मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

👉 कौन थी शबरी

शबरी की कहानी रामायण के अरण्य काण्ड मैं आती है। वह भीलराज की अकेली पुत्री थी। जाति प्रथा के आधार पर वह एक निम्न जाति मैं पैदा हुई थी। विवाह मैं उनके होने वाले पति ने अनेक जानवरों को मारने के लिए मंगवाया। इससे दुखी होकर उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया। फिर वह अपने पिता का घर त्यागकर जंगल मैं चली गई और वहाँ ऋषि मतंग के आश्रम मैं शरण ली। ऋषि मतंग ने उन्हें अपनी शिष्या स्वीकार कर लिया। इसका भारी विरोध हुआ। दूसरे ऋषि इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि किसी निम्न जाति की स्त्री को कोई ऋषि अपनी शिष्या बनाये। ऋषि मतंग ने इस विरोध की परवाह नहीं की।

ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें। उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे।

ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन मैं लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं। लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती। उनकी आंखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं। और एक दिन प्रभु राम उनके दरवाजे पर आ गए।

शबरी धन्य हो गयीं। उनका ध्यान और विश्वास उनके इष्टदेव को उनके द्वार तक खींच लाया। भगवान् भक्त के वश मैं हैं यह उन्होंने साबित कर दिखाया। उन्होंने प्रभु राम को अपने झूठे फल खिलाये और दयामय प्रभु ने उन्हें स्वाद लेकर खाया। फ़िर वह प्रभु के आदेशानुसार प्रभुधाम को चली गयीं।

शबरी की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? आइये इस पर विचार करें।
कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता। व्यक्ति के कर्म उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं। हम किस परिवार मैं जन्म लेंगे इस पर हमारा कोई अधिकार नहीं हैं पर हम क्या कर्म करें इस पर हमारा पूरा अधिकार है। जिस काम पर हमारा कोई अधिकार ही नहीं हैं वह हमारी जाति का कारण कैसे हो सकता है। व्यक्ति की जाति उसके कर्म से ही तय होती है, ऐसा भगवान् ख़ुद कहते हैं।

कहे रघुपति सुन भामिनी बाता,
मानहु एक भगति कर नाता।

प्रभु राम ने शबरी को भामिनी कह कर संबोधित किया। भामिनी शब्द एक अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है। प्रभु राम ने कहा की हे भामिनी सुनो मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ। तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तम्हारे द्वार पर लेकर आया है।

👉 परिवर्तन जो होकर रहेगा

सर्वनाश से पूर्व ही मनुष्य संभल जाता है। इतिहास के पृष्ठों पर इसके अगणित प्रमाण विद्यमान है। इस बार भी ऐसा ही होना है। अणुयुद्ध, प्रदूषण, प्रजनन, विस्फोट, पूँजी का एकत्रीकरण, अपराधों का अभिवर्धन, प्रमाद और विलास का विस्तार जैसी अनेकों समस्याऐं औद्योगिक क्रान्ति की देन है। इसे इस रूप में नहीं चलना है जैसे अब तक चलती रही है। कटु अनुभव को बार-बार दुहराते नहीं रहा जा सकता।

अगले दिनों महान परिवर्तन की प्रक्रिया प्रचण्ड होगी। उसे दैवी निर्धारण, साँस्कृतिक पुनरुत्थान, विचार क्रान्ति आदि भी कहा जा सकता है, पर वह होगी वस्तुतः समाजक्रान्ति ही। समाज, जन समुदाय को एक सूत्र में बाँधे रहने वाली व्यवस्था को कहते हैं। यह व्यवस्था बदलेगी तो प्रचलन और स्वभावों में समान रूप से एक साथ परिवर्तन प्रस्तुत होंगे।

व्यक्ति सादगी सीखेगा। सरल बनेगा और सन्तोषी रहेगा। श्रमशीलता गौरवास्पद बनेगी। हिल−मिलकर रहने की सहकारिता और मिल बाँटकर खाने की उदारता बदले हुए स्वभाव की विशेषता होगी। महत्त्वाकाँक्षाएँ उद्विग्न न करेंगी। उद्धत प्रदर्शन का अहंकार तब बड़प्पन का नहीं पिछड़ेपन का चिन्ह समझा जायेगा। विलासी और संग्रही भी अपराधियों की पंक्ति में खड़े किये जायेंगे और उन्हें सराहा नहीं दबाया जाएगा।  कुटिलता अपनाने की गुंजाइश जागृत एवं परिवर्तित समाज में रहेगी ही नहीं। छद्म आवरणों को उघाड़ने में ऐसा ही उत्साह उभरेगा जैसा कि इन दिनों विनोद मंचों के निमित्त पाया जाता है।

इन दिनों अधिक कमाने, अधिक उड़ाने और ठाट-बाट दिखाने की जिस दुष्प्रवृत्ति का बोलबाला है उसे भविष्य में अमान्य ही नहीं, हेय भी ठहरा दिया जायेगा। थोड़े में निर्वाह होने से कम समय में उपार्जन के साधन जुट जायेंगे। बचा हुआ समय तब आलस्य-प्रमाद में नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा करेगा। सार्वजनिक सुव्यवस्था और मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले तब ऐसे अनेकानेक कार्य सामने होंगे जिनमें व्यस्त रहते हुए व्यक्ति हर घड़ी प्रसन्नता, प्रगति और सुसम्पन्नता का अनुभव करता रहें।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1984 पृष्ठ 59

👉 Watch Your Attitude

To most of us the hardships, adversities and challenges of life seem to be intractable like gigantic mountains, dreadful like wild giants, and frightening like impenetrable darkness. But this is all subject to how we take them. In reality nothing is so hard or to tackle; it is mostly our delusion that regards it so and suffers the pains and fears.

Just change your attitude and you will find hope, courage and enthusiasm in all circumstances. Don’t lose your morale that you failed in your repeated attempts. Don’t worry. There are many other avenues. Look at them. There is no dead-end to trying harder again with better preparation. Move ahead. You just have to try your level best in transacting your duties. Every sincere effort is a step towards the goal; if not today, tomorrow you will succeed. This is the law of Nature.

There is always certain consequence, some result of every action. Don’t feel helpless. Don’t count upon other’s support. No one really would have the capacity to help you if you can’t help yourself. Never blame anyone for anything wrong or harmful happening to you. Because no one can rule over you and make you suffer. You alone are the friend and the enemy of yourself. The circumstances around you are in fact your own creation. They are neither supportive nor obstructive in reality; this all depends upon your own attitude, how you accept and make use of them.

Refine your attitude, your thinking and your aspirations and let virtuous instincts awaken in yourself. It is the accumulation of the inscriptions of positive thinking and good actions over several lives that awaken devotion in the human self.

📖 Akhand Jyoti, March 1941

👉 ज्ञान

ज्ञान प्रकाश है, जबकि अज्ञान अँधियारा है। जीवन का पथ इस अज्ञान के अँधियारे से पूरी तरह आपूरित है। इस पर सफलतापूर्वक चलने के लिए ज्ञान के प्रकाश की जरूरत है। लेकिन याद रहे कि इस अँधियारे में औरों का प्रकाश काम नहीं आता, प्रकाश अपना ही हो तो भरोसेमन्द साथी है। जो किसी भी कारण दूसरों के प्रकाश पर भरोसा कर लेते हैं, वे हमेशा धोखा खाते हैं।
  
सूफियों में बाबा फरीद के कथा प्रसंग में एक कथा आती है, उन्होंने अपने शिष्य से कहा- ज्ञान को उपलब्ध करो। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है। यह सुनने पर वह शिष्य नम्र भाव से बोला; बाबा, रोगी तो हमेशा वैद्य के पास ही जाता है, स्वयं चिकित्साशास्त्र का ज्ञान अर्जित करने के फेर में नहीं पड़ता। आप मेरे मार्गदर्शक हैं, गुरु हैं। यह मैं जानता हूँ कि आप मेरा उद्धार करेंगे। तब फिर स्वयं के ज्ञान की क्या आवश्यकता है।
  
यह सुनकर बाबा फरीद ने बड़ी गम्भीरतापूर्वक एक कथा सुनायी। वह बोले, एक गाँव में एक वृद्ध रहता था। वह अंधा हो गया, तो उसके बेटों ने उसकी आँखों की चिकित्सा करवानी चाही। लेकिन वृद्ध ने अस्वीकार कर दिया। वह बोला; भला मुझे आँखों की क्या जरूरत है। तुम आठ मेरे पुत्र हो, आठ पुत्र वधुएँ हैं, तुम्हारी माँ है। ऐसे चौंतीस आँखें तो मुझे मिली हैं। मेरी दो नहीं हुई तो क्या हुआ? पिता ने पुत्रों की बात न मानी। स्थिति जस की तस बनी रही। कुछ दिनों के बाद अचानक एक रात घर में आग लग गयी। सभी अपनी जान बचाने के लिए भागे, वृद्ध की याद किसी को न रही। वह उस आग में भस्म हो गया।
  
यह कथा सुनाने के बाद शेख फरीद ने अपने शिष्य से कहा, बेटा! अज्ञान का आग्रह मत करो। ज्ञान स्वयं की आँखें हैं। इसका कोई विकल्प नहीं है। सत्य न तो शास्त्रों से मिलता है, न शास्ताओं से। इसे तो स्वयं से ही पाना होता है। स्वयं का ज्ञान ही असहाय मनुष्य का एक मात्र सहारा है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१२

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

👉 हमारी सुनिश्चित भविष्यवाणी

भगवान् की इच्छा युग परिवर्तन की व्यवस्था बना रही है। इसमें सहायक बनना ही वर्तमान युग में जीवित प्रबुद्ध आत्माओं के लिये सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। अगले दिनों में पूँजी नामक वस्तु किसी व्यक्ति के पास नहीं रहने वाली है। धन एवं सम्पत्ति का स्वामित्व सरकार एवं समाज का होना सुनिश्चित है। हर व्यक्ति अपनी रोटी मेहनत करके कमायेगा और खायेगा। कोई चाहे तो इसे एक सुनिश्चित भविष्यवाणी की तरह नोट कर सकता है। अगले दिनों इस तथ्य को अक्षरशः सत्य सिद्ध करेंगे। इसलिये वर्तमान युग के विचारशील लोगों से हमारा आग्रह पूर्वक निवेदन है कि वे पूँजी बढ़ाने, बेटे पोतों के लिये जायदादें इकट्ठी करने के गोरख-धंधे में न उलझें। राजा और जमींदारों को मिटते हमने अपनी आँखों देख लिया अब इन्हीं आँखों को व्यक्तिगत पूँजी को सार्वजनिक घोषित किया जाना देखने के लिए तैयार रहना चाहिए।

