सोमवार, 4 दिसंबर 2017

👉 युग निर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 2)

🔶 मनुष्यों के सम्पर्क में जो आ गये हैं, उन प्राणियों के दुःखी होने के कारण हैं। उनको मनुष्यों ने पाल रखा है, वे दुःखी भी हो सकते हैं, काटे भी जा सकते हैं, घायल भी हो सकते हैं, लेकिन जो प्रकृति की गोद में रहते हैं, उनके सामने कोई समस्या नहीं है, जीवनयापन करने के सम्बन्ध में फिर मनुष्य के सामने इतनी समस्याएँ क्यों? मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी है, प्रगतिशील प्राणी है, उन्नत प्राणी है, उसके सामने तो सुख-सुविधाओं के अम्बार होने चाहिए।
                
🔷 लेकिन हम देखते हैं कि दूसरे प्राणियों की तुलना में मनुष्य बहुत दुःखी है। उसका एकमात्र कारण यह है कि उसकी विचारणाएँ, उसकी भावनाएँ, उसके दृष्टिकोण निम्न स्तर के होते चले गये। अगर यह स्तर उनका ऊँचा उठा रहा होता तो अभावग्रस्त स्थितियों में भी मनुष्य ने शान्ति का जीवन जिया होता। कहा जाता है कि सम्पदाएँ मनुष्य के पास होंगी, सुख-सुविधाएँ मनुष्य के पास होंगी तो वह समुन्नत होगा, सुखी रहेगा और आनन्द से रहेगा, लेकिन बात सही नहीं है। गरीब लोगों के पास जिनके पास साधन और सामान नहीं होते, सम्पत्ति नहीं होती, वह भी बड़ी सुख और सुविधा का जीवन जीते हैं और उनकी वृद्धि का कोई मार्ग रुका नहीं रहता। ऋषियों का जीवन इसी प्रकार का था। उनके सामने ज्यादा अभावी दुनिया में कोई भी नहीं है।
   
🔶 पहनने के नाम पर एक लँगोटी, इस्तेमाल करने के नाम पर एक कमण्डलु, फूस की झोंपड़ी, जमीन पर सोना, फूस की बिछावन, घास-पात और कन्द-मूल खा करके गुजारा कर लेना। इतना सब होते हुए भी ऋषियों ने बताया कि अभावग्रस्तता में भी सुखी जीवन बन सकता है, सुख और शान्ति का स्त्रोत बन सकता है। इन परिस्थितियों में भी विद्या अध्ययन में कोई रुकावट पैदा नहीं हुई। मगर सही बात यह है कि जिन-जिन लोगों के पास विशेष सुविधाएँ थीं, उन लोगों की अपेक्षा उन लोगों ने ज्यादा सुखी और समुन्नत जीवन जिया। ये बात उन्होंने साबित करने के लिए की थी कि वक्त-बेवक्त सुविधाएँ न हो, साधन मनुष्य के पास न हों तो भी वह आदमी सुखी जीवन जी सकता है, समुन्नत जीवन जी सकता है और दूसरों के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता है। फर्क केवल एक ही है कि भावनात्मक स्तर ऊँचा उठा हुआ हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

रविवार, 3 दिसंबर 2017

👉 युगनिर्माण योजना और उसके भावी कार्यक्रम (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो!!

🔶 युगनिर्माण योजना का प्रारम्भ इस उद्देश्य से हुआ कि मनुष्य की भावनात्मक स्थिति में परिवर्तन किया जाए और उसे ऊँचा उठाया जाए। संसार में जितनी भी समस्याएँ हैं, उन सारी समस्याओं का एकमात्र उपाय यह है कि मनुष्यों का भावनात्मक स्तर ऊँचा हो तो जो समस्याएँ आज हमको दिखाई पड़ती हैं, उनमें से एक का भी अस्तित्व न रहे। जितनी भी कठिनाइयाँ मनुष्य के सामने हैं, वे उसकी स्वयं की पैदा की हुई हैं, वास्तविक नहीं। सृष्टि में जितने भी जीव रहते हैं, सारे के सारे अपने जीवन की सुविधाओं को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। कीड़े-मकोड़ों से लेकर जलचर, नभचर और थलचर तक के सामने कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसके कारण से वह दुःखी रहते हों।
               
