न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों की भी इन दिनों बाढ़ आई हुई है। सिर दर्द, आधा शीशी, जुकाम, अनिद्रा, उन्माद, बेहोशी के दौरे आदि तो प्रत्यक्ष और प्रकट मस्तिष्कीय रोग हैं। चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, आत्महीनता जैसे अवसाद और क्रोध, अधीरता, चंचलता, उद्दण्डता, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रमण जैसे आवेश मनःसंस्थान को ज्वार-भाटों की तरह असंतुलित बनाये रहते हैं। फलतः मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग निरर्थक चला जाता है एवं अनर्थ बुनने में लगा रहता है। अपराधी दुष्प्रवृत्तियों से लेकर आत्म हत्या तक की अगणित उत्तेजनाएँ विकृत मस्तिष्क के उपार्जन ही तो हैं। तरह-तरह की सनकों के कितने ही लोग सनकते रहते हैं और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते हैं। दुर्व्यसनों और बुरी आदतों से ग्रसित व्यक्ति अपना तथा अपने साथियों का कितना अहित करते हैं, यह सर्वविदित है। पागलों की संख्या तो संसार में तेजी के साथ बढ़ रही है। जनसंख्या इसी चपेट में आई हुई दिखाई पड़ेगी। शारीरिक रोगों का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। दुर्बलता और रुग्णता से सर्वथा अछूते व्यक्ति ही बहुत स्वल्प संख्या में मिलेंगे।
रंगाई से पूर्व धुनाई आवश्यक है। यदि कपड़ा मैला-कुचैला है, तो उस पर रंग ठीक तरह न चढ़ेगा। इस प्रयास में परिश्रम, समय और रंग सभी नष्ट होंगे। कपड़े को ठीक तरह धो लेने के उपरान्त उसकी रंगाई करने पर अभीष्ट उद्देश्य पूरा होता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए की गई साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग-पग पर कठिनाई उत्पन्न करते है। दीवार बीच में हो तो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय-कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।
उपासना का प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्मशोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति, वस्ति, न्यौली-व्रजोली आदि क्रियाएँ करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम-नियमों में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका-चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण-कर्म को सुधारा जाय और पिछले जमा कूड़े करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के कायाकल्प विधान में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन आदि कृत्यों द्वारा पहले मल-शोधन किया जाता है, तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म-साधना के सम्बन्ध में भी आत्मशोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)
रंगाई से पूर्व धुनाई आवश्यक है। यदि कपड़ा मैला-कुचैला है, तो उस पर रंग ठीक तरह न चढ़ेगा। इस प्रयास में परिश्रम, समय और रंग सभी नष्ट होंगे। कपड़े को ठीक तरह धो लेने के उपरान्त उसकी रंगाई करने पर अभीष्ट उद्देश्य पूरा होता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए की गई साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग-पग पर कठिनाई उत्पन्न करते है। दीवार बीच में हो तो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय-कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।
उपासना का प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्मशोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति, वस्ति, न्यौली-व्रजोली आदि क्रियाएँ करने का विधान है। राजयोग में यह शोधन कार्य यम-नियमों में करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका-चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण-कर्म को सुधारा जाय और पिछले जमा कूड़े करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के कायाकल्प विधान में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन आदि कृत्यों द्वारा पहले मल-शोधन किया जाता है, तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म-साधना के सम्बन्ध में भी आत्मशोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)































