बुधवार, 25 दिसंबर 2019

👉 वृत्ति, बुद्धि, विवेक

विवेक, बुद्धि और वृत्ति-इन्हीं तीनों के इर्द-गिर्द मनुष्य की समग्र चेतना घूमती है। इन्हीं तीन से उसकी दशा और दिशा बदलती है, परिवर्तित होती है। विवेक मानव चेतना की श्रेष्ठतम भावदशा में अंकुरित एवं विकसित होता है। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि विवेक के अंकुरण से मानव चेतना अपनी श्रेष्ठतम अवस्था में पहुँच जाती है। जबकि बुद्धि मानव चेतना की मध्यवर्ती दशा है। इन दोनों से अलग वृत्ति मानव चेतना की निम्नतम अवस्था का प्रमाण है।
  
निश्चित रूप से वृत्ति पाश्विक है, बुद्धि मानवीय है और विवेक दिव्य है। वृत्ति सहज और अंधी है, इसे चेतना की सुप्तावस्था भी कह सकते हैं। यह अचेतन का जगत् है, यहाँ न शुभ है न अशुभ, न तो यहाँ भेद है और न विकास के लिए कोई संघर्ष। यहाँ तो बस वासनाओं की अंधी अँधेरी आँधियाँ हैं।
  
जबकि बुद्धि में न निद्रा है और न जागरण है। यहाँ अर्धमूर्च्छा है। यहाँ वृत्ति और विवेक के बीच संक्रमण है। यह देहरी है। इसमें चैतन्यता का एक अंश है, लेकिन बाकी हिस्से में गहरी अचेतनता है। यहाँ शुभ और अशुभ का भेद है। वासना के साथ विचार भी विद्यमान है।
  
विवेक मानव चेतना की पूर्ण जाग्रत् अवस्था है। यहाँ शुद्ध चैतन्यता है, यहाँ केवल प्रकाश हैं, यहाँ भी कोई संघर्ष नहीं हैं। बस शुभ का, सत् का, सौन्दर्य का सहज प्रवाह है। यहाँ बड़ी ही सजग सहजता है।
  
सहज वृत्ति भी है और विवेक भी, परन्तु वृत्ति में अंधी सहजता है और विवेक में सजग सहजता। केवल बुद्धि भर असहज है। इसमें पीछे की ओर वृत्ति है और आगे की ओर विवेक है। उसके शिखर की लौ विवेक की ओर है। लेकिन आधार की जड़ें  वृत्ति में हैं। शिखर कुछ-तलहटी कुछ, यही खिंचाव है। पशु में डूबने का आकर्षण-परमात्मा में उठने की चुैनाती, उसमें दोनों एक साथ हैं।
  
उपाय एक ही है, बुद्धि का विवेक में परिवर्तन। वृत्ति का बुद्धि के संक्रमण पथ से गुजरते हुए विवेक में रूपान्तरण। इसके लिए अंधेरे में दिया जलाना होगा। मूर्च्छा छोड़नी होगी। तभी वृत्ति की पाश्विकता एवं बुद्धि की मानवीयता विवेक की दिव्यता में रूपान्तरित हो सकेगी।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४५

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