🔷 मनुष्यों के सम्पर्क में जो आ गये हैं, उन प्राणियों के दुःखी होने के कारण हैं। उनको मनुष्यों ने पाल रखा है, वे दुःखी भी हो सकते हैं, काटे भी जा सकते हैं, घायल भी हो सकते हैं, लेकिन जो प्रकृति की गोद में रहते हैं, उनके सामने कोई समस्या नहीं है, जीवनयापन करने के सम्बन्ध में फिर मनुष्य के सामने इतनी समस्याएँ क्यों? मनुष्य तो बुद्धिमान प्राणी है, प्रगतिशील प्राणी है, उन्नत प्राणी है, उसके सामने तो सुख-सुविधाओं के अम्बार होने चाहिए।
   
🔶 लेकिन हम देखते हैं कि दूसरे प्राणियों की तुलना में मनुष्य बहुत दुःखी है। उसका एकमात्र कारण यह है कि उसकी विचारणाएँ, उसकी भावनाएँ, उसके दृष्टिकोण निम्न स्तर के होते चले गये। अगर यह स्तर उनका ऊँचा उठा रहा होता तो अभावग्रस्त स्थितियों में भी मनुष्य ने शान्ति का जीवन जिया होता। कहा जाता है कि सम्पदाएँ मनुष्य के पास होंगी, सुख-सुविधाएँ मनुष्य के पास होंगी तो वह समुन्नत होगा, सुखी रहेगा और आनन्द से रहेगा, लेकिन बात सही नहीं है। गरीब लोगों के पास जिनके पास साधन और सामान नहीं होते, सम्पत्ति नहीं होती, वह भी बड़ी सुख और सुविधा का जीवन जीते हैं और उनकी वृद्धि का कोई मार्ग रुका नहीं रहता। ऋषियों का जीवन इसी प्रकार का था। उनके सामने ज्यादा अभावी दुनिया में कोई भी नहीं है।

🔷 पहनने के नाम पर एक लँगोटी, इस्तेमाल करने के नाम पर एक कमण्डलु, फूस की झोंपड़ी, जमीन पर सोना, फूस की बिछावन, घास-पात और कन्द-मूल खा करके गुजारा कर लेना। इतना सब होते हुए भी ऋषियों ने बताया कि अभावग्रस्तता में भी सुखी जीवन बन सकता है, सुख और शान्ति का स्त्रोत बन सकता है। इन परिस्थितियों में भी विद्या अध्ययन में कोई रुकावट पैदा नहीं हुई। मगर सही बात यह है कि जिन-जिन लोगों के पास विशेष सुविधाएँ थीं, उन लोगों की अपेक्षा उन लोगों ने ज्यादा सुखी और समुन्नत जीवन जिया। ये बात उन्होंने साबित करने के लिए की थी कि वक्त-बेवक्त सुविधाएँ न हो, साधन मनुष्य के पास न हों तो भी वह आदमी सुखी जीवन जी सकता है, समुन्नत जीवन जी सकता है और दूसरों के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध हो सकता है। फर्क केवल एक ही है कि भावनात्मक स्तर ऊँचा उठा हुआ हो।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आत्मचिंतन के क्षण 3 Dec 2018

🔶 हर वक्त शंकित रहने वाले, प्रत्येक काम में कोई नुक्स निकालने वाले, हर किसी की आलोचना करने वाले, छिद्रान्वेषी व्यक्ति अपनी आन्तरिक दुर्बलता का परिचय देते हैं। भय और शंका जिनके मन में जम जाते हैं वे हर वक्त डरते रहते हैं, असफलता, गन्दगी और आशंका ही हर तरफ उन्हें दिखाई देती है। वे अपने लिये कोई काम चुन नहीं पाते। जो करते हैं उसमें सन्तुष्ट नहीं रहते, अपने काम को तुच्छ, निन्दनीय, हानिकारक मानते हैं और उसे छोड़ने की बात बार-बार कहते रहते हैं। छोड़ भी नहीं पाते। क्योंकि नया कदम उठाने लायक साहस उनमें नहीं होता। पुराने को ठीक तरह कर नहीं पाते। कर तो तभी पावें जब उसकी श्रेष्ठता और सफलता पर उन्हें विश्वास हो!

