मंगलवार, 10 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 44) :- सदगुरु संग बनें साधना-समर के साक्षी

🔴  अपने भीतर उस महासेनापति का आह्वान करो और उन्हें युद्ध की बागडोर सौंप दो। उन्हें बुलाने में सतर्क रहो, नहीं तो लड़ाई के उतावलेपन में तुम उन्हें भूल जाओगे। और याद रहे जब तक उन्हें तुम अपनी बागडोर नहीं सौंपोगे वे तुम्हारा दायित्व स्वीकार नहीं करेंगे। यदि उन तक तुम्हारी प्रार्थना के स्वर पहुँचेंगे तभी वह तुम्हारे भीतर लड़ेंगे और तुम्हारे भीतर के नीरस शून्य को भर देंगे। साधना के महासंग्राम में उन्हीं का आदेश पाना है और उसका पालन करना है। उन्हीं के प्रति समर्पण के स्वरों को अपनी साधना के संगीत में पिरोकर ही यह महायुद्ध जीता जा सकता है।

🔵  इस सूत्र को जीवन साधना में ढालने के लिए गहरा चिन्तन जरूरी है। इसके एक- एक वाक्य में सारगर्भित अर्थ पिरोए हैं। इसमें पहली और अनिवार्य बात है कि साधना समर में वे विजयी होते हैं- जो साक्षी होने का साहस करते हैं। जिन्होंने आध्यात्म विद्या के परम शास्त्र श्रीमद्भगवद् गीता को पढ़ा है, वे जानते हैं कि गीता का गायन दोनों सेनाओं के मध्य में हुआ था। गीता श्रवण से पहले अर्जुन को भगवान् श्री कृष्ण से यह प्रार्थना करनी पड़ी थी- ॥ सेनयोसूभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरा रथ खड़ा कीजिए। सबसे पहले साक्षी भाव, फिर साधक। यहाँ तक कि साधना के परम शास्त्र को साक्षी भाव के बिना समझा भी नहीं जा सकता।

🔴  यह साक्षी भाव जिन्दगी की गहनता में पहुँचे बिना नहीं मिलता। वह साक्षी अपना ही अन्तरतम है। यहीं सद्गुरु के वचनों का मर्म समझ में आता है। परिधि पर भूल की जा सकती है, पर केन्द्र पर भूल नहीं होती। परिधि पर होने के कारण ही जिन्दगी विकृत हुई है। जीवन अनुभवों ने, रास्तों ने, मार्गों ने, संसार ने, अनेक- अनेक जन्मों ने, संस्कारों ने इस जीवन को विकृत किया है। परिधि पर होने के कारण ही जिन्दगी में धूल- ध्वांस भर गयी है। इसी के कारण हमसे बार- बार भूलें होती हैं। बार- बार हम चूकते हैं और चूकते ही रहते हैं। वर्तमान के जीवन में यदि कुछ खोया है तो साक्षी भाव खो गया है। हम कर्त्ता हो गए हैं और यह कर्त्ता कर्म के निकट खड़ा हो गया है, जबकि उसे अन्तरात्मा में स्थित होना चाहिए। बस इसी वजह से जिन्दगी दुष्चक्र बनकर रह गयी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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सोमवार, 9 मई 2016

🌞 शिष्य संजीवनी (भाग 43) :- सदगुरु संग बनें साधना-समर के साक्षी

🔴  शिष्य संजीवनी के सूत्र जब शिष्यों के जीवन में घुलते हैं तो साधना का शास्त्र जन्म लेता है। यह शास्त्र दूसरे तमाम शास्त्रों से एकदम अलग है। क्योंकि इससे कागद कारे होने की बजाय जीवन उजला होता है। जहाँ अन्य शास्त्र निर्जीव होते हैं, वहीं इसमें जीवन छलकता है, जागृति चमकती है। इस फर्क का कारण केवल इतना है कि दूसरे शास्त्रों का लेखन कागज के पन्नों पर किया जाता है। लेकिन यहाँ तो जिन्दगी के फलक पर कर्म के अक्षर उकेरे जाते हैं।

🔵  जिन्होंने ऐसा करने का साहस किया है, वे इसके महत्त्व और महिमा को पहचानते हैं। उन्हें यह अनुभव हुए बिना नहीं रहता कि शिष्यत्व की साधना का सुफल कितने आश्चर्यों से भरा है। हां इतना जरूर है कि इसके लिए जीवन संग्राम में युद्ध करने की कुशलता सीखनी पड़ती है।

🔴  जीवन का यह महासंग्राम अन्य युद्धों से काफी अलग है। साधना के इस महासमर में अपूर्व कुशलता चाहिए। यह कुशलता कैसी हो इसके लिए शिष्य संजीवनी के दसवें सूत्र को अपने जीवन में घोलना होगा। इसमें शिष्यत्व की साधना के विशेषज्ञ जन कहते हैं- भावी साधना समर में साक्षी भाव रखो। और यद्यपि तुम युद्ध करोगे, पर तुम योद्धा मत बनना।

🔵  हां यह सच है कि वह तुम्ही हो, फिर भी अभी की स्थिति में तुम सीमित हो। अभी तुमसे भूल सम्भव है। लेकिन वह शाश्वत और निःसंशय है। जब वह एक बार तुममे प्रवेश करके तुम्हारा योद्धा बन गया, तो समझो कि वह कभी भी तुम्हारा त्याग न करेगा और महाशान्ति के दिन तुम से एकात्म हो जाएगा।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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बुधवार, 4 मई 2016

👉 शिष्य संजीवनी (भाग 42) :- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

🔴  बुद्ध ने यही किया, महावीर ने यही किया, रमण महर्षी एवं परमयोगी श्री अरविन्द ने यही किया। प्रत्येक साधक यही करता है। हर एक शिष्य को यही करना है। इस अवस्था के ज्ञान के अक्षय कोष शिष्य के लिए खुल जाते हैं। श्री सद्गुरु उसे दक्षिणामूर्ति शिव के रूप में दर्शन देते हैं। सच में बड़ी आश्चर्य मिश्रित श्रद्धा और भक्ति के अलौकिक प्रवाह का उदय होता है उस समय। ये अपने परम पू. गुरुदेव ही दक्षिणामूर्ति शिव हैं। यह अनुभूति ऐसी है जिसे अनुभवी ही जान सकते हैं। इसे ठीक- ठीक न तो कहा जा सकता है और न ठीक तरह से सुना जा सकता है। जो जानता है उसके लिए बोलना सम्भव नहीं है। और यदि वह बोले भी तो सुनने वाले लिए ठीक तरह से समझना सम्भव नहीं है।

