मंगलवार, 14 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग १)

जिस स्थान पर मनुष्य रहता तथा जिस शरीर से काम लेता है, उसकी नित्य सफाई करनी होती है। आहार-विहार से स्वास्थ्य संवर्धन का लाभ तभी मिल पाता है। गन्दगी बढ़ने से रोगों के कीटाणु उत्पन्न होते तथा अनेकों रोगों को जन्म देते हैं। अतएव स्वच्छता, स्वास्थ्य सन्तुलन के लिए अनिवार्य है। मन की स्वच्छता, पवित्रता शरीर से भी अधिक आवश्यक है। शरीर की भाँति मन पर भी नित्य विकारों की पर्त चढ़ती है। उनका शोधन भी जरूरी है। काम-क्रोध-लोभ-अहंकार जैसे अनेकों विकारों के कारण ही मन चिन्तित, विक्षुब्ध बना रहता है।
  
स्वच्छ मन में ही श्रेष्ठ विचारों का निवास होता है। वैयक्तिक अथवा सामूहिक उन्नति अथवा अवनति विचारों की उत्कृष्टता पर निर्भर करती है। स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ, पाप, व्यभिचार, अपहरण, क्रोध, अहंकार, आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मन में बढें़ तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। उसकी सारी क्रियाएँ और चेष्टाएँ ऐसी हो जाती हैं जिनसे उसे मनुष्य शरीर में रहते हुए भी प्रत्यक्ष असुर के रूप में देखा जा सकता है। आलस, प्रमाद, निराशा, अनुत्साह, अनियमितता, दीर्घसूत्रता, विलासिता जैसे दुर्गुण मन में जम जायें तो वह एक प्रकार से पशु ही बन जाता है। सींग, पूँछ भले ही उसके न हों पर जीवन के अपव्यय की दृष्टि से वह सब प्रकार पशु से भी अधिक घाटे में रहता है।
  
मन की मलीनता प्रगति के द्वार बन्द कर देती है। उससे न जम कर श्रम होता है और न पुरूषार्थ, साहस की पूँजी ही उसके पास शेष रहती है। दूषित दृष्टिकोण के कारण भीतर ही भीतर निरन्तर जलता -भुनता रहता है और अशान्ति, उद्विग्रता में घिरा रहता है। झुंझलाहट, अशिष्टता, कटुता ही उसके चेहरे और व्यवहार से टपकती है। दूसरे हर किसी को खराब बताना, सब में दोष ढूँढ़ना और उन्हें अपना शत्रु मानना ऐसा मानसिक दुर्गुण है जिसके कारण अपने भी विराने हो जाते हैं, जो लोग प्यार करते थे और सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रतिपक्षी बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने आपको मरघट के ठूँठ करील की तरह सर्वथा एकाकी और सताया हुआ ही अनुभव करते रहते है। बेचारों की स्थिति दयनीय रहती हैं।                 
  
आलसी और अव्यवस्थित, छिन्द्रान्वेषी और उद्विग्र मनुष्य के लिये यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा है और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग-तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते है, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नही। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रति-क्रिया में चिर-अशान्ति उसके पल्ले बँध जाती है । मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव जीवन में श्रेष्ठता है उस सबको चुपके-चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक को समझ भी नहीं पाता। वह बाहर ही कारणों को ढूँढ़ता रहता है, कभी इस पर कभी उस पर दोष मढ़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे, उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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