🔷 ओछे आदमी का एक चिन्ह यह है कि वह अपने बारे में ही सदा सोचता रहता है। अपना लाभ, अपनी हानि, अपनी भूल, अपना भविष्य, अपनी कठिनाई, अपना न्याय, अपना स्वास्थ्य, अपनी प्रतिष्ठा, अपना दुर्भाग्य, अपना स्वर्ग, अपनी मुक्ति आदि बातें ही उसके चिन्तन का मुख्य विषय होती हैं। दूसरों से जब भी बात करेगा अपना रोना रोवेगा, अपनी शेखी मारेगा। वह यह भूल जाता है कि दूसरों को तुम्हारे रोने गाने सुनने की न तो फुरसत है और न उसमें कोई दिलचस्पी। हर आदमी अपनी जिम्मेदारियों से लदा हुआ है, उसे दूसरे की सहानुभूति या सहायता चाहिए। यह जानते हुए भी जो लोग अपनी राम कहानी ऐसे लोगों को सुनाते हैं जो उसको हल नहीं कर सकते तो ऐसा सुनाना एक प्रकार से उनका समय नष्ट करना ही है। ऐसे सिर खाऊ लोगों को भला कौन पसन्द करेगा?

🔶 आलस, गन्दगी और अव्यवस्था भी ऐसे दुर्गुण हैं जो यह साबित करते हैं कि यह व्यक्ति अपने आप से लापरवाह है। जो अपने समय की, सामान की, शरीर की, वस्त्रों की, कार्यक्रमों की व्यवस्था नहीं कर सकता या नहीं करना चाहता, उसे जीवट का, जोरदार, सावधान या चैतन्य नहीं कहा जा सकता। ढीले-पोले, अस्त-व्यस्त स्वभाव के लोग वस्तुतः इसी लायक हैं कि उन्हें दूसरे आदमी हल्की निगाह से देखें। अपना चलना, उठना, बैठना, कपड़े पहनना, हजामत, बातचीत सभी में एक व्यवस्था, तेजी तथा सावधानी हो, तभी किसी की आँखों में हम सतर्क, सावधान एवं प्रगतिशील जँच सकते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आज का सद्चिंतन 3 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 Dec 2017


शनिवार, 2 दिसंबर 2017

👉 विद्या से विनय-

🔷 महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया। साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये। यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी। गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था। अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये।

🔶 निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया। उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ। दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया। वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है।
 
🔷 महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये। मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये। चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है। किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है। जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे?

🔶 पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये। महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—”अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था।”
 

👉 आज का सद्चिंतन 2 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Dec 2017

👉 The Angels on Earth

🔶 There are people who are not attracted by worldly vices and have dedicated their lives for social uplift. Such people are really the angles on this Earth. Ancient India had an abundance of such angels. A long time ago, there ruled an Indian king called Bindujaat. One day he decided that all the monks in his empire be distributed gold coins for their livelihood. He assigned this task to his trusted councilor Gritsmud. For several days Gritsmud roamed around the kingdom but could not distribute a single coin. At last he came back to the king and returned all the gold coins.

🔷 Surprised, the King asked, "Couldn't you find a single needy monk in the entire kingdom, who would accept my help?" Gritsmud drew a deep breath and said, "O great King I have indeed failed to implement your orders. There is no shortage of monks who have dedicated their entire lives for missions of social uplift, but they have reduced their own personal needs to such an extent that they do not need our help. If you really wish to spend this wealth on monks, you have to invest it to their missions, since none of them is ready to accept it for their personal use."

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Dec 2017

🔶 युग निर्माण का महान् कार्य आज की प्रचण्ड आवश्यकता है। जिस खंडहर स्थिति में हमारे शरीर, मन और समाज के भग्नावशेष पड़े हैं, उन्हें उसी दशा में पड़े रहने देने की उपेक्षा जिन्हें संतोष दे सकती हैं उन्हें जीवित मृत ही कहना पड़ेगा। आज बेशक ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब रखने की नीति पसंद है, पर ऐसे लोगों का बीज नष्ट नहीं हुआ है जो परमार्थ की महत्ता समझते हैं और लोकहित के लिए यदि उन्हें कुछ प्रयत्न या त्याग करना पड़े तो उसके लिए भी इंकार न करेंगे।     

