मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

👉 Jeevan Yatra जीवन यात्रा बने एक पर्वोत्सव

मनुष्य के हृदय भण्डार का द्वार खोलने वाली, निम्नता से उच्चता की ओर ले जाने वाली यदि कोई वस्तु है, तो प्रसन्नता ही है। यही वह साँचा है, जिसमें ढ़लकर मनुष्य अपने जीवन का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है। जीवन-यापन के लिए जहाँ उसे धन, वस्त्र, भोजन एवं जल की आवश्यकता पड़ती है, वहाँ उसे हलका-फुलका एवं प्रगतिशील बनाने के लिए प्रसन्नता भी आवश्यक है। प्रसन्नता मरते हुए मनुष्य में प्राण फूँकने के समान है। प्रसन्न और संतुष्ट रहने वाले व्यक्तियों का ही जीवन ज्योतिपुंज बनकर दूसरों का मार्गदर्शन करने में सक्षम होता है।
  
प्रसिद्ध दार्शनिक इमर्सन ने कहा है- वस्तुतः हास्य एक चतुर किसान है, जो मानव जीवन-पथ के काँटों, झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ कर अलग करता है और  सद्गुणों के सुरभित वृक्ष लगा देता है, जिसमें हमारी जीवन यात्रा एक पर्वोत्सव बन जाती है।
  
जीवन यात्रा के समय में मनुष्य को अनेक कठिनाइयों एवं समस्याओं का सामना करना पड़ता है, किन्तु हँसी का अमृत पान कर मनुष्य जीवन संग्राम में हँसते-हँसते विजय प्राप्त कर सकता है। इतिहास के पृष्ठों पर निगाह डालें, तो पता चलेगा कि महान व्यक्तियों के संघर्षपूर्ण जीवन की सफलता का रहस्य प्रसन्नता रूपी रसायन का अनवरत सेवन करते रहना ही है।
  
हँसना जीवन का सौरभ है। जो व्यक्ति आनन्द के खदान को जान लेता है, उसे श्रेष्ठ वातावरण की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। वर्तमान समय में जो परिस्थिति उसके सम्मुख होती है, उसी में वह सुख अनुभव कर लेता है। संतुलित मनुष्य यह नहीं सोचता कि जब वह धनी होगा, तभी उसे सुख मिल सकता है। धन मनुष्य को कभी सुखी बनाए नहीं रख सकता। प्रसन्नता तो मनुष्य के अन्तस् का स्रोत  है, उसके फूटते ही व्यक्ति को सब जगह तथा हर परिस्थिति में खुशी ही खुशी परिलक्षित होती है। स्वर्ग की चाह है, तो आनन्द के जल से आत्मा को स्नान कराना पड़ेगा। स्वर्ग कहीं और नहीं है, वह मनुष्य के अन्दर ही छुपा हुआ है। अन्दर के आनन्द से ही मनुष्य अनंत आनन्द की प्राप्ति कर सकता है।
  
एक विचारक का कथन है कि अगर तुम हँसोगे तो सारी दुनिया तुम्हारे साथ हँसेगी और अगर तुम रोओगे तो कोई तुम्हारा साथ न देगा।
  
प्रसन्न व्यक्ति को देखकर दूसरे व्यक्ति स्वयं ही खुश होने लगते हैं। प्रसन्न चित्त व्यक्ति के पास बैठकर दुःखी व्यक्ति भी थोड़ी देर के लिए प्रसन्नता के प्रवाह में अपने दुःख को भूल जाता है। जो व्यक्ति हर समय मुँह फुलाए रहता है, वह जीवन के प्राण उसके संजीवनी तत्त्व को नष्ट कर देता है। ऐसे व्यक्तियों के पास उठना-बैठना कोई पसंद नहीं करता। खिन्नता नरक की भयानक ज्वाला की भाँति मनुष्य को दीन, हीन, दुःखी एवं दरिद्र बना देती है।
  
अप्रसन्न प्रकृति का व्यक्ति दूसरों को भी हँसता नहीं देख सकता। दूसरे हँसते हैं, तो ऐसा लगता है कि ये सभी लोग हमारा मजाक बना रहे हैं। ऐसे लोग, प्रसन्नता की जीवन में क्या उपयोगिता है, इस तथ्य को भली-भाँति समझ नहीं पाते।  उनका स्वभाव बन जाता है, दूसरों को देखकर हँसना, दूसरों का मजाक बनाना, दूसरों के नुकसान पर हँसना। समय, परिस्थिति एवं वातावरण का ध्यान किये बिना असभ्य ढंग से हँसने का हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह हास्य, जीवन-विकास में सहायक नहीं होता, उलटे मनुष्य के अन्दर आसुरी प्रवृत्तियों को जन्म देता है और जीवन को दुरूह बना देता है। हमें ऐसी हँसी को अपने अंदर स्थान देना चाहिए, जो मनहूसों को भी हँसा दे, दुःखी को खुश कर दे।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

👉 Prem Aur Parmatma प्रेम और परमात्मा

संतो की उपदेश देने की रीति-नीति भी अनूठी होती है. कई संत अपने पास आने वाले से ही प्रश्न करते है और उसकी जिज्ञासा को जगाते है; और सही-सही मार्गदर्शन कर देते है। आचार्य रामानुजाचार्य एक महान संत एवं संप्रदाय-धर्म के आचार्य थे. दूर दूर से लोग उनके दर्शन एवं मार्गदर्शन के लिए आते थे. सहज तथा सरल रीति से वे उपदेश देते थे.

एक दिन एक युवक उनके पास आया और पैर में वंदना करके बोला। मुझे आपका शिष्य होना है. आप मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। रामानुजाचार्यने कहा : तुझे शिष्य क्यों बनना है? युवक ने कहा: मेरा शिष्य होने का हेतु तो परमात्मा से प्रेम करना है। संत रामानुजाचार्य ने तब कहा: इसका अर्थ है कि तुझे परमात्मा से प्रीति करनी है. परन्तु मुझे एक बात बता दे कि क्या तुझे तेरे घर के किसी व्यक्ति से  प्रेम है?