भले ही लोग सफल नहीं हो पा रहे हैं पर सोच और कर यही रहे हैं कि वे किसी प्रकार अपनी वर्तमान सम्पत्ति को जितना अधिक बढ़ा सकें, दिखा सकें उसकी उधेड़ बुन में जुटे रहें। यह मार्ग निरर्थक है। आज की सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि किसी प्रकार गुजारे की बात सोची जाए। परिवार के भरण-पोषण भर के साधन जुटाये जायें और जो जमा पूँजी पास है उसे लोकोपयोगी कार्य में लगा दिया जाए। जिनके पास नहीं है वे इस तरह की निरर्थक मूर्खता में अपनी शक्ति नष्ट न करें। जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक साधन मौजूद हैं, जो उसी पूँजी के बल पर अपने वर्तमान परिवार को जीवित रख सकते हैं वे वैसी व्यवस्था बना कर निश्चित हो जायें और अपना मस्तिष्क तथा समय उस कार्य में लगायें, जिसमें संलग्न होना परमात्मा को सबसे अधिक प्रिय लग सकता है।

जो जितना समय बचा सकता है वह उसका अधिकाधिक भाग नव-निर्माण जैसे इस समय के सर्वोपरि पुण्य परमार्थ में लगाने के लिये तैयार हो जाए। समय ही मनुष्य की व्यक्तिगत पूँजी है, श्रम ही उसका सच्चा धर्म है। इसी धन को परमार्थ में लगाने से मनुष्य के अन्तःकरण में उत्कृष्टता के संस्कार परिपक्व होते हैं। धन वस्तुतः समाज एवं राष्ट्र की सम्पत्ति है। उसे व्यक्तिगत समझना एक पाप एवं अपराध है। जमा पूँजी में से जितना अधिक दान किया जाए वह तो प्रायश्चित मात्र है। सौ रुपये की चोरी करके कोई पाँच रुपये दान कर दें तो वह तो एक हल्का सा प्रायश्चित ही हुआ। मनुष्य को अपरिग्रही होना चाहिए। इधर कमाता और उधर अच्छे कर्मों में खर्च करता रहे यही भलमनसाहत का तरीका है। जिसने जमा कर लिया उसने बच्चों को दुर्गुणी बनाने का पथ प्रशस्त किया और अपने को लोभ-मोह के माया बंधनों में बाँधा। इस भूल का जो जितना प्रायश्चित कर ले, जमा पूँजी को सत्कार्य में लगा दे उतना उत्तम है। प्रायश्चित से पाप का कुछ तो भार हल्का होता ही है। पुण्य परमार्थ तो निजी पूँजी से होता है। वह निजी पूँजी है- समय और श्रम। जिसका व्यक्तिगत श्रम और समय परमार्थ कार्यों में लगा समझना चाहिए कि उसने उतना ही अपना अन्तरात्मा निर्मल एवं सशक्त बनाने का लाभ ले लिया।

युग-निर्माण योजना की क्रिया पद्धति इसी धुरी पर घूमती है। हमने अपने प्रत्येक परिजन को गंभीर चेतावनी और प्रबल प्रेरणा के साथ इस दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है कि यह युग बदलने का अनुपम अवसर है। हममें से हर प्रबुद्ध आत्मा का कुछ विशेष कर्त्तव्य एवं कुछ विशेष उत्तर दायित्व है। भगवान का प्रयोजन पूरा करने में सहयोगी होना वर्तमान युग के जीवित अध्यात्मवादियों के लिये विवेक की सबसे बड़ी चुनौती है। इसे समझा और स्वीकारा जाए।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1967 पृष्ठ 36

👉 Transacting the Duties

That which is unambiguously permitted by your conscience is righteous, worth doing. That which is prevented or is doubted by your inner self should not be done. This is how duties and the ‘faux pas’ could be defined in simplest terms for those whose hearts are pure and minds are enlightened enough to grasp the impulse of the inner self.

One who is sincere in transacting his duties is worthy of God’s grace. He will never be helpless or sorry in any circumstance. He is a beloved disciple of God who bears the responsibilities selflessly as per thy will. Such morally refined, virtuous persons might be found lacking in wealth or in worldly (materialistic) possessions, but this would be only in the gross terms. In reality, such devoteespossess immense spiritual power. How could they have any worry or scarcity? Austerity of life is their choice… Indeed the greatest treasure of the world lies with such saintly people only. This limitless treasure never empties; rather, it expands more and more with spending…

A vicious man always has a threat of being counter-attacked by the enemies; his own evils and negativity ruin all the peace and joy from his life. But the whole world is benevolent for a moral, duty-bond altruistic fellow. No one is his enemy; neither he has any attachment with anybody. Everything, everyone, is alike for him. His heart is full of love for everyone.

A thought of morality and saintly virtues itself inspires a unique feeling of peace, hope and enlightenment in the inner self. God wants each one of us to experience it and follow it towards sublime evolution of our lives…

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1941

👉 भविष्यवाणियाँ जो पूरी होकर रहेगी

धर्म अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होगा। उस के प्रसार प्रतिपादन का ठेका किसी वेश या वंश विशेष पर न रह जायेगा। सम्प्रदाय वादियों के डेरे उखड़ जायेंगे, उन्हें मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा छिनती दीखेगी तो कोई उपयोगी धंधा अपना कर भले मानसों की तरह आजीविका उपार्जित करेंगे। तब उत्कृष्ट चरित्र, परिष्कृत ज्ञान एवं लोक मंगल के लिए प्रस्तुत किया गया अनुदान ही किसी सम्मानित या श्रद्धास्पद बना सकेगा पाखण्ड पूजा के बल पर जीने वाले उलूक उस दिवा प्रकाश से भौंचक होकर देखेंगे और किसी कोंटर में बैठे दिन गुजारेंगे। अज्ञानान्धकार में जो पौ बारह रहती थी उन अतीत की स्मृतियों को वे ललचाई दृष्टि से सोचते चाहते तो रहेंगे पर फिर समय लौटकर कभी आ न सकेगा।

अगले दिनों ज्ञानतंत्र ही धर्म तंत्र होगा। चरित्र निर्माण और लोक मंगल की गति विधियाँ धार्मिक कर्म काण्डों का स्थान ग्रहण करेंगी। तब लोग प्रतिमा पूजक देव मन्दिर बनाने की तुलना में पुस्तकालय विद्यालय जैसे ज्ञान मंदिर बनाने को महत्व देंगे तीर्थ-यात्राओं और ब्रह्मभोजों में लगने वाला धन लोक शिक्षण की भाव भरी सत्प्रवृत्तियों के लिए अर्पित किया जायगा। कथा पुराणों की कहानियाँ तब उतनी आवश्यक न मानी जाएंगी जितनी जीवन समस्याओं को सुलझाने वाली प्रेरणाप्रद अभिव्यंजनाएं। धर्म अपने असली स्वरूप में निखर कर आयेगा और उसके ऊपर चढ़ी हुई सड़ी गली केंचुली उतर कर कूड़े करकट के ढेर में जा गिरेगी।

ज्ञान तन्त्र वाणी और लेखनी तक ही सीमित न रहेगा वरन् उसे प्रचारात्मक रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्यक्रमों के साथ बौद्धिक नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए प्रयुक्त किया जायगा। साहित्य, संगीत, कला के विभिन्न पक्ष विविध प्रकार से लोक शिक्षण का उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा करेंगे। जिनके पास प्रतिभा है जिनके पास सम्पदा है वे उससे स्वयं लाभान्वित होने के स्थान पर समस्त समाज को समुन्नत करने के लिए समर्पित करेंगे।
(1) एकता (2) समता (3) ममता और (4) शुचिता नव निर्माण के चार भावनात्मक आधार होंगे।

एक विश्व, एक राष्ट्र एक भाषा, एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति के आधार पर समस्त मानव प्राणी एकता के रूप में बँधेंगे। विश्व बन्धुत्व की भावना उभरेगी और वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श सामने रहेगा। तब देश, धर्म भाषा वर्ण आदि के नाम पर मनुष्य मनुष्य के बीच दीवारें खड़ी न की जा सकेंगी। अपने वर्ग के लिए नहीं समस्त विश्व के हित साधन की दृष्टि से ही समस्याओं पर विचार किया जायगा।

जाति या लिंग के कारण किसी को ऊँचा या किसी को नीचा न ठहरा सकेंगे छूत अछूत का प्रश्न न रहेगा। गोरी चमड़ी वाले काले लोगों से श्रेष्ठ होने का दावा न करेंगे और ब्राह्मण हरिजन से ऊँचा न कहलायेगा। गुण कर्म स्वभाव सेवा एवं बलिदान ही किसी के सम्मानित होने के आधार बनेंगे जाति या वंश नहीं। इसी प्रकार नारी से नर श्रेष्ठ है उसे अधिक अधिकार प्राप्त है ऐसी मान्यता हट जायगी। दोनों के कर्तव्य और अधिकार एक होंगे। प्रति बन्ध या मर्यादायें दोनों पर समान स्तर की लागू होंगी। प्राकृतिक सम्पदाओं पर सब का अधिकार होगा। पूँजी समाज की होगी। व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार उसमें से प्राप्त करेंगे और सामर्थ्यानुसार काम करेंगे। न कोई धनपति होगा न निर्धन। मृतक उत्तराधिकार में केवल परिवार के असमर्थ सदस्य ही गुजारा प्राप्त कर सकेंगे। हट्टे-कट्टे और कमाऊ बेटे बाप के उपार्जन के दावेदार न बन सकेंगे, वह बचत राष्ट्र की सम्पदा होगी इस प्रकार धनी और निर्धन के बीच का भेद समाप्त करने वाली समाज वादी व्यवस्था समस्त विश्व में लागू होगी। हराम खोरी करते रहने पर भी गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा किसी को न मिलेगी। व्यापार सहकारी समितियों के हाथ में होगा, ममता केवल कुटुम्ब तक सीमित न रहेगी वरन् वह मानव मात्र की परिधि लाँघते हुए प्राणिमात्र तक विकसित होगी। अपना और दूसरों का दुख सुख एक जैसा अनुभव होगा। तब न तो माँसाहार की छूट रहेगी और न पशु−पक्षियों के साथ निर्दयता बरतने की। ममता और आत्मीयता के बन्धनों में बँधे हुए सब लोग एक दूसरे को प्यार और सहयोग प्रदान करेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मई 1972 पृष्ठ 35

रविवार, 5 अप्रैल 2020

👉 सन्तोष का फल मधुर है

किसी कसाई के यहाँ एक बकरा और कुत्ता था, बकरे को वह अच्छे स्थान पर बाँध कर नित्य हरी-हरी घास खिलाता, उसके रहने का स्थान साफ किया करता था। कुत्ते को सूखे रूखे टुकड़े दे दिया करता था। धूप, वर्षा, शीत का कष्ट सहन करते हुए, सूखे टुकड़े पाकर अपने मालिक की सेवा करता हुआ कुत्ता अपने मन में विचार करने लगा, मैं इतना कष्ट सहन कर मालिक की सेवा करता हूँ और बकरा जो कुछ भी सेवा नहीं करता उसे सुस्वाद भोजन मिला करते है। इस प्रकार के विचारों से ईश्वर के अस्तित्व अथवा उसके न्याय पर शंका होने लगी।

