मंगलवार, 21 जुलाई 2020

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (अन्तिम भाग)

महामानवों के पास भौतिक सम्पदायें भले ही न रही हो पर उनकी चरित्र निष्ठा, आदर्शवादिता और उदारता की पूँजी इतनी प्रचुर मात्रा में उन्हें विभूतिवान बनाये रही है और वह वैभव इतना बढ़ा रहा है, जिसके ऊपर धन कुबेरों की सम्पन्नता को न्यौछावर किया जा सके। ऋषियों के चरणों में राजमुकुट रखे देखकर यह समझा जा सकता है कि सन्मार्गगामी सर्वथा निर्धन नहीं होते, उनके पास अपने ढंग की ऐसी सम्पदा होती है जिसे पाकर मानव जीवन को सब प्रकार सार्थक एवं धन्य हुआ माना जा सके।
  
भौतिक विज्ञानियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है कि शारीरिक स्वास्थ्य का आधार मात्र पौष्टिक आहार एवं व्यायाम नहीं है वरन् मनःक्षेत्र की समस्वरता पर आरोग्य एवं दीर्घ जीवन की नींव रखी हुई है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय रोगों के विशेषज्ञ यह कहते हैं कि अधिक मानसिक श्रम करने आदि के कारण वे रोग उत्पन्न नहीं होते वरन् छल, प्रपंच, क्रूर दुराचरण जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ ही मनःसंस्थान में अन्तर्द्वन्द्व मचाती हैं और उन्हीं के फलस्वरूप अनिद्रा एवं सनक से लेकर उन्माद जैसे रोग अपने विभिन्न आकार- प्रकार में उठ खड़े होते है। कोई समय था जब वात, पित्त, कफ़, आहार- विहार, कृमि कीटाणु, छूत संक्रमण, ऋतु प्रभाव, गृहदशा, भाग्य प्रारब्ध आदि को विभिन्न रोगों का कारण माना जाता था। वे बातें पुरानी हो गई। मनःशास्त्र के विज्ञानी अब उस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अनैतिक, असामाजिक और अवांछनीय चिन्तन से, इस प्रकार की घुटन से भरा आन्तरिक विग्रह उत्पन्न होता है जो ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से अपने विद्रोह की कोशिकाओं तक पहुँच कर उन्हें रुग्ण कर देता है। इस मानसिक विद्रोह को शान्त करने के लिए अपनी रीति- नीति को सन्मार्गगामी बना लेना ही रोग निवृत्ति का एक मात्र उपाय है। इस आधार पर मनोविज्ञानवेत्ता रोगियों से उनकी भूलें कबूल कराते हैं पश्चाताप और परिवर्तन के संकल्प कराते हैं तदनुसार रोग निवृत्ति का लाभ भी मिलता है।
  
भारतीय धर्म शास्त्र आधि और व्याधि का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध मानता रहा है। आधि अर्थात् मनःक्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ जिस व्यक्ति में भरी होंगी वह शरीर और मस्तिष्क के रोगों से ग्रसित होता चला जायेगा और वे रोग मात्र औषधि चिकित्सा से कदापि अच्छे न हो सकेंगे। कष्टसाध्य रोगों की एक श्रेणी कर्मजन्य भी होती है। उन्हें अन्तःक्षेत्र में जमी हुई दुर्भावनाओं की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। इन्हें पश्चाताप और प्रायश्चित द्वारा उखाड़ने का विधान है। असाध्य महारोगों के लिए यह प्रायश्चित्त चिकित्सा प्राचीन अध्यात्म विज्ञान और भौतिक मनोविज्ञान के आधार पर समान रूप से उपयुक्त मानी गई है। मन की निर्मलता से बढ़कर शारीरिक रोगों की निवृत्ति का और कोई कारगर उपाय नहीं है।
  
निश्चित रूप से मनुष्य एक स्वसंचालित यन्त्र है जो कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए परिणाम भोगने की शृंखला में मजबूती के साथ जकड़ा हुआ है। यदि हम सद्भावनाओं का, सत्प्रवृत्तियों का चिन्तन और कर्तृत्व अपनायें तो सहज ही सुख- शान्ति की परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके प्रतिकूल चलना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह है। सुख और दुःख ईश्वर प्रदत्त दण्ड पुरस्कार नहीं वरन् अपने ही सत्कर्म- दुष्कर्म के प्रतिफल हैं।

.....समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शनिवार, 18 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (अंतिम भाग)

मन की सफाई जितनी आवश्यक है, अक्सर उस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। बहिरंग उपचार को ही प्रमुख मानने वाले तथा फिर उपासक, साधक अपना ध्यान शरीर शोधन तक ही नियोजित रखते हैं। जबकि उनका मन तरह-तरह भ्रम-जंजालों में तर्क-वितर्कों में भ्रमण करता रहता है। लिप्सा, वासना से मुक्ति पाना ही वास्तविक मोक्ष है। अपने मन की शुद्धि की जा सके एवं कामनाओं को भावनाओं में परिणित किया जा सके तो साधना की दिशा में कदम बढ़ा सकना संभव है। जीवन के साधना के विभिन्न उपचार जिनमें परोपकार व लोकमंगल की अनेकानेक गतिविधियाँ आती हंै—इस दिशा में सहायक होते हैं। मनोयोग से किसी काम को करना जीवन साधना का ही अंग है। ‘वर्क इज वरशिप’ इसी को कहते हैं। सबसे पहले जीवन को सुव्यवथित एवं सुनियोजित बना लें, फिर साधना क्षेत्र में प्रवेश करें। पारिवारिकता का विस्तार, अपने दायरे का फैलाव, अनुदारता का उदारता में परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य की संपन्नता का परिचायक है। पर यह सबके लिए इतना आसान नहीं है।
   
इस प्रकार के कदम उठा सकना केवल उसी के लिये सम्भव है, जो त्याग-तप की दृष्टि से आवश्यक साहस कर सके। लोगों की निन्दा-स्तुति, प्रसन्नता-अप्रसन्नता का विचार किये बिना विवेक, बुद्धि के निर्णय को शिरोधार्य कर सके। यदि वस्तुतः जीवन के सदुपयोग जैसी कुछ वस्तु पानी हो तो हमें साहस करने का अभ्यास प्रशस्त करते हुए दुस्साहसी सिद्ध होने की सीमा तक आगे बढ़ चलना होगा। मनस्वी और तेजस्वी होने का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
  
इन्द्रिय निग्रह में, तितिक्षाओं के अभ्यास में, साधनाओं से इसी दुस्साहस की साधना की जाती है। अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य व्रत, उपवास, सर्दी-गर्मी सहना, पैदल यात्रा, दान, पुण्य, मौन आदि क्रियाकलाप इसीलिए हैं कि शरीर यात्रा के प्रचलित ढर्रे को तोड़कर आन्तरिक इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए शरीर तथा मन को विवश किया जाए। मनोबल बढ़ाने के लिए ही तपश्चर्यायें विनिर्मित की गई हैं। मनोबल और साहस एक ही गुण के दो नाम हैं। मन को वश में करना एकाग्रता के अर्थ में नहीं माना जाना चाहिए। एकाग्रता बहुत छोटी चीज है। मन को वश में करने का अर्थ है—आकांक्षाओं को भौतिक प्रवृत्तियों से मोड़कर आत्मिक उद्देश्योंं में नियोजित करना। इसी प्रकार आत्मबल संपन्न होने का अर्थ है—आदर्शवाद के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर सकने का शौर्य।  हमें मनस्वी और आत्मबल संपन्न होना चाहिये। आदर्शवाद के लिए तप और त्याग कर सकने का साहस अपने भीतर अधिकाधिक मात्रा में जुटाना चाहिए। तभी हमारा कारण शरीर परिपुष्ट होगा और उससे देवत्व के जागरण की सम्भावना बढ़ेगी। कहना न होगा इस लक्ष्य की आपूर्ति की साधना मानसिक परिशोधन के साथ आरंभ करनी है। मलीनताओं के आवरण से ढके मन के परिष्कार के लिए तप और तितिक्षा का मार्ग अपनाना पड़ता है। पवित्र मन को देवता मानकर अभ्यर्थना की गयी है। कुसंस्कारी मन को पतन-पराभव का कारण माना गया है। मनुष्य की प्रगति अथवा अवगति में मन की ही प्रमुख भूमिका होती है। गीताकार इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहता है—
  
अर्थात् मन मनुष्य के बन्धन अथवा मोक्ष का साधन है। यह बन्धन और मुक्ति और कुछ नहीं मानसिक व्यापार की प्रतिक्रियाएँ मात्र हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे अनेकानेक विकारों से ग्रस्त मन ही बन्धन है। जब वह निर्विकार, निस्पृह और आसक्ति के बन्धनों से रहित होता है तो मुक्ति का साधन बन जाता है। अपने जीवन काल में ही मानसिक स्थिति के अनुरूप बन्धन-मुक्ति का अनुभव किया जा सकता है और आन्तरिक विकारों के बन्धनों से निकलने तथा मुक्ति के दिव्य आनन्द का रसास्वादन करने के लिए मानसिक परिशोधन का आध्यात्मिक पुरूषार्थ करने का साहस जुटाना चाहिए।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Immeasurable Power of Truth

You should speak truth, think truthfully and make your character, your actions, your behavior shine with the glow of truth. This will endow you with immense power, which will be stronger than any other force or power of the world. Confucius used to say that ‘truth contains the force of thousand elephants’.

Indeed the force of truth is immeasurable. It can’t be compared with any other force of the world. The wisest, strongest, truly dignified, is the one, who is honest to the soul, whose conduct is pure as per the guidance of the inner self, who has discarded falsehood, show-off, artificialness in all respects. He won’t have any fear, any worries.

On the contrary, those who are dishonest, manipulative or cunning, they remain trapped in some hidden fear and suspicion all the time. Power of wealth, might, power of people’s support, power of intellect, many kinds of powers are there in the world, but none stands before the power of truth. A truthful person is so powerful that even the gods of heavens bow before him.

📖  Akhand Jyoti, Nov. 1945

👉 पहले भूमि तैयार करनी पड़ेगी

युग−निर्माण की दिशा में हमें पहला कार्य एक ही करना होगा कि जन−मानस में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के निर्माण की आवश्यकता अनुभव करावें। लोगों को यह बतावें कि इन विभूतियों के बिना मानव जीवन निरर्थक जैसा है, ऐसे अर्धमृत जीवन में साँसों की गिनती पूरी कर लेने में क्या सार है? यदि जीना है तो इंसान की तरह क्यों न जियें, यदि मनुष्य का सुरदुर्लभ शरीर पाया है तो इसे सार्थक क्यों न करें? बीमार शरीर, मलीन मन, पतित समाज में रहना नरक के समान दुखदायी ही रहता है। सो जब उसे बदल सकना संभव है तो उस संभावना को सार्थक क्यों न किया जाय? इस प्रकार के प्रश्न जब जन−मानस के अन्तःकरण में उठने लगेंगे तो वह कुछ सोचने और कुछ करने के लिए भी तत्पर होगा। ऐसा जन−जागरण ही हमारा आज का प्रधान कार्य होना चाहिए।

प्रचार में बड़ी शक्ति है। चाय वालों ने चाय की और बीड़ी वालों ने बीड़ी की गंदी आदतें अपने प्रचार के बल पर घर−घर पहुँचा दी। सिनेमा के गंदे गाने छोटी देहातों में बच्चों की जवानों पर चढ़ गये, यह प्रचार साधनों की ही महत्ता है। हम युग−निर्माण के उपयुक्त संयम की, उदारता की, विवेक की आवश्यकता की ओर जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करना चाहें तो प्रचार के बल पर ही हो सकता है। अखण्ड ज्योति परिवार का एक बड़ा विशाल और शक्तिशाली संगठन है। हम सब मिलकर आज युग−निर्माण के लिए उपयोगी एवं आवश्यक विचारों का प्रसार करें और कल उन आयोजनों, कार्यक्रमों, आन्दोलनों एवं अभियानों की व्यवस्था करें जो आज की अव्यवस्था को उखाड़ दें और उसके स्थान पर स्वर्गीय वातावरण को पृथ्वी पर अवतरित करने के उपकरण उपस्थित कर दें। हमें यही करना है—यही करेंगे भी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (भाग ३)

सुविधाजनक प्रगतिशील वातावरण में सुसंस्कारी परिवार में जन्म होना पूर्वकृत सत्कर्मों का फल कहा जा सकता है। दुर्भागी व्यक्ति कुसंस्कारी परिस्थितियों में जन्म लेकर असुविधाजनक अड़चन भरे वातावरण में रहते हैं और प्रगति पथ पर बढ़ने में भारी अड़चन अनुभव करते हैं। इस विभेद के पीछे पूर्व जन्मों में संग्रहीत शुभ- अशुभ कर्म के परिणाम झाँकते देख सकते हैं। यों इन अड़चन भरी परिस्थितियों में भी सत्कर्म करने की, आगे बढ़ने की स्वतन्त्रता अक्षुण्ण रहती है और कोई चाहे तो नियत अवरोधों को सहन करते हुए भी आगे बढ़ने, ऊँचे उठने में सफल हो सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जिनमें अन्धे, अपंग, मूक, बधिर जैसी विषमताओं से ग्रसित लोगों ने इतनी उन्नति कर ली जिसे देखकर सर्व सुविधा सम्पन्न व्यक्तियों को भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा।
  
