गुरुवार, 16 जुलाई 2020

👉 अध्यात्म की आधारशिला-मन की स्वच्छता (भाग ३)

लाभ की तरह हानि का, संयोग की तरह वियोग का, दिन की तरह रात का आना बिलकुल स्वाभाविक है। कपड़े के ताने-बाने की तरह यह जीवन भी सुख और दुःख, उतार और चढ़ाव के ताने-बाने से बुना हुआ है। बुरा इसलिए है कि उसमें सुधारने का प्रयत्न करते हुए हम अपने को अधिक पुरुषार्थी अधिक पुण्यवान बनायें। शुभ इसलिए है कि उसे देखकर हम प्रमुदित हों और उस उपलब्धि का वितरण दूसरों को भी करें। दोनों ही प्रकार की—भली और बुरी परिस्थितियों से  हँसते-खेलते भी निपटा जा सकता है तो फिर रोते कलपते उनसे क्यों निपटें? ताश खेलने में बाजी हार जाने पर, खेल खेलते हुए परास्त हो जाने पर, नाटक करते हुए आपत्तिग्रस्त हो जाने पर कौन रोता कलपता है। उस हानि को हलकेपन से, उपेक्षाभाव से देखने पर जरा सी देर मन हलका-सा रहता है और फिर हम अपना आगे का काम स्वस्थ चित्त से करने लगते हंै। यदि हमारा मन विवेकी हो तो शोक, वियोग, हानि, कष्ट, परेशानी, दुर्व्यवहार आदि के अप्रिय प्रसंगों को हंसकर सहन कर सकते हैं और फिर सन्तुलित मन को उन समस्याओं का हल खोजने में लगाकर आगे कठिनाई से पार होने का मार्ग भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। मन की स्वच्छता से विवेक जागृत होता है, सोचने का सही तरीका अभ्यास में आता है और तब प्रायः सभी उलझी हुई समस्यायें शान्ति पूर्वक सुलझ जाती हैं।
   
इन थोड़ी सी पंक्तियों में यह विस्तार पूर्वक नही बताया जा सकता कि मन की मलीनता को हटा देने पर हम संताप से कितने बचे रह सकते हैं और मन को स्वच्छ रखकर उत्थान और आनन्द का कितना अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। यह लिखने-पढ़ने और कहने-सुनने की नहीं, करने और अनुभव में लाने की बात है। लौकिक जीवन को आनन्द और उत्थान की दिशा में गतिवान् करने का प्रमुख उपाय यह है कि हम अपने मन स्वच्छ कर उसकी मलीनताओं को हटावें। मनन करने वाले को ही मनुष्य कहते हैं। अपनी भीतरी मलीनताओं को खोजने और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। प्रत्येक महापुरुष को अनिवार्य रूप से यह पुरूषार्थ करना पड़ता है। क्या यह कोई ऐसा कठिन काम है जो हम नहीं कर सकते?  दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर अपना मन अपनी बात न माने यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं, अपने आपको समझा ही  सकते हैं, अपने को तो सन्मार्ग पर चला ही सकते हंै। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचा उठना चाहते हंै और उसका साधन हमारे हाथ में है तो फिर उसके लिए पुरूषार्थ क्यों न करें? आत्म-सुधार के लिए आत्म-निर्माण के लिए आत्म-विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य   

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