बकरा दिन-दिन मोटा होने लगा, जिससे कुत्ते की ईर्ष्या भी बढ़ने लगी। जब बकरा खूब तैयार हो गया तो कुत्ते ने देखा कि कसाई ने अपनी छुरी उसकी गर्दन पर फेर दी और माँस विक्रय कर जितना उस बकरे के लिए व्यय किया था, उससे कई गुना लाभ कमाया।

कुत्ते ने यह देखकर नास्तिक भाव से घृणा कर यह विश्वास किया कि ईश्वर न्यायी हैं, हराम की कमाई किसी दिन इसी प्रकार जान पर संकट लाती है। रूखी सूखी खाकर सन्तोष से जीवन व्यतीत करने का फल मीठा होता है।

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 5 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2020


👉 हमारी चेतावनी को अनदेखा न करें

अगले दिन बहुत ही उलट-पुलट से भरे हैं। उनमें ऐसी घटनायें घटेंगी ऐसे परिवर्तन होंगे जो हमें विचित्र भयावह एवं कष्टकर भले ही लगें पर नये संसार की अभिनव रचना के लिए आवश्यक हैं। हमें इस भविष्यता का स्वागत करने के लिए-उसके अनुरूप ढलने के लिए-तैयार होना चाहिये। यह तैयारी जितनी अधिक रहे उतना ही भावी कठिन समय अपने लिये सरल सिद्ध होगा।

भावी नर संहार में आसुरी प्रवृत्ति के लोगों को अधिक पिसना पड़ेगा। क्योंकि महाकाल का कुठाराघात सीधा उन्हीं पर होना है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशायश्च दुष्कृताम्” की प्रतिज्ञानुसार भगवान को युग-परिवर्तन के अवसर पर दुष्कृतों का ही संहार करना पड़ता है। हमें दुष्ट दुष्कृतियों की मरणासन्न कौरवी सेना में नहीं, धर्म-राज की धर्म संस्थापना सेना में सम्मिलित रहना चाहिये। अपनी स्वार्थपरता, तृष्णा और वासना को तीव्र गति से घटाना चाहिए और उस रीति-नीति को अपनाना चाहिये जो विवेकशील परमार्थी एवं उदारचेता सज्जनों को अपनानी चाहिये।

संकीर्णताओं और रूढ़ियों की अन्य कोठरी से हमें बाहर निकलना चाहिए। अगले दिनों विश्व-संस्कृति, विश्व-धर्म, विश्व-भाषा, विश्व-राष्ट्र का जो भावी मानव समाज बनेगा उसमें अपनी-अपनी महिमा गाने वालों और अपनी ढपली अपना राग गाने वालों के लिये कोई स्थान न रहेगा। पृथकतावादी सभी दीवारें टूट जायेंगी और समस्त मानव समाज को न्याय एवं समता के आधार पर एक परिवार का सदस्य बन कर रहना होगा। जाति लिंग या सम्पन्नता के आधार पर किसी को वर्चस्व नहीं मिलेगा। इस समता के अनुरूप हमें अभी से ढलना आरम्भ कर देना चाहिये।

धन-संचय और अभिवर्धन की मूर्खता हमें छोड़ देना ही उचित है, बेटे पोतों के लिए लम्बे चौड़े उत्तराधिकार छोड़ने की उपहासास्पद प्रवृत्ति को तिलाँजलि देनी चाहिये क्योंकि अगले दिनों धन का स्वामित्व व्यक्ति के हाथ से निकल कर समाज, सरकार के हाथ चला जायगा। केवल शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार एवं सद्गुणों की सम्पत्ति ही उत्तराधिकार में दे सकने योग्य रह जायगी। इसलिए जिनके पास आर्थिक सुविधायें हैं वे उन्हें लोकोपयोगी कार्यों में समय रहते खर्च करदें ताकि उन्हें यश एवं आत्म-संतोष का लाभ मिल सके। अन्यथा वह संकीर्णता मधुमक्खी के छत्ते पर पड़ी डकैती की तरह उनके लिये बहुत ही कष्ट-कारक सिद्ध होगी।

📖 अखण्ड ज्योति जुलाई 1967 पृष्ठ 54

👉 The Water Bearer

A water bearer in India had two large pots, each hung on each end of a pole which he carried across his neck. One of the pots had a crack in it, and while the other pot was perfect and always delivered a full portion of water at the end of the long walk from the stream to the master’s house, the cracked pot arrived only half full.

For a full two years, this went on daily, with the bearer delivering only one and a half pots full of water in his master’s house. Of course, the perfect pot was proud of its accomplishments, perfect to the end for which it was made. But the poor cracked pot was ashamed of its own imperfection and miserable that it was able to accomplish only half of what it had been made to do.

After two years of what it perceived to be a bitter failure, it spoke to the water bearer one day by the stream. “I am ashamed of myself, and I want to apologize to you. “Why?” asked the bearer. “What are you ashamed of?” “I have been able, for these past two years, to deliver only half my load because this crack in my side causes water to leak out all the way back to your master’s house. Because of my flaws, you have to do all of this work, and you don’t get full value from your efforts,” the pot said.

The water bearer felt sorry for the old cracked pot, and in his compassion, he said, “As we return to the master’s house, I want you to notice the beautiful flowers along the path.” Indeed, as they went up the hill, the old cracked pot took notice of the sun warming the beautiful wild flowers on the side of the path, and this cheered it somewhat. But at the end of the trail, it still felt bad because it had leaked out half its load, and so again it apologized to the bearer for its failure.

The bearer said to the pot, “Did you notice that there were flowers only on your side of your path, but not on the other pot’s side? That’s because I have always known about your flaw, and I took advantage of it. I planted flower seeds on your side of the path, and every day while we walk back from the stream, you’ve watered them. For two years I have been able to pick these beautiful flowers to decorate my master’s table. Without you being just the way you are, he would not have this beauty to grace his house.”

Moral: Each of us has our own unique flaws. We’re all cracked pots. In this world, nothing goes to waste. You may think like the cracked pot that you are inefficient or useless in certain areas of your life, but somehow these flaws can turn out to be a blessing in disguise.

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (अंतिम भाग)

यदि लोगों के हृदय कपट, पाखंड, द्वेष, छल आदि दुर्भावों से भरे रहें तो उससे अदृश्य लोक एक प्रकार की आध्यात्मिक दुर्गन्ध से भर जाते हैं जैसे वायु के दूषित, दुर्गन्धित होने से हैजा आदि बीमारियाँ फैलती हैं वैसे ही पाप वृत्तियों के कारण सूक्ष्म लोकों का वातावरण गंदा हो जाने से युद्ध, महामारी, दारिद्र, अर्थ संकट, दैवी प्रकोप आदि उपद्रवों का आविर्भाव होता है। संसार की सुख शान्ति इस बात के ऊपर निर्भर है कि प्रेम, दया, सहानुभूति, उदारता और न्याय का व्यवहार अन्य लोगों के साथ किया जावे, जब इस प्रकार के विचार और व्यवहार की अधिकता होती है तो संसार में ईश्वरीय कृपा के सुन्दर आनन्ददायक परिणाम दिखाई पड़ते हैं सब लोग सुख शान्ति के साथ प्रफुल्लता मय जीवन बिताते हैं, किन्तु जब स्वार्थ लिप्सा में अन्धे होकर मनुष्य एक दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयत्न करते हैं तो उसके दुर्गन्धित धुँए से सबका दम घुटने लगता हैं विपत्ति, आपदा और कष्टों के पहाड़ चारों ओर से टूटने लगते हैं। दुख दारिद्र का नंगा नाच होने लगता है।

वर्तमान समय की चतुर्मुखी दुर्दशा का एक ही कारण “नैतिकता का पतन हो जाना है”। मन की वृत्तियों का स्वार्थ प्रधान हो जाना ही पाप है। यह पाप पिछली एक शताब्दी से तो बहुत अधिक मात्रा में बढ़ गया है। सच्चे धर्म का, हृदय की विशालता का, लोप हो रहा है उसके स्थान पर ‘मजहबी कर्म काण्डों’ को धर्म कहा जाने लगा है। नदी नालों में गोता लगाकर, तस्वीर खिलौनों के दर्शन करके, किसी पुस्तक के पन्ने रट देने, तिलक छाप लगा लेने, शिर मुड़ा लेने, दाढ़ी रखा लेने, खड़ाऊ पहनने, सात बार आचमन कर लेने, तेरह बार हाथ माँज लेने या ऐसे ही किसी अन्य कर्मकाण्ड को करने वाले लोग धर्मध्वजी समझे जाते हैं, चाहे उनके आचरण और विचार कैसे ही क्यों न हों।

वेशभूषा और साम्प्रदायिक कर्मकाण्डों के आधार पर धर्म की विवेचना होना इस बात का द्योतक है कि सच्चे धर्म की तो जानकारी भी लोगों को नहीं रही, धर्म के स्थान पर पाखंड विराजमान हो गया, ईश्वर के स्थान पर शैतान की पूजा होने लगी। आज जो मनुष्य जितना धर्मात्मा बनने का ढोंग रचता है परीक्षा करने पर उसका हृदय उतनी ही मात्रा में अनुदारता, निर्दयता, कपट, असत्य, घमंड और स्वार्थ रूपी पापों से भरा पूरा मिलता है। ढोंग के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहते दिखाई देते हैं पर सच्चे धर्म के लिए कोई कौड़ियाँ भी लगाने को तत्पर नहीं होता। यह सब परिस्थितियाँ बताती हैं कि मानव जाति से धर्म का लोप बहुत बड़ी मात्रा में हो गया है। पाखंड की आड़ में अधर्म का साम्राज्य छाया हुआ है ऐसी दशा में पाप की दुर्गन्ध से अदृश्य लोकों का गंदा होना और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इन कष्ट क्लेशों का आना कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 4 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 4 April 2020


👉 धर्म जीतेगा और अधर्म हारेगा

चारों ओर फैले हुए पाप पाखंड को नष्ट करने के लिए वर्तमान समय में जो ईश्वरीय अवतारी प्रेरणा अदृश्य लोक में उत्पन्न हुई है, उसका प्रभाव जागृत आत्माओं पर विशेष रूप से पड़ रहा है। जिसका अन्तःकरण जितना ही पवित्र है, जिसकी आत्मा जितनी ही निर्मल है वह उतना ही स्पष्ट रूप से ईश्वर की आकाशवाणी को, समय की पुकार को, सुन रहा है और अवतार के महान कार्य में सहायता देने के लिए तत्पर हो रहा है। समय की समस्याओं को वह ध्यान पूर्वक अनुभव कर रहा है और सुधार कार्य में क्रियात्मक सहयोग प्रदान कर रहा है। जिन लोगों की आत्माएं कलुषित है, पाप, अनीति और घोर अन्धकार ने जिनके अन्तःकरण को ढ़क रखा है, वे उल्लू और चमगादड़ की तरह प्रकाश देखकर चिढ़ रहे हैं। वे कुछ काल से फैली हुई अनीति को सनातन बताकर पकड़े रहना चाहते है। सड़े गले कुविचारों का समर्थन करने के लिए पोथी पत्र ढूंढ़ते हैं। किसी पुराने व्यक्ति की लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ यदि उन सड़े गले विचारों के समर्थन में मिल जाती हैं तो ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो यह पंक्तियाँ साक्षात् ईश्वर ने ही लिखी हों। परिस्थितियाँ रोज बदलती हैं और उनका रोज नया हल ढूँढ़ना पड़ता है। इस सच्चाई को वे अज्ञान ग्रस्त मनुष्य समझ न सकेंगे और ‘जो कुछ पुराना सब अच्छा जो नया सो सब बुरे’ कहकर अपने अज्ञान और स्वार्थ का समर्थन करेंगे।

दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता हे तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, पाप भी अपने अन्तिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता। युग परिवर्तन की संध्या में पाप का इतना प्रचंड, उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जायगी, एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुन्द भी बज गई और धर्म बेचारा दुम दबा कर भाग गया, किन्तु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं, यह अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी। रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नये उग आते थे फिर भी अन्ततः रावण मर ही गया। संवत् दो हजार के आसपास अधर्म नष्ट हो हो कर फिर जीवित होता हुआ प्रतीत होगा उसकी मृत्यु में बहुत देर लगेगी, पर अन्त में वह मर ही जायेगा।

तीस वर्ष से कम आयु के मनुष्य अवतार की वाणी से अधिक प्रभावित होंगे वे नवयुग का निर्माण करने में अवतार का उद्देश्य पूरा करने में विशेष सहायता देंगे। अपने प्राणों की भी परवा न करके अनीति के विरुद्ध वे धर्म युद्ध करेंगे और नाना प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए बड़े से बड़ा त्याग करने को तत्पर हो जावेंगे। तीस वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिकाँश की आत्मा भारी होगी और वे सत्य के पथ पर कदम बढ़ाते हुए झिझकेंगे। उन्हें पुरानी वस्तुओं से ऐसा मोह होगा कि सड़े गले कूड़े कचरे को हटाना भी उन्हें पसंद न पड़ेगा। यह लोग चिरकाल तक नारकीय बदबू में सड़ेंगे, दूसरों को भी उसी पाप पंक में खींचने का प्रयत्न करेंगे, अवतार के उद्देश्य में, नवयुग के निर्माण में, हर प्रकार से यह लोग विघ्न बाधाएं उपस्थित करेंगे। इस पर भी इनके सारे प्रयत्न विफल जायेंगे, इनकी आवाज को कोई न सुनेगा, चारों ओर से इन मार्ग कंटकों पर धिक्कार बरसेंगी, किन्तु अवतार के सहायक उत्साही पुरुष पुँगब त्याग और तपस्या से अपने जीवन को उज्ज्वल बनाते हुए सत्य के विजय पथ पर निर्भयता पूर्वक आगे बढ़ते जावेंगे।

अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, अनीति से नीति का, अन्धकार से प्रकाश का, दुर्गन्ध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। इस धर्म युद्ध में ईश्वरीय सहायता न्यायी पक्ष को मिलेगी। पाँडवों की थोड़ी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा सा वानर दल विशाल असुर सेना के मुकाबले में, विजयी हुआ था, अधर्म अनीति की विश्व व्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा सा मालूम पड़ेगा, परन्तु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में सारे पाप प्रपंच ईश्वरीय कोप की अग्नि में जल-जल कर भस्म हो जायेंगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजय पताका फहरा वेगी।

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग ३)

यह एक तथ्य है कि किसी व्यक्ति द्वारा किये हुए भले या बुरे कर्म का कुछ भाग उस परिवार के अन्य व्यक्तियों को भी मिलता है। घर का एक व्यक्ति कोई भला काम करे तो उस परिवार के सब लोग अभिमान अनुभव करते हैं और आदर पाते हैं। यदि घर का एक व्यक्ति बुरा काम करता है तो सारे कुटुम्ब को लज्जित होना पड़ता है। एक समय ब्राह्मण लोगों ने बड़े उत्तम ज्ञान का प्रसार करके जनता की सेवा की थी। उनकी सैंकड़ों पीढ़ी के बाद भी आज ब्राह्मणों के गुणों से हीन होने पर भी उनका आदर होता है और वे अभिमानपूर्वक ऋषि मुनियों की संतान कह कर अपना गौरव प्रकट करते हैं। ऋषियों का शरीर छूटे हजारों वर्ष हो गये तो भी उनकी संतान उन पूर्वजों के पुण्य का फल, दान दक्षिणा के रूप में अब तक भोग रही हैं। बुरे कर्म करने वालों के कुटुम्बियों और वंशजों को भी इसी प्रकार लज्जित होना पड़ता है। भारत में कुछ कौमें “जरायम पेशा” लिखी जाती हैं। इन कौमों के लोग चोरी आदि अपराध करते हैं। उनमें से जो अपराध नहीं करते वे भी ‘जरायम पेशा” समझे जाते हैं और पुलिस की निगरानी उन पर भी रहती है। सम्मिलित रहने वालों की सम्मिलित जिम्मेदारी भी होती है। वे आपस में एक दूसरे के पाप पुण्य के भागीदार भी होते हैं।

आजकल समस्त संसार पर जो चतुर्मुखी आपत्तियाँ आई हुई हैं उसका कारण भी यही सम्मिलित जिम्मेदारी है। पूर्वकाल में परिवारों के दायरे छोटे थे इसलिए वहाँ विपत्तियाँ भी थोड़े ही पैमाने पर आती थी। अब सारी दुनिया एक सूत्र में बँधी है तो उसका यह कर्तव्य भी बढ़ गया है कि समस्त देशों में धर्म की वृद्धि और अधर्म का निवारण करने का प्रयत्न करें।

भारतीय शास्त्र चिल्ला चिल्ला कर बताते हैं कि आपत्तियों का कारण अधर्म है। हम देखते हैं कि पिछली शताब्दियों में नैतिकता का स्तर जितना नीचा घटा है उतना सृष्टि के आदि से लेकर पहले कभी नहीं घटा था। इन दिनों बुद्धिबल से, यान्त्रिक शक्ति से, छल प्रबन्ध से, स्वार्थ साधना का ही विशेष ध्यान रखा गया। लूट खसोट की प्रधानता रही। पहले शत्रु के लिए भी उसके चरित्र को नष्ट करने के षड़यंत्र नहीं रचे जाते थे पर इस युग में निर्बल शक्ति वालों को नैतिकता से भी गिरा देने का बुद्धिमान लोगों ने प्रयत्न किया, ताकि वे लोग असत् आचरण के कारण द्वेष, कलह, अशान्ति एवं कुविचारों में उलझे रहें और हमें लूट खसोट का अच्छा अवसर हाथ लगता रहे। जब मनुष्यों के मन में सद्वृत्तियाँ रहती हैं तो उनकी सुगंध से दिव्यलोक भरापूरा रहता है और जैसे यज्ञ की सुगंधि से अच्छी वर्षा, अच्छी अन्नोत्पत्ति होती है वैसे ही जनता की सत् भावनाओं के फलस्वरूप ईश्वरी कृपा की- सुख शान्ति की वर्षा होती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 5
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.5

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (अंतिम भाग)

अखण्ड-ज्योति के पाठकों से हम विशेष रूप से अनुरोध करते हैं कि वे सच्चे धर्म को फैलाने में पूरी शक्ति के साथ प्रयत्न करें। सबसे पहला काम हम में से हर एक को यह करना चाहिए, कि अपना आत्म-शोधन करें अपने अन्दर जो स्वार्थ, असत्य, अन्याय की दुर्भावनायें घुसी बैठी हों उन्हें बारीकी के साथ तलाश करें और जिस प्रकार मरे हुए कुत्ते की लाश को निकाल कर घर से बाहर फेंक देते हैं, वैसे ही अपनी कुभावना, अनीति और स्वार्थपरता को दूर फेंक देने का यथासम्भव उद्योग करें। अमुक मन्त्र की माला जपने, अमुक पुस्तक का पाठ करने अमुक देवता के भगत बनने, अमुक नदी नाले में नहाने के महजबी कर्म काण्डों को करने न करने के सम्बन्ध में हमें कुछ नहीं कहना, यह सब व्यक्तिगत रुचि और श्रद्धा की वस्तुएं हैं, हमें तो जोरदार शब्दों में यह कहना कि आप सत्य आचरण करने के लिए तत्पर हो जाइये दूसरों से निस्वार्थ प्रेम कीजिए, अन्य लोगों की भलाई में अपनी भलाई समझिए। ज्ञान, बल, धन, वैभव प्राप्त कीजिए, किन्तु उसको अपने भोगों का साधन मत बनाइये। अपने से अल्प शक्ति रखने वालों की सहायता में आपकी सम्पूर्ण शक्तियों का अधिक से अधिक व्यय होना चाहिए। मैं किसकी क्या भलाई कर सकता हूँ, यह सोचते रहा कीजिए और परोपकार के सेवा, सहायता के अवसर आवें उन्हें बिना चूकें कर्तव्य परायण हुआ कीजिए। आपका शारीरिक मानसिक और भौतिक बल अधिक से अधिक मात्रा में लोक कल्याण के निमित्त, सत्प्रवृत्तियों की उन्नति के निमित्त, पाप कर्मों को नाश करने के निमित्त, व्यय होना चाहिए। आपका जीवन कर्म योग में परिपूर्ण यज्ञमय बन जाना चाहिए, जिसका प्रत्येक क्षण विशुद्ध कर्तव्य पालन में, धर्म और ईश्वर की उपासना में व्यय होने लगे। यह कार्य कठिन दिखाई पड़ता है, परन्तु यदि आप प्रतिज्ञा करलें, कि मुझे अपना जीवन सत्यमय बनाना है तो विश्वास रखिए, आप से ही आपके कदम उस दिशा को बढ़ाने लगेंगे फिर कुछ ही दिनों में बड़ी भारी सफलता दृष्टिगत होने लगेगी।

दूसरा कार्य जो उपरोक्त आत्म सुधार कार्य कुछ ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है यह है कि जिन लोगों तक आपकी पहुँच हो सकती है, उनको धर्म मार्ग पर चलने के लिए, सत्य का आचरण करने के लिए प्रेरित करते रहा करें। जो लोग आपके संपर्क में आवें, जिनसे बात करने का अवसर मिले, जिनसे पत्रालय हो उन्हें सदुपदेश दिया कीजिए, सत्य के, प्रेम के, न्याय के मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित किया कीजिए। अपने मुख को एक प्रकार का जीवित धर्म शास्त्र बना डालिए, जिसमें से सदैव धर्म शिक्षा का प्रसार होता रहे। अपने कुटुम्बियों, मित्रों, सहयोगियों, सम्बन्धियों, परिचितों, अपरिचितों को सच्चाई और ईमानदारी के ढांचे में ढालने का उद्योग किया कीजिए, जिससे उनकी जीवन दिशा सुधरे और आपका अपना आत्म-सुधार का अभ्यास मजबूत होता रहे। यह बेल बढ़ेगी।

