शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

👉 अद्भुत सहनशीलता

🔷 बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान विश्वनाथ शास्त्री एक शास्त्रार्थ कर रहे थे। विरोधी पक्ष उनके प्रचण्ड वर्क और प्रमाणों के सामने लड़खड़ाने लगा और उसे अपनी हार होती दिखाई देने लगी।

🔶 विरोधियों ने शास्त्री जी को क्रोध दिलाकर झगड़ा खड़ा कर देने और शास्त्रार्थ को अंगर्णित रहने देने के लिए एक चाल चली। उनने सुँघनी तमाखू की एक मुठ्ठी शास्त्री जी ने मुँह पर फेंक मारी जिससे उन्हें बहुत छींक आई और परेशानी भी हुई।

🔷 शास्त्री जी बड़े धैर्यवान थे, उनने हाथ मुँह धोया। तमाखू का असर दूर किया और शान्त भाव से मुसकराते हुए कहा- हाँ, सज्जनों यह प्रसंग से बाहर की बात बीच में आ गई थी, अब आइए मूल विषय पर आवें और आगे का विचार विनिमय जारी रखो।

🔶 शास्त्री जी की इस अद्भुत सहनशीलता को देखकर विरोधी चकित रह गये। उनने अपनी हार स्वीकार कर ली।

🔷 मनुष्य का एक बहुत ही उच्चकोटि का गुण सहनशीलता है। जो दूसरों के द्वारा उत्तेजित किये जाने पर भी विक्षुब्ध नहीं होते और अपनी मनः स्थिति को संतुलित बनाये रखते हैं वस्तुतः वे ही महापुरुष है। ऐसे ही लोगों का विवेक निर्मल रहता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

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