गुरुवार, 23 नवंबर 2017

👉 युग-मनीषा जागे, तो क्रान्ति हो (भाग 6)

🔶 उन्होंने लोगों के समक्ष कसौटी रखी कि यदि आज के विचार, रीति-रिवाज, क्रिया-कलाप, गतिविधियाँ सही साबित हों तो स्वीकार कीजिए, नहीं तो मना कीजिए। लोगों ने इनकार करना शुरू कर दिया—यह नहीं हो सकता। हमारे बाप-दादा किया करते थे तो हम क्या करें? इनकारी का नशा इस कदर चढ़ता चला गया कि सारी बातें वाहियात ठहराई जाने लगीं। यज्ञों के नाम पर जानवर काटे जाते थे, अश्वमेध के नाम पर घोड़े को मारकर हवन होता था। जो भी अनर्थ होता था वह इनकार किया जाने लगा। बुद्ध ने कहा कि यदि भगवान् कहते हैं कि ऐसा गलत काम करना चाहिए तो ऐसे भगवान् को भी नहीं मानना चाहिए। उन्होंने वेदों को मानने से इनकार कर दिया, जिनका अनर्थ निकाला जाने लगा था और कहा—बुद्धं शरणं गच्छामि। बुद्ध को क्या कहेंगे? दार्शनिक-मनीषी। बाबाजी नहीं, मनीषी।
              
🔷 मनीषी इनसान की समस्याओं का समाधान देते हैं, व्यक्ति तैयार करते हैं, समाज बनाते हैं। सुकरात को तैयार करने वाले का नाम अरस्तू है और शिवाजी को तैयार करने वाले का नाम समर्थ गुरु रामदास है। चन्द्रगुप्त को तैयार करने वाले का नाम चाणक्य है और विवेकानन्द को तैयार करने वाले हैं रामकृष्ण परमहंस। ये कौन हैं? अरे भाई, ये मनीषी हैं। मनीषी विचार नहीं, दर्शन देते हैं, दर्शन जीकर दिखाते हैं और अनेक का जीवन बना देते हैं। आप कहेंगे दर्शन तो बद्रीनाथ का, जगन्नाथ का, सोमनाथ का किया जाता है। किराया खर्च करके जो दर्शन आप करते हैं, वह दर्शन नहीं है। दर्शन वह है, जो जमीला ने किया। जमीला ने सारी जिन्दगी भर पैसे जमा किए थे और कहती थी मैं काबा जाऊँगी और दर्शन करूँगी। जाने के वक्त पड़ गया अकाल। पानी न पड़ने से, अनाज न होने से लोग भूखों मरने लगे।
 
🔶 जमीला ने कहा मैं काबा हज करने जाने वाली थी। अब हज नहीं जाऊँगी। बच्चे भूख मर रहे हैं। इनके खाने का, दूध का, पानी का इन्तजाम किया जाए ताकि वे जिन्दा रखे जा सकें और उसने काबा जाने से इनकार कर दिया। मेरे पास कुछ है ही नहीं मैं कैसे जाऊँगी? इसे कहते हैं दर्शन, फिलॉसफी। देखने के अर्थ में नहीं फिलॉसफी के अर्थ में। बाद में खुदाबन्द करीम के यहाँ मीटिंग हुई तो यह तय किया गया कि हज किसका कबूल किया जाए। सारे फरिश्तों की मीटिंग में तय हुआ कि सिर्फ एक आदमी ने इस साल हज खुलकर किया। खुदाबन्द ने उसका नाम बताया—जमीला। फरिश्तों ने अपने रजिस्टर दिखाए व कहा कि वह तो गई ही नहीं। खुदाबन्द ने समझाया— देखने के लिए न गई तो न सही, लेकिन उसने काबा के ईमान को, प्रेरणा को समझा और हज करके जो अन्तरंग में बिठाया जाना चाहिए था, वह यहीं बैठकर लिया। शेष सब झक मारते रहे। इसलिए सबका नामंजूर। जमीला का कबूल।

....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

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