शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

👉 गायत्री और यज्ञ

भारत की प्रसुप्त अंतरात्मा को जगाने के लिए ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना सर्वप्रथम कार्य है। इन दोनों के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इनमें से एक की भी कमी हो जाती है, तो अधःपतन आरंभ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है-विद्या बुद्धिमत्ता, विवेक दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्याय प्रियता। विज्ञान का अर्थ है- योग्यता, साधन, शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है, तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिए ज्ञान की और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
  
आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों तथा विज्ञान मशीनों पर अवलंबित है। भौतिक जानकारी तथा शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए भौतिक उपकरणों का ही आज के वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे हैं यह तरीका बहुत खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्पफलदायक एवं अचिर-अस्थायी है जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंतःकरण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिए आत्म त्याग करने की भावना पैदा नहीं होती। आज का तथाकथित ज्ञान मनुष्य को अधिक स्वार्थी, खर्चीला एवं बनावट पसंद बनाता जा रहा है। दूसरी ओर जो वैज्ञानिक उन्नति हो रही है, उससे एक ओर जहाँ थोड़ा-सा लाभ होता है, दूसरी ओर उससे अधिक हानि हो जाती है।
  
प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे। आज जिस प्रकार हर वस्तुतः जड़ जगत् में से, भौतिक परमाणुओं में से खोजी जाती और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक बात, प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत् में से ढूँढ़ी जाती थी। आज का आधार भौतिकता है, प्राचीनकाल का आधार आध्यात्मिकता था।
  
ज्ञान और विज्ञान की हमारी प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होती थी, क्योंकि यही दोनों अध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं। गायत्री ज्ञान रुपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है। गायत्री मंत्र के ख्ब् अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार प्रदर्शन करने वाली शिक्षाएँ भरी हुई हैं। इसके अतिरिक्त इन अक्षरों का गुंथन रहस्यमय विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है। इन अक्षरों के नियमित उपासना से अलौकिक शक्तियाँ एवं आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सकता है।
  
यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। वेदमंत्रों की शब्द शक्ति को विशिष्ट कुण्डों, समिधाओं, हवियों चरुओं के साथ उत्पन्न की हुई विशेष सामर्थ्यवान अग्नि में सम्मिश्रित कर देने पर रेडियो सक्रिय शक्ति तरंगों का आविर्भाव होता है। यह शक्ति तरंगें रैडार यंत्र की तरह संसार के किसी भी भाग में भेजी जा सकती है, किसी व्यक्ति विशेष प्रयोजन के शरीर में भरी जा सकती है, प्रकृति के गुह्य गह्वर में किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रविष्ट कराई जा सकती है।
  
सांस्कृतिक पुनरुत्थान ज्ञान और विज्ञान के बिना असंभव है। भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र गायत्री है। उसकी शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। भौतिक माता-पिता हमें शरीर संपत्ति, शिक्षा सुविधा, आश्रय, सहयोग, स्नेह आदि बहुत कुछ देते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता की यदि हम प्रतिष्ठा और उपासना करें, तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त कर सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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