🔵  गुरुदेव तो सदा से अपना खजाना लुटाने के लिए तैयार खड़े हैं, लेकिन शिष्य में पाने के लिए पात्रता इसी अवस्था में आती है। गुरुदेव के अनुदानों के रूप में शिष्य अपनी साधना की फसल काटता है। शिष्य को उसकी फसल सौंपते हुए गुरुदेव उससे कहते हैं कि अब तुम इसको बो डालो। एक बीज भी बेकार न जाने पाये। तुम बुद्ध पुरुषों की परम्परा को आगे बढ़ाओ। तुम जाग्रत हो गये अब औरों को जगाओ। सबने यही कही किया है- मैंने भी और मेरे गुरुदेव ने भी। तुम्हें भी अपने गुरुओं के योग्य शिष्य के रूप में यही करना है। ज्ञान की गंगा थमने न पाये- उठो पुत्र! आगे बढ़ो! इस आज्ञा का अनुपालन ही शिष्य का धर्म है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 डॉ. प्रणव पण्डया
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सोमवार, 2 मई 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 41) :- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

जो शिष्य हैं उनकी समर्पित भावनाओं में तांत्रिक प्रश्र स्वयं ही अपना समाधान पाते जाते हैं। ज्यों- ज्यों प्रश्रों के समाधान होते जाते हैं- त्यों तर्क विलीन हो जाते हैं। तब श्रद्धा का उदय होता है। श्रद्धा तर्क के विलय ही परम भाव दशा है। यहाँ न तो तर्कों का अभाव है और न ही तर्कों की दमन, बल्कि तर्कों की सम्पूर्ण विलीनता है। सघन श्रद्धा में ही नीरवता प्रकट होती है। परम शान्ति अथवा समाधि इसी के अनेकों रूप हैं। भेद शब्दों का है भावों का नहीं। यह सत्य शास्त्र अथवा पण्डित नहीं अनुभवी साधक बताते हैं। श्रद्धा की सम्पूर्णता को समाधि का नाम देना अतिशयोक्ति नहीं अनुभूति है। ईश्वर प्रणिधान की चर्चा करते हुए महिष पतंजलि भी इससे अपनी सांकेतिक सहमति जताते हैं।

इस नीरवता की भावदशा में परम ज्ञान का उदय होता है। यही परम प्रज्ञा के महामंदिर का द्वार है। यहीं साधक का ब्राह्मी चेतना से संवाद होता है। यहीं उसे उसके सद्गुरु का परम ब्रह्म परमेश्वर के रूप में साक्षात्कार होता है। ‘गुरुर्ब्रह्मा, गुरुविष्णु गुरुरेव महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परमब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः’ इस मंत्र के अर्थ की अनुभूति चेतना की इसी अवस्था में होती है। यहीं उससे कहा जाता है कि तुम अब काट चुके अब बोने की तैयारी करो। जिन्दगी के सामन्य क्रियाकलापों में बोने के बाद काटा जाता है। पर यहाँ बड़ी उलटबाँसी है, यहाँ काटने के बाद बोया जाता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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रविवार, 1 मई 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 40) :- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

अब तुम वह हो जिसने आत्मा को विकसित अवस्था में देख लिया है और पहचान लिया है। अब तुमने नीरवता के नाद को सुन लिया है। यह वह क्षण है जिसमें तुम उस ज्ञान मन्दिर में जा सकते हो, जो परम प्रज्ञा का मंदिर है और जो कुछ तुम्हारे लिए वहाँ लिखा है, उसे पढ़ो। नीरवता की वाणी सुनने का अर्थ है, यह समझ जाना कि एक मात्र पथ- निर्देश अपने भीतर से ही प्राप्त होता है। प्रज्ञा के मन्दिर में जाने का अर्थ है, उस अवस्था में प्रविष्ट होना, जहाँ ज्ञान प्राप्ति सम्भव होती है। तब तुम्हारे लिए वहाँ बहुत से शब्द लिखे होंगे और वे ज्वलन्त अक्षरों में लिखे होंगे। ताकि तुम उन्हें सरलतापूर्वक पढ़ सको। ध्यान रहे शिष्य के तैयार होने भर की देर है, श्री गुरुदेव तो पहले से ही तैयार हैं।’

अब तक कहे गये पिछले सभी सूत्रों में यह सूत्र कहीं अधिक गहन है। लेकिन साधना का सारा व्यावहारिक ज्ञान इसी में हैं। जो साधना सत्य से परिचित हैं, उन्हें इसका अहसास है कि साधना के सारे पथ, सारे मत अपनी सारी विविधताओं- भिन्नताओं के बावजूद एक ही बात सुझाते हैं- नीरवता। ध्यान की विधियाँ, महामंत्रों के जप, प्राणायाम की प्रक्रियाएँ सिर्फ इसीलिए है कि साधक के अन्तःकरण में नीरवता स्थापित हो सके। यह नीरवता जो कि सभी आध्यात्मिक साधनाओं का सार है- शिष्य को अपनी सच्चाई में अनायास प्राप्त हो जाती है। उसकी समर्पित भावनाएँ- सघन श्रद्धा अपने आप ही उसे नीरवता का वरदान दे डालती है।

आत्म पथ के जिज्ञासुओं के लिए यहाँ यह कहने का मन है कि मन को चंचल बनाने का एक ही कारण है मानव की तर्क बुद्धि। जितनी तर्क क्षमता उतना ही उद्वेग उतनी ही चंचलता। पर साथ ही इसमें हमारी जागरूकता के शुभ संकेत भी छुपे हैं। ये तर्क न हो- तर्कों का अभाव हो तो व्यक्ति का अन्तःकरण जड़ता से भर जायेगा। तर्कों के अभाव का अर्थ है ‘जड़ता’। यह स्थिति मूढ़ों की होती है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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शनिवार, 30 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 39):- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

