गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

👉 Anubhav अनुभव

एक सुबह महर्षि रमण बोलने के लिए उठे। पर इसके पहले वे बोलते, आश्रम के वृक्ष पर बैठे विहंग गीत गाने लगे। उस शान्त सुहानी सुबह में फिर वे चुप ही रहे। सूर्य अपनी किरणों का जाल बुनता रहा और वे पक्षी गीत गाते रहे। महर्षि रमण चुप थे तो बाकी सब भी चुप बने रहे। उस मौन में, उस शून्य में वह गीत दिव्य हो गया। गीत पूरा हुआ तो शून्य और गहरा हो गया। महर्षि फिर उठ गए। उस दिन वे कुछ भी नहीं बोले। उस दिन यह मौन प्रवचन ही हुआ।
  
लेकिन इस मौन में उन्होंने जो कुछ कहा, वह किसी बड़े से बड़े शब्द समूह से बढ़कर था। इसने सभी के अन्तस् में गहरे अनुभव दिए। इस जगत् में और इस जीवन में जो भी है, सब दिव्य है। सबमें परमात्मा की छाप और छाया है। वही सब में प्रच्छन्न है, वही सब में प्रकट है। सब उसी का रूप है, सब ओर उसी की ध्वनि है। पर हम शान्त नहीं हैं, इसलिए उसे नहीं सुन पाते। और हमारी आँखें खुली नहीं हैं, इसलिए उसे निहार नहीं पाते।
  
हम सभी ओर से ओत-प्रोत हैं, इसलिए उसका अनुभव नहीं हो पाता। हम खाली हो सकें तो उसका अनुभव अभी और यहीं है। सत्य का अनुभव तो सर्वत्र है, पर अनुभव करने वाला स्व मूर्च्छा में है। पर हम स्व की बेहोशी नहीं तोड़ते, बस सत्य की खोज करते रहते हैं। आँख खोलने की कोशिश नहीं करते, बस प्रकाश की खोज अनवरत करते हैं। कोशिश करनी होगी, इस भूल को छोड़ने की। प्रयास करना होगा, अनुभव करने का।

चित्त-चिन्तन एवं चेतना गहरे मौन में डूबें तो अनुभव भी गहरे हो सकेंगे। देखने का अनुभव पाना है तो आँखें खुली रखनी होगी। अब गंगाजल की मछली, गंगा की खोज में परेशान हो, तो उससे क्या कहा जाएगा? अरे उससे यही कहना होगा कि खोज छोड़ो और देखो तुम गंगा के जल में ही हो। तुम्हें गंगाजी की खोज नहीं करनी, बस उसे पीना है और पवित्रता व शान्ति के अनुभव में डूबना है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१९

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