युवक ने कहा : ना, किसीसे भी मुझे प्रेम नहीं। तब फिर संतश्री ने पूछा : तुझे तेरे माता-पिता या भाई-बहन पर स्नेह आता है क्या? युवक ने नकारते हुए कहा, मुझे किसी पर भी तनिक मात्र भी स्नेह नहीं आता. पूरी दुनिया स्वार्थपरायण है, ये सब मिथ्या मायाजाल है। इसीलिए तो मै आपकी शरण में आया हूँ।

तब संत रामानुज ने कहा :बेटा, मेरा और तेरा कोई मेल नहीं. तुझे जो चाहिए वह मै नहीं दे सकता।  युवक यह सुन स्तब्ध हो गया। उसने कहा : संसार को मिथ्या मानकर मैने किसी से प्रीति नहीं की. परमात्मा के लिए मैं इधर-उधर भटका. सब कहते थे कि परमात्मा के साथ प्रीति जोड़ना हो तो संत रामानुज के पास जा; पर आप तो इन्कार कर रहे है।

संत रामानुज ने कहा : यदि तुझे तेरे परिवार से प्रेम होता, जिन्दगी में तूने तेरे निकट के लोगों में से किसी से भी स्नेह किया होता तो मै उसे विशाल स्वरुप दे सकता था. थोड़ा भी प्रेमभाव होता, तो मैं उसे ही विशाल बना के परमात्मा के चरणों तक पहुँचा सकता था।

छोटे से बीज में से विशाल वटवृक्ष बनता है. परन्तु बीज तो होना चाहिए. जो पत्थर जैसा कठोर एवं शुष्क हो उस में से प्रेम का झरना कैसे बहा सकता हूँ? यदि बीज ही नहीं तो वटवृक्ष कहाँ से  बना सकता हूँ? तूने किसी से प्रेम किया ही नहीं, तो तेरे भीतर परमात्मा के प्रति प्रेम की गंगा कैसे बहा सकता हूँ?

कहानी का सार ये है कि जिसे अपने निकट के भाई-बंधुओं से प्रेमभाव नहीं, उसे ईश्वर से प्रेम भाव नहीं हो सकता. हमें अपने आस पास के लोगों और कर्तव्यों से मुंह नहीं मोड़ सकते। यदि हमें आध्यात्मिक कल्याण चाहिए तो अपने धर्म-कर्तव्यों का भी  उत्तम रीति से पालन करना होगा।

👉 Janmansh Ka Parishkar जनमानस का परिष्कार

जिन्हें कुछ करना होता है वे घोर व्यस्तता के बीच भी अपने प्रिय प्रसंग के लिए कुछ कर गुजरने के लिए सहज ही अवसर प्राप्त कर लेते हैं। यहाँ तक कि दरिद्रता, रुग्णता, व्यस्तता से लेकर समस्याओं के जाल जंजाल तक के कुछ न कुछ करते रहने में बाधक नहीं बन सकते। ऐसे भावनाशीलों की कमी नहीं जो उलझनों और कठिनाइयों से निपटने की तरह ही अन्तरात्मा की, महाकाल की युग पुकार की-गरिमा स्वीकार करते हैं और उसे सर्वोपरि समस्या आवश्यकता मानते हैं। प्रयासों में प्रमुखता सदा उन्हें मिलती है जिन्हें अंतःकरण द्वारा महत्वपूर्ण माना जाता है। युग प्रकार यदि महत्वहीन समझी गई है तो सहज ही उसके लिए आजीवन फुरसत न मिलने की मनःस्थिति और परिस्थिति बनी रहेगी। श्रद्धा उमंगी भी तो हजार उपाय ऐसे निकल जावेंगे जिनके आधार पर निर्वाह की समस्याओं को हल करते रहने के साथ-साथ ही प्रस्तुत युग धर्म के आहृ के लिए भी इतना कुछ किया जा सकता है जिससे आत्म संतोष और लोक श्रद्धा को अभीष्ट मात्रा उपलब्धि होती रहे।

युग विकृतियों का एक ही कारण है जन मानस में आदर्शों के प्रति अनास्था का बढ़ जाना। इस सड़ी कीचड़ से ही असंख्यों कृमि कीटक उपजते हैं और समस्याओं तथा विभीषिकाओं के रूप में जन जन को संत्रस्त करते हैं। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का एक ही उपाय है-जन मानस का परिष्कार। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को समावेश किया जा सके, दृष्टिकोण में आदर्शवादिता को स्थान मिल सके तो लोक प्रवाह में सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य दीखेगा। ऐसी दशा में युग संकट के कुहासे को दूर होते देर न लगेगी। समस्या दार्शनिक है। आर्थिक, राजनैतिक या सामाजिक नहीं। जन मानस को परिष्कृत किया जा सके तो प्रस्तुत विभीषिकाओं का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। उनसे लड़ने की लम्बी चौड़ी तैयारी करने की आवश्यकता ही न रहेगी।

मनुष्य को ध्वंस के विरत करने के-सुजन में से लागू होने के लिए सहन किया जा सके तो बड़े पैमाने पर जो खर्चीली योजनाएं बन रहीं है। उनमें से एक भी आवश्यकता न पड़ेगी। जन के बूँद बूँद प्रयासों से इतना कुछ अनायास ही होने लगेगा जिस पर सैकड़ों पंच वर्षीय सृजन योजनाओं को निछावर किया जा सकेगा। इसके विपरीत जन सहयोग के अभाव में बड़ी से बड़ी खर्चीली योजनाएं अपंग बनकर रह जाती है। हमें पत्तों पर भटकने के स्थान पर जड़ सींचने का प्रयत्न करना चाहिए। जन मानस का परिष्कार ही सामयिक समस्याओं का एक मात्र हल है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना का लक्ष्य इस एक ही राज मार्ग पर चलते हुए निश्चित रूप से पूर्ण हो सकता है। ज्ञान यज्ञ का युग अनुष्ठान इसी निमित्त चल रहा हैं। विचार क्रान्ति की लाल मशाल का प्रज्वलन इसी विश्वास के साथ हुआ है कि जन-जन के मन-मन में उत्कृष्टता की आस्थाओं का आलोक उत्पन्न किया जा सके।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी १९७९, पृष्ठ ५४

👉 Where is the Lasting Joy?

We are all driven by the quest for joy. Behind all our plans, actions, expectations, lies this perennial thirst for joy. But because of our natural perception of the world and life at the gross material level, our domain of search remains confined to the sentient world and related extrovert experiences. We are not even aware that there could be an inner bliss or spiritual joy.

The feeling of delight is within us. How could the external things, material experiences enhance or suppress it? They might just give a momentary excitation or satisfy our ego for sometime. The true means and sources of joy lie deep within our own selves. The Vedic philosophy logically describes this fact – it is the consciousness-element of mind, which feels the joy. So, without knowing this sublime element or deciphering its nature and conditioning it, one can’t hope for unalloyed bliss or lasting joy. Conquering the mind is indeed bigger than conquering the world. One who succeeds in it is the happiest, strongest person in this world.

