गुरुवार, 26 दिसंबर 2019

👉 किमाश्चर्य परमं?

किमाश्चर्य परमं? - ‘सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?’- युगों पहले यक्ष ने युधिष्ठिर से यह सवाल पूछा था। धर्म का मर्म जानने वाले युधिष्ठिर ने इस सवाल के उतर में यक्ष से कहा था- ‘हजारों लोगों को रोज मरते हुए देखकर भी अपनी मौत से अनजान बने रहना, खुद को मौत से मुक्त मान लेना, जीते रहने की लालसा में अनेकों दुष्कर्म करते रहना ही सबसे बड़ा आश्चर्य है।’ अनेकों शवयात्राएँ रोज निकलती हैं, ढेरों लोग इनमें शामिल भी होते हैं। इसके बावजूद भी वे अपनी शवयात्रा की कल्पना नहीं कर पाते। काश! ऐसी कल्पना की जा सके अपनी मौत के कदमों की आहट सुनी जा सके, तो निश्चित ही जीवन दृष्टि संसार से हटकर सत्य पर केन्द्रित हो सकती है।
  
सूफी फकीर शेखसादी के वचन हैं- ‘बहुत समय पहले दज़ला के किनारे एक मुरदे की खोपड़ी ने कुछ बाते एक राहगीर से कही थी। वह बोली थी ः ऐ मुसाफिर, जरा होश में चल। मैं भी कभी भारी दबदबा रखती थी। मेरे ऊपर हीरों जड़ा ताज़ था। फतह मेरे पीछे-पीछे चली और मेरे पाँव कभी जमीन पर न पड़ते थे। होश ही न था कि एक दिन सब कुछ खत्म हो गया। कीड़े मुझे खा गए हैं और आज हर पाँव मुझे बेरहम ठोकर मारकर आगे निकल जाता है। तू भी अपने कानों से गफलत की रूई निकाल ले, ताकि तुझे मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत हासिल हो सके।’
  
सच में मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत को जो सुन लेता है, वह जान लेता है कि जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। उन दोनों के बीच जो है वह केवल जीवन का आभास भर है। यह जीवन की एक छाया भर है। क्योंकि जीवन तो शाश्वत है, और इसकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती। जन्म का अन्त है, जीवन का नहीं। और मृत्यु का प्रारम्भ है जीवन का नहीं। जीवन तो इन दोनों से पार है। इसे वही पाते हैं जो अनवरत तप और सतत सत्कर्मों से जीवन की छाया से पार शाश्वत में प्रवेश करते हैं। ऐसे लोग मौत से मुँह नहीं चुराते, बल्कि इसे शाश्वत जीवन का प्रवेश द्वार बना लेते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं हैं। और जो करने में समर्थ होते हैं, वे मर कर भी नहीं मरते।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४६

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