गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

👉 Ab Sirf Karne Ka Samay अब सिर्फ करने का समय

युग सृजन के पुण्य प्रयोजन की योजना बनाते रहने का समय बीत गया, अब तो करना ही करना शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में बहुत समय व्यतीत नहीं किया जाना चाहिए।

लक्ष्य विशाल और विस्तृत है। जन-मानस के परिष्कार के लिए प्रज्वलित ज्ञान-यज्ञ के, विचार क्रान्ति के, लाल मशाल के टिमटिमाते रहने से काम नहीं चलेगा। उसके प्रकाश को प्रखर बनाने के लिए जिस तेल की आवश्यकता है वह जागृत आत्माओं के भाव भरे त्याग बलिदान से ही निचोड़ा जा सकेगा। मनुष्य में देवत्व का उदय, संसार के समस्त उत्पादनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण उपार्जन है। इस कृषि कर्म में हमें शीत, वर्षा की परवा न करते हुए निष्ठावान कृषक की तरह लगना चाहिए। धरती पर स्वर्ग का अवतरण नया नन्दन वन खड़ा करने के समान है। निष्ठावान माली की तरह हमारी कुशलता ऐसी होनी चाहिए जिससे सृष्टा के इस मुरझाये विश्व उद्यान में बसन्ती बहार ला सकने का श्रेय मिल सके। ऐसी सफलता लाने में खाद, पानी जुटाने से ही काम नहीं चलता उसमें माली को अपनी प्रतिभा भी गलानी, खपानी पड़ती है। भूमि और पौधों के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने वाले किसान और माली की तरह ही हमें देवत्व के उद्भव और स्वर्ग के अवतरण में जागृत आत्माओं को अपनी श्रद्धा और क्षमता का समर्पण प्रस्तुत करना होगा।

राज क्रान्ति का काम साहस और शस्त्र बल से चल जाता है। आर्थिक क्रान्ति साधन और सूझ-बूझ के सहारे हो सकते हैं। यह भौतिक परिवर्तन है जिनके लिए भौतिक साधनों से काम चल जाता है। हमें बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी का उद्गम खोजना और संगम बनाना है। इसके लिए चरित्र, श्रद्धा और प्रतिभा के धनी दधीचि के वंशजों को ही आगे आना और मोर्चा सम्भालना है। भवन, पुल, कारखाने आदि को वस्तु शिल्पी अपनी शिक्षा के सहारे बनाने में सहज ही सफल होते रहते हैं। हमें नये व्यक्ति, नये समाज और नये युग का सृजन करना है। जागृत आत्माओं का भाव भरा अनुदान ही यह प्रयोजन पूरा कर सकता है। इसकी याचना करने किसके पास जाया जाय? जिनके पास भावना है ही नहीं, जो कृपणता के दलदल में एड़ी से चोटी तक फंसे पड़े हैं उन दयनीय लोगों से क्या याचना की जाय? कर्ण जैसे उदार व्यक्ति ही मरणासन्न स्थिति में अपने दाँत उखाड़ कर देते रहे हैं, हरिश्चन्द्रों ने ही अपने स्त्री, बच्चे बेचे हैं। लोभग्रसितों को तो कामनाओं की पूर्ति कराने से ही फुरसत नहीं, देने का प्रसंग आने पर तो उनका कलेजा ही बैठने लगेगा।

व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए न तो साधनों की आवश्यकता है और न परिस्थिति के अनुकूल होने की। उसके लिए ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए जिनकी नसों में भाव भरा ऋषि रक्त प्रवाहित होता हो। चतुरता की दृष्टि से कौआ सबसे सयाना माना जाता है। शृंगाल की धूर्तता प्रख्यात है। मुर्दे खोद खाने में बिज्जू की कुशलता देखते ही बनती है। खजाने की रखवाली करने वाला सर्प लक्षाधीश होता है। भावनात्मक सृजन में तो दूसरी ही धातु से ढले औजारों की आवश्यकता है। आदर्शों के प्रति अटूट आस्था की भट्टी में ही ऐसी अष्टधातु तैयार होती है। आवश्यकता ऐसे ही व्यक्तित्वों की पड़ रही है जो अष्ट धातु के ढले हैं। लोक सेवा का क्षेत्र बड़ा है उसके कोंतरों में ऐसे कितने ही छद्म वेषधारी वंचक लूट-खसोट की घात लगाये बैठे रहते हैं, पर उनसे कुछ काम तो नहीं चलता। प्रकाश तो जलते दीपक से ही होता है।

युग-निर्माण परिवार में ऐसी जागृत आत्माओं की कमी नहीं-जिनके पास संचित सुसंस्कारिता की पूँजी प्रचुर परिणाम में विद्यमान है। भावना, निष्ठा और प्रतिभा की भी उनमें कमी नहीं। परिस्थितियाँ भी इतनी प्रतिकूल नहीं कि युग की पुकार पर कुछ अनुदान प्रस्तुत कर सकना उनके लिए सम्भव ही न हो। कठिनाई एक ही है- ‘कार्यण्य दोषापहत स्वभाव........’ का बोझ इतना लदा दीखता है जिसे उतारना बन नहीं पड़ रहा है। यह कठिनाई अवास्तविक है। लगभग वैसी ही अवास्तविक जैसी कि छोटे मुँह के घड़े में से चने निकालते समय बंदर मुट्ठी बाँध लेता है और अनुभव करता है उसे घड़े से बाँध लिया। मनः स्थिति बदले तो परिस्थितियाँ हजार मार्गों से अनुकूल बनने का उपाय खोज निकालती हैं। खोजने वाले ईश्वर को खोज लेते हैं फिर युग पुकार के अनुरूप कुछ कर सकने के लिए कोई रास्ता न मिले यह कैसे हो सकता है?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- मार्च 1978 पृष्ठ 61

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