यदि इस संसार में ऐसी व्यवस्था रही होती कि तत्काल कर्मफल मिला करता तो फिर मानवी विवेक एवं चेतना की दूरदर्शिता की विशेषता कुण्ठित अवरुद्ध हो जाती। यदि झूठ बोलते ही जीभ में छाले पड़ जायें, चोरी करते ही हाथ में दर्द उठ खड़ा हो, व्यभिचार करते ही बुखार आ जाय, छल करने वाले को लकवा मार जाय तो फिर किसी के लिए भी दुष्कर्म कर सकना सम्भव न होता। एक ही निर्जीव रास्ता चलने के लिए शेष रह जाता। ऐसी दशा में स्वतन्त्र चेतना का उपयोग करने की, भले और बुरे में से एक को चुनने की विचारशीलता नष्ट हो जाती और विवेचना, ऊहापोह का बुद्धि प्रयोग सम्भव न रहता। तब दूरदर्शिता और विवेकशीलता की क्या आवश्यकता रहती और इसके अभाव में मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रतिभा का कोई उपयोग ही न हो पाता। बुरे कार्य के दुष्परिणाम और भले कार्य के सत्परिणाम समझने के लिए अन्तःप्रेरणा, अध्यात्म तत्त्वदर्शन, धर्म विज्ञान, नीति सदाचरण, श्रेय साधना का जो उपयोगी एवं आकर्षक सतोगुणी धर्म कलेवर खड़ा किया गया है उसकी कुछ आवश्यकता ही न रहती। सब कुछ नीरस हो जाता यहाँ जो कौतुक कौतूहल दीख रहा है, बहुरंगी, कटु- मधुर अभिव्यंजनाएँ सामने आ रही है उनमें कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर न होता। इन परिस्थितियों में और कुछ लाभ भले ही होता, मनुष्य की वह चेतनात्मक प्रतिभा कुण्ठित ही रह जाती जिसके कारण प्रगति पथ पर इतना आगे तक चल सकना सम्भव हो सका है।
  
कर्म का फल शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से कुछ विलम्ब से भी मिल सकता है, पर आन्तरिक दृष्टि से तुरन्त तत्काल मिलता है। सद्भावनाएँ धारण करने वाला अन्तःकरण अपने आप में अत्यधिक प्रफुल्लित रहता है। सुगन्ध विक्रेता बिना प्रयास किए निरन्तर उस महक का लाभ उठाता रहता है जिसके लिए दूसरे लोग तरसते ललचाते रहते हैं। सत्कर्म का सबसे बहुमूल्य लाभ आत्म- संतोष है जिसे प्राप्त करने में तनिक भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। सन्मार्ग पर चलने वाले का अन्तरात्मा अपने आप को प्रोत्साहन भरा आशीर्वाद देता रहता है। इस आधार पर बढ़ता हुआ आत्मबल मनुष्य की वास्तविक शक्ति को इतना अधिक बढ़ा देता है जिसकी तुलना उपनिषद्कार की उक्ति के अनुसार हजार हाथियों के बल से भी नहीं की जा सकती।
 
सद्भाव सम्पन्न सन्मार्गगामी का कोई स्वार्थवश कितना ही विरोध क्यों न हो, पर भीतर ही भीतर उसके लिए गहन श्रद्धा धारण किये रहेगा। महात्मा गाँधी पर आक्रमण करने वाले गोड़से ने गोली दागने से पूर्व उनके चरण स्पर्श करके प्रणाम किया था। ईसा मसीह को क्रूस पर चढ़ाने वाले लोग आँसुओं की धार से अपनी श्रद्धाञ्जलि चढ़ा रहे थे। सुकरात को विष पिलाने वाले जल्लाद ने आत्म प्रताड़ना से अपना माथा पीट लिया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग ४)

हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य की आधारशिला मन की स्वच्छता है। जप, तप, भजन, ध्यान, व्रत, उपवास, तीर्थ, हवन, दान, पुण्य, कथा, कीर्तन सभी का महत्व है पर उनका पूरा लाभ उन्ही को मिलता है जिनने मन की स्वच्छता के लिए भी समुचित श्रम किया है। मन मलीन हो, दुष्टता एवं नीचता की दुष्प्रवृत्तियों से मन गन्दी कीचड़ की तरह सड़ रहा हो तो भजन-पूजन का भी कितना लाभ मिलने वाला है? अन्तरात्मा की निर्मलता अपने आप में  एक साधन है जिसमें किलोल करने के लिए भगवान स्वयं दौड़े आते हैं। थोड़ी साधना से भी आत्म-दर्शन का, मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धिदायिनी बन जाती हंै।
  
‘सुमनस्’  शब्द संस्कृत भाषा में बहुत ही प्रतिष्ठा का प्रतीक है। जिसका मन स्वच्छ होता है उसे ‘सुमनस्’ कहकर सम्मानित किया जाता है। ऋषि लोग प्रसन्न होकर किसी को ‘सौमनस्’ अर्थात् सुन्दर मन वाला होने का आशीर्वाद दिया करते थे। प्रस्तुत-इस निकम्में प्राणी मनुष्य में यदि कोई विशेषता हो सकती है तो वह उसकी मानसिक स्वच्छता ही है। जिसे यह सम्पदा प्राप्त हुई उसका जीवन सच्चे अर्थों में सफल हो गया। स्वच्छ मन वाले मानवों का देव समाज जहाँ बढ़ता है, वहीं स्वर्ग बन जाता है। स्थान चाहे पृथ्वी हो या कोई और लोक, वहीं रहेगा जहाँ ऊँचे मन वाले मनुष्य रहेंगे। किसी राष्ट्र की दौलत सोना, चाँदी नहीं वरन् वहाँ उच्च मन वाली जनता ही है। श्रेष्ठ मनुष्य का मूल्य सोने और चाँदी के पहाड़ से अधिक है। गाँधी और बुद्ध की कीमत रूपयों में नहीं आँकी जा सकती।
   
आम लोगों की मनोभूमि तथा परिस्थिति, कामना, वासना, लालसा, संकीर्णता और कायरता के ढर्रे में घूमती रहती है। इस चक्र में घूमता रहने वाला किसी तरह जिन्दगी के दिन ही पूरे कर सकता है। तीर्थयात्रा, व्रत, उद्यापन, कथा, कीर्तन,  प्रणाम, प्राणायाम जैसे माध्यम मन बहलाने के लिए ठीक हैं, पर उनसे किसी को आत्मा की प्राप्ति या ईश्वर दर्शन जैसे महान् लाभ पाने की आशा नहीं करनी चाहिए। उपासना से नहीं, साधना से कल्याण की प्राप्ति होती और जीवन साधना के लिए व्यक्तिगत जीवन में इतना आदर्शवाद तो प्रतिष्ठापित करना होता है जिसमें लोक-मंगल के लिए महत्वपूर्ण स्थान एवं अनुदान सम्भव हो सके।
   
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Chiseled Refinement of Life

It’s the law of Nature that stress and struggle of particles generate force and motion. Friction and violent movement though appear harsh, but are necessary for sharpened gaze. The yellow metal gets its golden bright glow only after being heated and hammered. An ordinary piece of stone or metal becomes magnificent sculptures or precious idols only after undergoing hard hitting and shrill cutting.

The same is true of human life. Glory of life sparkles only after passing through testing times, bearing the tough disciplines, pains and difficulties on the path of ideals. Those who can rise and march against obstructions and opposition alone can reach high goals. You can hardly find any great life or eminent success that was achieved by any one without unflinching efforts and examinations.

Devout endeavors of penance and adoption of ascetic disciplines for selfpurification and self-transformation are described as tapasya (tapa). Chiseled refinement of life is the essence of tapa. This awakens hidden powers and sublime potentials. Vedic history has witnessed how great tapaswis have been able to conquer heavens by the spiritual force of their tapasya. The best devotion of the life-God is tapa. It is the only means of glorious accomplishments.

Remember, only those gain importance and reverence in this world, who can smile in hardships and who can enjoy the pains of tapaspya for noble aims.

📖  Akhand Jyoti, Oct. 1945

👉 सद्विचारों की उपयोगिता और आवश्यकता

हमारा शरीर आहार के आधार पर बनता और बिगड़ता है। इसी प्रकार मन का बनाव और बिगाड़ विचारों पर निर्भर रहता है। सद्विचारों के संपर्क में आये बिना कोई व्यक्ति उसी प्रकार मानसिक स्वच्छता प्राप्त नहीं कर सकता जिस प्रकार आहार की सुव्यवस्था किये बिना शरीर को बलवान बना सकना संभव नहीं होता। मन तभी स्वच्छ रह सकता है जब उसे सद्विचारों का सान्निध्य मिले। मानसिक स्वच्छता के लिए स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता उसी प्रकार है जिस प्रकार बर्तन माँजने के लिए मिट्टी और पानी की उपयोगिता होती है। सद्विचारों का प्रसार जब कम हो जाता है और कुविचारों का विस्तार बढ़ जाता है तब स्वभावतः जन मानस में मलीनता छा जाती है और पाप तापों का, क्लेश कलह का रोग शोक का वातावरण पनपता दृष्टिगोचर होने लगता है। मनुष्य के भीतरी मन की बुराइयाँ उसके सामने विपत्ति बनकर आ खड़ी होती हैं।

कुएँ की प्रतिध्वनि की तरह हमें अपनी भावनाओं के अनुरूप ही दूसरों का प्रत्युत्तर मिलता है। जैसे हम स्वयं है वैसे ही दूसरे भी दीखते हैं। स्वभावतः वे वैसे नहीं तो कम से कम हमारे लिए तो वैसे बन ही जाते हैं, अपना क्रोधी स्वभाव हो और दूसरों से झगड़ते रहने की आदत पड़ जाय तो उसके फलस्वरूप दूसरे लोग जो भले ही स्वभावतः क्रोधी न हों हमारे आचरण से क्षुब्ध होकर कुछ देर के लिए तो क्रोधी बन ही जाते हैं। चोर, व्यभिचारी, बेईमान, असभ्य, अकर्मण्य मनुष्य के संपर्क में आने वाले व्यक्ति कुछ देर तक तो घृणा और क्षोभ प्रकट करेंगे ही। मन का मैला मनुष्य कुढ़न का अभिशाप भोगता है अपनी सारी श्रेष्ठताएँ खोकर निम्न स्तर का बन जाता है। मित्रों को शत्रु रूप में बदल लेता है। लोक−परलोक तो उसके बिगड़ते ही हैं। इतनी हानिकारक मन की मलीनता हमारे लिए सर्वथा त्याज्य है। वैयक्तिक और सामूहिक सारे संघर्ष इसी पर ठहरे हुए हैं। पापों की जड़ यही है। इसे काट दिया जाय तो वे कटीली झाड़ियाँ जो पग−पग पर दुख देती हैं नष्ट हो सकती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (भाग २)

घृणित कर्म करने वाले आप ही अपने को दण्ड देते हैं और सन्मार्ग पर चलने वाले अपनी गतिविधियों के कारण स्वयं ही पुरस्कृत होते हैं। शृंखला अपनी गति से चल रही है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कुमार्ग पर चलने वाले सुख शान्ति से रहे और सन्मार्ग अपनाने वालों को दुःख दारिद्र्य से ग्रसित होना पड़े। यदि ऐसा होता तो यहाँ उचित अनुचित के बीच कोई भेद ही न रह जाता और कोई कुकर्म से बचने एवं सत्कर्म अपनाने के लिए तैयार ही न होता। अधर्म का तात्कालिक आकर्षण यदि चिरस्थायी लाभ दे सका होता और उसके दुष्परिणामों की कोई आशंका न होती तो कदाचित् ही कोई उस कष्ट साध्य प्रतीत होने वाली प्रक्रिया को अपनाता।
  