शिष्य संजीवनी को शिष्यों ने अजस्र स्रोत के रूप में अनुभव किया है। इसके चिंन्तन्- मनन से उन्हें शिष्यत्व की सुगन्धि और पुष्टि का अहसास होता है। इससे उनकी भावनाएँ न केवल प्रगाढ़ होती हैं, बल्कि पवित्र भी होती हैं। इस क्रम में कइयों के मन में प्रश्र उठना स्वाभाविक है कि आयुर्वेद आदि चिकित्सा शास्त्र के ग्रन्थों में प्रत्येक संजीवनी के साथ अनुपान की विधि क्या है? सचमुच ही यह प्रश्र सार्थक है। प्रश्रकत्ताओं की भावनाओं की सघनता को दर्शाता है। इसके उत्तर में यही कहना है कि जो शिष्य संजीवनी का सेवन कर रहे हैं अथवा करना चाहते हैं, उन्हें इस उत्तम औषधि का सेवन अपनी समर्पित भावनाओं के साथ करना चाहिए। ये समर्पित भावनाएँ ही इस औषधि का अनुपान हैं।

इस अनुपात के साथ यह औषधि अनेकों गुना प्रभावी हो जाती है। इसके शुभ परिणामों में भारी बढ़ोत्तरी हो जाती है। जो इस महासत्य को अनुभव कर रहे हैं, उन्हें अपनी नीरव भावनाओं में उस दिव्य तत्त्व की अनुभूति होती है- जो शिष्यत्व का सार है। यह क्या है? किस तरह है? इसके लिए शिष्य संजीवनी के नवें सूत्र पर चिंन्तन् करना होगा। इसमें शिष्यत्व की साधना करने वाले श्रेष्ठ साधक कहते हैं- ‘समर्पित भावनाओं की प्रगाढ़ता में नीरवता प्रकट होती है। यह नीरवता ही वह परम शान्ति है, जिसकी कामना सभी साधक करते हैं। इस शान्ति से ही परा वाणी की अनुगूंज प्रकट होती है।

वह वाणी अपने परम मौन में शिष्य को कहती है कि काट तो तुम चुके अब तुम्हें बोना चाहिए। यह वाणी- शिष्य के अन्तःकरण की परम शान्ति एवं सघन नीरवता का ही एक रूप है। यह स्वयं तुम्हारे सद्गुरु के स्वर हैं। उन्हें विश्वास है कि तुम उनके आदेश का पालन करोगे। इस अवस्था में तुम अब ऐसे शिष्य हो जो अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। तुम ब्राह्मी चेतना के संकेतों को सुन सकते हो, देख सकते हो, बोल सकते हो। ऐसा इसलिए हो सका है, क्योंकि तुमने अपनी वासनाओं को जीत लिया है और आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 38) : जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शोर का रूपान्तरण शान्ति में- यह शिष्य की श्रद्धा का सुफल है। यह उसकी भक्ति का सत्परिणाम है। जो इस नीरवता में अविचल भाव से अपने सद्गुरु को पुकारता रहता है। उसे ही मार्ग की सिद्धि मिलती है। यह मार्ग बाहरी दुनिया का मार्ग नहीं है। यह अन्तजर्गत की यात्रा का पथ है। यह ऐसा मार्ग है, जो शिष्य की चेतना को सद्गुरु की चेतना से जोड़ता है। बड़ा दुर्लभ पथ है यह। जिसे मिल चुका है, वे परम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि वे सतत्- निरन्तर अपने सद्गुरु के सम्पर्क में रहते हैं। उनकी कृपा वर्षा को अनुभव करते हैं।

इस मार्ग को उपलब्ध करने वाले साधकों का अनुभव यही कहता है कि उनके सद्गुरु इस लोक में हों, या फिर किसी सुदूर लोक में, कोई अन्तर नहीं पड़ता। जिसे मार्ग मिल सका है, उसके कई चिह्न उनके जीवन में प्रकट हो जाते हैं। इन चिह्नों में सबसे महत्त्वपूर्ण चिह्न है, देहभाव का विलीन हो जाना। आचार्य शंकर कहते हैं देहादिभाव परिवर्तयन्त, परिवर्तित हो गए हैं देहभाव जिसके। इसका सार अर्थ इतना ही है कि उस पर बरसने वाली सद्गुरु की कृपा चेतना उसकी जैविक प्रवृत्तियों को आमूल- चूल बदल देती है। सच्चे शिष्य की देह दिखने में तो जस की तस बनी रहती है, पर उसकी प्रवृत्तियाँ घुल जाती हैं, धुल जाती हैं।

जैविक प्रवृत्तियों के रूपान्तरण के साथ ही शिष्य सतत् और निरन्तर अपने सद्गुरु की चेतना के लिए ग्रहणशील होता है। उसमें प्रकट होता है अडिग विश्वास, प्रबल निश्चय और व्यापक आत्मबोध। गुरुदेव उसे अपनी आत्मचेतना में स्वीकार लेते हैं। शिष्य उनकी सर्वव्यापी चेतना का अभिन्न अंश बन जाता है। उसके व्यक्तित्व से ऐसा प्रकाश फूटता है, जिससे कि उससे मिलने वालों का जीवन प्रकाशित हो जाता है। जिन्हें भी इसकी प्राप्ति हो सकी है, उन सभी के अन्तःकरण शान्ति से आप्लावित हो उठते हैं। इस सत्य के भेद और भी हैं। अगला सूत्र इस सत्य के नए आयाम उद्घाटित करेगा। 

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 37): जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शिष्य संजीवनी का यह सूत्र जितना गहन है, उतना ही रहस्यमय भी। इसे सही- सही वही अनुभव कर सकते हैं, जो अपने अन्तःकरण के महारण्य में मार्ग खोजने में लगे हैं। जो इस महत्कार्य में सम्पूर्ण तल्लीनता व तन्मयता से तत्पर हैं, उन्हीं में इस सूत्र से बिखर रही प्रकाश किरणें अवतरित हो पाएँगी। इस सूत्र के पहले जो भी सूत्र बताए गए थे, यह सूत्र उन सभी की अपेक्षा अति विशिष्ट है। इसकी पहली पंक्ति ‘भयंकर आँधी के पश्चात् जो निस्तब्धता छा जाती है, उसी में फूल खिलने की प्रतीक्षा करो, उससे पहले नहीं।’ सभी पंक्तियों का सार है।

हम सभी साधक- जो वर्षों से साधना कर रहे हैं, उनमें से प्रायः सभी को आँधियों का अनुभव है। हम सभी के अन्तर्गगन आँधियों के धूल- गुबार से भरे हुए हैं। संस्कारों, प्रवृत्तियों एवं कर्मों के भयावह जंगल में ये आँधियाँ जोर- शोर से उठती हैं। शुरूआती दौर में हम ज्यों- ज्यों साधना करते हैं, त्यों- त्यों इनका शोर बढ़ता है। आँधी की गर्द- गुबार तेज होती है। कभी- कभी तो इनके बढ़ने की दर साधना के बढ़ने के हिसाब से ही तेज होती है।