Hidden there is the subtle spring of infinite bliss in the core of our inner self. What we ever experience as joy is only a sprinkle of this immense source. The pleasure, if any, we find in the outer world is also a reflection of this inner impulse. As the Vedic Sciences (of Yoga etc) preach – in order to peep into this inner treasure, we will first have to purity and control our minds (both conscious and unconscious mind), stabilize and uproot its agility and extrovert tendencies.

Such a mind can eventually have the realization of divinity, of the absolute truth, the omnipresent, eternal Brahm. Attaining this state is a grand sadhana. The gamut of universal principles of religion is taught only for this purpose. The righteous path of morality, human religion alone can reach the realms of ever lasting joy.

📖 Akhand Jyoti, Sept. 1942

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 27 April 2020

महिलाएँ शिक्षा प्राप्त करें, ज्ञानार्जन करें, विचारवान् बनें तभी तो उनसे यह आशा की जा सकती है कि वे परिवार में और समाज समें अपने उत्तरदायित्वों को भलीभाँति निबाह सकेंगी।  यदि इन आवश्यक तत्त्वों की ओर से ध्यान हटाकर आभूषण प्रियता की संकीर्ण विचारधारा को ही अपनाया जाता रहा तो कर्त्तव्य पालन में व्यवधान आना स्वाभाविक है। नारी के विकास में बाधा स्वरूप इस कुरीति के प्रति अब अरुचि उत्पन्न होनी चाहिए और विचारशील महिलाओं को इस दिशा में कुछ करने के लिए तत्पर होना चाहिए।

यदि नारी की क्षमता को जगाया जाय, उसे योग्य बनाने की ओर ध्यान दिया जाय तो न केवल हमारे परिवार में स्वर्गीय वातावरण की सृष्टि हो सकेगी, वरन् समाज के लिए भी कई दृष्टियों से लाभकर स्थिति बन सकती है। गृह-व्यवस्था को सँभालने के बाद उसके पास जो समय बचता है वह बाहरी प्रयोजनों में ही तो लगेगा और जाग्रत् शक्ति क्षमतावान् नारी अपनी योग्यता से समाज के लिए सुखद परिस्थितियाँ तथा प्रगतिशील वातावरण बना सकेगी।

परिवार निर्माण का परोक्ष अर्थ है-नारी जागरण। अर्द्ध मूर्छि, पददलित, आलस्य, प्रमाद और पिछड़ेपन से ग्रस्त नारी अपने लिए और परिवार के लिए भार ही रहती है। रोटी, कपड़ा, पाती और बदले में रसोईदारिन, चौकीदारिन, जननी, धात्री और चलती-फिरती गुड़िया की हलकी भारी भूमिका निभाती है। इस पिछड़ेपन के रहते वह परिवार निर्माण जैसे असाधारीण कार्य को संपन्न कैसे कर सकेगी। इसके लिए सूझबूझ, संतुलन, अनरवत प्रयास की आवश्यकता पड़ती है। योजना का स्वरूप, परिमाण एवं अवरोधों का समाधान भी उसके सामने आना चाहिए।

दुष्ट प्रचलनों में सर्वनाशी है-विवाहोन्माद। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। दहेज के लेन-देन में कितने घर-परिवार बर्बाद हुए और दर-छर के भिखारी बने हैं इसका बड़ा मर्मभेदी इतिहास है। बारात की धूमधाम, आतिशबाजी, गाजे-बाजे, दावतें, दिखावे, प्रदर्शन में इतना अपव्यय होता है कि एक सामान्य गृहस्थ की आर्थिक कमर ही टूट जाती है। लड़की का माँस बेचने वाला दहेज के व्यवसायी अपने मन में भले ही प्रसन्न होते और नाक ऊँची देखते हों, पर यदि विवेक से पूछा जाय तो इन अदूरदर्शियों के ऊपर दसों दिशाओं से धिक्कार ही बरसती दिखेगी। विवेकवान् युवकों का कर्त्तव्य है कि दहेज न लेने, धूमधाम की शादी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा आन्दोलन चलायें और उस व्रत को अभिभावकों की नाराजगी लेकर भी निभायें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Jeevan Sanjevani जीवन संजीवनी है इच्छा-शक्ति

ज्ञान और क्रिया के मध्य की स्थिति को इच्छा शक्ति के नाम से जाना जाता है। ज्ञान जब तक कार्य रूप में परिणत नहीं होता, तब तक वह अनुपयोगी और अपूर्ण ही कहा जायेगा। उसे पूर्ण और उपयोगी बनाने के लिए इच्छा शक्ति की आवश्यकता अनुभव की जाती है। संसार में जितने भी महान् कार्य हुए हैं, वे मनुष्य की प्रबल इच्छा शक्ति का संयोग पाकर ही हुए। दृढ़ इच्छा-शक्ति सम्पन्न व्यक्ति ही महान् कार्यों का संचालन करते हैं। वही नवसृजन व नवनिर्माण करने में समर्थ होते हैं। अपने और दूसरों के कल्याण, विकास एवं उत्थान का मार्ग खोजते हैं। जीवन का सुख, स्वास्थ्य सौन्दर्य, प्रसन्नता, शांति उसके सदैव साथ रहते हैं। जीवन की विरोधी परिस्थितियाँ उसकी मनःस्थिति को नहीं डिगा पातीं।

मन की प्रचण्ड शक्ति सामर्थ्य के अस्तित्व को अब सर्वत्र पृथक् सत्ता के रूप में स्वीकारा गया है। नवीन विचारधारा के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर के भीतर कोई स्वतंत्र सत्ता भी क्रियाशील है, जिसे मन कहा जाता है। शरीर की समस्त गतिविधियों का संचालन उसी के इशारे पर होता रहता है। इच्छाशक्ति और संकल्प शक्ति का उद्गम स्रोत भी वही है।
  
वियना के प्रसिद्ध मनः चिकित्सक डॉ. विक्टर फ्रैंक्ल ने लम्बे समय तक हिटलर के यहूदी बन्दी शिविरों में रहकर क्रूरतापूर्ण अत्याचारों को झेला है। उनके समूचे परिवार को उन्हीं के समक्ष गैस-चैम्बरों में झोंककर मार डाला गया था। मृत्यु निरंतर सिर पर मँडराते हुए भी उनने अपने जीवन को उपेक्षणीय नहीं समझा। इच्छा-शक्ति के बलबूते वे जीवन विरोधी परिस्थितियों में भी अध्ययनरत बने रहे। फलतः उन्होंने साहित्य, वक्तृत्व और चिकित्सा के क्षेत्र में विशिष्ट योग्यता अर्जित कर दिखाई। उनके कथनानुसार जीवन की सफलता असफलता उत्कर्ष-अपकर्ष, उन्नति-अवनति, उत्थान-पतन सब मनुष्य की इच्छा शक्ति की सबलता और निर्बलता के ही परिणाम है। सशक्त दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न लोगों  को कुविचार, कुकल्पनाएँ, भयानक परिस्थितियाँ और उलझनें भी विचलित नहीं कर सकतीं। वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हैं। उनके विचार स्थिर और निश्चित होते हैं। प्रबल इच्छा-शक्ति से शारीरिक पीड़ा भी उन्हें नहीं डिगा सकती। ऐसे व्यक्ति हर परिस्थिति में रास्ता निकाल कर आगे बढ़ते रहते हैं। अपने व्यक्तिगत हानि-लाभ से भी प्रभावित नहीं होते।
  