ईश्वर ने मनुष्य को जितना स्वावलम्बी बनाया है उतना ही परावलम्बी भी। सर्वत्र स्वतन्त्र मनुष्य नहीं, ईश्वर ही है। ईश्वर इसलिए स्वतन्त्र है कि उसने नियम व्यवस्था बनाई है और उसने सर्वप्रथम अपने को बाँधा है। जहाँ विश्व का कण- कण किसी विधान से बँधा है उसी प्रकार ईश्वर भी मर्यादा पुरुषोत्तम है। मर्यादाएँ टूटने न पायें, उन्हें तोड़ने का कोई दुस्साहस न करे इसलिए उसने अपने को भी प्रतिबन्धित किया है। पात्रता की मर्यादा से अधिक अनुदान किसी को नहीं मिलते। कर्मफल की मर्यादा का उल्लंघन करके वह न तो किसी को क्षमा प्रदान करता है और न किसी को भक्त- अभक्त होने के नाम पर राग, द्वेष की नीति अपनाता है। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा उसके लिए प्रधान है। बिजली मनुष्य की बहुत सेवा सहायता करती है, पर करती तभी तक है जब तक उसे विधि पूर्वक प्रयुक्त किया जाता है। अविधिपूर्वक व्यवहार करने पर यज्ञाग्नि भी होता को जला सकती है। प्रचुर खर्च करके बिजली के यन्त्रों को सुसज्जा एवं मनोयोग पूर्वक लगाने वाले भी यदि प्रयोगों में प्रमाद बरतें तो वह प्रतिष्ठापित विद्युत यन्त्र प्रयोक्ता के प्राण लिये बिना न छोड़ेंगे। ईश्वर को कर्मफल शृंखला में अग्नि या विद्युत के समतुल्य माना जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
  
कर्मफल तत्काल मिले ऐसी विधि व्यवस्था इस संसार में नहीं है। क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच कुछ समय का अन्तराल रहता है। बीज बोते ही फल- फूलों से लदा वृक्ष सामने प्रस्तुत नहीं होता। गर्भाधान के अगले क्षण ही प्रसव नहीं होता और प्रसव के उपरान्त तत्काल नवजात शिशु किशोर या प्रौढ़ नहीं बन जाता। अभिभावकों को उसके लिए धैर्य रखना होता है। बीज का फल वृक्ष और गर्भाधान का फल समर्थ सन्तान होता है यह सही है, पर यह भी सही है कि आरम्भ और परिणाम के बीच कुछ अन्तर अवश्य रहता है। हथेली पर सरसों बाजीगर ही जमा सकते हैं। किसान को उसके लिए छः महीने तक साधना और प्रतीक्षा करनी पड़ती है। गाय के पेट में घास जाकर दूध में बदलती है इसे कौन नहीं जानता, पर यह लाभ धैर्यपूर्वक ही उठाया जा सकता है। कोल्हू से तेल निकलने की तरह गाय को एक ओर घास खिलाने और दूसरी ओर दूध पाने की आशा की जाय तो सफलता न मिलेगी। ठीक इसी प्रकार कर्म को फल रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया कुछ समय चाहती है।
  
जन्मजात अपंग, बाधित, असमर्थ, रुग्ण व्यक्तियों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि उद्धत आचरण करने वालों के प्रगति साधनों का प्रकृति ने किस प्रकार अपहरण कर लिया। बन्दूक का दुरुपयोग करने वालों का लाइसेन्स जब्त हो जाता है, इसी प्रकार मोटर चलाने में प्रमाद बरतने वालों का लाइसेन्स छिन जाता है। अपराधियों को न्यायालय में समाज से पृथक रहने का यातनापूर्ण कारावास मिलता है और उनके नागरिक अधिकार छिन जाते हैं। जन्मजात बाधितों को देखकर हम अनुमान लगा सकते हैं कि मिली हुई कर्म स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वालों से प्रकृति किस प्रकार प्रतिशोध लेती है।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

👉 द्वेष का कुचक्र

द्रोणाचार्य और द्रुपद एक साथ ही गुरुकुल में पढ़ते थे। द्रुपद बड़े होकर राजा हो गये। एक बार किसी प्रयोजन की आवश्यकता पड़ी। वे उनसे मिलने गये। राज सभा में पहुँचकर द्रोणाचार्य ने बड़े प्रेम से उन्हें सखा कहकर संबोधन किया। पर द्रुपद ने उपेक्षा ही नहीं दिखाई तिरस्कार भी किया। उनने कहा-जो राजा नहीं वह राजा का सखा नहीं हो सकता। बचपन की बातों का बड़े होने पर कोई मूल्य नहीं उनका स्मरण करके आप मेरे सखा बनने की अनधिकार चेष्टा करते हैं।

द्रोणाचार्य को इस तिरस्कार का बड़ा दुःख हुआ। उनने इसका बदला लेने का निश्चय किया। वे हस्तिनापुर जाकर पाँडवों और कौरव बालकों को अस्त्र विद्या सिखाने लगे। जब शिक्षा पूर्ण हो गई और शिष्यों ने गुरु से दक्षिणा माँगने की प्रार्थना की तो पाँडवों से उनने यही माँग, कि राजा द्रुपद को जीतकर उन्हें बाँधकर मेरे सामने उपस्थित करो। भीम और अर्जुन ने यही किया, उसने द्रुपद को बाँधकर द्रोणाचार्य के सामने उपस्थित कर दिया।

द्वेष का कुचक्र टूटता नहीं। द्रुपद के मन में द्रोणाचार्य के लिए प्रतिशोध की भावना बनी रही। उसने भी द्रोणाचार्य को नीचा दिखाने की ठानी और बाज़ ऋषि को प्रसन्न करके मन्त्र शक्ति से एक ऐसा पुत्र प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जो द्रोणाचार्य को मार सके। उस पुत्र का नाम धृष्टद्युम्नः रखा गया। बड़े होने पर महाभारत में उसी ने द्रोणाचार्य को मारा।

📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1961

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग ३)

लाभ की तरह हानि का, संयोग की तरह वियोग का, दिन की तरह रात का आना बिलकुल स्वाभाविक है। कपड़े के ताने-बाने की तरह यह जीवन भी सुख और दुःख, उतार और चढ़ाव के ताने-बाने से बुना हुआ है। बुरा इसलिए है कि उसमें सुधारने का प्रयत्न करते हुए हम अपने को अधिक पुरुषार्थी अधिक पुण्यवान बनायें। शुभ इसलिए है कि उसे देखकर हम प्रमुदित हों और उस उपलब्धि का वितरण दूसरों को भी करें। दोनों ही प्रकार की—भली और बुरी परिस्थितियों से  हँसते-खेलते भी निपटा जा सकता है तो फिर रोते कलपते उनसे क्यों निपटें? ताश खेलने में बाजी हार जाने पर, खेल खेलते हुए परास्त हो जाने पर, नाटक करते हुए आपत्तिग्रस्त हो जाने पर कौन रोता कलपता है। उस हानि को हलकेपन से, उपेक्षाभाव से देखने पर जरा सी देर मन हलका-सा रहता है और फिर हम अपना आगे का काम स्वस्थ चित्त से करने लगते हंै। यदि हमारा मन विवेकी हो तो शोक, वियोग, हानि, कष्ट, परेशानी, दुर्व्यवहार आदि के अप्रिय प्रसंगों को हंसकर सहन कर सकते हैं और फिर सन्तुलित मन को उन समस्याओं का हल खोजने में लगाकर आगे कठिनाई से पार होने का मार्ग भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। मन की स्वच्छता से विवेक जागृत होता है, सोचने का सही तरीका अभ्यास में आता है और तब प्रायः सभी उलझी हुई समस्यायें शान्ति पूर्वक सुलझ जाती हैं।
   
इन थोड़ी सी पंक्तियों में यह विस्तार पूर्वक नही बताया जा सकता कि मन की मलीनता को हटा देने पर हम संताप से कितने बचे रह सकते हैं और मन को स्वच्छ रखकर उत्थान और आनन्द का कितना अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। यह लिखने-पढ़ने और कहने-सुनने की नहीं, करने और अनुभव में लाने की बात है। लौकिक जीवन को आनन्द और उत्थान की दिशा में गतिवान् करने का प्रमुख उपाय यह है कि हम अपने मन स्वच्छ कर उसकी मलीनताओं को हटावें। मनन करने वाले को ही मनुष्य कहते हैं। अपनी भीतरी मलीनताओं को खोजने और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। प्रत्येक महापुरुष को अनिवार्य रूप से यह पुरूषार्थ करना पड़ता है। क्या यह कोई ऐसा कठिन काम है जो हम नहीं कर सकते?  दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं, अपने आपको समझा ही  सकते हैं, अपने को तो सन्मार्ग पर चला ही सकते हंै। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचा उठना चाहते हंै और उसका साधन हमारे हाथ में है तो फिर उसके लिए पुरूषार्थ क्यों न करें? आत्म-सुधार के लिए आत्म-निर्माण के लिए आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य   

👉 Thoughts are Seeds of Deeds

Narrow-mindedness, selfish boundaries, and misery are certainly not the natural components of the Supreme Creation of the Almighty. These kinds of heinous things are the products of our vices, our wrong ambitions and thoughts. Because of our ignorance and unawareness, they have silently invaded our inner self too and eaten much of our inner strength and sublime powers. This is why, our progress or wellbeing largely remains confined to the body and physical resources; there is hardly any sign of mental, intellectual or emotional evolution, spiritual refinement or growth of virtuous prosperity.

There is only one cause of all misery and agony in this world and that is – the misdeeds of humans. And what drives it? Maligned thinking. Thoughts are like seeds which give rise to the trees of karmas (actions); joy, sorrows and sufferings are their fruits.

It is indeed pathetic that despite living in the limitless treasure of joy that Nature is, we shut our inner self in the narrow barriers of prejudiced convictions and selfish passions. As a result, we get entrapped in the smog of abrupt, fallacious, irrelevant thoughts and often remain fearful, jealous, worried and depressed in one way or the other. All our misery is an outcome of our inner bankruptcy. Its time we realize it and improve ourselves right from the root of our thinking rather than attributing our failures and sorrows to – “ill omen”, “lack of resources or support” or “destined life”.

📖  Akhand Jyoti, Sept. 1945

👉 मानसिक और सामाजिक बुराइयाँ

मन की मलीनता और समाजगत बुराइयाँ एवं कुरीतियाँ इसलिए टिकी हुई और बढ़ी हैं कि उनका पोषक वातावरण चारों ओर बना रहता है। मन एक दर्पण की तरह है उस पर जैसी छाया पड़ती है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखने लगता है। हमारे चारों ओर आज जिस प्रकार के विचार और कार्य फैले होते हैं उसी का प्रभाव ग्रहण करके अपनी प्रवृत्तियाँ भी उसी ओर मुड़ने लगती हैं। एक बुरा व्यक्ति दूसरे अनेकों को अपनी बुराइयाँ सिखा लेता है। व्यभिचारी, नशेबाज, दुर्व्यसनी अपनी आदतों को कितने ही लोगों को सिखा देते हैं। कुविचारों को फैलाने के अगणित माध्यम आज मौजूद हैं। अश्लीलता, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता को प्रोत्साहन देने वाली पुस्तकों, तस्वीरों, गीतों, पत्र−पत्रिकाओं, फिल्मों की आज भारी धूम है, उनका आकर्षक एवं व्यापक प्रचार जन साधारण के भोले मस्तिष्कों को प्रभावित करके उन्हें अपने चंगुल में जकड़ लेता है और लोगों के मन बुराइयों की ओर झुक पड़ते हैं।

बुरे आदमी बुराई के सक्रिय सजीव प्रचारक होते हैं। वे अपने आचरणों द्वारा बुराइयों की शिक्षा लोगों को देते हैं। उनकी कथनी और करनी एक होती है। जहाँ भी ऐसा सामंजस्य होगा उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। हम में से कुछ लोग धर्म−प्रचार का कार्य करते हैं पर वह सब कहने भर की बातें होती हैं। इन प्रचारकों की कथनी और करनी में अन्तर रहता है। यह अन्तर जहाँ भी रहेगा वहाँ प्रभाव भी क्षणिक रहेगा। सच्चे धर्म प्रचारक जिनकी कथनी और करनी एक रही है अपने अगणित अनुयायी बनाने में समर्थ हुए हैं। बुद्ध, गाँधी, तिलक, कबीर, नानक आदि की कथनी और करनी एक थी, वे अपने आदर्शों के प्रति सच्चे थे, इसलिए अगणित व्यक्ति उनका अनुकरण करने वाले, उनके आदर्शों पर बड़े से बड़ा त्याग करने वाले प्रस्तुत हो गये थे। आज अच्छाइयों के सच्चे एवं आदर्श प्रचारक नहीं है। बुराइयों के आस्थावान प्रचारक मौजूद हैं, वे बुरे काम करते हैं, बुराइयाँ सिखाते हैं, पर ऐसे धर्म−प्रचारक कहाँ हैं जो अपने आचरणों से दूसरों को शिक्षा और प्रेरणा प्रदान करें। जहाँ थोड़े बहुत सच्चे लोग हैं वहाँ प्रभाव भी पड़ रहा है। हजारों मील से आकर विदेशी ईसाई मिशिनरी भारत में ईसाई धर्म का प्रचार पूरी आस्था और लगन के साथ कर रहे हैं फलस्वरूप गत दस वर्षों में ही लाखों की संख्या में लोगों ने हिन्दू धर्म का परित्याग कर ईसाई धर्म की दीक्षा ली है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 कर्मफल की स्वसंचालित प्रक्रिया (भाग १)