🔷 अखण्ड ज्योति का प्रत्येक सदस्य अब एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रहेगा, वरन् वह एक लोकशिक्षक के रूप में अपना उत्तरदायित्व अनुभव करें। युग निर्माण के लिए आवश्यक प्रकाश अखण्ड ज्योति प्रस्तुत करेगी, वह एक बिजलीघर के रूप में रहेगी और हममें से प्रत्येक एक बल्ब के रूप में प्रकाशित होकर अपने क्षेत्र में प्रकाश फैलाएँ। अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है, इसी अंधकार में नाना प्रकार के पाप पनपते हैं। 

🔶 अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को प्रातःकाल का समय ईश्वर चिन्तन के लिए और सायंकाल का समय आत्म-निरीक्षण के लिए नियत करना चाहिए। असुविधा और परिस्थितियों के कारण इसमें कुछ व्यतिरेक होना क्षम्य भी कहा जा सकता है, पर शैय्या पर नींद खुलने से लेकर जमीन पर पैर रखने के बीच का जो थोड़ा सा समय रहता है वह अनिवार्य रूप से हममें से हर एक को ईश्वर चिंतन में लगाना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 बड़प्पन की सही कसौटी

🔷 वैभव के आधार पर बड़प्पन आँकने की प्रथा इस संसार में है। जिनके पास जितनी संपदा, शिक्षा एवं चतुरता है, उसी अनुपात से उसके बड़प्पन का मूल्य आँका जाता है। बलिष्ठता और प्रतिभा भी उसी वर्ग में आती है, जो दूसरों पर अपनी छाप छोड़ती है तथा धाक जमाती है। लोग उग्रता, आतंकवाद, दुष्टता और हानि पहुंचाने की शाक्ति को देखते हुए भी डरते हैं, मान देते हैं।  

🔶 बड़प्पन के मूल्यांकन की यह सभी कसौटियाँ ओछी तथा खोटी हैं। इनके सहारे हम किसी व्यक्ति का सही मूल्यांकन नहीं कर सकते। कसौटी ही खोटी हो, तो सोने और पीतल का अन्तर कैसे जाना जाय?

🔷 व्यक्तित्व की वास्तविक ऊँचाई उसकी सुसंस्कारिता के आधार पर आँकी जानी चाहिए। देखा जाना चाहिए कि किसने अपने आप में गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में कितनी उत्कृष्टता अपनाई है और निजी चरित्र तथा दूसरों के साथ सद्व्यवहार में किस सीमा तक अपनी विशिष्टता अपनाई है।

🔶 जो अपने को जितना संयत, सज्जन और अनुशासित बना सका, वह उतना ही महान् है। धर्म- चिह्नो या प्रचलनों से कोई धर्मात्मा नहीं बनता। जिसने आदर्शांे के प्रति अपनी निष्ठा जिस सीमा तक परिपक्व की है, वस्तुतः उसी का बड़प्पन सफल और सराहनीय है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

👉 श्रम से अधिक वेतन

🔶 जार्ज बर्नार्डशॉ को अपने आरम्भिक जीवन में एक अच्छी नौकरी मिली। उस नौकरी में काम कम और वेतन अधिक था। शॉ ने यह कहकर इस्तीफा दे दिया कि जितना पैसा मुझे मिलता है उतना काम मेरे पास नहीं है। यह एक आश्चर्यजनक त्यागपत्र था।

🔷 हरामखोरी करके भी श्रम से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले इस घटना से कुछ सीख सकते हैं।

👉 नियत कर्तव्यों का पालन

🔷 क्रान्तिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को जिस दिन फाँसी लगनी थी उस दिन सवेरे जल्दी उठकर वे व्यायाम कर रहे थे। जेल वार्डन ने पूछा आज तो आप को एक घंटे बाद फाँसी लगने वाली है फिर व्यायाम करने से क्या लाभ? उनने उत्तर दिया- जीवन आदर्शों और नियमों में बँधा हुआ है जब तक शरीर में साँस चलती है तब तक व्यवस्था में अन्तर आने देना उचित नहीं है।

🔶 थोड़ी सी अड़चन सामने आ जाने पर जो लोग अपनी दिनचर्या और कार्य व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देते हैं उनको बिस्मिल जी मरते मरते भी अपने आचरण द्वारा यह बता गये है कि समय का पालन, नियमितता एवं धैर्य ऐसे गुण हैं जिनका व्यक्तिक्रम प्राण जाने जैसी स्थिति आने पर भी नहीं करना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (अन्तिम भाग)