बड़ी विकट एवं विपन्न स्थिति होती है इस समय साधक की। ऐसे में उसके लिए गुरुभक्ति का ही सहारा होता है। गुरुभक्ति का रक्षा कवच ही उसे सुरक्षा प्रदान करता है। जो इस सुरक्षा का सम्बल बनाए अन्त तक टिके रहते हैं, उनके जीवन में आँधियों का यह शोर कम हो जाता है और इसका स्थान एक नीरव- निस्तब्धता ले लेती है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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शनिवार, 23 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 36) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


 लेकिन जब तक शिष्य का सम्पूर्ण देहभाव विघटित होकर घुल न जाएगा, जब तक समूची अन्तःप्रकृति आत्म सत्ता से पूर्ण हार मानकर उसके अधिकार में न आ जाएगी तब तक महासिद्धि के फूल नहीं खिल सकते। यह पुण्य क्षण तो तब आता है जब एक ऐसी शान्ति का उदय होता है, जो गर्म प्रदेश में भारी वर्षा के पश्चात छाती है। इस गहन और नीरव शान्ति में ही यह रहस्यमय घटना घटित होती है। जो सिद्ध कर देती है कि मार्ग प्राप्ति हो गयी है।

यह क्षण बड़ा मार्मिक है। सिद्धि के ये फूल बड़े अनोखे हैं। इनकी महक भी बड़ी अनूठी है। इन क्षणों के मर्म को वही अनुभव करते हैं जो इन्हें जी रहे हैं। जिनके हृदय अपने सद्गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण की सघनता से भरे हुए हैं। वे ही इस सत्य की संवेदना का स्पर्श कर पाते हैं। क्योंकि यही वे क्षण हैं जब शिष्यत्व का कमल सुविकसित व सुवासित होता है।

इन्हीं क्षणों में शिष्य की ग्रहण शक्ति जाग्रत् होती है। इस जागृति के साथ- साथ विश्वास, बोध और निश्चय भी प्राप्त होते हैं। ध्यान रहे, ज्यों ही शिष्य सीखने के योग्य हो जाता है, त्यों ही वह स्वीकृत हो जाता है। वह शिष्य मान लिया जाता है और परम पूज्य गुरुदेव उसे अपनी आत्म चेतना में ग्रहण कर लेते हैं।
 
यह घटना विरल होने पर भी सुनिश्चित है। क्योंकि जिस किसी शिष्य ने अपने शिष्यत्व का दीप जला लिया है, उसकी धन्यता छुपी नहीं रहती। उसके दीप की सुप्रकाशित ज्योति सब ओर फैले बिना नहीं रहती। अभी तक इस सूत्र के पहले जो भी नियम बताए गए हैं, वे नियम प्रारम्भिक हैं। ये और बाद में बताए जाने वाले अन्य सभी नियम परम- प्रज्ञा के मन्दिर की दीवारों पर लिखे हैं। जो शिष्य हैं- वे अच्छी तरह से जान लें कि जो मांगेंगे उन्हें जरूर मिलेंगे। जो पढ़ना चाहेंगे, वे अवश्य पढ़ेंगे और जो सीखना चाहेंगे, वे निश्चित रूप से सीखेंगे। इस सूत्र को पढ़ने वाले शिष्यों- इस पर गहन मनन करो। इस पर मनन करते हुए तुम्हें अविचल शान्ति प्राप्ति हो।
 
क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

Mutiny against faith and belief, thy name is corruption



Corruption - is not a thing, it is not an external object. It is an internal flaw in the character of a human being, which shakes up his moral and ethical foundations. It is a mental affliction.

Corruption pierces the boundaries of religion, sect, culture, society, history, clans and shows its presence everywhere. Today government, administration, politics, even our social life nothing is left untouched by corruption.

It has become an incurable epidemic. This is a global problem, it’s not about a country or a society.

Acharya Kautilya has described corruption in his epic work - Arthashastra (Science of means) - in the following way – “It is possible to track the flight of a bird flying high up in the sky, but its impossible to track the activities of people who abduct money from the royal treasury”.

Acharya Kautilya describes eight forms of corruption. They are - Suppression, Use, Behavior, Concealment, Deprivation, Consumption, Alteration and Forfeiture. In other words - pratibaṅdha or creating obstruction, prayoga or inappropriate usage, vyavahara or illicit trading, avastāra or faking accounts, pariahāyana or encouraging tax evasion, upabhoga or misappropriating funds for one’s own use, parivartana or exchange and apahāra or plundering.

General Nejushen has termed corruption as - Cancer of a nation. And according to him corruption is a product of a perverted mind. When a whole society becomes corrupt, it adversely affects the moral gauge of people and organizations. In them instead of honesty and truthfulness, selfishness and deceit flourish.

A Muslim scholar - Ibn Khaldun, 'Abd al-Rahman (1332-1406) has stated, “When a person gives in to consumerism, the desire to earn more than the current wages becomes quite strong”.

To achieve this he wants to break all the moral rules and boundaries and where this happens the "chain reaction" of corruption starts.

The word corruption is used in three contexts - bribes, extortion and favoritism.

All the three are of similar nature. If we analyze them, it would be like so - It always happens between more than one person. When a single person commits this crime its called cheating but when it transpires between a group of people its called corruption.

Chiefly it’s done in secret, behind closed doors. People deliberate between themselves and then for their own vested interests take action. Here, in such a fraud there is no explicit breaking of laws, but the fraud is executed with systematic precision.

Drafting a law cannot be the only option available to eradicate corruption. An individual’s strong moral character, honesty and courage are a must to tackle this vile demon. It requires both inner and outer strength to deal with the evils of corruption.

Therefore, people need to be educated to prevail over their weakness of greed (one’s own personal interest) and attachment (the interest of the near and dear ones) and become brave to act and be strong in character.