जन समूह के समक्ष सत्यवादी और धर्म परायण होने का दिखावा करना एक बात है और उसे स्वेच्छा से जीवन-व्यवहार में उतारना सर्वथा दूसरी। यश की कामना से तो अधिकांश जनसमुदाय परमार्थ प्रवृत्तियों को अपनाने में निरत रह सकता है, लेकिन अंतःप्रेरणा के उभरने पर संभवतः कोई विरले ही ऐसा कर पाते हैं। मनुष्य की महानता इसी में है कि वह स्वेच्छापूर्वक सत्प्रवृत्ति संवर्धन की बात को गले उतारे। उत्कृष्ट जीवन की रीति-नीति भी यही हो सकती है। जब टिटिहरी और गिलहरी जैसे नगण्य एवं तुच्छ प्राणी विशाल समुद्र को सुखा देने, पाट देने की योजना को सफल बनाने का प्रयत्न कर सकते हैं, तो मनुष्य जैसे सर्वश्रेष्ठ प्राणी की तो अपनी इच्छा- शक्ति का प्रमाण परिचय पूरी तरह देने में क्या संकोच होना चाहिए, मनुष्य जब यह दृढ़ निश्चय कर बैठता है कि  वह विशृंखलित मन रूपी सागर को भी सुखा कर अपने  वश में कर सकता है, तो इच्छा-शक्ति स्वयंमेव उभर कर आती है। बुद्धि भी उसकी साथी-सहयोगी बन जाती है। जो अपनी प्रबल इच्छा-शक्ति को जगाते और अपनी क्षमताओं का सदुपयोग लोकहित में करने लगते हैं, ईश्वर भी उनकी सहायता हेतु सदैव तत्पर रहता है।

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

👉 Yah Sansaar Kya Hai यह संसार क्या है?

एक दिन एक शिष्य ने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, आपकी दृष्टि में यह संसार क्या है?

इस पर गुरु ने एक कथा सुनाई।

'एक नगर में एक शीशमहल था। महल की हरेक दीवार पर सैकड़ों शीशे जडे़ हुए थे। एक दिन एक गुस्सैल कुत्ता महल में घुस गया। महल के भीतर उसे सैकड़ों कुत्ते दिखे, जो नाराज और दुखी लग रहे थे। उन्हें देखकर वह उन पर भौंकने लगा। उसे सैकड़ों कुत्ते अपने ऊपर भौंकते दिखने लगे। वह डरकर वहां से भाग गया कुछ दूर जाकर उसने मन ही मन सोचा कि इससे बुरी कोई जगह नहीं हो सकती।

कुछ दिनों बाद एक अन्य कुत्ता शीशमहल पहुंचा। वह खुशमिजाज और जिंदादिल था। महल में घुसते ही उसे वहां सैकड़ों कुत्ते दुम हिलाकर स्वागत करते दिखे। उसका आत्मविश्वास बढ़ा और उसने खुश होकर सामने देखा तो उसे सैकड़ों कुत्ते खुशी जताते हुए नजर आए।

उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। जब वह महल से बाहर आया तो उसने महल को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्थान और वहां के अनुभव को अपने जीवन का सबसे बढ़िया अनुभव माना।  वहां फिर से आने के संकल्प के साथ वह वहां से रवाना हुआ।'

कथा समाप्त कर गुरु ने शिष्य से कहा..

'संसार भी ऐसा ही शीशमहल है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों के अनुरूप ही प्रतिक्रिया पाता है। जो लोग संसार को आनंद का बाजार मानते हैं, वे यहां से हर प्रकार के सुख और आनंद के अनुभव लेकर जाते हैं।

जो लोग इसे दुखों का कारागार समझते हैं उनकी झोली में दुख और कटुता के सिवाय कुछ नहीं बचता.....।'

👉 Bhagwan Ka Hastakshep बेकाबू स्थिति में भगवान का हस्तक्षेप

यदि दैवी शक्तियाँ रोकथाम करने में समर्थ हैं, तो समय रहते वह सब क्यों नहीं करती। इतनी हैरानी उत्पन्न होने के बाद क्यों चेतती हैं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि प्रत्येक घटनाक्रम के पीछे मनुष्य को सीखने लायक बहुत कुछ होता है। किस मार्ग पर चलने का क्या परिणाम हो सकता है इसे देखने अनुभव करने से भी मनुष्य बहुत कुछ सीखता है। अस्तु दैवी शक्तियों का हस्तक्षेप तभी चलता है जब जन सामान्य की अपनी क्षमताएं चूक जाती हैं।

आशा यही की जाती है कि जब मनुष्य बिगाड़ कर सकता है, तो उसी को बनाना या सुधारना भी चाहिए। बनाने, सुधारने के उपाय पिछले दिनों मनुष्य करता रहा है। इन दिनों भी कर रहा है, पर वे इस स्तर के नहीं जितने के होने चाहिए। ऐसी दशा में जब स्थिति हर दृष्टि से बेकाबू हो जाती है तभी भगवान हस्तक्षेप करते हैं। अन्यथा यही आशा करते हैं कि बिगाड़ने वाले सुधारें भी। सुधारने की प्रक्रिया इन दिनों परोक्ष जगत में चल रही है। समय आने पर सामान्यजन उसका प्रत्यक्ष रूप भी देखेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1984 पृष्ठ 9

👉 Soul: The Identity of Truth

If we want to know the meaning, the purpose, the nature of our life, we must know our own self, our soul. Without that we keep wandering in the infinite trap of illusion and the immensity of worldly circumstances without even having the sight of our goal.
If you want to see the light of wisdom, want to excel in the truest sense, you must first accept and ponder over the preeminence of your soul. If you want to live respectful life, learn to respect your soul. Spiritual evolution would begin and eventually lead to unification of your soul (individual self) with the Supreme Soul (God) only if you purify, enlighten your self up to virtuous levels. For that, you will have to recognize and experience the divinity hidden in your soul.