🔶 आज गुरुपूर्णिमा का त्यौहार है। हम आपको बता रहे हैं कि भगवान् का नया अवतार होने जा रहा है। आज की परिस्थितियों के अनुरूप यह अवतार है। जब-जब दुष्टता बढ़ती है, तब-तब देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप भगवान् अवतार के रूप में जन्म लेते हैं। आज आस्थाओं में, जन-जन के मन-मन में असुर घुस गया है। इसे विचारों की विकृति कह सकते हैं। एक किश्त आज के अवतार की आज से २५०० वर्ष पूर्व बुद्ध के रूप में, विचारशील के रूप में आई थी। वही प्रज्ञा की, विवेक की, विचारों कह अब पुनः आई है। वह है गायत्री मन्त्र ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में। यह अवतार जो आ रहा है विचारों के संशोधन के रूप में दिमागों में ही नहीं, आस्थाओं में भी हलचलें पैदा करेगा।
                
🔷 विचार-क्रान्ति के रूप में जो आ रही है वह युगशक्ति गायत्री है। यह गायत्री हिन्दुस्तान मात्र की नहीं, सारे विश्व की है। नये विश्व की माइक्रोफिल्म इसमें छिपी पड़ी है। गायत्री मन्त्र विश्व मन्त्र है। व्यक्ति का अन्तस् व बहिरंग बदलने वाले बीज इस मन्त्र के अन्दर छिपे पड़े हैं। यदि आपको यह बात समझ में आ गई तो आप हमारे साथ नवयुग का स्वागत करने में जुट जाएँगे। हम अपने लिए एक ही नाम बताते हैं मुर्गा। मुर्गा वह जो प्रभात के आगमन का उद्घोष करें कि नवप्रभात आ रहा है, नया युग आ रहा है, युगशक्ति का अवतरण हो रहा है, कुकुडूकूँ........। यह तो मुर्गा करता है। हम नए युग की अगवानी करें।
    
🔶 हम गायत्री की फिलॉसफी व युग के देवता विज्ञान की बात आपको बताते आए हैं। यह ब्रह्मविद्या घर-घर पहुँचे, इसमें आप सबका सहयोग चाहते हैं। जैसे सेतुबन्ध के लिए, गोवर्धन के लिए, अवतारों को सहयोग मिला, हम भी चाहते हैं कि आप भी इस प्रवाह में सम्मिलित हो जाएँ। आपको भी बाद में लगेगा कि हम भी समय पर जुड़ गए होते तो अच्छा रहता। युगशक्ति का उदय एवं अवतरण हो रहा है। आप इस अवतरण में एक हाथ भर लगा दें। आपकी गणना युगान्तरकारी पुरुषों में होने लगेगी।

🔷 आप समय दीजिए, पैसा दीजिए। यह सोचकर नहीं कि हमारा काम रुकेगा। आप अपनी श्रद्धा को परिपक्व करने के लिए जो भी कर सकें वह कीजिए। हमें देने से, हमें गुरुदीक्षा से मतलब है। घर-घर, जन-जन तक गायत्री का सद्ज्ञान पहुँचाने का काम करना। दवा तो हमारे पास है आस्थाओं में छाई विषाक्तता की। आप मात्र सुई बन जाइए। आज की गुरुपूर्णिमा के दिन सम्पूर्ण समर्पण की, युगदेवता के काम के लिए खपने की मैं आपसे अपेक्षा रखता हूँ। आशा है आप मेरी इच्छा पूरी करेंगे।

🔶 अन्त में यह कामना करते हैं कि जिस श्रद्धा ने हमारा कल्याण किया, वह आपका भी कल्याण करे, ताकि आप महान् बनने के अधिकारी हो सकें। आप सबका कल्याण हो, सब स्वस्थ हों, सबका समर्पण भाव बढ़ा रहे।

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखमाप्नुयात् ।।

आज की बात समाप्त।
ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 आज का सद्चिंतन 1 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 Dec 2017


