शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग २)

यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है। इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

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