शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Nov 2017

🔶 हम अपने परिजनों से लड़ते-झगड़ते भी रहते हैं और अधिक काम करने के लिए उन्हें भला-बुरा भी कहते रहते हैं, पर यह सब इस विश्वास के कारण ही करते हैं कि उनमें पूर्वजन्मों के महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक संस्कार विद्यमान हैं, आज वे प्रसुप्त पड़े हैं, पर उन्हें झकझोरा जाय तो जगाया जा सकना असंभव नहीं। कटु प्रतीत होने वाली भाषा में और अप्रिय लगने वाले शब्दों में हम अक्सर परिजनों का अग्रगामी उद्बोधन करते रहते हैं। इस संदर्भ में रोष या तिरस्कार मन में नहीं रहता, वरन् आत्मीयता और अधिकार की भावना ही काम करती रहती है।     

🔷 आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार की दिशा में जिनकी रुचि नहीं बढ़ी और लोकमंगल के लिए त्याग, बलिदान करने के लिए जिनमें कोई उत्साह पैदा नहीं हुआ मात्र पूजा-पाठ, तिलक-छापे और कर्मकाण्ड तक सीमित रह जाये ऐसे निर्जीव आध्यात्मिकता को देखते हैं तो इतना ही सोचते हैं बेचारा कुमार्गगामी कार्यों से बचकर इस गोरखधंधे में लग गया तो कुछ अच्छा ही है। अच्छाई का नाटक भी अच्छा, पर काम तो इतने मात्र से चलता नहीं। प्रखर और सजीव आध्यात्मिकता तो वह है जिसमें अपने आपका निर्माण दुनिया वालों की अँधी भेड़चाल के अनुकरण से नहीं, वरन् स्वतंत्र विवेक के आधार पर कर सकना संभव हो सके।

🔶 हम चाहते हैं कि हमारे प्रत्येक परिजन के अंतःकरण में लोकसेवा को मानव जीवन का एक अनिवार्य कर्त्तव्य मानने की निष्ठा जम जाये। उनमें इतना सत्साहस जाग पड़े कि वह थोड़ा श्रम और थोड़ा धन नियमित रूप से उस प्रयोजन के लिए लगाने का निश्चय करे और उस निश्चय को दृढ़ता एवं भावनापूर्वक निबाहें। यदि इतना हो जाता तो गायत्री परिवार के गठन के पीछे हमारे श्रम, त्याग और उमड़ते हुए भावों की सार्थकता प्रमाणित हो जाती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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