The widespread evil of corruption can be eradicated only when such thoughts and intents arise in people’s minds and they act on it.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
Akhand Jyoti May 2001 - Page 30

आस्था और विश्वास के प्रति विद्रोह का नाम है भ्रष्टाचार



 
भ्रष्टाचार भौतिक पदार्थ नहीं है। यह मनुष्य की अंतर्निहित चारित्रिक दुर्बलता है। जो मानव के नैतिक मूल्य को डिगा देती है। यह एक मानसिक समस्या है। भ्रष्टाचार धर्म, संप्रदाय, संस्कृति, सभ्यता, समाज, इतिहास एवं जाति की सीमाएँ भेदकर अपनी व्यापकता का परिचय देता है। वर्तमान समय में शासन, प्रशासन, राजनीति एवं सामाजिक जीवनचक्र भी इससे अछूते नहीं हैं। इसने असाध्य महामारी का रूप ग्रहण कर लिया है। यह किसी एक समाज या देश की समस्या नहीं है वरन् समस्त विश्व की है।

आचार्य कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध कृति “अर्थशास्त्र' में भ्रष्टाचार का उल्लेख इस तरह से किया है,” अपि शक्य गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम्| न तु प्रच्छन्नं भवानां युक्तानां चरतां गति। अर्थात् आकाश में रहने वाले पक्षियों की गतिविधि का पता लगाया जा सकता है, किंतु राजकीय धन का अपहरण करने वाले कर्मचारियों की गतिविधि से पार पाना कठिन है। कौटिल्य ने भ्रष्टाचार के आठ प्रकार बताये हैं। ये हैं प्रतिबंध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन एवं अपहार।

जनरल नेजुशन ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय कैंसर की मान्यता प्रदान की है। उनके अनुसार यह विकृत मन मस्तिष्क की उपज है। जब समाज भ्रष्ट हो जाता है, तो व्यक्ति और संस्थाओं का मानदंड भी प्रभावित होता है। ईमानदारी और सच्चाई के बदले स्वार्थ और भ्रष्टता फैलती है।

इस्लामी विद्वान् अब्दुल रहमान इबन खाल्दुन (1332-1406) ने कहा, व्यक्ति जब भोगवाद वृत्ति का अनुकरण करता है, तो वह अपनी आय से अधिक प्राप्ति की प्रबल कमाना करता है। इसलिए वह मर्यादा की हर सीमाएँ लाँघ जाना चाहता है और जहाँ ऐसा प्रयास सफल होता है, तो भ्रष्टाचार का 'चेन रिएक्शन' प्रारंभ होता है।

भ्रष्टाचार तीन तरह के अर्थों में प्रयुक्त होता है, रिश्वत, लूट-खसोट और भाई - भतीजावाद। इन तीनों की प्रकृति एक समान होती है। अगर इसके चरित्र का विश्लेषण किया जाए, तो इस तरह होगा, यह सदा एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है। जब यह दुष्कृत्य एक व्यक्ति द्वारा होता है, तो उसे धोखेबाज कहते हैं और एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है, तो भ्रष्टाचार कहलाता है। मुख्यतः यह गोपनीय कार्य है। व्यक्ति आपसी मंत्रणा कर अपने निहित स्वार्थ हेतु यह कदम उठाते हैं। इसमें नियम और कानून का खुला उल्लंघन नहीं
किया जाता है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से जालसाजी की जाती है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु केवल कानून बनाना ही एकमात्र विकल्प नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्ति के अन्दर चारित्रिक सुदृढ़ता, ईमानदारी और साहस होना अनिवार्य है। क्योंकि भ्रष्टाचार रूपी दैत्य से जूझने के लिए अंदर और बाहर दोनों मजबूत होना चाहिए। भ्रष्टाचार की जड़ें इन दोनों क्षेत्रों में गहरी हैं। अतः जागरूकता यह पैदा की जाए कि व्यक्ति को लोभ, मोह को छोड़कर साहस एवं बलशाली होना चाहिए। यह विचार एवं भाव सभी जनों के अंदर से उमगे, तो ही भ्रष्टाचाररूपी महाकुरीति का उन्मूलन संभव है।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखंड ज्योति - मई 2001 - पृष्ठ - 30

शिष्य संजीवनी (भाग 35) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


शिष्य संजीवनी के सेवन से शिष्यों को नवप्राण मिलते हैं। उनकी साधना में नया निखार आता है। अन्तःकरण में श्रद्धा व भक्ति की तरंगे उठती हैं। अस्तित्त्व में गुरुकृपा की अजस्र वर्षा होती है। यह ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है जिसे असंख्यों ने अनुभव किया है, और असंख्य जन अनुभव की राह पर चल रहे हैं। जिन्होंने निरन्तर अध्यात्म साधना के मान सरोवर में अवगाहन किया है, वे जानते हैं कि शिष्यत्व से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।

शिष्यत्व के मंदराचल से ही अध्यात्म का महासागर मथा जाता है। प्रखरता और सजलता की बलिष्ठ भुजाएँ ही इसे संचालित करती हैं। शिष्य- साधक की जिन्दगी में यदि ऐसा सुयोग बन पाए तो फिर जैसे अध्यात्म के महारत्नों की बाढ़ आ जाती है। शक्तियाँ, सिद्धियाँ और विभूतियाँ ऐसे शिष्य- साधक की चरण- चेरी बनकर रहती हैं।

यह दिव्य अनुभव पाने के लिए प्रत्येक साधक को अपने अन्तःकरण में मार्ग की प्राप्ति करनी होगी। यह महाकर्म आसान नहीं है। जन्म- जन्मान्तर के अनगिनत संस्कारों, प्रवृत्तियों से भरे इस भीषण अरण्य में यह महाकठिन पुरुषार्थ है। यह महापराक्रम किस तरह से किया जाय इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह आठवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है।

इसमें शिष्यत्व की महासाधना के परम साधक कहते हैं- ‘भयंकर आँधी के बाद जो नीरव- निस्तब्धता छाती है, उसी में फूलों के खिलने का इन्तजार करो। उससे पहले यह शुभ क्षण नहीं आएगा। क्योंकि जब तक आँधी उठ रही है, बवंडर उठ रहे हैं, महाचक्रवातों का वेग तीव्र है, तब तक तो बस महायुद्ध के प्रचण्ड क्षण हैं। ऐसे में तो केवल साधना का अंकुर फूटेगा, बढ़ेगा। उसमें शाखाएँ और कलियाँ फूटेंगी।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

माँ: ईश्वर का भेजा फ़रिश्ता



एक समय की बात है, एक बच्चे का जन्म होने वाला था. जन्म से कुछ क्षण पहले उसने भगवान् से पूछा:  मैं इतना छोटा हूँ, खुद से कुछ कर भी नहीं पाता, भला धरती पर मैं कैसे रहूँगा, कृपया मुझे अपने पास ही रहने दीजिये, मैं कहीं नहीं जाना चाहता।

भगवान् बोले,  मेरे पास बहुत से फ़रिश्ते हैं, उन्ही में से एक मैंने तुम्हारे लिए चुन लिया है, वो तुम्हारा ख़याल रखेगा।
 
पर आप मुझे बताइए, यहाँ स्वर्ग में मैं कुछ नहीं करता बस गाता और मुस्कुराता हूँ, मेरे लिए खुश रहने के लिए इतना ही बहुत है।

तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हारे लिए गायेगा और हर रोज़ तुम्हारे लिए मुस्कुराएगा भी. और तुम उसका प्रेम महसूस करोगे और खुश रहोगे।

और जब वहां लोग मुझसे बात करेंगे तो मैं समझूंगा कैसे, मुझे तो उनकी भाषा नहीं आती?