क्रिया की प्रतिक्रिया का नियम शाश्वत है। इसे सर्वत्र देखा और अनुभव किया जा सकता है। क्रियाओं के जैसे बीज होगे वैसे ही फल परिणाम के रूप में सामने आयेंगे। गेहूँ का बीज गलकर अपने अदृश्य असंख्यों बीज पैदा करता है। आम का बीज गलकर आम ही पैदा करता है। नीम का बीज गलता है तो नीम का वृक्ष ही पैदा करता है। गेहूँ के बीज से नीम का वृक्ष पनपे ऐसा न तो देखा गया और न ही सुना गया। प्रकृति के उपवन में कर्मफल व्यवस्था के उदाहरण सर्वत्र देखे जाते है।
 
दैनन्दिन जीवन में भी इसके प्रमाण मिलते हैं। अपवादों को छोड़कर बिना कोई पढ़े विद्वान बन गया हो ऐसा देखा नहीं जाता। बिना नियमित निर्धारित समय तक अध्ययन किये किसी को विशिष्ट डिग्री मिल गयी हो यह सामान्य क्रम में नहीं होता। डाक्टर, इंजीनियर, वकील, वैज्ञानिक बनने के लिए नियत समय तक निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ना और उसमें उत्तीर्ण होना पड़ता है। विद्यार्थी को अभीष्ट प्रकार की योग्यता सम्पादन के लिए पूरे धैर्य का परिचय देना होता तथा परिश्रम की कीमत चुकानी पड़ती है।
  
माली मन चाहे पुष्पों के लिए उनके पौध लगाता, तत्काल बिना किसी प्रकार के प्रतिदान की अपेक्षा किये उन्हें सींचता रहता है, निराई गुड़ाई करता है। किसान भी इसी प्रकार के मनोयोग, धैर्य का परिचय देता है। फल पाने की उतावली उनमें नहीं होती क्योंकि उन्हें यह मालूम होता है कि समय के परिपाक पर फल मिलेगा ही। कर्मों का सुनिश्चित फल एक अकाट्य नियम है जिसे कुछ बातों में स्पष्ट देखा जा सकता है।
  
पर कुछ मानवी कृत्य ऐसे होते हैं जिनका तत्काल फल नहीं मिलता। भले कर्मों के सुनिश्चित परिणाम होते हुए भी तुरन्त मिलते न देखकर कितने ही व्यक्ति उस शाश्वत व्यवस्था पर उँगली उठाते, संदेह करते हैं जिसे कर्मफल सिद्धान्त के रूप में जाना जाता है। कितने व्यक्ति तो सृष्टा तथा उसकी नियम व्यवस्था पर भी आशंका व्यक्त करने लगते हैं। उन्हें यह बात भली भाँति जानना चाहिए कि भगवान किसी को न तो दण्ड देता है और न पुरस्कार। वह केवल विधि व्यवस्था का विधायक और नियन्ता मात्र है। सृष्टि की क्रमबद्धता और समस्वरता को बनाये रखने भर का ध्यान रखता है। व्यक्तिगत जीवन में उसका हस्तक्षेप नहीं के बराबर है। हर किसी को उसने यह पूरी आजादी दी है कि जो चाहे जिस तरह सोचे या करे। साथ ही विवेक का अनुदान देकर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चिन्तन कर्तृत्व का स्तर ही उसके सामने दण्ड पुरस्कार के रूप में सामने आयेगा। स्वतन्त्रता दिशा अपनाने भर की है। पर जो कँटीले मार्ग पर चलेगा वह चुभन से बच न सकेगा यह तथ्य भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया। धर्मशास्त्र, तत्व दर्शन और प्रमाण उदाहरणों से भरा इतिहास इसी यथार्थता का पग- पग पर प्रतिपादन करते रहे हैं।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

बुधवार, 15 जुलाई 2020

👉 आत्म ज्ञान की प्राप्ति


👉 सत्संग की शक्ति

एक बार वशिष्ठ जी विश्वामित्र ऋषि के आश्रम में गये। उनने बड़ा स्वागत सरकार और आतिथ्य किया। कुछ दिन उन्हें बड़े आदरपूर्वक अपने पास रखा। जब वशिष्ठ जी चलने लगे तो विश्वामित्र ने उन्हें एक हजार वर्ष की अपनी तपस्या का पुण्य फल उपहार स्वरूप दिया। बहुत दिन बाद संयोगवश विश्वामित्र भी वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। उनका भी वैसा ही स्वागत सत्कार हुआ। जब विश्वामित्र चलने लगे तो वशिष्ठ जी ने एक दिन के सत्संग का पुण्य फल उन्हें भेंट किया।

विश्वामित्र मन ही मन बहुत खिन्न हुए। वशिष्ठ को एक हजार वर्ष की तपस्या का पुण्य भेंट किया था। वैसा ही मूल्यवान उपहार न देकर वशिष्ठ जी ने केवल एक दिन के सत्संग का तुच्छ फल दिया। इसका कारण उनकी अनुदारता और मेरे प्रति तुच्छता की भावना का होना ही हो सकता है। यह दोनों ही बातें अनुचित हैं।

वशिष्ठ जी विश्वामित्र के मनोभाव को ताड़ गए और उनका समाधान करने के लिए विश्वामित्र को साथ लेकर विश्व भ्रमण के लिए चल दिये। चलते चलते दोनों वहाँ पहुँचे जहाँ शेष जी अपने फन पर पृथ्वी का बोझ लादे हुए बैठे थे। दोनों ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया और उनके समीप ठहर गये।

अवकाश का समय देखकर वशिष्ठ जी ने शेष जी से पूछा-भगवन् एक हजार वर्ष का तप अधिक मूल्यवान है या एक दिन का सत्संग? शेष जी ने कहा-इसका समाधान केवल वाणी से करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव से करना ही ठीक होगा। मैं सिर पर पृथ्वी का इतना भार लिए बैठा हूँ। जिसके पास तप बल है वह थोड़ी देर के लिए इस बोझ को अपने ऊपर ले लें। विश्वामित्र को तप बल पर गर्व था। उनने अपनी संचित एक हजार वर्ष की तपस्या के बल को एकत्रित करके उसके द्वारा पृथ्वी का बोझ अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया पर वह जरा भी नहीं उठी। अब वशिष्ठ जी को कहा गया कि वे एक दिन के सत्संग बल से पृथ्वी उठावें। वशिष्ठ जी ने प्रयत्न किया और पृथ्वी को आसानी से अपने ऊपर उठा लिया।

शेष जी ने कहा- ‘तप बल की महत्ता बहुत है। सारा विश्व उसी की शक्ति से गतिमान है। परंतु उसकी प्रेरणा और प्रगति का स्त्रोत सत्संग ही है। इसलिए उसकी महत्ता भी तप से भी बड़ी है।’

विश्वमित्र का समाधान हो गया और उनने अनुभव किया कि वशिष्ठ जी ने न तो कम मूल्य की वस्तु भेंट की थी और न उनका तिरस्कार किया था। सत्संग से ही तप की प्रेरणा मिलती है। इसलिए तप का पिता होने के कारण सत्संग को अधिक प्रशंसनीय माना गया है। यों शक्ति का उद्भव तो तप से ही होता है।

📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1940

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग २)

काश! मनुष्य ने मन की स्वच्छता  का महत्व समझ पाया होता तो उसका जीवन कितने आनन्द और उल्लास के साथ व्यतीत हुआ होता। दूसरों की श्रेष्ठता को देखने वाली, उसमें अच्छाइयाँ तलाश करने वाली यदि अपनी प्रेम-दृष्टि जग पड़े तो बुरे लोगों में भी बहुत कुछ आनन्ददायक, बहुत कुछ अच्छा, कुछ अनुकरणीय हमें दीख पड़े। दत्तात्रेय ऋषि ने जब अपनी दोष-दृष्टि त्यागकर श्रेष्ठता ढूँढ़ने वाली वृत्ति जागृत कर ली तो उन्हें चील, कौए, कुत्ते, मकड़ी, मछली, जैसे तुच्छ प्राणी भी गुणों के भण्डागार दीख पड़े और वे ऐसे ही तुच्छ जीवों को अपना गुरु बनाते गये उनसे बहुत कुछ सीखते गये। हम चाहें तो चोरों  से भी सावधानी, सतर्कता, साहस, लगन, ढूँढ़-खोज जैसे अनेक गुण सीख सकते हैं।  वे इस दृष्टि से कहीं अधिक आगे होते हैं। पाप की उपेक्षा कर पुण्य को और अशुभ की उपेक्षा कर शुभ को तलाश करने का स्वभाव यदि बन जाय तो इस सांसर में हमें सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर चमकता नजर आवे। उसकी इस पुण्य कृति में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द झरता दीखने लगे। सारी दुनियाँ हमारे लिए उपकार, सहयोग, स्नेह और सद्भावना का उपकार लिए खड़ी है, पर हम उसे देख कहाँ पाते हैं, मन की मलीनता तो हमें केवल दुर्गन्ध सूँघने और गन्दगी ढूँढ़ने के लिए ही विवश किए रहती है।
    
ईमानदारी और मेहनत से जो कमाई की जाती है उसी से आदमी फलता-फूलता है, यह बात यदि मन में बैठ जाय तो हम सादगी और किफायत का जीवन व्यतीत करते हुए सन्तोष पूर्वक अपना निर्वाह करेंगे। धर्म उपाॢजत कमाई का अनीति से अछूता अन्न हमारी नस-नाड़ियों में रक्त बनकर घूमेगा तो हमारा आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव क्यों न आकाश को चूमने लगेगा? क्यों न हम हिमालय जैसा ऊँ चा मस्तक रख सकेंगे? और क्यों हमें हमारी महानता का— उत्कृष्टता का अनुभव होने से अन्तः करण में सन्तोष एवं गर्व भरा न दिखेगा?
     
प्यार आत्मीयता, ममता की आँखों से जब हम दूसरों को देखेंगे तो वे हमें अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे से कुटुम्ब को देख-देखकर हमेंं आनन्द होता है। फिर यदि हम दूसरों को—बाहर वालों को भी उसी आँख से देखें तो वे भी अपने ही प्रतीत होंगे। अपने कुटुम्बियों के जब हम अनेक दोष-दुर्गुण हम बर्दाश्त करते हैं, उन्हें भूलते -छिपाते और क्षमा करते हैं, तो बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नही किया जा सकता। उदारता, सेवा, सहयोग, स्नेह, नेकी और भलाई की प्रवृत्ति को यदि हम विकसित कर लें, तो देवता योनि प्राप्त होने का आनन्द हमें इसी मनुष्य जन्म में मिल सकता है। हमारी भलमनसाहत और सज्जनता का कोई थोड़ा दुरूपयोग कर ले, उससे अनुचित लाभ उठा ले , इतने पर भी उस ठगने वाले के स्वयं अपने मन पर भी आपकी सज्जनता की छाप पड़ी रहेगी और वह कभी न कभी उसके लिए पश्चाताप करता हुआ सुधार की ओर चलेगा। अनेक सन्तों और सज्जनों के ऐसे उदाहरण हैं जिनने दुष्टता को अपनी सज्जनता से जीता है। फिर चालाक आदमी भी तो दूसरे अधिक चालाकों द्वारा ठग लिए जाते हैं, वे भी कहाँ सदा बिना ठगे बने रहते हैं। फिर यदि हमें अपनी भलमनसाहत के कारण कभी कुछ ठगा जान पड़ा तो इसमें कौन-सी बहुत बड़ी बात हो गई जिसके लिए पछताया जाय। छोटा बच्चा जिसे हम अपना मानते हैं जन्म से लेकर वयस्क होने तक हमें ठगता ही तो रहता है, उस पर जब हम नही झुँझलाते तो श्रम-धर्म से परिपूर्ण हृदय हो जाने पर दूसरों पर भी क्यों झुँझलाहट आवेगी।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Boasting Sounds Raw

The shallowness (triviality, meanness) of ego is expressed in self-praise or bragging. It makes you unbearable and laughable before others. People might like to praise someone, but if he starts praising himself then it would certainly reverse the impression. Even you are honestly analyzing yourself in that effort; no one would respect your self-admiration. Forget about friendship or help, people do not even like to meet arrogant, self-boasting or pompous fellows. They may not always express it on your face because of social etiquettes or fear, etc, but in reality, they would like to avoid you as far as possible if you are egotist.

You should compare your qualities and achievements with those of the great men and women renowned in human history.
A camel regards himself tallest only until it doesn’t stand beneath a mountain. You should meet and know the great persons and eminent talents who are revered by people to know that you are not so high as your arrogance might assume. You will also learn from them that modesty is an essential quality for prestige.