Refinement and rise from inferior to superior, evil to nobility, is possible only if you realize that your soul, your inner self is originally a reflection of the divine. Respecting your inner self, your soul-reality does not mean that you become egotist or arrogant or have some superiority complex. In fact, that would be just a contrary act, a blunder of your ignorance. So be careful and understand that the respect of your own self means honor of your soul, your eternal impersonal self.

You should attempt to see the light of divinity indwelling in it, see the presence of God in it and worship it by sublime illumination of your heart, mind and conduct. Remembering it every moment should remind you that you are breathing in the presence of God and should edify your aspirations, your thoughts, your deeds accordingly.

📖 Akhand Jyoti, June 1942

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 25 April 2020

स्वार्थी व्यक्ति यों किसी का कुछ प्रत्यक्ष बिगाड़ नहीं करता, किन्तु अपने लिए सम्बद्ध व्यक्तियों की सद्भावना खो बैठना एक ऐसा घाटा है, जिसके कारण उन सभी लाभों से वंचित होना पड़ता है जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक स्नेह-सहयोग पर टिके हुए हैं।

ईश्वर को इस बात की इच्छा नहीं कि आप तिलक लगाते हैं या नहीं, पूजा-पत्री करते हैं या नहीं, भोग-आरती करते हैं या नहीं, क्योंकि उस सर्वशक्तिमान् प्रभु का कुछ भी काम इन सबके बिना रुका हुआ नहीं है। वह इन बातों से प्रसन्न नहीं होता, उसकी प्रसन्नता तब प्रस्फुटित होती है जब अपने पुत्रों को पराक्रमी, पुरुषार्थी, उन्नतिशील, विजयी, महान् वैभव युक्त, विद्वान्, गुणवान्, देखता है और अपनी रचना की सार्थकता अनुभव करता है।

आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है- असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़ें, परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ्य का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध ही होता है।

किसी को यदि परोपकार द्वारा सुखी करते हैं और किसी को अपने क्रोध का लक्ष्य बनाते हैं, तो एक ओर का पुण्य दूसरी ओर के पाप से ऋण होकर शून्य रह जायेगा। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का सामंजस्य एवं अनुरूपता ही वह विशेषता है, जो जीवन जीने की कला में सहायक होती है।

ऐसे विश्वासों और सिद्धान्तों को अपनाइये जिनसे लोक कल्याण की दिशा में प्रगति होती हो। उन विश्वासों और सिद्धान्तों को हृदय के भीतरी कोने में गहराई तक उतार लीजिए। इतनी दृढ़ता से जमा लीजिए कि भ्रष्टाचार और प्रलोभन सामने उपस्थित होने पर भी आप उन पर दृढ़ रहें, परीक्षा देने एवं त्याग करने का अवसर आवे तब भी विचलित न हों। वे विश्वास श्रद्धास्पद होने चाहिए, प्राणों से अधिक प्यारे होने चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Rachnatmak Jeevan Ki Sadhna रचनात्मक जीवन की साधना

नया वर्ष नयी साधना के स्वरों को लेकर हम सबके द्वार-देहरी तक आया है। इन स्वरों में रचनात्मक जीवन का मधुर गीत पिरोया है। चेतो! चेतो!! जागो! जागो!! की मीठी धुन को हम सभी इस नव वर्ष के नए विहान पर सुन सकते हैं। बहुत सोये,  अब और नहीं! बहुत खोया अब और नहीं!! की प्रभाती नव वर्ष की प्रभात बेला में गायी जा रही है। प्रकृति, परमेश्वर एवं सद्गुरु की सम्मिलित चेतना से उपजे इन साधना स्वरों की अनसुनी न करें।
  
ध्यान रहे, साधना से ही जीवन संवरता है। रचनात्मकता की कोपलें फूटती हैं, नव सृजन के अंकुर निकलते हैं। साधना के अभाव में जीवन यूँ ही बंटता, बिखरता और बरबाद होता रहता है। बरबादी की इस टीस को हममें से हर एक कहीं न कहीं अपनी अन्तर्चेतना में अनुभव करता है। जिन्दगी की बरबादी का दर्द हम सभी को सालता है। रचनात्मक जीवन की साधना में ही इसका समाधान है।
  
किन्तु सावधान! यह साधना कुछ इने-गिने कर्मकाण्डों तक सीमित नहीं है। किसी तरह की पूजा-पत्री, पाठ, होम से इसे पूरा नहीं किया जा सकता। यह तो सजगता, सक्रियता एवं शुचिता से ही सधती है। इन्हीं तीन के मिलन और मिश्रण से जीवन में सार्थकता का समावेश होता है। इसी संयोग से जीवन में वैभव एवं विभूतियों के अनुदान-वरदान बरसते हैं। व्यक्ति धनवान् ही नहीं, पुण्यवान्, बलवान्, ओजवान् एवं कीर्तिवान् भी बनता है। सभी तरह की सफलताएँ स्वयं ही उसका वरण करती हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २२०

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

👉 Aazadi आजादी

एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा। सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा?

संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है। सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है। घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी में सब समझ गया। दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं।
    
सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है। सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबुझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया। तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।

कहानी से तात्पर्य : हम सत्संग में तो जाते हैं ज्ञान की बाते करते हैं या सुनते भी हैं, पर हमारा मन हमेशा सांसारिक बातों में हीं उलझा रहता हैं। सत्संग में भी हम सिर्फ उन बातों को पसंद करते है जिसमे हमारा स्वार्थ सिद्ध होता हैं। हमे वहां भी मान यश मिल जाये यही सोचते रहते हैं। जबकि सत्संग जाकर हमें सत्य को स्वीकार कर सभी बातों को महत्व देना चाहिये और जिस असत्य, झूठ और अहंकार को हम धारण किये हुए हैं उसे साहस के साथ मन से उतार कर सत्य को स्वीकार करना चाहिए।

👉 Ab Sirf Karne Ka Samay अब सिर्फ करने का समय

युग सृजन के पुण्य प्रयोजन की योजना बनाते रहने का समय बीत गया, अब तो करना ही करना शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में बहुत समय व्यतीत नहीं किया जाना चाहिए।

