मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

👉 क्या हम मनुष्य हैं?

क्या हम मनुष्य हैं? अटपटे से लगने वाले इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा है। संवेदना में जितनी हमारी गहराई होगी-मनुष्यता में उतनी ही ऊँचाई होगी। और संग्रह में जितनी ऊँचाई होगी, मनुष्यता में उतनी ही नीचाई होगी। संवेदना और संग्रह जिन्दगी की दो दिशाएँ हैं। संवेदना सम्पूर्ण हो तो संग्रह शून्य हो जाता है। और जिनके चित्त संग्रह की लालसा से घिरे रहते हैं, संवेदना वहाँ अपना घर नहीं बसाती।
  
अरब देश की एक मलिका ने अपनी मौत के बाद कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का हुक्म जारी किया- ‘इस कब्र में अपार धन राशि गड़ी हुई है। जो व्यक्ति अत्यधिक निर्धन, दीन-दरिद्र और अशक्त हो, वह उसे खोदकर प्राप्त कर सकता है।’ कब्र बनाये जाने के बाद से हजारों दरिद्र और भिखमंगे उधर से गुजरे लेकिन उनमें से कोई भी इतना दरिद्र नहीं था कि धन के लिए किसी मरे हुए व्यक्ति की कब्र खोदे। एक अत्यन्त बूढ़ा और दरिद्र भिखमंगा उस कब्र के पास सालों से रह रहा था। जो उधर से गुजरने वाले प्रत्येक दरिद्र व्यक्ति को कब्र पर लगे हुए पत्थर की ओर इशारा कर देता था।
  
और फिर आखिरकार वह इंसान भी आ पहुँचा, जिसकी दरिद्रता इतनी ज्यादा थी कि वह उस कब्र को खोदे बिना नहीं रह सका। अचरज की बात तो यह थी कि कब्र खोदने वाला यह व्यक्ति स्वयं एक सम्राट था। उसने कब्र वाले इस देश को अभी-अभी जीता था। अपनी जीत के साथ ही उसने बिना समय गँवाये उस कब्र की खुदाई का काम शुरु कर दिया। लेकिन कब्र की गहराई में उसे अपार धनराशि की बजाय एक पत्थर मिला, जिस पर लिखा हुआ था, ऐ कब्र खोदने वाले इंसान, तू अपने से सवाल कर-क्या तू सचमुच मनुष्य है?
  
निश्चय ही जो मनुष्य है, वह भला मृतकों को सताने के लिए किस तरह तैयार हो सकता है। लेकिन जो धन के लिए जिन्दा इंसानों को मुरदा बनाने के लिए तैयार हो, उसे भला इससे क्या फर्क पड़ता है। निराश व अपमानित वह सम्राट जब कब्र से वापस लौट रहा था तो लोगों ने कब्र के पास रहने वाले बूढ़े भिखमंगे को जोर से हँसते देखा। वह कह रहा था-मैं सालों से इंतजार कर रहा था, अंततः आज धरती के सबसे अधिक निर्धन, दरिद्र एवं अशक्त व्यक्ति का दर्शन हो ही गया। सचमुच संवेदना जिस हृदय में नहीं है, वही दरिद्र, दीन और अशक्त है। जो संवेदना के अलावा किसी और सम्पत्ति के संग्रह के फेर में रहता है, एक दिन उसकी सम्पदा ही उससे पूछती है-क्या तू मनुष्य है? और आज हम पूछें अपने आपसे-क्या हम मनुष्य हैं?

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १४९

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