The moment you think yourself as big or have achieved something significant, your natural quest for ascent will decelerate and might block after sometime. Don’t worry and don’t hurry your virtues. Your abilities will certainly be known to people via your deeds. You don’t have to declare them yourself.

📖  Akhand Jyoti, Aug. 1945

👉 सन्मार्गगामी सत्प्रवृत्तियाँ

स्वस्थ शरीर का सारा आधार मन की सन्मार्गगामी प्रवृत्तियों पर निर्भर है। परिवार की सुव्यवस्था एवं आर्थिक संतुलन का ठीक रहना भी तभी संभव है जब अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न नहीं किया, उनके सामने अपना अनुकरणीय आदर्श नहीं रखा वे कभी पारिवारिक उलझनों और कलह क्लेशों से छुटकारा प्राप्त न कर सकेंगे। इसी प्रकार जो पूरे मन से खरा काम करने और ईमानदारी एवं सज्जनता बरतने में तत्पर रहेंगे उनकी आमदनी ही नहीं प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। मितव्ययी हुए बिना कुबेर भी निर्धन हो सकता है फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है। आज जिस फिजूलखर्ची को लोगों ने सभ्यता और आवश्यकता का नाम दे रखा है यदि उसमें सुधार न हुआ तो आर्थिक तंगी बनी ही रहेगी। अर्थ व्यवस्था का सुधार हमारे दृष्टिकोण में सुधार हुए बिना चाहे जितनी आमदनी कर लेने पर भी हो नहीं सकता। जीवन की सारी समस्याऐं हमारी मानसिक स्थिति के साथ जुड़ी हुई हैं। ताली घुमाने से ही ताला खुलता है अपने को बदलने से ही परिस्थितियाँ बदलती हैं।

शरीर, परिवार और अर्थव्यवस्था की भाँति ही मानव जीवन में ज्ञान का स्थान है। अज्ञानी मनुष्यों की तुलना पशु से की जाती है। जिसमें ज्ञान का जितना ही अभाव है वह उतना ही पिछड़ा हुआ माना जाता है और उसकी परिस्थितियाँ भी निम्न स्तर की ही बनी रहती हैं। गरीबी जिस प्रकार दुखदायी मानी जाती है उसी प्रकार अविद्या भी है। अज्ञान के बंधनों में जकड़े हुए मनुष्य को हीन कोटि का जीवन− यापन करने के लिए ही विवश होना पड़ता है। प्रगति का एक महत्वपूर्ण सोपान ‘ज्ञान’ है। जिसे ज्ञान प्राप्ति के साधन नहीं मिल सके वह अंधे के समान एक बहुत ही संकुचित विचारधारा में हुआ कुँए के मेंढक की तरह अपने दिन पूरे करता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

👉 शारीरिक सौंदर्य का आधार


👉 जीवन कहानी

एक बड़ा सुन्दर शहर था, उसका राजा बड़ा उदार और धर्मात्मा था। प्रजा को प्राणों के समान प्यार करता और उनकी भलाई के लिए बड़ी बड़ी सुन्दर राज व्यवस्थाएं करता। उसने एक कानून प्रचलित किया कि अमुक अपराध करने पर देश निकाले की सजा मिलेगी। कानून तोड़ने वाले अनेक दुष्टात्मा राज्य से निकाल बाहर किये गये, राज्य में सर्वत्र सुख शान्ति का साम्राज्य था।

एक बार किसी प्रकार वही जुर्म राजा से बन पड़ा। बुराई करते तो कर गया पर पीछे उसे बहुत दुःख हुआ। राजा था सच्चा, अपने पाप को वह छिपा भी सकता था पर उसने ऐसा किया नहीं।

दूसरे दिन बहुत दुखी होता हुआ वह राज दरबार में उपस्थित हुआ और सबके सामने अपना अपराध कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा मैं अपराधी हूँ इसलिए मुझे दण्ड मिलना चाहिए। दरबार के सभासद ऐसे धर्मात्मा राजा को अलग होने देना नहीं चाहते थे फिर भी राजा अपनी बात पर दृढ़ रहा उसने कड़े शब्दों में कहा राज्य के कानून को मैं ही नहीं मानूँगा तो प्रजा उसे किस प्रकार पालन करेगी? मुझे देश निकाला होना ही चाहिये।

निदान यह तय करना पड़ा कि राजा को निर्वासित किया जाय। अब प्रश्न उपस्थित हुआ कि नया राजा कौन हो? उस देश में प्रजा में से ही किसी व्यक्ति को राजा बनाने की प्रथा थी। जब तक नया राजा न चुन लिया जाय तब तक उसी पुराने राजा को कार्य भार सँभाले रहने के लिए विवश किया गया। उसे यह बात माननी पड़ी।

उस जमाने में आज की तरह वोट पड़कर चुनाव नहीं होते थे। तब वे लोग इस बात को जानते ही न हों सो बात न थी। वे अच्छी तरह जानते थे कि यह प्रथा उपहासास्पद है। लालच, धौंस, और झूठे प्रचार के बल पर कोई नालायक भी चुना जा सकता है। इसलिए उपयुक्त व्यक्ति की कसौटी उनके सद्गुण थे। जो अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करता था वही अधिकारी समझा जाता था।

उस देश का राजा जैसा धर्मात्मा था वैसा ही प्रधान मन्त्री बुद्धिमान था। उसने नया राजा चुनने की तिथि नियुक्त की। और घोषणा की कि अमुक तिथि को दिन के दस बजे जो सबसे पहले राजमहल में जाकर महाराज से भेंट करेगा वही राजा बना दिया जायेगा। राजमहल एक पथरीली पहाड़ी पर शहर से जरा एकाध मील हठ कर जरूर था पर उसके सब दरवाजे खोल दिये गये थे भीतर जाने की कोई रोक टोक न थी। राजा के बैठने की जगह भी खुले आम थी और वह मुनादी करके सबको बता दी गई थी।

राजा के चुनाव से एक दो दिन पहले प्रधान मन्त्री ने शहर खाली करवाया और उसे बड़ी अच्छी तरह सजाया। सभी सुखोपभोग की सामग्री जगह जगह उपस्थिति कर दी। उन्हें लेने की सबको छुट्टी थी किसी से कोई कीमत नहीं ली जाती। कहीं मेवे मिठाइयों के भण्डार खुले हुए थे तो कहीं खेल, तमाशे हो रहे थे कहीं आराम के लिए मुलायम पलंग बिछे हुए थे तो कहीं सुन्दर वस्त्र, आभूषण मुफ्त मिल रहे थे। कोमलाँगी तरुणियाँ सेवा सुश्रूषा के लिए मौजूद थीं जगह -जगह नौकर दूध और शर्बत के गिलास लिये हुए खड़े थे। इत्रों के छिड़काव और चन्दन के पंखे बहार दे रहे थे। शहर का हर एक गली कूचा ऐसा सज रहा था मानो कोई राजमहल हो।

चुनाव के दिन सबेरे से ही राजमहल खोल दिया गया और उस सजे हुए शहर में प्रवेश करने की आज्ञा दे दी गई। नगर से बाहर खड़े हुए प्रजाजन भीतर घुसे तो वे हक्के-बक्के रह गये। मुफ्त का चन्दन सब कोई घिसने लगा। किसी ने मिठाई के भण्डार पर आसन बिछाया तो कोई सिनेमा की कुर्सियों पर जम बैठा, कोई बढ़िया बढ़िया कपड़े पहनने लगा तो किसी ने गहने पसन्द करने शुरू किये। कई तो सुन्दरियों के गले में हाथ डालकर नाचने लगे सब लोग अपनी अपनी रुचि के अनुसार सुख सामग्री का उपयोग करने लगे।
एक दिन पहले ही सब प्रजाजनों को बता दिया गया था कि राजा से मिलने का ठीक समय 10 बजे है। इसके बाद पहुँचने वाला राज का अधिकारी न हो सकेगा। शहर सजावट चन्द रोजा है, वह कल समय बाद हटा दी जायेगी एक भी आदमी ऐसा नहीं बचा था जिसे यह बातें दुहरा दुहरा कर सुना न दी गई हों, सबने कान खोलकर सुन लिया था।

शहर की सस्ती सुख सामग्री ने सब का मन ललचा लिया उसे छोड़ने को किसी का जी नहीं चाहता था। राज मिलने की बात को लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे। कोई सोचता था दूसरों को चलने दो मैं उनसे आगे दौड़ जाऊँगा, कोई ऊंघ रहे थे अभी तो काफी वक्त पड़ा है, किसी का ख्याल था सामने की चीजों को ले लो, राज न मिला तो यह भी हाथ से जाएंगी, कोई तो राज मिलने की बात का मजाक उड़ाने लगे कि यह गप्प तो इसलिये उड़ाई गई है कि हम लोग सामने वाले सुखों को न भोग सकें। एक दो ने हिम्मत बाँधी और राजमहल की ओर चले भी पर थोड़ा ही आगे बढ़ने पर महल का पथरीला रास्ता और शहर के मनोहर दृश्य उनके स्वयं बाधक बन गये बेचारे उल्टे पाँव जहाँ के तहाँ लौट आये। सारा नगर उस मौज बहार में व्यस्त हो रहा था।

दस बज गये पर हजारों लाखों प्रजाजनों में से कोई वहाँ न पहुँचा। बेचारा राजा दरबार लगाये एक अकेला बैठा हुआ था। प्रधान मन्त्री मन ही मन खुश हो रहा था कि उसकी चाल कैसी सफल हुई। जब कोई न आया तो लाचार उसी राजा को पुनः राज भार सँभालना पड़ा।

यह कहानी काल्पनिक है परन्तु मनुष्य जीवन में यह बिल्कुल सच उतरती है। ईश्वर को प्राप्त करने पर हम राज्य मुक्ति अक्षय आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। उसके पाने की अवधि भी नियत हैं मनुष्य जन्म समाप्त होने पर यह अवसर हाथ से चला जाता है। संसार के मौज तमाशे थोड़े समय के हैं यह कुछ काल बाद छिन जाते हैं। सब किसी ने यह घोषणा सुन रखी है कि संसार के भोग नश्वर हैं, ईश्वर की प्राप्ति में सच्चा सुख है, प्रभु की प्राप्ति का अवसर मनुष्य जन्म में रहने तक ही है। परन्तु हममें से कितने हैं जो इस घोषणा को याद रख कर नश्वर माया के लालच में नहीं डूबे रहते?

अवसर चला जा रहा है। हम माया के भुलावे में फँस कर तुच्छ वस्तुओं को समेट रहे हैं और अक्षय सुख की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। हमारे इस व्यवहार को देखकर प्रधान मन्त्री शैतान मन ही मन खुश हो रहा है कि मेरी चाल कैसी सफल हो रही है। यह कहानी हमारे जीवन का एक कथा चित्र है।

📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1940

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग १)

जिस स्थान पर मनुष्य रहता तथा जिस शरीर से काम लेता है, उसकी नित्य सफाई करनी होती है। आहार-विहार से स्वास्थ्य संवर्धन का लाभ तभी मिल पाता है। गन्दगी बढ़ने से रोगों के कीटाणु उत्पन्न होते तथा अनेकों रोगों को जन्म देते हैं। अतएव स्वच्छता, स्वास्थ्य सन्तुलन के लिए अनिवार्य है। मन की स्वच्छता, पवित्रता शरीर से भी अधिक आवश्यक है। शरीर की भाँति मन पर भी नित्य विकारों की पर्त चढ़ती है। उनका शोधन भी जरूरी है। काम-क्रोध-लोभ-अहंकार जैसे अनेकों विकारों के कारण ही मन चिन्तित, विक्षुब्ध बना रहता है।
  
स्वच्छ मन में ही श्रेष्ठ विचारों का निवास होता है। वैयक्तिक अथवा सामूहिक उन्नति अथवा अवनति विचारों की उत्कृष्टता पर निर्भर करती है। स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ, पाप, व्यभिचार, अपहरण, क्रोध, अहंकार, आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मन में बढें़ तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। उसकी सारी क्रियाएँ और चेष्टाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनसे उसे मनुष्य शरीर में रहते हुए भी प्रत्यक्ष असुर के रूप में देखा जा सकता है। आलस, प्रमाद, निराशा, अनुत्साह, अनियमितता, दीर्घसूत्रता, विलासिता जैसे दुर्गुण मन में जम जायें तो वह एक प्रकार से पशु ही बन जाता है। सींग, पूँछ भले ही उसके न हों पर जीवन के अपव्यय की दृष्टि से वह सब प्रकार पशु से भी अधिक घाटे में रहता है।
  
मन की मलीनता प्रगति के द्वार बन्द कर देती है। उससे न जम कर श्रम होता है और न पुरूषार्थ, साहस की पूँजी ही उसके पास शेष रहती है। दूषित दृष्टिकोण के कारण भीतर ही भीतर निरन्तर जलता -भुनता रहता है और अशान्ति, उद्विग्रता में घिरा रहता है। झुंझलाहट, अशिष्टता, कटुता ही उसके चेहरे और व्यवहार से टपकती है। दूसरे हर किसी को खराब बताना, सब में दोष ढूँढ़ना और उन्हें अपना शत्रु मानना ऐसा मानसिक दुर्गुण है जिसके कारण अपने भी विराने हो जाते हैं, जो लोग प्यार करते थे और सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रतिपक्षी बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने आपको मरघट के ठूँठ करील की तरह सर्वथा एकाकी और सताया हुआ ही अनुभव करते रहते है। बेचारों की स्थिति दयनीय रहती हैं।                 
  
आलसी और अव्यवस्थित, छिन्द्रान्वेषी और उद्विग्र मनुष्य के लिये यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा है और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग-तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते है, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नही। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रति-क्रिया में चिर-अशान्ति उसके पल्ले बँध जाती है । मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव जीवन में श्रेष्ठता है उस सबको चुपके-चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक को समझ भी नहीं पाता। वह बाहर ही कारणों को ढूँढ़ता रहता है, कभी इस पर कभी उस पर दोष मढ़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे, उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Accumulate Strength

Life is a sort of a continuum of struggles of varied intensities and types. One has to fight with diverse, unfavorable situations and troubles every moment. The success of life is in proceeding ahead against all odds. This seems to be the case with the life cycle of every living being; despite enormous gifts of Nature, there also appear enemies and hardships all around in one form or the other. “Survival of the fittest” is a bitter truth in this world. The weaker is a prey to the stronger; big fishes eat the tiny ones; Sparrows eat insects; Hawks eat sparrows and so on… Huge trees grab the food of the small plants around; the rich men exploit the poor; the mightier rule over the meek.

