शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (भाग २)

चतुरंगिणी सेनाएं शत्रुओं का संहार करने के लिये कूच कर रही हैं, रोगों को मिटा देने के लिए वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं बड़े-बड़े अनुसन्धान कर रही हैं, आर्थिक कष्टों को मिटाने के लिए अर्थशास्त्री प्रयत्नशील हैं, राजनैतिक दिमाग लगे हुए हैं। वे लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों में बड़े परिश्रम और जाँ किसानी के साथ लगे हुए हैं। कर्तव्य निष्ठा सराहनीय वस्तु है। जो लोग वर्तमान महा विपत्तियों का समाधान करने के लिए कार्य कर रहे हैं, वे सचमुच प्रशंसा के पात्र हैं। आग लगने पर उसे बुझाने का प्रयत्न करना हर एक विचारशक्ति रखने वाले का परम पवित्र कर्तव्य है। हिन्दू धर्म शास्त्रों की ऐसी आज्ञा है कि सामूहिक आपत्ति को निवारण करने में हर एक मनुष्य को सहयोग देना चाहिए, अन्यथा घोर पाप का भागी होना पड़ता है।

कहीं आग लगने पर जो बालक, रोगी या असमर्थ उसे बुझाने के लिए जाने में समर्थ नहीं होते उन्हें पाँच कदम उस दिशा में चल कर पाँच मुट्ठी रेत और एक लोटा पानी फैलाकर प्रायश्चित्त कर लेने का विधान है। आज संसार में आग लग रही है, जिसकी ज्वाला में देश के देश और परिवार के परिवार जले जा रहे हैं, इस अग्नि को बुझाने में जो लोग आना-कानी करते हैं, अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते, वे निःसन्देह एक महान पाप के भागी होते हुए अपने लिए घोर गौरव नरक का निर्माण करेंगे।

भौतिक और शारीरिक दृष्टि से किसे क्या करना चाहिए, इस पर हम अधिक प्रकाश नहीं डालेंगे, क्योंकि अनेक सूत्रों से उन कर्तव्यों की जानकारी पाठकों को प्राप्त होती रहती है। हमें तो उस मूल कारण के सम्बन्ध में कुछ कहना है, जिसके कारण यह सारी विपत्तियाँ उत्पन्न हुई हैं। तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भौतिक उपकरण प्रयोग होते हैं। पर स्थायी शान्ति के लिए उन आध्यात्मिक शस्त्रों की आवश्यकता हैं, जिनसे अधर्म की सारी किलेबन्दी को ढहा कर विस्मार कर दिया जाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...