👉 महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन व् दिखावे में नहीं।

🔴 “मैं भी एक सम्पन्न घराने का था, पर जुए और शराब की लत ने मुझे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया” एक व्यक्ति अपनी करुण कथा दीनबन्धु एंड्रयूज से कह रहा था -”माता-पिता के प्यार और भाई-बहन के स्नेह से वंचित होना पड़ा। तभी से दर-दर की खाक छान रहा हूँ और अब स्थिति ऐसी है कि खाने के भी लाले पड़ रहे हैं। इसी मजबूरी ने चोरी करना भी सिखा दिया और कई वर्षों की जेल की सजा भी काट चुका हूँ। मेहनत-मजदूरी करते बन नहीं पड़ता। स्वास्थ्य भी साथ नहीं देता और फिर ऊपर से कोढ़ में खाज की तरह टी.बी. की शिकायत! जीवन से ऊब चुका हूँ। आत्महत्या करने को जी चाहता है।”

🔵 दीनबन्धु बड़ी धैर्य से उसकी कथा सुन रहे थे। सब कुछ सुनने के उपरान्त उनने प्रश्न किया- क्या तुम्हें पता नहीं बुरी आदतों का परिणाम भी बुरा होता है? व्यक्ति ने सकारात्मक जवाब में सिर हिला दिया।

🔴 “फिर तुमने यह गलती क्यों की?” दीनबन्धु का सवाल था।

🔵 कुछ तो मित्रों के बहकावे में आकर और कुछ बड़प्पन का अहंकार जताने हेतु।

🔴 दीनबन्धु उसे समझाने की दृष्टि से कहने लगे- व्यक्ति यहीं भ्रमित हो जाता है। यह समझता है कि वह पड़ोसियों पर, समाज पर ऐसे कृत्यों द्वारा अपनी छाप डाल लेगा। लोग उसे बड़ा प्रगतिशील, सभ्य, और आधुनिक मानने लगेंगे, पर होता ठीक इसके विपरीत है। उन्हीं के बिरादरी वाले ऐसे लोगों को बड़ा और आधुनिक मान सकते हैं, पर यदि कोई सचमुच ही विचारशील व्यक्ति हो, तो इस आधुनिक सभ्यता, और चिन्तन-चेतना की प्रवृत्ति द्वारा स्वयं को बड़ा बनाने और कहलाने को कभी उचित नहीं ठहरायेगा। व्यक्ति बड़ा और महान बाह्याडम्बर से पहनावे-ओढ़ावे से नहीं, वरन् कर्त्तृत्व से बनता है, चिन्तन-चरित्र से बनता है और यदि यह सब ओछे और बचकाने हों, तो भले ही आडम्बर का ढकोसला वह ओढ़े रहे, पर वास्तविकता जग-जाहिर हो ही जाती है और लोग उसके तथाकथित ‘बड़प्पन’ पर उँगली उठाने लगते हैं। याद रखो महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन में नहीं।”

🔴 व्यक्ति का समाधान हो चुका था। वह बड़ी आर्तदृष्टि से दीनबन्धु की ओर देख रहा था, जैसे उसे अपना अपराध-बोध हो गया हो और वह उसे स्वीकार रहा हो। दीनबन्धु ने उसे कई महीनों तक अपने साथ रखा एवं उसका उपचार कराया। अनेक महीनों के पश्चात् जब उसका स्वास्थ्य और रोग लगभग सही हो गया, तो उनने युवक से कहा-”अब तुम जा सकते हो, पर फिर से इन गंदी लतों को पास फटकने मत देना और कहीं मेहनत-मजदूरी कर ईमानदारी की जिन्दगी जीना।”

🔵 व्यक्ति उनकी नसीहत की स्वीकारोक्ति में नतमस्तक हो प्रणाम कर चल पड़ा। अनेक वर्षों बाद एक सुबह दीनबन्धु की झोंपड़ी के सामने आकर एक कार रुकी। उससे सीधे-साधे लिबास में एक प्रौढ़ सा दीखने वाला व्यक्ति उतरा। दरवाजा खटखटाया। कुछ क्षण पश्चात् दीनबन्धु बाहर आये। व्यक्ति ने भाव विभोर होकर कहा-”पहचाना।” दीनबन्धु असमंजस में पड़ गये तभी अपना परिचय न देते हुए उसने कहा “ मैं वही हूँ, जिसने आपसे अमुक महीनों तक सेवा करवायी थी।”