What do these live-examples teach us? If we do not want to let ourselves ruined by adversities and want to live with dignity, we must be alert and eliminate our weaknesses. We should at least have that much (inner) strength that no one would ruin us just like that; we should at least have the courage, vigor and mental power to fight for our genuine rights and work for moral rise.

Before entering the worldly life, we must know this secret that only the awakened, aware, strong (independent), confident and wise enjoy esteemed success here.

📖  Akhand Jyoti, Aug. 1945

👉 विवेकहीन अन्धानुकरण

अंग्रेजों की आमदनी बहुत थी वे मनचाहा खर्च कर सकते थे। वे अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा के लिए इस गरम देश में रहकर भी अपने ठण्डे मुल्क की पोशाक पहनते थे, हिन्दुस्तानी भाषा जानते हुए भी अपनी मातृ भाषा में बोलने में ही गौरव अनुभव करते थे। उन्होंने अपने को श्रेष्ठ समझा और अपनी दृढ़ता से दूसरे की कमजोरी को प्रभावित किया। एक हम हैं जो उनकी दृढ़ता देश भक्ति ,स्वाभिमान एवं विशेषताओं को तो छू भी न सके उलटे बन्दर की तरह नकल बनाने लगे अपनी भाषा, संस्कृति, पोशाक, आहार, परम्परा आदि को तिलाञ्जलि देकर हमने पाया कुछ नहीं समझदार लोगों की आँखों में उपहासास्पद बने और खर्च भी बढ़ा लिये।

अब अंग्रेज भारत में नहीं हैं राजनैतिक गुलामी से भी छुटकारा मिल गया पर काले अंग्रेज अभी भी उनकी सांस्कृतिक गुलामी को गले में लपेटे बैठे हैं और इसी दुर्बुद्धि है कि भारतीय परम्पराओं के अनुरूप जीवन क्रम रखने की अपेक्षा अंग्रेजी परम्पराओं के अनुरूप वेश विन्यास एवं ढंग ढाँचा बनाना कहीं अधिक खर्चीला है और इतना खर्चीला ढोंग जो कोई भी बनावेगा दरिद्रता का अभिशाप उसे घेरे ही रहेगा। नक्कालों की हर जगह हँसी उड़ाई जाती है। साँस्कृतिक नकलची जहाँ आर्थिक तंगी में घिरे रहते हैं वहाँ हर समझदार की दृष्टि में परले सिरे के मूर्ख भी माने जाते हैं। हमें इस खर्चीले मूर्खता से बचकर भारतीय रहन−सहन अपनाये रहना चाहिए। हर शिक्षित को इस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि शिक्षा के कारण उनकी बढ़ी हुई आमदनी को भी यही नकलची प्रवृत्ति बरबाद करती रहती है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1962
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 पचास फीसदी दुख अभी खत्म हो जाएं

'शांति चाहिए। इसके लिए मैं क्या करूं? 'कुछ मत करो, बल्कि जो कर रहे हो उसे बंद कर दो, शांति आ जाएगी।' बतौर उदाहरण आप झूले पर झूल रहे हो और पैर से टेका लगाना बंद कर दो, झूला अपने आप थम जाएगा। शांतिमय जीवन के लिए जरूरी है कि व्यक्ति हर हाल में मस्त रहने की कला सीख ले। जो नहीं मिला, उसके लिए प्रभु से शिकायत मत करो कि तूने मुझे औरों से कम दिया है, बल्कि इस बात के लिए उसे धन्यवाद दो कि उसने तुझे तेरी काबलियत से भी अधिक दिया है। अगर व्यक्ति इस तथ्य को  स्वीकार कर ले कि 'जो भी दे-दे मालिक, तू कर ले कबूल, कभी-कभी कांटो में भी खिलते हैं फूल' तो उसके पचास फीसदी दुख आज और अभी खत्म हो जाएं।

जीवन की सफलता यह नहीं कि आप कितने खुश हैं? बल्कि जीवन की सफलता यह है कि लोग आपसे कितने खुश हैं। लोगों को क्षमा करते और अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगते चलिए, जीवन की सफलता आपको नजर आने लगेगी।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

👉 कर्तव्य पालन की साधना।

कौशिक नामक एक ब्राह्मण बड़ा तपस्वी था। तप के प्रभाव से उसमें बहुत आत्म बल आ गया था। एक दिन वह वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था कि ऊपर बैठी हुई चिड़िया ने उस पर बीट कर दी। कौशिक को क्रोध आ गया। लाल नेत्र करके ऊपर को देखा तो तेज के प्रभाव से चिड़िया जल कर नीचे गिर पड़ी। ब्राह्मण को अपने बल पर गर्व हो गया।

दूसरे दिन वह एक सद् गृहस्थ के यहाँ भिक्षा माँगने गया। गृहिणी पति को भोजन परोसने में लगी थी। उसने कहा-भगवान थोड़ी देर ठहरें अभी आपको भिक्षा दूँगी। इस पर ब्राह्मण को क्रोध आया कि मुझ जैसे तपस्वी की उपेक्षा करके यह पति सेवा को अधिक महत्व दे रही है। गृह स्वामिनी ने दिव्य दृष्टि से सब बात जान ली। उसने ब्राह्मण से कहा-क्रोध न कीजिए मैं चिड़िया नहीं हूँ। अपना नियत कर्तव्य पूरा करने पर आपकी सेवा करूँगी।

ब्राह्मण क्रोध करना तो भूल गया, उसे यह आश्चर्य हुआ कि चिड़िया वाली बात इसे कैसे मालूम हुई? ब्राह्मणी ने इसे पति सेवा का फल बताया और कहा कि इस संबंध में अधिक जानना हो तो मिथिला पुरी में तुलाधार वैश्य के पास जाइए। वे आपको अधिक बता सकेंगे।

भिक्षा लेकर कौशिक चल दिया और मिथिलापुरी में तुलाधार के घर जा पहुँचा। वह तौल नाप के व्यापार में लगा हुआ था। उसने ब्राह्मण को देखते ही प्रणाम अभिवादन किया ओर कहा-तपोधन कौशिक देव! आपको उस सद्गृहस्थ गृह स्वामिनी ने भेजा है सो ठीक है। अपना नियत कर्म कर लू तब आपकी सेवा करूँगा कृपया थोड़ी देर बैठिये। ब्राह्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बिना बताये ही इसने मेरा नाम तथा आने का उद्देश्य कैसे जाना? थोड़ी देर में जब वैश्य अपने कार्य से निवृत्त हुआ तो उसने बताया कि मैं ईमानदारी के साथ उचित मुनाफ़ा लेकर अच्छी चीजें लोकहित की दृष्टि से बेचता हूँ। इस नियत कर्म को करने से ही मुझे यह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है। अधिक जानना हो तो मगध के निजात चाण्डाल के पास जाइए।

कौशिक मगध चल दिया और चाण्डाल के यहाँ पहुँचा। वह नगर की गंदगी झाड़ने में लगा हुआ था। ब्राह्मण को देखकर उसने साष्टांग प्रणाम किया और कहा-भगवान आप चिड़िया मारने जितना तप करके उस सद्गृहस्थ देवी और तुलाधार वैश्य के यहाँ होते हुए यहाँ पधारे यह मेरा सौभाग्य है। मैं नियत कर्म कर लू, तब आपसे बात करूँगा तब तक आप विश्राम कीजिए।

चाण्डाल जब सेवा वृत्ति से निवृत्त हुआ तो उन्हें संग ले गया और अपने वृद्ध माता पिता को दिखाकर कहा अब मुझे इनकी सेवा करनी है। मैं नियत कर्तव्य कर्मों में निरंतर लगा रहता हूँ इसी से मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त है।

तब कौशिक की समझ में आया कि केवल तप साधना से ही नहीं, नियत कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्व करते रहने से भी आध्यात्मिक लक्ष’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।

📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1961

बुधवार, 8 जुलाई 2020

👉 कलह से दरिद्रता

एक बहुत धनवान् व्यक्ति के यहाँ चार बेटों की चार बहुएँ आई। वे बड़े उग्र और असहिष्णु स्वभाव की थीं, आपस में रोज ही लड़ती। दिन-रात गृह-कलह ही मचा रहता। इससे खिन्न होकर लक्ष्मी जी ने वहाँ से चले जाने की ठानी। रात को लक्ष्मी ने उस सेठ को स्वप्न दिया कि अब मैं जा रही हूँ। यह कलह मुझसे नहीं देखा जाता। जहाँ ऐसे लड़ने झगड़ने वाले लोग रहते हैं वहाँ मैं नहीं रह सकती।

सेठ बहुत गिड़गिड़ाकर रोने लगा, लक्ष्मी के पैरों से लिपट गया और कहा मैं आपका अनन्य भक्त रहा हूँ। मुझे छोड़कर आप जावे नहीं। लक्ष्मी को उस पर दया आई और कहा-कलह के स्थान पर मेरा ठहर सकना तो संभव नहीं। ऐसी स्थिति में अब मैं तेरे घर तो किसी भी प्रकार न रहूँगी पर और कुछ तुझे माँगना हो तो एक वरदान मुझ से माँग ले।

धनिक ने कहा-अच्छा माँ यही सही। आप यह वरदान दें कि मेरे घर के सब लोगों में प्रेम और एकता बनी रहे। लक्ष्मी ने ‘एवमस्तु’ कह कर वही वरदान दे दिया और वहाँ से चली गई। दूसरे दिन से ही सब लोग प्रेम पूर्वक रहने लगे और मिल-जुल कर सब काम करने लगे।

एक दिन धनिक ने स्वप्न में देखा कि लक्ष्मी जी घर में फिर वापिस आ गई हैं। उसने उन्हें प्रणाम किया और पुनः पधारने के लिए धन्यवाद दिया। लक्ष्मी ने कहा-इसमें धन्यवाद की कोई बात नहीं है। मेरा उसमें कुछ अनुग्रह भी नहीं है। जहाँ एकता होती है और प्रेम रहता हूँ वहाँ तो मैं बिना बुलाये ही जा पहुँचती हूँ।

जो लोग दरिद्रता से बचना चाहते हैं और घर से लक्ष्मी को नहीं जाने देना चाहते उन्हें अपने घर में कलह की परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं होने देनी चाहिए।

👉 ममता हटाने पर ही चित्त शुद्ध होगा (अंतिम भाग)

वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण ही वासनाओं को जन्म देता है। इस आकर्षण का कारण है वस्तुओं को बहुत महत्व देना। जब मानव जीवन की सुख शाँति का हेतु वस्तुओं की प्राप्ति मान लिया जाता है तब उनका महत्व अनावश्यक रूप से बढ़ जाता है। मनुष्य अपनी भ्राँत मान्यता के वशीभूत होकर वस्तुओं के संग्रह में निरत हो जाता है। वह उन्हें पाने में कर्तव्य का भी बोध खो देता है। एक वस्तु पाने के बाद दूसरी पाने की लालसा में प्रयत्न करता हुआ स्वाभाविक जीवन से भटक कर अस्वाभाविक जीवन की ओर चला जाता है, जिससे संघर्ष अशांति तथा अतृप्ति की वृद्धि हो जाती है। ऐसी दशा में चित्त का शुद्ध रहना सम्भव नहीं हो सकता।