लक्ष्य विशाल और विस्तृत है। जन-मानस के परिष्कार के लिए प्रज्वलित ज्ञान-यज्ञ के, विचार क्रान्ति के, लाल मशाल के टिमटिमाते रहने से काम नहीं चलेगा। उसके प्रकाश को प्रखर बनाने के लिए जिस तेल की आवश्यकता है वह जागृत आत्माओं के भाव भरे त्याग बलिदान से ही निचोड़ा जा सकेगा। मनुष्य में देवत्व का उदय, संसार के समस्त उत्पादनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण उपार्जन है। इस कृषि कर्म में हमें शीत, वर्षा की परवा न करते हुए निष्ठावान कृषक की तरह लगना चाहिए। धरती पर स्वर्ग का अवतरण नया नन्दन वन खड़ा करने के समान है। निष्ठावान माली की तरह हमारी कुशलता ऐसी होनी चाहिए जिससे सृष्टा के इस मुरझाये विश्व उद्यान में बसन्ती बहार ला सकने का श्रेय मिल सके। ऐसी सफलता लाने में खाद, पानी जुटाने से ही काम नहीं चलता उसमें माली को अपनी प्रतिभा भी गलानी, खपानी पड़ती है। भूमि और पौधों के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने वाले किसान और माली की तरह ही हमें देवत्व के उद्भव और स्वर्ग के अवतरण में जागृत आत्माओं को अपनी श्रद्धा और क्षमता का समर्पण प्रस्तुत करना होगा।

राज क्रान्ति का काम साहस और शस्त्र बल से चल जाता है। आर्थिक क्रान्ति साधन और सूझ-बूझ के सहारे हो सकते हैं। यह भौतिक परिवर्तन है जिनके लिए भौतिक साधनों से काम चल जाता है। हमें बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी का उद्गम खोजना और संगम बनाना है। इसके लिए चरित्र, श्रद्धा और प्रतिभा के धनी दधीचि के वंशजों को ही आगे आना और मोर्चा सम्भालना है। भवन, पुल, कारखाने आदि को वस्तु शिल्पी अपनी शिक्षा के सहारे बनाने में सहज ही सफल होते रहते हैं। हमें नये व्यक्ति, नये समाज और नये युग का सृजन करना है। जागृत आत्माओं का भाव भरा अनुदान ही यह प्रयोजन पूरा कर सकता है। इसकी याचना करने किसके पास जाया जाय? जिनके पास भावना है ही नहीं, जो कृपणता के दलदल में एड़ी से चोटी तक फंसे पड़े हैं उन दयनीय लोगों से क्या याचना की जाय? कर्ण जैसे उदार व्यक्ति ही मरणासन्न स्थिति में अपने दाँत उखाड़ कर देते रहे हैं, हरिश्चन्द्रों ने ही अपने स्त्री, बच्चे बेचे हैं। लोभग्रसितों को तो कामनाओं की पूर्ति कराने से ही फुरसत नहीं, देने का प्रसंग आने पर तो उनका कलेजा ही बैठने लगेगा।

व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए न तो साधनों की आवश्यकता है और न परिस्थिति के अनुकूल होने की। उसके लिए ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए जिनकी नसों में भाव भरा ऋषि रक्त प्रवाहित होता हो। चतुरता की दृष्टि से कौआ सबसे सयाना माना जाता है। शृंगाल की धूर्तता प्रख्यात है। मुर्दे खोद खाने में बिज्जू की कुशलता देखते ही बनती है। खजाने की रखवाली करने वाला सर्प लक्षाधीश होता है। भावनात्मक सृजन में तो दूसरी ही धातु से ढले औजारों की आवश्यकता है। आदर्शों के प्रति अटूट आस्था की भट्टी में ही ऐसी अष्टधातु तैयार होती है। आवश्यकता ऐसे ही व्यक्तित्वों की पड़ रही है जो अष्ट धातु के ढले हैं। लोक सेवा का क्षेत्र बड़ा है उसके कोंतरों में ऐसे कितने ही छद्म वेषधारी वंचक लूट-खसोट की घात लगाये बैठे रहते हैं, पर उनसे कुछ काम तो नहीं चलता। प्रकाश तो जलते दीपक से ही होता है।

युग-निर्माण परिवार में ऐसी जागृत आत्माओं की कमी नहीं-जिनके पास संचित सुसंस्कारिता की पूँजी प्रचुर परिणाम में विद्यमान है। भावना, निष्ठा और प्रतिभा की भी उनमें कमी नहीं। परिस्थितियाँ भी इतनी प्रतिकूल नहीं कि युग की पुकार पर कुछ अनुदान प्रस्तुत कर सकना उनके लिए सम्भव ही न हो। कठिनाई एक ही है- ‘कार्यण्य दोषापहत स्वभाव........’ का बोझ इतना लदा दीखता है जिसे उतारना बन नहीं पड़ रहा है। यह कठिनाई अवास्तविक है। लगभग वैसी ही अवास्तविक जैसी कि छोटे मुँह के घड़े में से चने निकालते समय बंदर मुट्ठी बाँध लेता है और अनुभव करता है उसे घड़े से बाँध लिया। मनः स्थिति बदले तो परिस्थितियाँ हजार मार्गों से अनुकूल बनने का उपाय खोज निकालती हैं। खोजने वाले ईश्वर को खोज लेते हैं फिर युग पुकार के अनुरूप कुछ कर सकने के लिए कोई रास्ता न मिले यह कैसे हो सकता है?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1978 पृष्ठ 61

👉 Thirst for What?

Instead of giving content, the worldly desires – even if fulfilled, always lead to newer ones with greater thirst. It is said that a human life is just a sojourn in the endless journey of the individual self in its quest for completeness. However, if a human being gets rid of all cravings then he can attain absolute evolution in this life itself. Trisna (thirst for fulfillment of desires, ambitions) is the root cause of all thralldoms, which entraps the individual self in the cycle of life and death. How a person enslaved by cravings would ever be liberated? Salvation means freedom from all worldly desires and expectations. Those having quest for realization of absolute knowledge, truth should best begin with a vigilant watch on their own aspirations and control them prudently.

It is said that inner content is the biggest fulfillment. No amount of wealth could match it. One may be free and independent in worldly terms, but in reality, he, like most of us is the slave of his mind. The one whose mind is captured by trisna cannot be free for any moment. Even the most affluent man of the world is like a beggar because of his trisna: because he would always expect something from the world in terms of greater success, wealthier resources and what not. So if you want to rise and make proper use of your life, you will have to restrain your desires, selfish ambitions. Don’t escape from your duties, you must be constructive and must transact your duties sincerely; only you leave out the expectations or attachments with the results. Every action has a corresponding reaction here. The Law of appropriate consequences of your karma is absolute.

