मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

👉 Jeevan Yatra जीवन यात्रा बने एक पर्वोत्सव

मनुष्य के हृदय भण्डार का द्वार खोलने वाली, निम्नता से उच्चता की ओर ले जाने वाली यदि कोई वस्तु है, तो प्रसन्नता ही है। यही वह साँचा है, जिसमें ढ़लकर मनुष्य अपने जीवन का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है। जीवन-यापन के लिए जहाँ उसे धन, वस्त्र, भोजन एवं जल की आवश्यकता पड़ती है, वहाँ उसे हलका-फुलका एवं प्रगतिशील बनाने के लिए प्रसन्नता भी आवश्यक है। प्रसन्नता मरते हुए मनुष्य में प्राण फूँकने के समान है। प्रसन्न और संतुष्ट रहने वाले व्यक्तियों का ही जीवन ज्योतिपुंज बनकर दूसरों का मार्गदर्शन करने में सक्षम होता है।
  
प्रसिद्ध दार्शनिक इमर्सन ने कहा है- वस्तुतः हास्य एक चतुर किसान है, जो मानव जीवन-पथ के काँटों, झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ कर अलग करता है और  सद्गुणों के सुरभित वृक्ष लगा देता है, जिसमें हमारी जीवन यात्रा एक पर्वोत्सव बन जाती है।
  
जीवन यात्रा के समय में मनुष्य को अनेक कठिनाइयों एवं समस्याओं का सामना करना पड़ता है, किन्तु हँसी का अमृत पान कर मनुष्य जीवन संग्राम में हँसते-हँसते विजय प्राप्त कर सकता है। इतिहास के पृष्ठों पर निगाह डालें, तो पता चलेगा कि महान व्यक्तियों के संघर्षपूर्ण जीवन की सफलता का रहस्य प्रसन्नता रूपी रसायन का अनवरत सेवन करते रहना ही है।
  
हँसना जीवन का सौरभ है। जो व्यक्ति आनन्द के खदान को जान लेता है, उसे श्रेष्ठ वातावरण की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। वर्तमान समय में जो परिस्थिति उसके सम्मुख होती है, उसी में वह सुख अनुभव कर लेता है। संतुलित मनुष्य यह नहीं सोचता कि जब वह धनी होगा, तभी उसे सुख मिल सकता है। धन मनुष्य को कभी सुखी बनाए नहीं रख सकता। प्रसन्नता तो मनुष्य के अन्तस् का स्रोत  है, उसके फूटते ही व्यक्ति को सब जगह तथा हर परिस्थिति में खुशी ही खुशी परिलक्षित होती है। स्वर्ग की चाह है, तो आनन्द के जल से आत्मा को स्नान कराना पड़ेगा। स्वर्ग कहीं और नहीं है, वह मनुष्य के अन्दर ही छुपा हुआ है। अन्दर के आनन्द से ही मनुष्य अनंत आनन्द की प्राप्ति कर सकता है।
  
एक विचारक का कथन है कि अगर तुम हँसोगे तो सारी दुनिया तुम्हारे साथ हँसेगी और अगर तुम रोओगे तो कोई तुम्हारा साथ न देगा।
  
प्रसन्न व्यक्ति को देखकर दूसरे व्यक्ति स्वयं ही खुश होने लगते हैं। प्रसन्न चित्त व्यक्ति के पास बैठकर दुःखी व्यक्ति भी थोड़ी देर के लिए प्रसन्नता के प्रवाह में अपने दुःख को भूल जाता है। जो व्यक्ति हर समय मुँह फुलाए रहता है, वह जीवन के प्राण उसके संजीवनी तत्त्व को नष्ट कर देता है। ऐसे व्यक्तियों के पास उठना-बैठना कोई पसंद नहीं करता। खिन्नता नरक की भयानक ज्वाला की भाँति मनुष्य को दीन, हीन, दुःखी एवं दरिद्र बना देती है।
  
अप्रसन्न प्रकृति का व्यक्ति दूसरों को भी हँसता नहीं देख सकता। दूसरे हँसते हैं, तो ऐसा लगता है कि ये सभी लोग हमारा मजाक बना रहे हैं। ऐसे लोग, प्रसन्नता की जीवन में क्या उपयोगिता है, इस तथ्य को भली-भाँति समझ नहीं पाते।  उनका स्वभाव बन जाता है, दूसरों को देखकर हँसना, दूसरों का मजाक बनाना, दूसरों के नुकसान पर हँसना। समय, परिस्थिति एवं वातावरण का ध्यान किये बिना असभ्य ढंग से हँसने का हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह हास्य, जीवन-विकास में सहायक नहीं होता, उलटे मनुष्य के अन्दर आसुरी प्रवृत्तियों को जन्म देता है और जीवन को दुरूह बना देता है। हमें ऐसी हँसी को अपने अंदर स्थान देना चाहिए, जो मनहूसों को भी हँसा दे, दुःखी को खुश कर दे।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

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