तुम्हारा फ़रिश्ता तुमसे सबसे मधुर और प्यारे शब्दों में बात करेगा, ऐसे शब्द जो तुमने यहाँ भी नहीं सुने होंगे, और बड़े धैर्य और सावधानी के साथ तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बोलना भी सीखाएगा।

और जब मुझे आपसे बात करनी हो तो मैं क्या करूँगा?

तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करना सीखाएगा, और इस तरह तुम मुझसे बात कर सकोगे।

मैंने सुना है कि धरती पर बुरे लोग भी होते है उनसे मुझे कौन बचाएगा?

तुम्हारा फरिश्ता तुम्हे बचाएगा, भले ही उसकी अपनी जान पर खतरा क्यों ना आ जाये।

लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूँगा क्योंकि मैं आपको नहीं देख पाऊंगा।

तुम इसकी चिंता मत करो; तुम्हारा फ़रिश्ता हमेशा तुमसे मेरे बारे में बात करेगा और तुम वापस मेरे पास कैसे आ सकते हो बतायेगा।

उस वक़्त स्वर्ग में असीम शांति थी, पर पृथ्वी से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी….बच्चा समझ गया कि अब उसे जाना है, और उसने रोते- रोते भगवान् से पूछा, हे ईश्वर, अब तो मैं जाने वाला हूँ, कृपया मुझे उस फ़रिश्ते का नाम बता दीजिये?

भगवान् बोले,  फ़रिश्ते के नाम का कोई महत्त्व नहीं है, बस इतना जानो कि तुम उसे “माँ” कह कर पुकारोगे।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

घास की रोटियां और कीचड़ का पानी पीने को मजबूर हैं बुंदेलखंड के किसान।


बालिका वधु की एक्ट्रेस प्रत्यूषा बनर्जी की मौत के दुःख ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया. टेलीविज़न पर भी स्टार्स और न्यूज़ एंकरों ने प्रत्युषा को लेकर जम कर बहस की. फेसबुक और ट्विटर पर हर दूसरा यूज़र प्रत्यूषा को श्रंद्धाजलि देने में लग गया. ऐसा लगा जैसे सारे देश में बस प्रत्यूषा ही एकलौता मुद्दा है, जिससे सब आहत हैं. ऐसा नहीं कि प्रत्युषा की मौत का दुःख लाज़मी नहीं था या उससे हमें दुःख नहीं. पर क्या आप जानते हैं कि हर रोज कितने किसान गरीबी की मार झेल कर मौत को गले लगाते हैं या बीती रात कितने लोग बगैर खाये सो गए थे? शायद नहीं. इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? वो लोग थोड़ी न कोई सेलेब्स हैं, जिनकी मौत का दुःख करके हम भी फेसबुक के ट्रेंड कर रहे ऑप्शन से लोगों की नज़रों में आ पाएंगे. अब कुछ लोग कह सकते हैं कि मीडिया जो दिखाता है हम वही देखते हैं. पर मीडिया को ये अधिकार दिया किसने? हमनें. जो TRP बढ़ाने के लिए हर वो खबर दिखाने पर आमादा है, जो उनकी जेब भरने में सहायक हो. इस सब के बीच में धरातल और सतही ख़बरें बेशक ही छूट क्यों न जाएं.


यह हालत है खुद को विकासशील कहने वाले भारत की, जहां के बुंदेलखंड में बीते 6 सालों में 3223 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. जबकि 62 लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर अपने पीछे छप्पर और मिट्टी वाले कच्चे मकान छोड़ गए हैं.


यहां सूखे का आलम यह है कि लोग भूख मिटाने के लिए घास से बनी रोटियां और कीचड़ से पानी निकाल कर पीने को मजबूर हैं.


देश तरक्की कर रहा है, हम सबको दिखाई दे रहा है. हमारी GDP भी आज विश्व सूचकांक पर अपनी स्थिति दर्ज करा रही है. रोज नई योजनाएं बनाई जा रही हैं, रोज नए वादे किये जा रहे हैं. पर असल में हमारे देश की क्या स्थिति है, ये हम खुद नहीं जानते.

जवान पिता बूढ़े हो जाते हैं..

 
हर साल सर के बाल कम हो जाते हैं

बचे बालों में और भी चांदी पाते  हैं 

चेहरे पे झुर्रियां बढ़ जाती हैं

रीसेंट पासपोर्ट साइज़ फोटो में कितना अलग नज़र आते हैं

"कहाँ पहले जैसी बात" कहते जाते हैं

देखते ही देखते, जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं.....


सुबह की सैर में चक्कर खा जाते हैं

मौहल्ले को पता पर हमसे छुपाते हैं 

प्रतिदिन अपनी खुराक घटाते हैं 

तबियत ठीक है, फ़ोन पे बताते हैं

ढीली पतलून को टाइट करवाते हैं

देखते ही देखते, जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


किसी का देहांत सुन घबराते हैं

और परहेजो की संख्यां बढ़ाते हैं 

हमारे मोटापे पे, हिदायतों के ढेर लगाते हैं

तंदुरुस्ती हज़ार नियामत, हर दफे  बताते हैं

"रोज की वर्जिश" के फायदे गिनाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


हर साल शौक से बैंक जाते हैं

अपने जिन्दा होने का सबूत दे कितना हर्षाते है 

जरा सी बड़ी पेंशन पर फूले नहीं समाते हैं

एक नई  "मियादी जमा" करके आते हैं

अपने लिए नहीं, हमारे लिए ही बचाते हैं 

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....