So don’t be desperate for any result, don’t think that the world or the circumstance would conform to your expectations. Renounce your trisna and be a free being…

📖 Akhand Jyoti, Mar. 1942

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 23 April 2020

किसी व्यक्ति के कहने से अथवा किसी आपत्ति के आने से अपने आत्म-विश्वास को डगमगाने मत दो। कदाचित् आप अपनी संपत्ति, स्वास्थ्य, यश और  सम्मान खो बैठो, पर जब तक आप अपने ऊपर श्रद्धा कायम रखोगे, तब तक आपके लिए आशा है। यदि आत्म-श्रद्धा को कायम रखोगे और आगे बढ़ते रहोगे तो जल्दी या देर में संसार आपको रास्ता देगा ही।

समाज में हो रही बुराइयों को रोकने के लिए ईश्वर ने सामूहिक जिम्मेदारी हर व्यक्ति को सौंपी है। उनका कर्त्तव्य है कि अनीति जहाँ कहीं भी हो रही है, उसे रोकें, घटाने का प्रयत्न करें, विरोध करें, असहयोग बरतें। जो भी तरीका अनुकूल जँचे उसे अपनायें, पर कम से कम उस बुराई में अपना सहयोग प्रत्यक्ष और परोक्ष किसी भी रूप से न हो।

मेरे कारण दूसरों का भला हुआ-यह सोचना मूर्खता है। हमारे बिना संसार का कोई काम अटका न रहेगा। हमारे पैदा होने से पहले संसार का सब काम ठीक-ठीक चल रहा था और हमारे बाद भी वैसा ही चलता रहेगा। परमात्मा उतना गरीब नहीं है कि हमारी मदद के बिना सृष्टि का काम न चला सके।

आध्यात्म्कि जीवन अपनाने का अर्थ है-असत् से सत् की ओर जाना। प्रेम और न्याय का आदर करना। निकृष्ट जीवन से उत्कृष्ट जीवन की ओर बढ़ना। इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन अपनाये बिना मनुष्य वास्तविक सुख-शान्ति नहीं पा सकता।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 
Shantikunjvideo:- https://goo.gl/GafJp5
Rishi Chintan:- https://bit.ly/2KISkiz

👉 Anubhav अनुभव

एक सुबह महर्षि रमण बोलने के लिए उठे। पर इसके पहले वे बोलते, आश्रम के वृक्ष पर बैठे विहंग गीत गाने लगे। उस शान्त सुहानी सुबह में फिर वे चुप ही रहे। सूर्य अपनी किरणों का जाल बुनता रहा और वे पक्षी गीत गाते रहे। महर्षि रमण चुप थे तो बाकी सब भी चुप बने रहे। उस मौन में, उस शून्य में वह गीत दिव्य हो गया। गीत पूरा हुआ तो शून्य और गहरा हो गया। महर्षि फिर उठ गए। उस दिन वे कुछ भी नहीं बोले। उस दिन यह मौन प्रवचन ही हुआ।
  
लेकिन इस मौन में उन्होंने जो कुछ कहा, वह किसी बड़े से बड़े शब्द समूह से बढ़कर था। इसने सभी के अन्तस् में गहरे अनुभव दिए। इस जगत् में और इस जीवन में जो भी है, सब दिव्य है। सबमें परमात्मा की छाप और छाया है। वही सब में प्रच्छन्न है, वही सब में प्रकट है। सब उसी का रूप है, सब ओर उसी की ध्वनि है। पर हम शान्त नहीं हैं, इसलिए उसे नहीं सुन पाते। और हमारी आँखें खुली नहीं हैं, इसलिए उसे निहार नहीं पाते।
  
हम सभी ओर से ओत-प्रोत हैं, इसलिए उसका अनुभव नहीं हो पाता। हम खाली हो सकें तो उसका अनुभव अभी और यहीं है। सत्य का अनुभव तो सर्वत्र है, पर अनुभव करने वाला स्व मूर्च्छा में है। पर हम स्व की बेहोशी नहीं तोड़ते, बस सत्य की खोज करते रहते हैं। आँख खोलने की कोशिश नहीं करते, बस प्रकाश की खोज अनवरत करते हैं। कोशिश करनी होगी, इस भूल को छोड़ने की। प्रयास करना होगा, अनुभव करने का।

चित्त-चिन्तन एवं चेतना गहरे मौन में डूबें तो अनुभव भी गहरे हो सकेंगे। देखने का अनुभव पाना है तो आँखें खुली रखनी होगी। अब गंगाजल की मछली, गंगा की खोज में परेशान हो, तो उससे क्या कहा जाएगा? अरे उससे यही कहना होगा कि खोज छोड़ो और देखो तुम गंगा के जल में ही हो। तुम्हें गंगाजी की खोज नहीं करनी, बस उसे पीना है और पवित्रता व शान्ति के अनुभव में डूबना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१९

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

👉 Vardaan वरदान

एक बार पाँच असमर्थ और अपंग लोग इकट्ठे हुए और कहने लगे, यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो बहुत बड़ा परमार्थ करते। अन्धे ने कहा— यदि मेरी आँखें होतीं तो जहाँ कहीं अनुपयुक्त देखता वहीं उसे सुधारने में लग जाता। लंगड़े ने कहा— पैर होते तो दौड़-दौड़ कर भलाई के काम करता। निर्बल ने कहा— बल होता तो अत्याचारियों को मजा चखा देता। निर्धन ने कहा— धनी होता तो दीन दुखियों के लिए सब कुछ लुटा देता। मूर्ख ने कहा— विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता।

वरुण देव उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सचाई को परखने के लिए उनने आशीर्वाद दिया और इन पाँचों को उनकी इच्छित स्थिति मिल गई। अन्धे ने आँखें, लंगड़े ने पैर, निर्बल ने बल, निर्धन ने धन और मूर्ख ने विद्या पाई और वे फूले न समाये। परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदल गये। अन्धा सुन्दर वस्तुएँ देखने में लगा रहता और अपनी इतने दिन की अतृप्ति बुझाता। लंगड़ा सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। धनी ठाठ-बाठ जमा करने में लगा। बलवान ने दूसरों को आतंकित करना शुरू कर दिया। विद्वान ने अपनी चतुरता के बल पर जमाने को उल्लू बना दिया। बहुत दिन बाद वरुण देव उधर से लौटे और उन असमर्थों की प्रतिज्ञा निभी या नहीं, यह देखने के लिए रुक गये। पता लगाया तो वे पाँचों अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए थे।

वरुण देव बहुत खिन्न हुए और अपने दिये हुए वरदान वापिस ले लिए। वे फिर जैसे के तैसे हो गये। अन्धे की आँखों का प्रकाश चला गया। लँगड़े के पैर जकड़ गये। धनी निर्धन हो गया। बलवान को निर्बलता ने जा घेरा। अब उन्हें अपनी पुरानी प्रतिज्ञायें याद आईं और पछताने लगे कि पाये हुए सुअवसर को उन्होंने इस प्रकार प्रमाद में क्यों खो दिया। समय निकल चुका था, अब पछताने से बनता भी क्या था?