मान लीजिए आप दस आदमियों को धर्ममय विचारों का बना देते हैं, वे दस और दस-दस को सुधारते हैं, तो सौ हो गये। ऐसा ही सौ करें तो दस हजार हो जायेंगे, यही बेल आगे बढ़े तो दसवें व्यक्ति पर जाकर वह संख्या इतनी हो सकती है जितने मनुष्य इस सारी पृथ्वी पर नहीं हैं यदि सौ दृढ़ प्रतिज्ञा सुयोग्य व्यक्ति धर्म भावनाओं का प्रचार करने के लिये सच्चे हृदय से तत्पर हो जावें तो संसार की काया पलट कर सकते है युद्ध का जरा मूल से अन्त कर सकते हैं, कुछ ही समय में इस पृथ्वी को सुर-पुरी बना सकते हैं। भागीरथ की तपस्या की पतित पावनी भगवती गंगाजी स्वर्ग से भूमण्डल पर उतर आई थी। आज ऐसे ही भागीरथों की आवश्यकता है, जो स्वयं घोर तप करके सतयुगी गंगा को पृथ्वी पर लावें और जलते हुए संसार पर अमृत की वर्षा करके इसे नन्दन वन के समान हरा-भरा करदें।

वर्तमान दारुण परिस्थितियों में हम अपने हर एक पाठक से आग्रह पूर्वक अनुरोध करते हैं, कि अपने निजी जीवन को पवित्र, पुण्यमय परमार्थी बनावें और दूसरों को भी इस मार्ग पर प्रवृत्त करें। इस धर्म प्रचार यज्ञ से संसार पर आई हुई आपत्तियों को हटाने में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी, ऐसा हमारा सुदृढ़ विश्वास हैं।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 2
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

👉 हे महाकाल!

हे महाकाल! तुम्हारी यह कैसी लीला है? आज लाखों आदमी निर्दयता से मारे जा रहे है, करोड़ों आदमी भूखों मर रहे हैं, उन्हें रात में सोने को भी जगह नहीं हैं, जीवनोपयोगी पदार्थों का ध्वंस हो रहा है मनुष्य मनुष्य को खाये जा रहा है, यह सब क्या है! तुम्हारी संहार लीला असमय में ही ऐसा प्रलयंकर रूप क्यों धारण कर रही है?

क्या कहते हो? यह मनुष्य के पापों का ही फल है? मनुष्य दल बाँधकर जब दूसरे मनुष्यों को देशों और वर्गों को चूस डालना चाहता है तब उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।

हे भयंकर! आदमियत पढ़ाने का तुम्हारा यह तरीका बड़ा निर्दय है पर क्या तुम समझते हो कि आदमी में इस प्रकार शैतानियत बढ़ाकर नंगा चित्र खींचकर तुम उसे दूर कर सकोगे? अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ, शैतानियत बढ़ती ही जा रही है।

क्या कहते हो? जब तक आँच से लोहा गलेगा नहीं तब तक ढाला न जायगा! क्या इसीलिये मनुष्य जाति को इस प्रकार भट्टी में झोंके जाते हो। क्या मनुष्य जाति के भाग्य में और भी भयंकर विपदाएं वदी हैं? पर करोड़ों आदमी इतने में भी घबरा उठे है- उन्हें अभी भी यह सब असह्य है!

क्या कहते हो? जब वेदना असह्य होगी तब सब गल जायेंगे? क्या तभी अक्ल आयेगी? पर बहुतों को अक्ल आ चुकी है-वे गल भी गये हैं। अब तो थोड़े के पीछे बहुतों को गलना पड़ा रहा है।

ऐ! क्या कहते हो! बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है? तो क्या जब तक थोड़े न गलेंगे तब तक बहुतों को भी गलना पड़ेगा! हे न्याय मूर्ति! बात तो सच कहते हो। संसार पर शैतानियत का ताँडव करने वाले मुट्ठीभर लोग ही है, पर उनको उन लोगों का भी पीठ बल है जो उनकी शैतानियत से पिस रहे हैं। इन लड़ाकू स्वभाव के लोगों के पीछे उन मजबूरों, गरीबों तक का बल है जो खुद पूँजीवाद से कराह रहे हैं! पर दूसरे देशों के गरीबों को सताने में अपने नेताओं का साथ दे रहे हैं। तब तुम्हारा कहना ठीक ही है कि भस्म होकर भी बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है। पर हे शिव, ऐसे भी तो लोग हैं देश हैं जिनके न थोड़े न बहुत, किसी को पीसना नहीं चाहते है वे तो गले हुए हैं उन्हें भट्टी में क्यों डाल रक्खा है?

क्या कहा? वे कच्चा लोहा हैं? उनमें बहुत-सा भाग ऐसा है जिसे जलाकर नष्ट कर देना है। तो क्या उन्हें भी बहुत देर तक भट्टी में रहना पड़ेगा? हे शंकर यह क्या कहते हो? वे तो बहुत निर्बल हैं, दीन हैं, न्याय चाहते हैं। उन्हें यह दण्ड क्यों?

क्या कहते हो! निर्बलता का नाम या संयम नहीं है! ओह! तुम बड़े कठोर हो। पर मैं मानता हूँ कि तुम्हारे कहने में जरा भी झूठ नहीं है। निर्बल निर्बल नरों को चूसते हैं वहाँ हैवानियत है-संयम नहीं है। जब तक हैवानियत भस्म न हो जायेगी तब तक तुम उन्हें भी भट्टी में झोंके रहोगे। हे महादेव! तुम्हीं सत्य हो। जैसा समझो करो। तुम महाकाल हो, अनन्त हो। हम चार दिन के कीड़े तुम्हारी अनन्त गम्भीर, अनन्त उन्नति और अनन्त व्यापक नीति को क्या समझें! -संगम

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 10

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 3 April 2020


👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग २)

यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है। इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (भाग २)

चतुरंगिणी सेनाएं शत्रुओं का संहार करने के लिये कूच कर रही हैं, रोगों को मिटा देने के लिए वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं बड़े-बड़े अनुसन्धान कर रही हैं, आर्थिक कष्टों को मिटाने के लिए अर्थशास्त्री प्रयत्नशील हैं, राजनैतिक दिमाग लगे हुए हैं। वे लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों में बड़े परिश्रम और जाँ किसानी के साथ लगे हुए हैं। कर्तव्य निष्ठा सराहनीय वस्तु है। जो लोग वर्तमान महा विपत्तियों का समाधान करने के लिए कार्य कर रहे हैं, वे सचमुच प्रशंसा के पात्र हैं। आग लगने पर उसे बुझाने का प्रयत्न करना हर एक विचारशक्ति रखने वाले का परम पवित्र कर्तव्य है। हिन्दू धर्म शास्त्रों की ऐसी आज्ञा है कि सामूहिक आपत्ति को निवारण करने में हर एक मनुष्य को सहयोग देना चाहिए, अन्यथा घोर पाप का भागी होना पड़ता है।

कहीं आग लगने पर जो बालक, रोगी या असमर्थ उसे बुझाने के लिए जाने में समर्थ नहीं होते उन्हें पाँच कदम उस दिशा में चल कर पाँच मुट्ठी रेत और एक लोटा पानी फैलाकर प्रायश्चित्त कर लेने का विधान है। आज संसार में आग लग रही है, जिसकी ज्वाला में देश के देश और परिवार के परिवार जले जा रहे हैं, इस अग्नि को बुझाने में जो लोग आना-कानी करते हैं, अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते, वे निःसन्देह एक महान पाप के भागी होते हुए अपने लिए घोर गौरव नरक का निर्माण करेंगे।

भौतिक और शारीरिक दृष्टि से किसे क्या करना चाहिए, इस पर हम अधिक प्रकाश नहीं डालेंगे, क्योंकि अनेक सूत्रों से उन कर्तव्यों की जानकारी पाठकों को प्राप्त होती रहती है। हमें तो उस मूल कारण के सम्बन्ध में कुछ कहना है, जिसके कारण यह सारी विपत्तियाँ उत्पन्न हुई हैं। तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भौतिक उपकरण प्रयोग होते हैं। पर स्थायी शान्ति के लिए उन आध्यात्मिक शस्त्रों की आवश्यकता हैं, जिनसे अधर्म की सारी किलेबन्दी को ढहा कर विस्मार कर दिया जाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग १)

आज हम चारों ओर भयंकर दावानल सुलगती हुई देखते हैं। महायुद्ध का दानव लाखों मनुष्यों को अपनी कराल दाढ़ों के नीचे कुचल कुचल कर चबाते जा रहा है। खून से पृथ्वी लाल हो रही है। आकाश से ऐसी अग्नि वर्षा हो रही है जिससे सहस्रों निरपराध प्राणी अकारण ही चबाने की तरह जल-भुन रहे हैं। कराह और चीत्कारों से सारा आकाश मण्डल गुँजित हो उठा है। नन्हें नन्हें बालक अपने माता पिताओं के लिए बिलख रहे हैं। माताएं अपने पुत्रों के लिए और पत्नियाँ अपने पतियों के लिए, अश्रुपात कर रहीं हैं। कितने घरों में, किस प्रकार करुण क्रन्दन हो रहें हैं, इन मर्म कथाओं को यदि प्रत्यक्ष रूप से प्रकट किया जाये तो वज्र का भी कलेजा फटने लगेगा।

अकेला युद्ध ही क्यों महामारियों का प्रचंड प्रकोप आप देखिए। अनेक प्रकार के नये-नये अश्रुत पूर्व रोग उठ खड़े हुए हैं। चिकित्सा करने वाले परेशान हैं, उपचार हतवीर्य साबित होते हैं, अर्धमृत या मृत लाशों के ढेर घर एवं मरघटों में आसानी से देखे जा सकते हैं। रोगी और उनकी परिचर्या करने वाले सभी की बेचैनी बढ़ती चली जा रही है। जीवन भर बने हुए हैं, जो साँसें बीत रही हैं वह भारी और कष्टकर प्रतीत होती हैं। दवा के लिए पैसा नहीं, पथ्य के लिए पैसा नहीं, असहायवस्था में पड़े हुए लोग बेबसी आँसू घूँट रहे हैं।
महंगी का तो कुछ कहना ही नहीं, हर चीज पर चौगुने आठ गुने दाम बढ़ते जा रहे हैं। पैसा खर्च करने पर भी वस्तुएं प्राप्त होती नहीं। अच्छा अब नसीब नहीं, खाद्य पदार्थों का लोप होता जाता है। व्यापार चौपट हो रहे हैं, उद्योग धंधे बढ़ते नहीं, बेकारी में कमी नहीं होती खर्च बढ़ रहे हैं पर आमदनी नहीं बढ़ती आधे पेट खाने वालों और आधे अंग ढकने वालो की संख्या बढ़ती जा रही है। जी तोड़ परिश्रम करने पर भी भोजन वस्त्र की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती। कुछ अमीरों या युद्ध सम्बन्धी कोई व्यवसाय प्राप्त कर लेने वाले भाग्यवानों की बात अलग है, किन्तु साधारण जनता की जीवन निर्वाह समस्या दिन-दिन गिरती चली जा रही है, तिल तिल करके अभावों की ज्वाला में लोगों को झुलसना पड़ रहा है।