🔴 परिचय पाकर दीनबन्धु ने मुस्कराते हुए कहा-”अरे! तुम। अन्दर आओ।” व्यक्ति ने संक्षेप में अपनी प्रगति-कथा सुनायी कि किस तरह अखबार बेचते हुए आज वह एक फैक्ट्री का मालिक बन गया है। वह अपने साथ ढेर सारे उपहार और एक प्रस्ताव लेकर आया था कि वह इस झोंपड़ी से एक अच्छे मकान में चले चलें, जिसे उसने हाल ही में खरीदा था। प्रस्ताव अस्वीकारते हुए उन्होंने कहा-इस पैसे को गरीबों की सवा में लगा देना। रही उपहार की बात तो उनने एक गुलदस्ता भर रख कर शेष को अभावग्रस्तों में बाँट देने को कहा। चलते-चलते दीनबन्धु ने एक बात और कही कि “जीवन भर दूसरों की सेवा करना, पिछड़ों को उठाना। यही मेरे प्रति तुम्हारा सच्चा कृतज्ञता-ज्ञापन होगा”। निहाल वह व्यक्ति एक और मंत्र सीखकर पुनः सेवा क्षेत्र की ओर चल पड़ा।

बुधवार, 29 नवंबर 2017

👉 सेवा धर्म :-

🔷 सत्यनगर का राजा सत्यप्रताप सिंह अत्यंत न्यायप्रिय शासक था। एक बार उसे पता चला कि सौम्यदेव नामक एक ऋषि अनेक सालों से लोहे का एक डंडा जमीन में गाड़कर तपस्या कर रहे हैं और उनके तप के प्रभाव से डंडे में कुछ अंकुर फूट कर फूल-पत्ते निकल रहे हैं और जब वह अपनी तपस्या में पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेंगे तो उनका डंडा फूल-पत्तों से भर जाएगा।

🔶 सत्यप्रताप ने सोचा कि यदि उनके तप में इतना बल है कि लोहे के डंडे में अंकुर फूट कर फूल-पत्ते निकल सकते हैं तो फिर मैं भी क्यों न तप करके अपना जीवन सार्थक बनाऊं।

🔷 यह सोच कर वह भी ऋषि के समीप लोहे का डंडा गाड़कर तपस्या करने लगा। संयोगवश उसी रात जोर का तूफान आया। मूसलाधार बारिश होने लगी। राजा और ऋषि दोनों ही मौसम की परवाह न कर तपस्या में मगन रहे।

🔶 कुछ देर बाद एक व्यक्ति बुरी तरह भीगा हुआ ठंड से कांपता आया। उसने ऋषि से कहीं ठहरने की जगह के बारे में पूछा पर ऋषि ने आंख खोलकर भी नहीं देखा। निराश होकर वह राजा सत्यप्रताप के पास पहुंचा और गिर पड़ा।

🔷  राजा ने उसकी इतनी बुरी हालत देखकर उसे गोद में उठाया। उसे नजदीक ही एक कुटिया नजर आई। उसने उस व्यक्ति को कुटिया में लिटाया और उसके समीप आग जलाकर गर्माहट पैदा की। गर्माहट मिलने से व्यक्ति होश में आ गया। इसके बाद राजा ने उसे कुछ जड़ी-बूटी पीसकर पिलाई।

🔶 कुछ ही देर बाद वह व्यक्ति बिल्कुल ठीक हो गया। सुबह होने पर राजा जब उस व्यक्ति के साथ कुटिया से बाहर आया तो यह देखकर हैरान रह गया कि जो लोहे का डंडा उसने गाड़ा था वह ताजे फूल-पत्तों से भरकर झुक गया था। इसके बाद राजा ने ऋषि के डंडे की ओर देखा। ऋषि के थोड़े  बहुत निकले फूल-पत्ते भी मुरझा गए थे।

🔷 राजा समझ गया कि मानव सेवा से बड़ी तपस्या कोई और नहीं है। वह अपने राज्य वापस आकर प्रजा की समुचित देखभाल करने लगा।

👉 आज का सद्चिंतन 30 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 Nov 2017


👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 Nov 2017

🔶 लोगों के हाथों अपनी प्रसन्नता-अप्रसन्नता बेच नहीं देनी चाहिए। कोई प्रशंसा करे तो हम प्रसन्न हों और निन्दा करने लगे तो दुःखी हो चलें? यह तो पूरी पराधीनता हुई। हमें इस संबंध में पूर्णतया अपने ही ऊपर निर्भर रहना चाहिए और निष्पक्ष होकर अपनी समीक्षा आप करने की हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। निन्दा से दुःख लगता हो तो अपनी नजर में अपने कामों को ऐसे घटिया स्तर का साबित न होने दें जिसकी निन्दा करनी पड़े। यदि प्रशंसा चाहते हैं तो अपने कार्यों को प्रशंसनीय बनायें।     