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1964

👉 Yugduto Ki Bhumika Nibhayen युगदूतों की भूमिका निभायें

जागृत परिजनों को उच्च स्वर से समय ने पुकारा है। अरुणोदय ने जागृति का सन्देश भेजा है। ऊषा की अग्रिम किरणें करवटें बदलते रहने से विरत होकर अँगड़ाई लेने और उठ खड़े होने की चुनौती प्रस्तुत कर रही है। इस पुण्य बेला में असामान्यों को सामान्यों की तरह समय नहीं गुजारना चाहिए। महानता सम्पन्न आत्माओं को तुच्छताग्रस्त प्राणियों जैसी गतिविधि नहीं अपनाये रहनी चाहिए।

नवयुग की चेतना घर−घर पहुँचाने और जन−जन को जागृति का सन्देश सुनाने का ठीक यही समय है। इन दिनों हमारा भूमिका युग दूतों जैसी होनी चाहिए। इन दिनों हमारे प्रयास संस्कृति का सेतु बाँधने वाले नल−नील जैसे होने चाहिए। खाई कूदने वाले अंगद की तरह−पर्वत उठाने वाले हनुमान की तरह−यदि पुरुषार्थ न जगे तो भी गिद्ध गिलहरी की तरह अपने तुच्छ को महान के सम्मुख समर्पित कर सकना तो सम्भव हो ही सकता है। गोवर्धन उठाते समय यदि हमारी लाठी भी सहयोग के लिए न उठी तो भी सृष्टा का प्रयोजन पूर्णता तक रुकेगा नहीं। पश्चात्ताप का घाटा हमें भी सहना पड़ेगा।

साहसिक शूरवीरों की तरह अब नवयुग के अवतरण में अपनी भागीरथी भूमिका आवश्यक हो गई हैं। इसके बिना तपती भूमि और जलती आत्माओं को तृप्ति देने वाली गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए सहमत न किया जा सकेगा।

विनाश की शक्तियाँ प्रबल होती हैं या सृजन अधिक शक्तिशाली होती हैं? यह प्रश्न वाणी से नहीं व्यवहार से- उत्तर से नहीं, उदाहरण से- अपना समाधान माँगता है। यह देवत्व की प्रतिष्ठा का सवाल है। हमें सृजन की समर्थता सिद्ध करनी होगी, ताकि संव्याप्त निराशा में आशा का आलेग उग सके। कोई आगे नहीं चलेगा तो पीछे वालों का साहस कैसे जगेगा? व्यवसायी की बुद्धि लेकर नहीं, शूरवीरों की साहसिकता को अपनाकर ही हमें वह करने का अवसर मिलेगा, जो अभीष्ट आवश्यक, उपयुक्त ही नहीं विशिष्ट आत्माओं के प्रस्तुत अवतरण का लक्ष्य भी हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1978 पृष्ठ 60

👉 The Significance of Satsang

Satsanga means being in the company of good people, inspiring discourses and discussions. You should always try to be in the company of such people who protect you from evils and wrongs; who can induce hope even in the moments of despair and offer you encouraging support in adverse circumstances. It is easy to get the sycophants or selfish friends around, who would just be ‘friends’ when they need something from you: they need not be your well wishers, and might even pull you in the rut of addictions, ego and avarice; they won’t hesitate in stepping you on your back if it suits their vested interests. You may find it difficult to find wise men who would be your guides; who would be your critiques on your face to correct your flaws and advice you righteously; who would warn you of the dangers or risks well n time. People often prefer the company of elite; we should know that the best company is that of the enlightened personalities, the elevated souls.

Having true friends, though few in numbers, is a sign of wisdom. Noble friendship is quite significant in the ascent of life in many respects. It is foolish to make enemies, but worse is to leave the friendship of good people. Pure intellect and faith in sincere efforts with assiduity are the two key elements essential for transmutation of personality. Adoption of virtues transforms the bad, debased ones into great personalities; on the contrary, vices could decline and debouch the great ones into mean, inferior, scornful levels. So your friends should be those who inspire the virtues and uproot the vices. You may also begin on your own by cultivating food qualities, like constructive use of time, alertness, sincerity and perseverance… Small steps in the prudent direction lead to brighter
goals.

📖 Akhand Jyoti, Apr. 1942

👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 22 April 2020

सकाम उपासना से लाभ नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। जब सभी को मजदूरी मिलती है, तो भगवान् किसी भजन करने वाले की मजदूरी क्यों न देंगे?  जितना हमारा भजन होगा, जिस श्रेणी की हमारी श्रद्धा होगी एवं जैसा भाव होगा, उसके अनुरूप हिसाब चुकाने में भगवान् के यहाँ अन्याय नहीं होता, पर यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि व्यापार बुद्धि से किया हुआ भजन अपने अनुपात से ही लाभ उत्पन्न कर सकता है।

गिरे हुओं को उठाना, पिछड़े हुओं को आगे बढ़ाना, भूले को राह बताना और जो अशान्त हो रहा है उसे शान्तिदायक स्थान पर पहुँचा देना, यह वस्तुतः ईश्वर की सेवा ही है। जब हम दुःख और दरिद्र को देखकर व्यथित होते हें और मलीनता को स्वच्छता में बदलने के लिए बढ़ते हैं तो समझना चाहिए यह कृत्य ईश्वर के लिए-उसकी प्रसन्नता के लिए ही किये जा रहे हैं।

काम को कल के लिए टालते रहना और आज का दिन आलस्य में बिताना एक बहुत बड़ी भूल है। कई बार तो वह कल कभी आता ही नहीं। रोज कल करने की आदत पड़ जाती है और कितने ही ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य उपेक्षा के गर्त में पड़े रह जाते हैं, जो यदि नियत समय पर आलस्य छोड़कर कर लिये जाते तो पूरे ही हो गये होते।

जो उन्नति की ओर बढ़ने का प्रयत्न नहीं करेगा, वह पतन की ओर फिसलेगा। यह स्वाभाविक क्रम है। इस संसार में मनुष्य जीवन की दो ही गतियाँ हैं-उत्थान अथवा पतन।  तीसरी कोई भी माध्यमिक गति नहीं है। मनुष्य उन्नति की ओर न बढ़ेगा तो समय उसे पतन के गर्त में गिरा देगा।

हम अपने आपको प्यार करें, ताकि ईश्वर से प्यार कर सकने योग्य बन सकें। हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करें, ताकि ईश्वर के निकट बैठ सकने की पात्रता प्राप्त कर सकें। जिसने अपने अंतःकरण को प्यार से ओतप्रोत कर लिया, जिसके चिंतन और कर्तृत्व में प्यार बिखरा पड़ता है, ईश्वर का प्यार उसी को मिलेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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