आये दिन जो अज्ञात विपत्तियाँ सामने आती रहती हैं, उनकी भयंकरता भी कम नहीं। राजनैतिक संघर्षों के कारण जनता के कष्टों में वृद्धि होती है, कोई उपद्रव करता है दण्ड किसी को सहना पड़ता है। निर्दोष व्यक्ति का भी कलेजा काँपता रहता है कि कही अकारण ही कोई चपेट मुझे न लग जाये। देवी प्रकोप का भी पूरा जोर है। इस साल नदियों में बड़ी भारी बाढ़ें आईं, जिससे हजारों गाँव का नुकसान हुआ लाखों बीघा कृषि नष्ट हो गई, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूचाल, तूफान, अंधड़ के कारण बहुत भारी क्षति उठानी पड़ी। गुँडे बदमाशों का जोर बढ़ने से आये दिन अपराध बढ़ते रहते हैं। आज का दिन किसी प्रकार कट गया हो कल के लिए आशंका बनी रहती है कि कही कोई नई विपत्ति न टूट पड़े। शान्ति, स्थिरता, संतोष में कमी होती जाती है और बेचैनी बढ़ती जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (भाग १)

वर्तमान काल में मनुष्य जाति पर जो विपत्तियाँ आई हैं, उनके तात्कालिक कारण अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं, परन्तु इन सब के मूल में एक ही कारण काम कर रहा है वह यह है ‘धर्म के प्रति उपेक्षा।’ आत्मा का स्वाभाविक धर्म यह है कि सेवा बुद्धि से लोक कल्याणार्थ कर्तव्य करें। सब भूतों में ईश्वर की भावना रखकर उनकी क्रियात्मक पूजा करना, प्रेम, सहायता, सहयोग करना, सच्चा धर्म है। ईश्वर भक्ति का और धर्म पालन का एक ही सच्चा मार्ग है और वह यह कि अन्य प्राणियों के उत्थान के निमित्त निजी स्वार्थों का त्याग किया जाये। दया, उदारता, भ्रातृभाव, त्याग, सेवा, सहायता की उपकारी सद्भावनायें धर्म के प्रत्यक्ष चिन्ह हैं। अपने लिये कम लेने और दूसरों को अधिक देने का स्वभाव धर्मात्मा होने के प्रधान लक्षण हैं।

इस सत्य धर्म को लोगों ने त्याग दिया और जैसे भी बने वैसे नीति या अनीति से दूसरों की वस्तु को अपहरण करके अपनी भोगेच्छाओं को पूरा करने की प्रथा को अपना लिया। अपहरण को पाप और सेवा को पुण्य कहा जाता है, लेने की इच्छा को मोह, देने की इच्छा को प्रेम कहा जाता है। आत्मा को लोभ में गिराने को असत्य और भोग छोड़कर तप करने को सत्य बताया गया है। शक्ति को सहायता में लगाना न्याय, और संचय एवं परपीड़न में लगाना अन्याय कहा गया है। हम दृष्टि पसार कर देखते हैं, कि संसार में धर्म को, पुण्य को, सत्य को, प्रेम को, न्याय को, लोगों ने छोड़ दिया है और उसके स्थान पर अधर्म, पाप, असत्य, मोह एवं अन्याय को गर्वपूर्वक अपनायें फिर रहें हैं। एक दूसरे को लूटने की तरकीबें सोचने में व्यस्त हैं। एक भेड़िया दूसरे भेड़िये का माँस नोंच खाने के लिये अपने तीक्ष्ण दाँतों को और भी तेज करने में, मजबूत करने में, लगा हुआ है। ऐसी भावनायें जब उग्र रूप धारण करके सर्वत्र फैल रही हैं तो उसका यह एक ही परिणाम होना संभव है, कि सारी मनुष्य जाति घोर विपत्तियों के दलदल में फँस जाय। वह परिणाम हमारे सामने उपस्थित है। हम लोग नाना प्रकार की आधि व्याधियों में पड़े हुए कराह रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (अंतिम भाग)

जिनकी आत्मा अपनी इन्द्रियों के विषयों-खान-पान, चटकीले वस्त्र, दिखावा, विलासप्रियता, श्रृंगार, झूठी शान, बचपन की रंग रेलियाँ, सिनेमा की अभिनेत्रियों के जीवन या सामाजिक विकारों में ही लगा रहता है और स्वार्थ, क्रोध, ईर्ष्या, मोह, दगाबाजी-बेईमानी के कलुषित विचारों में रमा हुआ है, ऐसी नशोन्मुख आत्माओं का अवलोकन कर कौन पश्चाताप न करेगा?

ऐसी विनाशकारी वृत्ति का एक उदाहरण पं. रामचंद्र शुक्ल ने दिया है। आपने मकदूनिया के बादशाह डेमेट्रियस के विषय में लिखते हुए निर्देश किया है कि वह कभी-कभी राज्य का सब कार्य त्याग कर अपने ही मेल के दस-पाँच साथियों को लेकर विषय वासना में लिप्त रहा करता था। एक बार बीमारी का बहाना करके, वह इसी प्रकार अपने दिन काट रहा था। इसी बीच उसका पिता उससे मिलने के लिए गया। उसने एक हंसमुख जवान को कोठरी से बाहर निकलते हुए देखा। जब पिता कोठरी के बाहर निकला, तब डेमेट्रियस ने कहा - “ज्वर ने मुझे अभी छोड़ा है।” पिता ने उत्तर दिया, “हाँ! ठीक है, वह दरवाजे पर मुझे मिला था।”

कुसंग का ज्वर ऐसा ही भयानक होता है। एक बार युवक इसके पंजे में फंस कर मुक्त नहीं हो पाता। अतः प्रत्येक युवक को अपने मित्रों, स्थानों, दिलचस्पियों, पुस्तकों इत्यादि का चुनाव बड़ी सतर्कता से करना चाहिए।

इसके विपरीत सत्संग एक ऐसा आध्यात्मिक साधन है जिससे मनुष्य की सर्वतोमुखी उन्नति हो सकती है। संसार में एक से एक पवित्र आत्माएं पुस्तकों के रूप में आपके साथ रह सकती हैं। उनके विचारों की विद्युत आपके चारों ओर रह कर सब प्रकार की गंदगी को, अशुभ विचारों को दूर भगाती है। उत्तम पुस्तकों को घर में रखने, उनका अध्ययन, मनन तथा सहवास करने से मनुष्य सबसे बुद्धिमान आत्माओं के सहवास में हो सकता है।

इसके अतिरिक्त विद्वान, साहित्य सेवियों, दर्शन शास्त्रियों, सम्पादकों, सन्तों के संपर्क में रह कर भी आध्यात्मिक जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.26

मंगलवार, 31 मार्च 2020

👉Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 1 April 2020


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 1 April 2020




👉 उपयोग और सदुपयोग:-

शीमक कठिन शीत ज्वर से पीड़ित है उनके पुत्र पात्रों ने उपचार की अच्छी व्यवस्था की है तो भी वे औषधि नाम मात्र को ही ले रहे है। उनका कथन है कि औषधि का काम विष के प्रभाव को रोकना भर है, रोग को नष्ट करना नहीं, वह काम तो प्रकृति स्वयं ही करती है। तब हम उसमें हस्तक्षेप क्यों करें!

पर उनके इस कथन का भी वही अर्थ लगाया गया जो अब तक लगाया जा रहा था। अर्थात् शीमक बड़ा कृपण है। घर में अथाह धनराशि होते हुये भी वह न तो अच्छा खा सकता है, न पहन सकता है, बाल-बच्चों को देना तो दूर, अब जब उसका अपना ही जीवन संकट में पड़ गया तब भी पैसे का इतना मोह-छिः शीमक की कृपणता- कलंक नहीं तो और क्या है।

बहुत बार तो शीमक को कई ऐसे व्यक्ति भी मिले थे जो उसे मुख पर ही कह गये थे- ”शीमक इतनी कृपणता तो न किया करो, कभी कुछ दान, कभी कुछ पुण्य, तीर्थ यात्रा, ब्राह्मण भोज, नगर भोज कुछ तो ऐसा कर डालो, जिससे यह धन ठिकाने लग जाये! मर गये तब वह धन किसी और के हाथ लग गया तो तुम्हारी इस कमाई का क्या लाभ।”

शीमक हंस पड़ते और 'अच्छा! अच्छा!! कहकर उस प्रसंग को टाल देते।

ऐसे अवसर आते तो दूर दृष्टि डालते हुये शीमक की मुख मुद्रा देखने से प्रतीत होता था मानो वे सुन्दर भविष्य में कुछ खोजना चाहते हैं, वे क्या चाहते हैं, यह आज तक उसके पुत्र परिजन भी नहीं समझ सके थे।

आज जितने चिन्तित शीमक बैठे थे, उससे अधिक विकल आचार्य महीधर दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बड़े परिश्रम के साथ वेदों का भाष्य किया था। भाष्य भी ऐसा जो भी विद्वान उसे पढ़ता धन्य हो जाता। किन्तु धन के अभाव के कारण आज स्वयं महीधर इतने निराश हो गये थे कि उन्हें अपना सारा तप ही निरर्थक लगने लगा था। वे चाहते थे कि वेदों का यह भाष्य घर-घर पहुँचे ताकि बौद्धों के प्रभाव को रोका जा सके। उनकी आकांक्षा, आकांक्षा ही रही। कोई उपाय बन नहीं सका।

शीमक ने समाचार सुना तो चुपचाप घर से निकल पडे। कहा गए शीमक की कई दिन तक खोज की गयी। पर कुछ भी पता न चला!

