शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

👉 असम्भव में सम्भव

जीवन के हर पल में विषमताएँ विपन्नताएँ एवं द्वन्द्व हैं। ये इतनी अधिक हैं कि इनको मिटाना असम्भव जान पड़ता है। जीवन के हर तल में, यहाँ तक कि मनुष्य के कण-कण में महाभारत का महासमर छिड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति नित नये कौरवी चालों और आघातों को झेलने एवं इनसे जूझने के लिए कुरुक्षेत्र में खड़ा है। महाभारत के ऐतिहासिक क्षण बीत चुके, ऐसा नहीं है। यह महासमर तो अभी भी जारी है। नये बच्चे के साथ पैदा हो रहा है।
  
गीता में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा है, क्योंकि यहाँ निर्णय होता है धर्म और अधर्म का, प्रकाश और अंधकार का, प्रेम एवं घृणा का। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर निर्णायक घटना घटित होती है। इसीलिए तो भारी चिंता है, किसी को कहीं राहत नहीं है, आदमी बेचैन है। इस बेचैनी के बड़े कारण भी हैं, क्योंकि घृणा के पक्ष में, अंधकार और अधर्म के पक्ष में बड़ी फौज है। महाभारत में कृष्ण की नारायणी सेना कौरवों के ही साथ थी। केवल कृष्ण, वे भी पूरी तरह से निहत्थे पाण्डवों के साथ थे। यह बात बड़ी अर्थपूर्ण है। जिन्दगी के भी यही हाल हैं। संसार की सारी शक्तियाँ आज अधर्म एवं अँधेरे के पक्ष में हैं। संसार की शक्तियाँ यानि कि परमात्मा की सेना, कृष्ण की समूची नारायणी सेना। केवल कृष्ण भर अपने पक्ष में हैं, वे भी बिना किसी हथियार के । भरोसा नहीं होता कि जीत अपनी ही हो सकेगी। पूरी तरह से असम्भव लगता है कि निहत्थे परमात्मा के साथ विजय कैसे हो सकेगी।
  
कृष्ण अर्जुन के ही सारथी थे, ऐसा नहीं है। हमारी जिन्दगी के रथ पर भी जो सारथी बैठा है, वे कृष्ण ही हैं। प्रत्येक के भीतर परमात्मा ही रथ को सम्भाल रहे हैं। लेकिन सामने विरोध में दिखाई दे रही है, बड़ी सेनाएँ, घातक व्यूह रचनाएँ, चतुर चालों एवं षड्यंत्रों का बड़ा विराट् आयोजन। ऐसे असम्भव में घबराहट स्वाभाविक है। अर्जुन भी घबराया था। हमारे भी हाथ-पाँव थरथरा रहे हैं। सब तरह से, गणित के हर ढंग से, प्रत्येक तर्क से हार सुनिश्चित मालूम पड़ रही है और जीत असम्भव। लेकिन इस असम्भव में सम्भव घटित हो सकता है, यदि कृष्ण के ‘मामेकंशरण व्रज’ की स्वर लहरियों को सुना जा सके। जो कृष्ण को समर्पित हैं, जिनके जीवन के हर कर्म अपने हृदय में वास करने वाले परमात्मा को अर्पित हैं, जीवन में अंतिम विजय उन्हीं की होती है। उनके जीवन के प्रत्येक असम्भव में सम्भव साकार होते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १५२

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