गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! सज्जनो!!
🔶 इस संसार में कुल मिलाकर तीन शक्तियाँ हैं, तीन सिद्धियाँ हैं। इन्हीं पर हमारा सारा जीवन-व्यापार चल रहा है। लाभ सुख जो भी प्राप्त करते हैं, इन्हीं तीन शक्तियों के आधार पर हमें मिलते हैं। पहली शक्ति है श्रम की शक्ति, शरीर के भीतर की शक्ति भगवान् की दी हुई शक्ति। इससे हमें धन व यश मिलता है। जमीन पहले भी थी, अभी भी है। यह मनुष्य का श्रम है। जब वह लगा तो सोना, धातुएँ, अनाज उगलने लगी। जितना भी सफलताओं का इतिहास है, वह आदमी के श्रम की उपलब्धियों का इतिहास है। यही सांसारिक उन्नति का इतिहास है।
🔷 जमीन कभी ब्रह्माजी ने बनाई होगी तो ऐसी ही बनाई होगी जैसा कि चन्द्रमा है। यहाँ गड्ढा, वहाँ खड्डा, सब ओर यही। श्रम ने धरती को समतल बना दिया। नदियाँ चारों ओर उत्पात मचा देती थीं। जलप्लावन से प्रलय-सी आ जाती थी। रास्ते बन्द हो जाते थे। ब्याह-शादियाँ भी बन्द हो जाती थीं, उन चार महीनों में जिन्हें चातुर्मास कहा जाता है सुना होगा आपने नाम। आदमी जहाँ थे, वहीं कैद हो जाते थे। यह आदमी का श्रम है, आदमी की मशक्कत है कि आदमी ने पुल बनाए, नाव बनाई, बाँध बनाये। अब वह बन्धन नहीं रहा। सारी मानव जाति श्रम पर टिकी है। आदमी का श्रम, जिसकी हम अवज्ञा करते हैं। दौलत हमेशा आदमी के पसीने से निकलती है। आपको सम्पदा के लिए कहीं गिड़गिड़ाने, नाक रगड़ने की जरूरत नहीं है। एक ही देवता है—श्रम का देवता। वही देवता आपको दौलत दिला सकता है। उसी की आपको आराधना-उपासना करनी चाहिए।
🔶 माना कि आपके बाप ने कमाकर रख दिया है, पर बिना श्रम के उसकी रखवाली नहीं हो सकती। श्रम कमाता भी है, दौलत की रखवाली भी कर सकता है। हम श्रम का महत्त्व समझ सकें, उसे नियोजित कर सकें तो हम निहाल हो सकते हैं। मात्र सम्पत्तिवान-समृद्ध ही नहीं, हम अन्यान्य दौलत के भी अधिकारी हो सकते हैं। सेहत, मजबूती श्रम से ही आती है। शिक्षा, कला-कौशल शालीनता, लोक-व्यवहार में पारंगतता श्रम से ही प्राप्त होती है। बेईमानी से, चालाकी से आदमी दौलत की छीन-झपट मात्र कर सकता है, पर उसे कमा नहीं सकता। आप यदि फसल बोना चाह रहे हैं तो बीज बोइए। यदि चालाकी करें, बीज खा जाएँ तो कुछ नहीं होने वाला। हर आदमी को ईमानदारी से श्रम किए जाने की, मशक्कत की कीमत समझाइए। सम्पदा अभीष्ट हो, विनिमय करना चाहते हो तो कहिए श्रमरूपी पूँजी अपने पास रखें। उसका सही नियोजन करिए। यह है दौलत नम्बर एक।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! सज्जनो!!
🔶 इस संसार में कुल मिलाकर तीन शक्तियाँ हैं, तीन सिद्धियाँ हैं। इन्हीं पर हमारा सारा जीवन-व्यापार चल रहा है। लाभ सुख जो भी प्राप्त करते हैं, इन्हीं तीन शक्तियों के आधार पर हमें मिलते हैं। पहली शक्ति है श्रम की शक्ति, शरीर के भीतर की शक्ति भगवान् की दी हुई शक्ति। इससे हमें धन व यश मिलता है। जमीन पहले भी थी, अभी भी है। यह मनुष्य का श्रम है। जब वह लगा तो सोना, धातुएँ, अनाज उगलने लगी। जितना भी सफलताओं का इतिहास है, वह आदमी के श्रम की उपलब्धियों का इतिहास है। यही सांसारिक उन्नति का इतिहास है।
🔷 जमीन कभी ब्रह्माजी ने बनाई होगी तो ऐसी ही बनाई होगी जैसा कि चन्द्रमा है। यहाँ गड्ढा, वहाँ खड्डा, सब ओर यही। श्रम ने धरती को समतल बना दिया। नदियाँ चारों ओर उत्पात मचा देती थीं। जलप्लावन से प्रलय-सी आ जाती थी। रास्ते बन्द हो जाते थे। ब्याह-शादियाँ भी बन्द हो जाती थीं, उन चार महीनों में जिन्हें चातुर्मास कहा जाता है सुना होगा आपने नाम। आदमी जहाँ थे, वहीं कैद हो जाते थे। यह आदमी का श्रम है, आदमी की मशक्कत है कि आदमी ने पुल बनाए, नाव बनाई, बाँध बनाये। अब वह बन्धन नहीं रहा। सारी मानव जाति श्रम पर टिकी है। आदमी का श्रम, जिसकी हम अवज्ञा करते हैं। दौलत हमेशा आदमी के पसीने से निकलती है। आपको सम्पदा के लिए कहीं गिड़गिड़ाने, नाक रगड़ने की जरूरत नहीं है। एक ही देवता है—श्रम का देवता। वही देवता आपको दौलत दिला सकता है। उसी की आपको आराधना-उपासना करनी चाहिए।
🔶 माना कि आपके बाप ने कमाकर रख दिया है, पर बिना श्रम के उसकी रखवाली नहीं हो सकती। श्रम कमाता भी है, दौलत की रखवाली भी कर सकता है। हम श्रम का महत्त्व समझ सकें, उसे नियोजित कर सकें तो हम निहाल हो सकते हैं। मात्र सम्पत्तिवान-समृद्ध ही नहीं, हम अन्यान्य दौलत के भी अधिकारी हो सकते हैं। सेहत, मजबूती श्रम से ही आती है। शिक्षा, कला-कौशल शालीनता, लोक-व्यवहार में पारंगतता श्रम से ही प्राप्त होती है। बेईमानी से, चालाकी से आदमी दौलत की छीन-झपट मात्र कर सकता है, पर उसे कमा नहीं सकता। आप यदि फसल बोना चाह रहे हैं तो बीज बोइए। यदि चालाकी करें, बीज खा जाएँ तो कुछ नहीं होने वाला। हर आदमी को ईमानदारी से श्रम किए जाने की, मशक्कत की कीमत समझाइए। सम्पदा अभीष्ट हो, विनिमय करना चाहते हो तो कहिए श्रमरूपी पूँजी अपने पास रखें। उसका सही नियोजन करिए। यह है दौलत नम्बर एक।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)









