चीज़े रख कर अब अक्सर भूल जाते हैं

उन्हें  ढूँढने में सारा घर सर पे उठाते हैं

और मां को पहले की ही तरह हड़काते हैं

पर उससे अलग भी नहीं रह पाते हैं

एक ही किस्से को कितनी बार दोहराते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


चश्मे से भी अब
ठीक से नहीं देख पाते हैं

ब्लड प्रेशर की दवा लेने में
आनाकानी मचाते हैं

एलोपैथी के साइड इफ़ेक्ट बताते हैं

योग और आयुर्वेद की ही रट लगाते हैं

अपने ऑपरेशन को और आगे टलवाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


उड़द की दाल अब नहीं पचा पाते हैं

लौकी, तुरई और धुली मूंग ही अधिकतर खाते हैं

दांतों में अटके खाने को  तिल्ली से खुजलाते हैं

पर डेंटिस्ट के पास कभी नहीं जाते  हैं

काम चल तो रहा है की ही धुन लगाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


हर त्यौहार पर हमारे आने की बाट जोहते जाते हैं
अपने पुराने घर को नई दुल्हन सा चमकाते हैं
हमारी पसंदीदा चीजों के ढेर लगाते हैं

हर  छोटे-बड़ी  फरमाईश पूरी करने  के लिए
फ़ौरन ही बाजार दौडे चले जाते हैं

पोते-पोतियों से मिल कितने आंसू टपकाते हैं
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....

हर पिता को समर्पितं ..... सादर 🙏 🙏

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 34) :हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


बाहरी जीवन को पवित्र बनाते हुए समूचे साहस के साथ आगे बढ़कर मार्ग की शोध करो। कभी मत भूलो, जो मनुष्य साधना पथ पर चलना चाहता है उसे अपने सम्पूर्ण स्वभाव को बुद्धिमत्ता के साथ उपयोग में लाना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य अपने आप में खुद ही अपना मार्ग, अपना सच और अपना जीवन है। इस सूत्र को अपना कर उस मार्ग को ढूँढो।

उस मार्ग को जीवन और प्रकृति के नियमों के अध्ययन के द्वारा ढूँढों। अपनी आध्यात्मिक साधना एवं परा प्रकृति की पहचान करके इस मार्ग को ढूँढों। ज्यों- ज्यों सद्गुरु की चेतना के साथ तुम्हारा सान्निध्य सघन होगा, ज्यों- ज्यों तुम्हारी उपासना प्रगाढ़ होगी, त्यों- त्यों यह परम मार्ग तुम्हारी दृष्टि पथ पर स्पष्ट होगा।

उस ओर से आता हुआ प्रकाश तुम्हारी ओर बढ़ेगा और तब तुम इस मार्ग का एक छोर छू लोगे। और तभी तुम्हारे सद्गुरु का प्रकाश, हां उन्हीं सद्गुरु का प्रकाश, जिन्हें कभी तुमने देहधारी के रूप में देखा था, हां उनका ही प्रकाश एकाएक अनन्त प्रकाश का रूप धारण कर लेगा। उस भीतर के दृश्य से न भयभीत होओ और न आश्चर्य करो। क्योंकि तुम्हारे सद्गुरु ही सर्वेश्वर हैं।

जो गुरु हैं वही ईष्ट हैं। हां इतना जरूर है कि इस सत्य तक पहुँचने के पहले अपने भीतर के अन्धकार से सहायता लो और समझो कि जिन्होंने प्रकाश देखा ही नहीं है, वे कितने असहाय हैं और उनकी आत्मा कितने गहन अंधकार में है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 33) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


शिष्य संजीवनी का सीधा मतलब है शिष्यत्व का सम्वर्धन। जो शिष्य अपने शिष्यत्व के खरेपन के लिए सजग, सचेष्ट एवं सतर्क नहीं है, उनका मन रह- रहकर डगमगाता है। साधना पथ की दुष्कर परीक्षाएँ उनके साहस को कंपाती रहती हैं। उनका उत्साह एवं उल्लास कभी भी धराशाही हो जाता है। अन्तःकरण में उठने वाली अनेकों छद्म प्रवंचनाएँ उन्हें किन्हीं भी नाजुक क्षणों में बहकाने में समर्थ होती हैं। सन्देह एवं भ्रम के झोंके उनकी आस्थाओं को सूखे पत्तों की भांति कहीं भी किधर भी उड़ा ले जाते हैं।

ये विडम्बनाएँ हमारे अपने जीवन में न घटें इसके लिए एक ही सार्थक समाधान है कि अपना शिष्यत्व हरदम खरा बना रहे। अपने शिष्यत्व के परिपाक एवं निखार के लिए एक ही साधना व समाधान है। शिष्य संजीवनी का नियमित एवं निरन्तर सेवन। जो यह सेवनकर रहे हैं उन्हें इसके गुणों की अनुभूति भी हो रही है।

यह अनुभूति और भी अधिक स्पष्ट हो, अपना शिष्यत्व और भी अधिक प्रमाणिक हो, इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह सातवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है। इसमें कहा गया है- मार्ग की शोध करो। थोड़ा ठहरो और सोचो कि तुम सचमुच ही गुरु भक्ति का मार्ग पाना चाहते हो या फिर तुम्हारे मन में ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिए, आगे बढ़ने और एक भव्य भविष्य निर्माण करने के लिए स्वपन हैं।

सावधान! केवल और केवल गुरुभक्ति के लिए ही मार्ग को प्राप्त करना है। ध्यान रहे गुरुभक्ति किसी महत्त्वाकांक्षा पूर्ति का साधन बनकर कलंकित न होने पाए। इसके लिए कहीं बाहर भटकने की बजाय अपने अन्तःकरण में समाहित होकर मार्ग की शोध करो।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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बुधवार, 13 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 32) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी

 
अन्तरात्मा की इस शुद्ध भावदशा में ही आत्मा की सम्पदा प्रकट होती है। सूर्य की रश्मियों की भाँति ही आत्मा की सम्पत्तियां साधक में प्रकट होती है। यहीं पर शिष्य के जीवन में, साधक के जीवन में सच्चा स्वामित्व विकसित होता है। इसी स्वामित्व की चाहत शिष्य के जीवन में होनी चाहिए। दुनियावी जीवन में हम स्वामित्व की चाहत तो रखते हैं पर यह चाहत होती धन, साधन, भवन- सम्पत्ति का स्वामी बनने की। स्वयं का स्वामी भला कौन होना चाहता है? हालांकि जो स्वयं का स्वामी है, अपना मालिक है वही सच्चे अर्थों में स्वामी है। बाकी सब तो धोखा है। धन, दुकान- मकान का मालिक बनकर हम केवल गुलाम बनते हैं।