बहुत दिन बाद जब महीधर के वेदभाष्य घर-घर पहुँचने लगे तब लोगों ने इतना भर सुना कि कोई एक देव पुरुष उनके पास आया था और उसने अपनी सारी सम्पत्ति उन्हें देकर कहा था- “आचार्य प्रवर! सद्इच्छाएं धन के अभाव में रुकती नहीं। यह मेरे जीवन भर की कमाई इसे काम में लेकर मेरा जीवन धन्य करें।“

उसके बाद फिर उस महापुरुष के कभी दर्शन नहीं हुए। कहते हैं, वह वानप्रस्थ ग्रहण कर अंतिम साधना के लिये अन्त:वासी हो गया था।

‘अखण्ड ज्योति, अप्रैल-1970’

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ८)

कुसंग का भयानक अभाव-

कुसंग में रह कर युवक परिवार से छूट जाता है। ये कुसंग बढ़े आकर्षण रूप में उसके सम्मुख आते हैं-मित्रों, सिनेमा, थियेटर, वैश्या, गन्दा साहित्य, गर्हित चित्र, मद्यपान, सिगरेट तथा अन्य उत्तेजित पदार्थ। वे सभी प्रत्यक्ष विष के समान है, जिनके स्पर्श मात्र से मनुष्य पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उनकी कल्पना सर्वथा विनाशकारी है। बड़े सावधान रहें।

इस सम्बन्ध में हम पं. रामचन्द्र शुक्ल की बहुमूल्य वाणी उद्धृत करना चाहते हैं। इसमें गहरी सत्यता है :-

कोई भी युवा पुरुष ऐसे अनेक युवा पुरुषों को पा सकता है जो उसके साथ थियेटर देखने जायेंगे, नाच रंग में जायेंगे, सैर-सपाटे में जायेंगे, भोजन का निमंत्रण स्वीकार करेंगे। ऐसे लोगों से हानि होगी तो बड़ी होगी।

सोचो तो, तुम्हारा जीवन कितना नष्ट होगा, यदि ये जान पहिचान के लोग उन मनचले युवकों में से निकले जिनकी संख्या दुर्भाग्यवश आजकल बहुत बढ़ रही है, यदि उन शोहदों में से निकले जो अमीरों की बुराइयों और मूर्खताओं का अनुकरण किया करते हैं, दिन रात बनाव श्रृंगार में रहा करते हैं, कुलटा स्त्रियों के फोटो मोल लिया करते हैं, महफिलों में अहाँ -हा, वाह किया करते हैं, गलियों में ठट्ठा मारते और सिगरेट का धुआँ उड़ाते चलते हैं। ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है ?
वे अच्छी बातों से कोसों दूर हैं। उनके लिए न तो संसार में सुन्दर और पवित्र उक्ति वाले कवि हुए, और न उत्तम चरित्र वाले महात्मा हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.26

👉 The Illusive Reality

One who knows that he knows not, but claims he knows – is a liar. One who knows little bit but thinks he knows – is ignorant. One who knows not and knows and accepts that he knows not – is sincere. One who knows partially and knows that he knows not – is a learner. But none can know it because it is impossible to know it. This is what, is the maya – the ‘grand illusion’ of our perception of the gigantic creation of God.

One who knows that he knows and also knows that he does not – is wise. He does not say it despite knowing a lot. Because he knows a lot and therefore knows that nothing could be said or discussed about it. One who knows that it is undecipherable infinity and immerses and ‘illusion’ of self-identity into devotion of the Omniscient – is enlightened…

His existence is unified with the devotion and love of god. He has realized the absolute void in the infinity (of maya – the illusive creation) and the infinity (of God) in the void (sublime). What doubts or queries he would have? Nothing! What he would know and about what? Nothing! He says nothing. What he would say and to whom? He knows God and knows that God alone knows his maya.

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 दरिद्रता

दरिद्रता इच्छाओं की कोख से पैदा होती है। जिसकी इच्छाएँ जितनी अधिक हैं उसे उतना ही दरिद्र होना पड़ेगा। उसे उतना ही याचना और दासता के चक्रव्यूह में फँसना पड़ेगा। इसी के साथ उसका दुःख भी उतना ही बढ़ेगा। इसलिए जिसे दरिद्रता निवारण के लिए कदम आगे बढ़ाने हैं, उसे इच्छाओं की ओर से अपने पाँव उतना ही पीछे हटाने होंगे। क्योंकि जो जितना अपनी इच्छाओं को छोड़ पाता है, वह उतना ही स्वतन्त्र, सुखी और समृद्ध होता है। जिसकी चाहत कुछ भी नहीं है, उसकी निश्चिंतता एवं स्वतंत्रता अनन्त हो जाती है।
  
इस सम्बन्ध में सूफियों में एक कथा कही जाती है। फकीर बालशेम ने एक बार अपने एक शिष्य को कुछ धन देते हुए कहा- इसे किसी दरिद्र व्यक्ति को दान कर देना। शिष्य अपने गुरु के पास से चल कर थोड़ा आगे बढ़ा और सोचने लगा कि उसके गुरु ने गरीब के स्थान पर दरिद्र व्यक्ति को यह धन देने के लिए कहा है। और जैसा कि उसने बालशेम के सत्संग में जाना था कि गरीब व गरीबी परिस्थितियों वश होता है। लेकिन दरिद्र व दरद्रिता मनःस्थिति जन्य है। सो उसने किसी दरिद्र व्यक्ति की तलाश करनी शुरू की।
  
अपनी इस तलाश में वह एक राजमहल के पास जाकर रुक गया। वहाँ कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि राजा ने अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रजा पर कितने कर लगाए हैं, कितने लोगों को लूटा है। इन बातों को सुनकर उसे लगा कि उसकी तलाश पूरी हुई। बस उसने राजा के दरबार में हाजिर होकर उस राजा को अपने सारे रूपये सौंप दिए। एक फकीर के द्वारा इस तरह अचानक रूपये दिये जाने से वह राजा हैरान हुआ। इस पर बालशेम के शिष्य ने उसे अपने गुरु की बात कह सुनायी। और कहा- राजन्! इच्छाएँ हो तो दरिद्रता व दुःख बने ही रहेंगे। इसलिए जो इन इच्छाओं के सच को जान लेता है वह दुःख से नहीं अपनी चाहतों से मुक्ति खोजता है। क्योंकि जो अपनी इच्छाओं व चाहतों से छुटकारा पा लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता, दुःख, याचना व दासता स्वतः ही हट एवं मिट जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २११

रविवार, 29 मार्च 2020

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ७)

पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, वही आत्मिक शान्ति का अनुभव कर सकता है।

स्मरण रखिये, आप जो कुछ गुप्त रखते हैं, दूसरों के समक्ष कहते हुए शर्माते है, वह निंदय है। जब कोई युवक पिता के कानों में बात डालते हुए हिचके, तो उसे तुरन्त सम्भल जाना चाहिए क्योंकि बुरे मार्ग पर चलने का उपक्रम कर रहा है। उचित अनुचित जानने का उपाय यह है कि आप उसे परिवार के सामने प्रकट कर सकें। जब किसी पदार्थ का रासायनिक विश्लेषण हो जाता है, तब सभी उसके शुभ अशुभ अंशों को जान जाते हैं। परिवार में यह विश्लेषण तब होता है, तब युवक का कार्य परिवार के सदस्यों के सम्मुख आता है।

परिवार से युवक का मन तोड़ने में विशेष हाथ पत्नी का होता है। उसे अपने स्व का बलिदान कर संपूर्ण परिवार की उन्नति का ध्यान रखना चाहिए। समझदार गृहणी समस्त परिवार को सम्भाल लेती है।

आज के युवक प्रेम-विवाह से प्रभावित हैं। जिसे प्रेम-विवाह कहा जाता है, वह क्षणिक वासना का ताँडव, थोथी समझ की मूर्खता, अदूरदर्शिता है। जिसे ये लोग प्रेम समझते हैं, वह वासना के अलावा और कुछ नहीं होता। उसका उफान शान्त होते ही प्रेम-विवाह टूक टूक हो जाता है। चुनावों में भारी भूलें मालूम होती है। समाज में प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है। ऐसा व्यक्ति सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।

अनेक पुत्र विचारों में विभिन्नता होने के कारण झगड़ों का कारण बनते हैं। संभव है युवक पिता से अधिक शिक्षक हो। किन्तु पिता का अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है। पुत्र को उदारतापूर्वक अपने विचार अपने पास रखने चाहिए और व्यर्थ के संपर्क से बचना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 25

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.25

👉 बासन्ती रंग व उमंग

वसन्त में रंग व उमंग है। ये बासन्ती रंग व उमंग सदा ही भारतीय संस्कृति व संस्कारों से सराबोर हैं। बासन्ती बयार में ये घुले-मिले हैं। ये रंग हैं पवित्रता के, उमंग हैं प्रखरता की। इन रंगों में भगवान् का भावभरा स्मरण छलकता है, तो उमंग में सद्गुरु के प्रति समर्पण की झलक झिलमिलाती है। इस बासन्ती रंग में श्रद्धा के सजल आँसुओं के साथ इसकी उमंग में प्रज्ञा का प्रखर तेज है। इन रंगों में निष्ठा की अनूठी चमक के साथ इसकी उमंगों में अटूट नैतिकता सदा छायी रहती है।
  
वसन्त के ये रंग यदि विवेक का प्रकाश अपने में समेटे हैं, तो इसकी उमंगों में वैराग्य की प्रभा है। वसन्त के इन रंगों की अद्भुत छटा में त्याग की पुकार है और इसकी उमंगों में बलिदानी शौर्य की महाऊर्जा है। वसन्त के इन्हीं रंगों व उमंगों ने हमेशा ही भारतीय संस्कृति को संजीवनी व संस्कारों को नवजीवन दिया है। इन बासन्ती रंगों व उमंगों को अपने में धारण करके भारत माता की सुपुत्रियों व सपूतों ने हँसते-हँसते स्वयं को बलिदान करके सद्ज्ञान व सन्मार्ग को प्रकाशित किया है।
  
यदि कभी काल के कुटिल कुचक्र के कारण बासन्ती रंग व उमंग फीके पड़े हैं, तो इसी के साथ भारत की संस्कृति व संस्कारों की छवि भी धूमिल हुई है। जब कभी किसी ने बासन्ती रंग व उमंग को प्रकाशित व ऊर्जावान् करने का सत्प्रयास किए तो उसी के साथ भारत की संस्कृति व संस्कार भी अपने आप समुज्ज्वल हो गए। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी इसी प्रक्रिया को अपनाकर युग परिवर्तन की बासन्ती बयार प्रवाहित की। उनके द्वारा प्रेरित व प्रवाहित परिवर्तन की बयार में बासन्ती रंगों का अनूठा उनका प्यार है, तो साथ हैं बासन्ती उमंगों के तपपुञ्ज अंगार भी। जो उन्हीं के इस जन्मशताब्दी वर्ष में नव वसन्त का सन्देश सुना रहे हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१०

शनिवार, 28 मार्च 2020

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ६)

जरमी टेलर कहते हैं -”जीवन एक बाजी के समान है। हार-जीत तो हमारे हाथ में नहीं है, पर बाजी का ठीक तरह से खेलना हमारे हाथ में है। यह बाजी हमें बड़ी समझदारी से, छोटी-छोटी भूलों से बचाते हुए निरन्तर आत्म विकास और मनोवेगों का परिष्कार करते हुए करनी चाहिए।”