जिनको पाने और इकट्ठा करने में मनुष्य अपना सारा जीवन ही यापन कर डालता है, यदि उन वस्तुओं में सुख एवं सन्तुष्टि होती तो कोई एक वस्तु की कामना न रहती । सुख में खण्ड नहीं होते वह अखण्ड एवं पूर्ण होता है। वह जिसमें रहता है पूर्ण एवं अखण्ड रूप में रहता है अन्यथा बिल्कुल नहीं रहता। एक वस्तु से तृप्त न होकर दूसरी के लिए लालायित रहना इस बात का प्रमाण है कि सच्चा सुख, सन्तुष्टि वस्तुओं में नहीं है। इस लिए उसके लिए उनका संग करना असंगत एवं अस्वाभाविक है जो कि चित्त की अशुद्धि का विशेष कारण बनती है।

चित्त की शुद्धि के लिये वस्तुओं से असंग रहना आवश्यक है। वह हर चीज इन अर्थों में वस्तु ही कही जायेगी जो नश्वर एवं परिवर्तनशील है। आवश्यकतानुसार निर्मोह के साथ संसार की वस्तुओं का उपयोग करते हुए अवनिश्वर आत्मा के प्रति आकर्षित रहना ही वस्तुओं का असंग कहा गया है। वस्तुओं के साथ असंग रहने की स्थिति में मनुष्य में माया, मोह, ममता, लोभ तथा अहंकार की वे विकृतियाँ उत्पन्न नहीं होने पाती जो कि चित्त की अशुद्धता अथवा मल कही गई है। इन विकृतियों के अभाव में चित्त शुद्ध, शान्त एवं स्थिर रहता है जिससे एक शाश्वत, सात्विक तथा अनिवर्चनीय प्रसन्नता प्राप्त होती है और यही प्रसन्नता मानव जीवन का लक्ष्य एवं उद्देश्य है।

निःसन्देह इस नश्वर संसार में रहते हुए और नश्वर वस्तुओं की आवश्यकता होने पर उनसे संग होना असम्भव नहीं, किन्तु आवश्यकता जन्य संग व्यवहारिक है, स्थायी अथवा सार्वजनिक नहीं है। मनुष्य का सार्वजनिक सम्बन्ध तो उसकी अपनी उस आत्मा से है जिसका कभी न तो नाश होता है और न जिसमें कभी कोई विकार ही उत्पन्न होता है। संग करते हुये भी वस्तुओं से असंग रहने की कला का अभ्यास कर लेने वाले अपने चित्त को शुद्ध करके शाश्वत सुख शान्ति एवं सन्तोष के अधिकारी बनते हैं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 12
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.12

👉 Reality of Love

The roots of real love lie deep within the soul. Linking it with the Supreme Soul (God) makes is an eternal source of unlimited, unalloyed bliss. What we often regard as love is, in one form or the other, an affection or attachment with the people or things which we feel as our own. But this binding, howsoever strong that may be, with the perishable entities, of this ever-changing world can’t be long lasting or consistently blissful. The instances of change like – demise of near and dear ones, separation from the beloved, loss of hard-earned prosperity, or tainting of self-prestige, etc break one’s heart; the same world which used to be so loving, appears an ocean of dole and depression in these tragic moments. This demonstrates that the bounds and strength of ‘worldly love’ are no more stable or stronger than a castle of sand. Love with the mortal beings, with the momentary things of this world is therefore not true love. True love is a perennial source of limitless joy… How can it ever be a cause of sorrow?

True love is a spiritual feeling, which surrenders the individual self in the Divine Supreme Self. The individual self, the soul is immortal, sublime, consciousness force, so its love could only be with the sachchidanand (eternal, omnipresent, everenlightening,
ever-blissful) – Supreme Soul.

📖  Akhand Jyoti, July 1945

👉 सबका प्रिय बनना है तो...

क्रोध तो दूध का एक उबाल है। जब तक आग रहेगी जब तक दूध उबलेगा लेकिन जब आग ठंडी पड़ जाएगी तो दूध भी बैठ जाएगा। अपेक्षा की उपेक्षा क्रोध है। आप किसी से अपेक्षा रखते हैं और जब उसकी उपेक्षा होती है तो क्रोध आता है। अपेक्षा ही मत रखिए तो फिर आपको कोई भी आपको क्रोध नहीं दिला सकता।

क्रोध जहर है तो क्षमा अमृत है। क्षमा आदत में हो और क्षमा की आदत हो तो जीवन में खुशियां ही खुशियां है । अगर आदमी दिमाग की गर्मी हटाए और जुबान में नरमी लाए तो परिवार में बल्ले-बल्ले हो जाए। मनुष्य समाज में जीता है। सबके साथ सबके बीच में रहता है। अगर उसे सभी का प्रिय बनना है तो वह नम्र बने, बड़ों के सामने झुकना सीखे, अहंकार के हिमालय से उतर कर विनम्रता की कार में सवारी करना सीखे। हर टक्कर अंतत लौटकर उस पर ही हमला करती है। अत: गलती होने पर परस्पर में क्षमा याचना करते चलें।

सोमवार, 6 जुलाई 2020

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (अंतिम भाग)

एक घंटा समय किस कार्य में लगाया जाय? इसका उत्तर यही है- ‘जन जागृति में’-विचार क्रान्ति का अलख जगाने में। बौद्धिक कुण्ठा ही राष्ट्रीय अवसाद का एकमात्र कारण है। भावनाएं जग पड़े तो सब ओर जागृति ही जागृति होगी। सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश दृष्टिगोचर होगा। अन्तःकरण न जगे तो बाहरी हलचलें कुछ ही दिन चमक कर बुझ जाती हैं। जो भीतर से प्रकाशवान है वह आँधी तूफान में भी ज्योतिर्मय बना रहता है, इसलिये हमें दीपक से दीपक जलाने की धर्म परम्परा प्रचलित करने के लिये अपने समय दान का सदुपयोग करना चाहिये। अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों, परिचित-अपरिचितों के नामों में से छाँटकर एक लिस्ट ऐसे लोगों की बनानी चाहिये जिनमें विचारशीलता एवं सद्भावना के बीजाँकुर पहले से ही किसी अंश में मौजूद हैं। उन लोगों से संपर्क बनाकर उन तक नव निर्माण की प्रौढ़ विचारधारा पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिये। इस अभिनव ज्ञान दान द्वारा हम उन स्वजनों की सच्ची सेवा करते हैं। भाव जागृति द्वारा किसी व्यक्ति में उत्कृष्टता उत्पन्न कर देना ऐसा परोपकार है जिससे बढ़कर और कुछ अनुदान दिया ही नहीं जा सकता। राष्ट्र की तीन आवश्यकताएं नैतिक, क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात यहीं से होता है। भाव जागृति के बिना मानव जाति की कुण्ठाओं और विकृतियों को और किसी प्रकार दूर नहीं किया जा सकता।

लिस्ट में अंकित व्यक्ति प्रथम बार में भी कम से कम दस तो होने ही चाहिये। उनके पास जाने एवं संपर्क बनाने की पहल अपने को ही करनी चाहिये। मीटिंग में जिन्हें बुलाया जाता है, उन आने वालों का अपने ऊपर अहसान होता है और जिनके घर हम स्वयं जाते हैं वे हमारी सद्भावना से प्रभावित होते हैं। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को हमें समझ ही लेना चाहिये। इसलिये जिन्हें प्रेरणा देनी हो, उनके पास स्वयं जाने का क्रम बनाना ही होगा। मीटिंग में इकट्ठे करने से यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। धर्म फेरी का पुण्य हमें ही लेना चाहिये। जन-जागरण के लिए लोगों से संपर्क बनाने एवं उनके घरों पर जाने का क्रम हमें ही बनाना चाहिये।

जिनके घर जाया जाय उनसे कुशल क्षेम पूछने के साधारण शिष्टाचार के उपरान्त अभीष्ट उद्देश्य के लिये आवश्यक प्रेरणा देनी आरंभ कर देनी चाहिये। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति व युग निर्माण योजना के पिछले अंक पढ़ने को देना चाहिये। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें प्रेरणाप्रद लेख, समाचार एवं प्रसंग सुनाने चाहिये। अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये। पुरानी अखण्ड-ज्योति की प्रतियाँ युग निर्माण योजना के अंक सभी के पास होंगे, उनके ऊपर अच्छे मोटे कवर चढ़ा चिपका लेने चाहिये ताकि अनेक लोगों में पढ़े जाने पर वे खराब न हों। आदर्शवादी विचार आमतौर से रूखे और नीरस माने जाते हैं। उन्हें पढ़ना, सुनना बहुत कम लोग पसंद करते हैं। यह काम अपना है कि विषय की महानता एवं गरिमा को आकर्षक तथा प्रभावशाली ढंग से समझा कर लोगों में यह अभिरुचि उत्पन्न करें। व्यापक दृष्टिकोण को समझने और विचारने की आकांक्षा जब जागृत हो जाय तब समझना चाहिये कि यह व्यक्ति राष्ट्र के लिये कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकने की स्थिति में पहुँचा। इतनी सफलता मिल जाने पर आगे की प्रगति बहुत सरल हो जाती है। जिसके मनोभाव सोये पड़े हैं उसमें विचारशीलता की अभिरुचि जागृत कर देना हमारे लिये भारी गौरव, गर्व एवं संतोष की बात होगी।

गुरु पूर्णिमा पर्व पर (जो रविवार 5 जुलाई सन् 2020 को पड़ेगा) गुरु दक्षिणा में देने के लिए इस वर्ष हमें एक घंटा समय और एक रुपया प्रतिदिन दान करने का व्रत लेना चाहिए। एक रुपया प्रतिदिन देने से एक महीने में 30 होता है। वर्ष भर में 365 रुपये होते है। 220 की अखण्ड-ज्योति 110 की युग-निर्माण योजना आती है। यह खर्च भी हमें नव-निर्माण के लिए करना ही चाहिए। यह पैसे बाहर किसी को देने नहीं हैं। वरन् इन्हें अत्यन्त सस्ते लागत से भी कम मूल्य में मिलने वाले सत्साहित्य के रूप में परिणित कर लेना है। यह अमानत अपने ही पास जमा रहती है। भण्डार बढ़ता रहेगा और उसका लाभ अब से लेकर आगामी पचास सौ वर्ष तक अनेक लोग उठाते रहेंगे। विवेक सम्पन्न दान का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है। छोटे बच्चे भी आमतौर से स्कूल जाते समय एक आना जेब खर्च ले जाते हैं। समझना चाहिए कि युग-निर्माण अभियान भी हमारा एक बच्चा है। चाहे तो ऐसा भी मान सकते हैं कि आचार्य जी हमारे एक बच्चे हैं और उन्हें एक आना प्रतिदिन जेब खर्च के लिए दिया जाता है। मन को समझाने के हजार प्रकार हो सकते हैं। भावना यदि विद्यमान हो तो इतना खर्च कर सकना गरीब से गरीब के लिए भी भारी नहीं पड़ता। एक आने का अनाज तो हर घर में चूहे, कीड़े भी खा जाते हैं। इतना तो सभी को सहन करना पड़ता है। भावना जाग पड़े तो इतना छोटा खर्च भी क्या किसी को भारी पड़ेगा।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को इस गुरु पूर्णिमा से यह व्रत लेना चाहिये। एक घण्टा समय, एक आना नकद, यह त्याग कुछ इतना बड़ा नहीं है, जिसे लक्ष्य की महानता को देखते हुए, कर सकना हमारे लिए कठिन होना चाहिये। नियमितता में बड़ी शक्ति होती है। महीने में 30 घण्टे यदि जन संपर्क के लिए सुरक्षित रख लिये जायें और प्रतिदिन या साप्ताहिक अवकाश के दिन उन्हें ठीक तरह प्रचार कार्य में लगाया जाय तो इसका चमत्कारी परिणाम कितना महान होता है इसे कोई भी प्रत्यक्ष देख सकता है। दान अनेक प्रकार करने पड़ते हैं पर यह प्रेरक साहित्य संग्रह करने के लिए किया गया साहस विश्व मानव का भाग्य बदलने के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होता है इसे कुछ ही दिनों में मूर्तिमान देखा जा सकेगा।