इस अटपटे वचन को समझने के लिए सूफी सन्त फरीद के जीवन की एक घटना को समझ लेना ठीक रहेगा। बाबा फरीद अपने शिष्यों के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे। वहीं रास्ते में एक आदमी अपनी गाय को रस्सी से बांधे लिए जा रहा था। फरीद ने उस आदमी से थोड़ी देर रुकने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर वह रुक गया। अब बाबा फरीद ने अपने शिष्यों से पूछा- इन दोनों में मालिक कौन है- गाय या आदमी। शिष्यों ने कहा- यह भी कोई बात हुई, जाहिर है, आदमी गाय का मालिक है।

फरीद ने फिर कहा- यदि गाय के गले की रस्सी काट दी जाय तो कौन किसके पीछे दौड़ेगा- गाय आदमी के पीछे या फिर आदमी गाय के पीछे। शिष्यों ने कहा- जाहिर है आदमी गाय के पीछे भागेगा। तो फिर मालिक कौन हुआ? फरीद ने शिष्यों से कहा, यह जो रस्सी तुम्हें दिखाई पड़ती है गाय के गले में, यह दरअसल आदमी के गले में है। आत्मा की सम्पत्ति को छोड़कर बाकी हर सम्पत्ति हमारे गले का फंदा बन जाती है। यथार्थ में आत्म सम्पदा ही सच्ची सम्पदा है। सच्चे शिष्य ही इसे पाने में समर्थ होते हैं। शिष्यत्व की यह सामर्थ्य किस तरह बढ़े- इसका विवरण अगले पृष्ठों में अनावृत्त होगा।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 31) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी


शक्ति के साथ शान्ति की चाहत भी शिष्यत्व की एक कसौटी है। और इस तरह का मेल भी बड़ा विरल है। क्योंकि दुनियादारी से भरे जीवन में शक्ति अशान्ति का पर्याय बनकर ही आती है। जितनी ज्यादा शक्ति, जितना ज्यादा रूतबा- मर्तबा उतनी ही ज्यादा अशान्ति। इसका कारण एक ही है कि दुनियादारी में शक्ति के मायने अहंता के पोषण के सिवा और कुछ नहीं। और अहंता का पोषण अशान्ति से ज्यादा और कुछ भी नहीं दे सकता।

अहंता- जितनी बढ़ेगी अशान्ति भी उतनी ही बढ़ेगी। परन्तु शिष्यत्व की साधना में ये सारे समीकरण एकदम उलट जाते हैं। शिष्य की शक्ति तो समर्पण की शक्ति की है। अहंता के विसर्जन और विलीनता की शक्ति है। यह शक्ति ज्यों- ज्यों बढ़ती है, त्यों- त्यों शान्ति भी बढ़ती है। क्रमिक रूप में यह सघन और प्रगाढ़ होती जाती है।

इस शक्ति और शान्ति के प्रसार के साथ साधक का अन्तर्मन एवं अन्तःकरण पवित्र एवं निर्मल होता जाता है। शिष्य के जीवन में पवित्रता की बाढ़ आती है। भक्ति का समुद्र उमड़ता है। निर्मल भावनाओं का तूफान उठता है। अन्तःकरण के ऐसे वातावरण में शिष्य की आत्मा उत्तरोत्तर विकसित होती है। उसमें सद्गुरु कृपा का सहज अवतरण होता है। गुरुकृपा की अनुभूति की सहज अवस्था यही है।

इस अवस्था को पाए बिना गुरुकृपा का रहस्य कभी भी अनुभव नहीं हो पाता। यह दुर्लभ अनुभूति जिन्हें हुई है अथवा जिन्हें हो रही है वही हां केवल वही इस सत्य को समझ सकते हैं। बाकी के पल्ले तो केवल बौद्धिक तर्क- वितर्क का संजाल ही पड़ता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 30) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी


शिष्य संजीवनी के इस सूत्र में श्रुतियों का सार है, सन्त वचनों की पवित्रता है, सिद्ध परम्परा का रहस्य है। बड़े ही गुह्य एवं अटपटे भाव हैं इस सूत्र के। सूत्र की पहली बात में ही बड़ी उलटबांसी है। सामान्य जीवन की रीति यही है कि शक्ति की अभीप्सा इसलिए की जाती है कि लोगों की नजर में, जन समुदाय के बीच में अपने अहंकार को प्रतिष्ठित किया जा सके।

अहंता की प्रतिष्ठा जितनी ज्यादा होती है, लोगों की नजर में व्यक्ति का रूतबा, दबदबा, मर्तबा उतना ही ज्यादा होता है। उसकी बड़ी धाक होती है सबकी दृष्टि में। सभी उससे डरते, दबते या घबराते हैं। जितना ज्यादा मान उतनी ही ज्यादा शक्ति। यही सोच है जमाने की। यही चलन है दुनिया की। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि मान पाने के लिए, मर्तबा पाने के लिए लोग शक्ति की चाहत रखते हैं।

लेकिन शिष्य के जीवन में तो इसका अर्थ ही उल्टा है। शिष्य तो शक्ति इसलिए चाहता है कि वह स्वयं को पूरी तरह से अपने सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर सके। अपने अस्तित्त्व को गुरुदेव के अस्तित्त्व को विलीन कर सके। समर्पण की साधना के लिए विसर्जन की भावदशा के लए, विलीनता की अनुभूति के लिए गहन शक्ति की आवश्यकता है। यह काम थोड़ी- बहुत शक्ति से नहीं हो सकता। अपने बिखरे हुए अस्तित्त्व को समेटना, एकजुट करना और फिर उसे गुरुदेव के अस्तित्त्व में मिला देना बड़े साहस का काम है।

इसके लिए महान् शक्ति चाहिए। अपने को बनाने, बड़ा सिद्ध करने के लिए तो सभी प्रयासरत रहते हैं। परन्तु स्वयं को मिटाने, विसर्जित करने के लिए विरले ही तैयार होते हैं। शिष्य को यही विरल काम करना होता है। उसे अपने शिष्यत्व का खरापन साबित करने के लिए स्वयं को पूरी तरह मिटा देना होता है। उसे लोगों की नजर में नहीं भगवान् और अपने सद्गुरु की नजर में खुद को प्रमाणित करना होता है। जो ऐसा करने में समर्थ होता है वही खरा शिष्य बन पाता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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