा। थोड़ी देर ठहर कर आनंद जब झील पर पहुंचा तो अब झील का पानी बिलकुल पहले जैसा ही साफ़ हो चुका था। काई सिमटकर दूर जा चुकी थी, सड़े- गले पदार्थ नीचे बैठ गए थे और पानी आईने की तरह चमक रहा था।

इस बार आनंद प्रसन्न होकर जल ले आया जिसे बुद्ध पीकर बोले कि आनंद जो क्रियाकलाप अभी तुमने किया, तुम्हारा जबाब इसी में छुपा हुआ है। बुद्ध बोले -हमारे जीवन के जल को भी विचारों की बैलगाड़ियां रोज गन्दा करती रहती है और हमारी शांति को भंग करती हैं। कई बार तो हम इनसे डर कर जीवन से ही भाग खड़े होते है, किन्तु हम भागे नहीं और मन की झील के शांत होने कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लें तो सब कुछ स्वच्छ और शांत हो जाता है। ठीक उसी झरने की तरह जहाँ से तुम ये जल लाये हो। यदि हम ऐसा करने में सफल हो गए तो जीवन में सदा शान्ति के अहसास को पा लेगे।

👉 वृत्ति, बुद्धि, विवेक

विवेक, बुद्धि और वृत्ति-इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द मनुष्य की समग्र चेतना घूमती है। इन्हीं तीन से उसकी दशा और दिशा बदलती है, परिवर्तित होती है। विवेक मानव चेतना की श्रेष्ठतम भावदशा में अंकुरित एवं विकसित होता है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि विवेक के अंकुरण से मानव चेतना अपनी श्रेष्ठतम अवस्था में पहुँच जाती है। जबकि बुद्धि मानव चेतना की मध्यवर्ती दशा है। इन दोनों से अलग वृत्ति मानव चेतना की निम्नतम अवस्था का प्रमाण है।
  
निश्चित रूप से वृत्ति पाश्विक है, बुद्धि मानवीय है और विवेक दिव्य है। वृत्ति सहज और अंधी है, इसे चेतना की सुप्तावस्था भी कह सकते हैं। यह अचेतन का जगत् है, यहाँ न शुभ है न अशुभ, न तो यहाँ भेद है और न विकास के लिए कोई संघर्ष। यहाँ तो बस वासनाओं की अंधी अँधेरी आँधियाँ हैं।
  
जबकि बुद्धि में न निद्रा है और न जागरण है। यहाँ अर्धमूर्च्छा है। यहाँ वृत्ति और विवेक के बीच संक्रमण है। यह देहरी है। इसमें चैतन्यता का एक अंश है, लेकिन बाकी हिस्से में गहरी अचेतनता है। यहाँ शुभ और अशुभ का भेद है। वासना के साथ विचार भी विद्यमान है।
  
विवेक मानव चेतना की पूर्ण जाग्रत् अवस्था है। यहाँ शुद्ध चैतन्यता है, यहाँ केवल प्रकाश हैं, यहाँ भी कोई संघर्ष नहीं हैं। बस शुभ का, सत् का, सौन्दर्य का सहज प्रवाह है। यहाँ बड़ी ही सजग सहजता है।
  
सहज वृत्ति भी है और विवेक भी, परन्तु वृत्ति में अंधी सहजता है और विवेक में सजग सहजता। केवल बुद्धि भर असहज है। इसमें पीछे की ओर वृत्ति है और आगे की ओर विवेक है। उसके शिखर की लौ विवेक की ओर है। लेकिन आधार की जड़ें  वृत्ति में हैं। शिखर कुछ-तलहटी कुछ, यही खिंचाव है। पशु में डूबने का आकर्षण-परमात्मा में उठने की चुैनाती, उसमें दोनों एक साथ हैं।
  
उपाय एक ही है, बुद्धि का विवेक में परिवर्तन। वृत्ति का बुद्धि के संक्रमण पथ से गुजरते हुए विवेक में रूपान्तरण। इसके लिए अंधेरे में दिया जलाना होगा। मूर्च्छा छोड़नी होगी। तभी वृत्ति की पाश्विकता एवं बुद्धि की मानवीयता विवेक की दिव्यता में रूपान्तरित हो सकेगी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४५

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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