डॉक्टर आर्नल्ड ने लिखा है - “इस जगत में सबसे बड़ी तारीफ की बात यह है कि जिन लोगों में स्वभाविक शक्ति की न्यूनता रहती है, यदि वे उसके लिए सच्चा साधन और अभ्यास करें, तो परमेश्वर उन पर अनुग्रह करता है।” बक्सटन ने भी निर्देश किया है - “युवा पुरुष बहुत से अंशों में जो होना चाहें, हो सकते हैं।” एटी शेकर ने कहा है- “जीवन में शारीरिक और मानसिक परिश्रम के बिना कोई फल नहीं मिलता। दृढ़ चित्त और महान् उद्देश्य वाला मनुष्य जो चाहे कर सकता है।”

प्रतिभा की वृद्धि कीजिए। आपको नौकरी, रुपया, पैसा, प्रतिष्ठा और आत्म सम्मान प्राप्त होगा। उसके अभाव में आप निखट्टू बने रहेंगे। प्रतिभा आपके दीर्घकालीन अभ्यास, सतत परिश्रम, अव्यवसाय, उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर है। प्रतिभा हम अभ्यास और साधन से प्राप्त करते हैं। मनुष्य की प्रतिभा स्वयं उसी के संचित कर्मों का फल है। अवसर को हाथ से न जाने दें, प्रत्येक अवसर का सुँदर उपयोग करें और दृढ़ता, आशा और धीरता के साथ उन्नति के पथ पर अग्रसर होते जायें। स्व संस्कार का कार्य इसी तरह सम्पन्न होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.25

👉 प्रतिभा

प्रतिभा का अर्थ है जीवन के प्रश्नों का उत्तर देने की क्षमता। जीवन सर्वथा मौलिक है। यह बँधी-बँधाई राहों, घिसी-पिटी परम्पराओं के अनुरूप नहीं चलता। इसमें घटने वाली सभी आन्तरिक एवं बाहरी घटनाएँ पूर्णतया मौलिक व अनूठा नयापन लिये होती हैं। इसके हर मोड़ पर आने वाली चुनौतियाँ, उभरने वाले प्रश्न पूरी तरह से अपनी नवीनता का परिचय देते हैं। जो इन प्रश्नों का जितना अधिक सटीक, सकारात्मक, सक्षम व सृजनात्मक उत्तर दे पाता है, समझो वह उतना ही प्रतिभाशाली है।
  
जीवन प्रवाह में प्रतिपल-प्रतिक्षण सजग व सचेष्ट रहने की जरूरत है। तभी यह जान पाना सम्भव हो पाता है कि जीवन हमसे क्या माँग रहा है? परिस्थिति की क्या चुनौती है? प्रतिभावान् व्यक्ति परिस्थिति व प्रश्न के अनुरूप व्यवहार करता है, जबकि मूढ़ व परम्परावादी व्यक्ति घिसे-पिटे उत्तरों को दुहराते रहते हैं। फिर ये पुरानी बातें किसी धार्मिक पुस्तक में लिखी हुई हों अथवा फिर ऐसी किसी अवतार, पैगम्बर द्वारा कही गयी हों। स्व-विवेक का त्याग कर इन्हें अपना लेना प्रकारान्तर से मूढ़ता ही है।
  
विवेकहीन व्यक्ति, शास्त्रों, धर्मग्रन्थों का पुरातन बोझ ढोते रहते हैं। वह अवतार, मसीहा, पैगम्बर पर अपना सारा बोझ डालकर निशिं्चत हो जाना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें अपने ऊपर भरोसा करने से भय लगता है। जबकि अन्तदृष्टि सम्पन्न प्रतिभावान् व्यक्ति स्वयं पर भरोसा करता है। वह अवतार, मसीहा व पैगम्बर तथा धर्मग्रन्थों पर श्रद्धा-आस्था रखते हुए इनकी नए युग के अनुरूप नयी व्याख्या करता है। किसी तरह के सामाजिक-धार्मिक कारागृह उसे कैद नहीं कर पाते। क्योंकि अपनी प्रतिभा के बल पर वह इन्हें तोड़ने में सक्षम होता है। इसीलिए तो कहते हैं- प्रतिभा का अर्थ है- अन्तर्दृष्टि सम्पन्न दूरदर्शी विवेकशीलता, जो जीवन की सभी समस्याओं का सार्थक हल ढूँढने में सक्षम है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०९

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

👉 यह भी नहीं रहने वाला

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका।
आनंद ने साधू  की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया।

साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की  - "भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।"

साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला - "अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला।" साधू आनंद  की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है । साधू आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया। झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दी। दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे। साधू कहने लगा - "हे भगवान्! ये तूने क्या किया?"

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला - "महाराज  आप क्यों दु:खी हो रहे है? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान्  इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो! यह भी नहीं रहने वाला।"

साधू मन ही मन सोचने लगा - "मैं तो केवल भेष से साधू  हूँ। सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।"

कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद  तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है।  मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद  नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया।

साधू ने आनंद  से कहा - "अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया। भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"

यह सुनकर आनंद  फिर हँस पड़ा और कहने लगा - "महाराज  ! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।"

साधू ने पूछा - "क्या यह भी नहीं रहने वाला?"

आनंद उत्तर दिया - "हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।"

आनंद  की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया।

साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद  का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद  का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है।

कह रहा है आसमां यह समा कुछ भी नहीं।

रो रही हैं शबनमें, नौरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।
जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस।
झाड़ उनके कब्र पर, बाकी निशां कुछ भी नहीं।

साधू कहता है - "अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ। लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।"

साधू कहने लगा - "धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।"

साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद  ने अपनी तस्वीर  पर लिखवा रखा है - "आखिर में यह भी नहीं रहेगा।"


108 Gayatri Mantra
Gurudev Pt. Shriram Sharma Acharya's Voice
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https://youtu.be/Fv7Iy3g42QY

👉 दुःख का सुअवसर

दुःख की कल्पना मात्र से कंपकपी होने लगती है। इसके अहसास से मन विकल, विह्वल, बेचैन हो जाता है। ऐसे में दुःख से होने वाले दर्द की कौन कहे? यही वजह है कि दुःख से सभी भागना चाहते हैं। और अपने जीवन से दुःख को भगाना चाहते हैं। दुःख से भागने और दुःख को भगाने की बात आम है। जो सामान्य जनों और सर्वसाधारण के लिए है। लेकिन इसकी एक खास बात भी है। जो सत्यान्वेषियों के लिए, साधकों के लिए और भगवद्भक्तों के लिए है। यह अनुभूति विरले लोग पाते हैं। ऐसे लोग दुःख से भागते नहीं, बल्कि दुःख में जागते हैं।
  
दुःख उनके लिए रोने, कलपने का साधन नहीं बल्कि परमात्मा द्वारा प्रेरित और उन्हीं के द्वारा प्रदत्त जागरण का अवसर बनता है। दुःख के क्षणों में उनकी अन्तर्चेतना में संकल्प, साहस, संवेदना, पुरुषार्थ की प्रखरता और प्रज्ञा की पवित्रता जागती है। उनकी आत्मचेतना में अनुभूतियों के नए गवाक्ष खुलते हैं, उपलब्धियों के नए अवसर आते हैं। इसीलिए तपस्वियों ने दुःख को देवों के हाथ का हथौड़ा कहा है। जो चेतना में उन्नयन के नए सोपान सृष्ट करता है। विकास और परिष्कार के नए द्वार खोलता है।
  
तभी तो सन्तों ने, साधुओं, दरवेशों और फकीरों ने भगवान् से हमेशा दुःख के वरदान मांगे हैं। सुख की चाहत तो बस आलसी, विलासी करते हैं। जो सुखों के बीच पले, बढ़े हैं, उनकी चेतना सदा-सदा से सुषुप्ति की ओर अग्रसर होती है। उनके जीवन में भला परिष्कार व पवित्रता का दुर्लभ सौभाग्य कहाँ? यह तो बस केवल उन्हीं को मिलता है, जो पीड़ाओं में पलते हैं और दुःख के दरिया में प्रसन्नतापूर्वक बहते हैं। जो बदनामी के क्षणों में प्रभु भक्ति में जीना और गुमनामी के अँधेरों में प्रभु चिन्तन करते हुए मरना जानते हैं। उन्हें ही परमात्म मिलन का अनन्त सौभाग्य मिलता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०८


यज्ञोपचार पद्धति
Yagya Upchar Paddhti
Shraddheya Dr. Pranav Pandya
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https://youtu.be/s9eVfFZ3ZFc

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ५)

परिवार के युवक तथा उनकी समस्याएँ-

प्रायः युवक स्वच्छन्द प्रकृति के होते हैं और परिवार के नियंत्रण में नहीं रहना चाहते। वे उच्छृंखल प्रकृति, पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित, हलके रोमाँस से वशीभूत पारिवारिक संगठन से दूर भागना चाहते हैं। यह बड़े परिताप का विषय है।

युवकों के झगड़ों के कारण ये हैं- 1-अशिक्षा 2-कमाई का अभाव, 3-प्रेम सम्बन्धी अड़चनें घर के सदस्यों का पुरानापन और युवकों की उन्मुक्त प्रकृति, 4-कुसंग, 5-पत्नी का स्वच्छन्द प्रिय होना तथा पृथक घर में रहने की आकाँक्षा, 6- विचार सम्बन्धी पृथकता-पिता का पुरानी धारा के अनुकूल चलाना पुत्र का अपने अधिकारों पर जमे रहना, 7-जायदाद सम्बन्धी बटवारे के झगड़े । इन पर पृथक-पृथक विचार करना चाहिए।

यदि युवक समझदार और कर्त्तव्यशील हैं, तो झगड़ों का प्रसंग ही उपस्थित न होगा। अशिक्षित अपरिपक्व युवक ही आवेश में आकर बहक जाते हैं और झगड़े कर बैठते हैं। एक पूर्ण शिक्षित युवक कभी पारिवारिक विद्वेष या कलह में भाग न लेगा। उसका विकसित मस्तिष्क इन सबसे ऊँचा उठ जाता है। वह जहाँ अपना अपमान देखता है, वहाँ स्वयं ही हाथ नहीं डालता।

कमाई का अभाव झगड़ों का एक बड़ा कारण है। निखट्टू पुत्र परिवार में सबकी आलोचना का शिकार होता है। परिवार के सभी सदस्य उससे यह आशा करते हैं कि वह परिवार की आर्थिक व्यवस्था में हाथ बंटाएगा। जो युवक किसी पेशे या व्यवसाय के लिए प्रारम्भिक तैयारी नहीं करते, वे समाज में फिर नहीं हो पाते। हमें चाहिए कि प्रारंभ से ही घर के युवकों के लिए काम तलाश कर लें जिससे बाद में जीवन-प्रवेश करते समय कोई कठिनाई उपस्थित न हो। संसार कर्मक्षेत्र है। यहाँ हम में से प्रत्येक को अपना कार्य समझना तथा उसे पूर्ण करना है। हममें जो प्रतिया बुद्धि, अज्ञात शक्तियाँ हैं, उन्हें विकसित कर समाज के लिए उपयोगी बनाना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 24

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