आगे हमें बहुत कुछ करना है। अनैतिकता, मूढ़ता, अन्ध परम्परा, अस्वस्थता, अशिक्षा, दरिद्रता, अकर्मण्यता आदि अगणित विकृतियों से डटकर लोहा लेना है। हमारा देश किसी समय सर्वश्रेष्ठ मानवों का निवास स्थान, समस्त संसार का मार्ग दर्शक, देवलोक के लिये भी स्पर्धा का विषय माना जाता था। पर इन्हीं कुरीतियों, हानिकारक अन्ध परम्पराओं के कारण आज वह निकृष्ट, दीन−हीन स्थिति को प्राप्त हो गया है। यदि हमको इस दुरावस्था से बाहर निकल फिर दुनिया के प्रगतिशील देशों की श्रेणी में अपनी गणना करानी है तो हमको अवश्य ही इन हीन प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना चाहिये। उसके लिए अगले दिनों व्यापक योजनाएं बनाई जानी हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणित किया जाना है। पर इसके लिए आवश्यक जन-शक्ति तो अपने पास होनी चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति हमारी यह प्रथम प्रक्रिया ही पूर्ण करेगी। एक घण्टा समय, एक आना नकद की माँग को पूरा करने के लिए यदि हम साहस कर सकें तो इस अवसर पर बढ़ा हुआ शौर्य आगे की कठिन मंजिलों को भी पार कर सकने में समर्थ होगा। पर यदि इतना भी न बन पड़ा तो हमारी वाक्शूरता ऊसर में डाले गये बीज की तरह ही नपुंसक सिद्ध होगी।

अब समय कम ही रह गया है। इसलिए आज से ही विचारना आरम्भ कीजिए कि इस पुण्य पर्व के उपलक्ष में उपरोक्त प्रथम आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘एक घण्टा एक आना’ की माँग पूरी करेंगे क्या? यदि कर सके तो उसकी सूचना गुरुपूर्णिमा को श्रद्धाञ्जलि के रूप में समय से पूर्व ही भेज दें ताकि उस दिन उन्हें छाती से लगाकर अपार आनन्द प्राप्त किया जा सके।
आगामी गुरु पूर्णिमा हमारी परीक्षा लेने आ रही है। क्या करना है, क्या करेंगे, इसका निर्णय करने के लिये अभी से सोच विचार आरम्भ कर देना चाहिये।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 50, 51

शनिवार, 4 जुलाई 2020

👉 गुरु पूर्णिमा-’युग निर्माण योजना’ का अवतरण पर्व (भाग ३)

राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, परिवार, शरीर, धन आदि का मोह छोड़कर भारत माता को पराधीनता पाश से मुक्त करने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया, उनकी आत्माएं भारतीय राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आशा लेकर इस संसार से विदा हुई हैं। उन्हें विश्वास था कि अगली पीढ़ी हमारे छोड़े हुए काम को पूरा करेगी। नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति की अभी तीन मंजिलें पार करनी हैं। राजनैतिक क्रान्ति की अभी एक ही मंजिल तो पार हुई है। तीन चौथाई काम करना बाकी पड़ा है। यदि वैयक्तिक स्वार्थपरता तक सीमित रह कर हम उन सार्वजनिक उत्तरदायित्वों को उठाने से इनकार करेंगे, बहाने बनायेंगे तो निश्चय ही यह उन स्वर्गीय शहीदों के प्रति विश्वासघात होगा। इतिहास हमारे इस ओछेपन को सहन न करेंगे। भावी पीढ़ियाँ इस अकर्मण्यता को घृणा भरी दृष्टि से देखती रहेंगी।

मानव जीवन का गौरव समझने वाला कोई भावनाशील व्यक्ति अपने को इस घृणित परिस्थिति में रखना पसंद न करेगा—अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई सदस्य तो निश्चित रूप में नहीं । हम लोग जिस भी परिस्थिति में है देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान में भाग लेते हुए बहुत कुछ करते रहे हैं, आगे बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के अनुरूप और भी अधिक करेंगे। त्रिविध क्रान्तियों को सम्पन्न करने की तीन अग्नि परीक्षाओं में होकर जब गुजरना ही ठहरा तो झंझट किस बात का, जो करना हो उसे करेंगे ही।

आगामी गुरुपूर्णिमा हमसे कुछ अधिक खरी और अधिक स्पष्ट बात करने आ रही है। अब तक लड़खड़ाते हुए चलने की बात निभती रही, पर अब तो सीना तान कर ही चलना पड़ेगा। अब ‘यदा कदा’ के स्थान पर निश्चितता और नियमित की नीति बदलनी पड़ेगी। जिस प्रकार शरीर को नित्य ही नहाते, खिलाते, सुलाते हैं, जिस प्रकार परिवार की दैनिक जिम्मेदारियों को नियमित रूप से वहन करते हैं उसी प्रकार हमें नव निर्माण के उत्तरदायित्व भी एक प्रकार से दैनिक नित्य कर्मों में सम्मिलित करने पड़ेंगे और जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बनाना पड़ेगा। अपने दृष्टिकोण में जब तक यह परिवर्तन न हो तब तक युग-परिवर्तन अभिमान के एक उत्तरदायी सदस्य के ऊपर आने वाली जिम्मेदारियों को हम समुचित रूप से पूरा कर ही न सकेंगे।

गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य सदा से मनाता आया है। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गुरु पूजन, सत्संकल्प पाठ, दीप दान आदि औपचारिक कर्म काण्ड प्रायः सभी शाखाओं में आयोजित किये जाते हैं। जहाँ शाखाएं नहीं हैं वहाँ वह कार्यक्रम वैयक्तिक रूप से किया जाता है। इस पर्व पर श्रद्धाञ्जलि के रूप में गुरुदक्षिणा देने की भी प्रथा है। मातृऋण, पितृ ऋण की तरह गुरु ऋण भी रहता है और उसे अपने धर्म एवं अपनी संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले किसी न किसी रूप में चुकाकर अपने को आँशिक रूप से उऋण बनाने का प्रयत्न किया करते हैं। स्वर्गीय पितरों के वार्षिक श्राद्ध की तरह गुरुदक्षिणा भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देनी ही पड़ती है। नहीं तो एक धार्मिक ऋण हमारे ऊपर चढ़ा ही रह जाता है।

गत वर्षों में अपनी-अपनी श्रद्धा और स्थिति के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के सदस्य जिस प्रकार भी इस पुनीत पर्व पर जो भी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते रहे हों, वह बात अलग है। पर इस वर्ष तो हम सभी को एक ही प्रकार अपनाना है। वह है नव-निर्माण के लिए ‘यदा कदा’ कुछ कर देने की ढील-पोल छोड़कर निश्चित और नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना। शरीर में कई अंग होते हैं उन सबको रक्त देना पड़ता है, परिवार में कई सदस्य होते हैं उन सब का भरण पोषण करना होता है, दैनिक क्रम में अनेकों समस्याएं रहती हैं, उन सब को सुलझाना पड़ता है। इन्हीं दैनिक आवश्यकताओं में एक नव निर्माण के राष्ट्रीय कर्तव्यों की आवश्यकता को भी जोड़ लेना चाहिये। उसे दैनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता का स्थान देना चाहिये। यदि इतना किया जा सका तो यह ठोस गुरु पूर्णिमा होगी। यह व्रत लिया जा सका तो गुरु ऋण, राष्ट्रीय ऋण, समाज ऋण, धर्म ऋण सभी से उऋण होने का अवसर मिलेगा।

हमारी माँग यह है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य “एक घंटा समय तथा एक आना नित्य” (आज के समय में १ रुपया) नव निर्माण योजना के धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दान किया करें। दान, भारतीय धर्म का अंग है। दान से विमुख कृपण की सद्गति नहीं होती। कुपात्रों को विडम्बनाओं को दान तो हम बहुत दिन से देते आ रहे हैं पर अब आदर्श एवं कर्त्तव्य के लिये अपनी परमार्थ बुद्धि को प्रयुक्त करना पड़ेगा। देखा-देखी के निरर्थक आडम्बरों में हम न जाने कितना धन और समय लगाते रहते हैं, पर तात्विक सत् प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना विवेकवानों के लिये ही संभव होता है। नामवरी और स्वर्ग-सिद्धि के लिये तो लोभी दुनिया न जाने क्या-क्या लुटाती रहती है पर जिससे मानवता का मुख उज्ज्वल हो सके ऐसे तात्विक परमार्थ को अपना सकना केवल विवेकशील, जागृत आस्थाओं का ही काम है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है इसलिये इन से इस प्रकार की याचना एवं आशा करना भी हमारे लिये उचित ही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 48, 49

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

👉 हमारी वास्तविकता को परखने फिर आ पहुँचा (भाग २)

जो जितना प्रबुद्ध है उसकी उतनी ही अधिक जिम्मेदारी है। ईश्वर, आत्मा और समाज के सामने उनके उत्तरदायित्व बहुत कुछ बढ़े-चढ़े होते हैं। मूढ़ता और पशुता की स्थिति में पड़े हुए मनुष्यों की न कोई भर्त्सना है और न महिमा। वे जीते भर हैं। खाने और कमाने भर तक उनकी गतिविधियाँ सीमित रहती हैं। ऐसे लोग कुछ बड़ी बात सोच नहीं पाते, इसलिए कुछ बड़ा काम कर सकना भी उनके लिए संभव नहीं होता। संसार उनकी इस विवशता को जानता है इसलिए उन्हें कुछ श्रेय, दोष भी नहीं देता। पर जिन्हें भगवान ने विचारणा दी है, उनकी स्थिति भिन्न है। प्रबुद्ध लोग यदि अपने समय की समस्याओं की उपेक्षा करने लगें तो उनका अपराध अक्षम्य माना जायगा। फौजी अधिकारियों की छोटी-सी भूल राष्ट्रीय स्वाधीनता को खतरे में डाल सकती है। इसलिए उनसे अधिक सतर्कता एवं जिम्मेदारी की आशा की जाती है। यदि वह थोड़ा भी प्रमाद करता है तो उसे सहन नहीं किया जा सकता। सरकारी अन्य विभागों के कर्मचारी ढील-पोल बरतने पर चेतावनी या नगण्य-सा अर्थ दंड पाकर छुटकारा पा जाते हैं पर फौजी अफसर का तो ‘कोर्ट मार्शल’ ही होता है। उसे अपनी छोटी-सी लापरवाही के लिए मृत्यु दंड भुगतना पड़ता है।

सौभाग्य या दुर्भाग्य से ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों को ऐसी ही उत्तरदायित्वपूर्ण परिस्थिति प्राप्त हुई हैं। भगवान ने उन्हें प्रबुद्धता की चेतना दी है। साथ ही कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है। उनके लिए लापरवाही बरतने का अवसर नहीं। बेशक सामाजिक नागरिकों की तरह हम लोगों को भी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। यह अर्थ उपार्जन आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। पर इसका यह अर्थ किसी प्रकार भी नहीं होता कि नव-निर्माण के कार्यों में भाग लेने के लिए उसे तनिक भी अवकाश नहीं मिलता। इस बहानेबाजी को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। संसार के प्रायः सभी महापुरुष गृहस्थ थे और उन्हें पारिवारिक व्यवस्था जुटाने का भी ध्यान रखना पड़ता था। पर उनमें से किसी ने यह बहाना नहीं बनाया कि राष्ट्रीय कर्तव्यों की पूर्ति के लिए हमारे पास तनिक भी अवकाश नहीं। इस प्रकार की झूठी धोखेबाजी से केवल अपनी अन्तरात्मा को झुठलाया जा सकता है और किसी को नहीं। जिसकी आत्मा में थोड़ी भी समाज निष्ठा एवं कर्तव्य-निष्ठा होगी वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में रहते हुए भी विश्व मानव की किसी न किसी प्रकार सेवा कर ही सकेगा। जहाँ इच्छा हो वहाँ रास्ता निकलता ही है। जिस ओर सच्ची आन्तरिक श्रद्धा होगी उस ओर चलने का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध बन जाना निश्चित है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उस कसौटी पर खोटे नहीं खरे उतरते रहे हैं। हम सभी गृहस्थ हैं और व्यस्तता के बीच भी अवकाश निकालकर इतना कुछ करते रहे हैं कि सारा राष्ट्र आश्चर्यचकित है। यदि फुरसत वाले साधु सन्त हम लोग होते तो शायद इतना भी न कर पाते जितना अब करते हैं। तब संभवतः संसार को माया मिथ्या बताकर आलस्य और अवसाद में पड़े रहने को ही मन करता। प्रश्न परिस्थितियों का नहीं भावना का है। युग के उत्तरदायित्वों के समझने की-अनुभव करने की— चेतना जिनके अन्तःकरण में जागृत हो चुकी है, उन्हें न समय का अभाव रहता है, न कठिनाइयों का रोना, रोना पड़ता है। आकाँक्षा अपना रास्ता बनाती है। यह तथ्य कितना सत्य है, इसका अनुभव हम सब इन दिनों भली प्रकार करते रहते हैं। वर्तमान काल की आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक जीवन की उलझनों से जूझते हुए भी नव-निर्माण के लिए कितना अधिक कर लेते हैं। इस प्रयोग ने उन लोगों का मुँह बन्द ही कर दिया है जो सामयिक उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठावान न होने के कारण उत्पन्न हुई अकर्मण्यता को फुरसत न मिलने, अमुक कठिनाई रहने जैसे बहानों की चादर उठाने की उपहासास्पद चेष्टा करते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1965 पृष्ठ 47

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/June/v1.47

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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