🔷 घृणा पापी से नहीं, पाप से करो। यथार्थ में पापी कोई मनुष्य नहीं होता, वरन् पाप मनुष्य की एक अवस्था है। इसलिए यदि संशोधन करना हो तो पाप का ही करना चाहिए। अपराधी को यदि दण्ड देना हो तो उसे सुधारने के लिए ही दिया जाना चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज की प्रत्येक अवस्था का उस पर प्रभाव पड़ सकता है इसलिए किसी को घृणापूर्वक बहिष्कृत कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता, वरन् बुराई का शोधन करके अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करने से ही उस अवस्था का नाश किया जा सकता है, जो घृणित है, हेय और जिससे सामाजिक जीवन में विष पैदा होता है।

🔶 हमारे सान्निध्य और सत्संग की जिन्हें उपयोगिता प्रतीत होती हो उसे आदि से अंत तक अखण्ड ज्योति पढ़ते रहना चाहिए। एक महीने में हमने जो कुछ सोचा, विचारा, पढ़ा, मनन किया, समझा और चाहा है, उसका सारांश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जाएगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिए पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 6)

🔶 आप चाहते हैं कि आपको कुछ मिले तो वजन उठाइए। हम आपको मुफ्त देना नहीं चाहते, क्योंकि इससे आपका अहित होगा। वह हम चाहते नहीं। गुरु-शिष्य की परीक्षा एक ही है कि अनुशासन मानते हैं हम आपके शिष्य, ऐसा कहें व मानें। समर्थ ने अपने शिष्य की परीक्षा ली थी व सिंहनी का दूध लाने को कहा था, अपनी आँख की तकलीफ का बहाना करके। सिंहनी कहाँ थी? वह तो हिप्नोटिज्म से एक सिंहनी खड़ी कर दी थी। शिवाजी का संकल्प दृढ़ था। वे ले आए सिंहनी का दूध व अक्षय तलवार का उपहार गुरु से पा सके। राजा दिलीप की गाय को जब मायावी सिंह ने पकड़ लिया तो उन्होंने स्वयं को शक्ति-दैवी अनुदान मिलते हैं। यह आस्थाओं का इम्तिहान है, जो हर गुरु ने अपने शिष्य का लिया है।
               
🔷 श्रद्धा अर्थात् सिद्धान्तों का, भावनाओं का आरोपण। कहा गया है—‘भावो हि विद्यते देवा तस्मात् भावो हि कारणम्’ भावना का आरोपण करते ही भगवान् प्रकट हो जाते हैं। भगवान् अर्थात् सिद्धि हर आशीर्वाद, सिद्धि, का आधार, फीस एक ही है—श्रद्धा। उसे विकसित करने के लिए अभ्यास हेतु गुरुपूर्णिमा पर्व। गुरुतत्त्व के प्रति श्रद्धा का अभ्यास आज के दिन किया जाता है। गुरु अन्तरात्मा की उस आवाज का नाम है, जो भगवान् की गवर्नर है, हमारी सत्ता उसी को समर्पित है। वही हमारी सद्गुरु है। गुरु को ब्रह्मा कहा गया है अर्थात् हमारा सुपर कांशसनेस हमारा अतिमानस ही हमारा गुरु है। अच्छा काम करते ही यह हमें शाबाशी देता है। गलत काम करते ही धिक्कारता है। गुरु ही ब्रह्मा है, विष्णु है, महेश है। गुरु अर्थात् भगवान् का प्रतिनिधि। गुरु को जाग्रत-जीवन्त करने के लिए एक खिलौना बनाकर श्रद्धा विकसित करें। आप हमें मानते हैं तो हमारा चित्र देखते ही श्रेष्ठतम पर विश्वास करने का अभ्यास करें। यह एक व्यायाम है, रिहर्सल हैं। प्रतीक की आवश्यकता इसी कारण पड़ती है।
   
🔶 हमारी अटूट निष्ठा-श्रद्धा की प्रतिक्रिया लौटकर हमारे पास ही आ जाती है। एक शिष्य गुरु के चरणों की धोवन को श्रद्धापूर्वक दुःखी, कष्ट-पीड़ितों को देता था। सब ठीक हो जाते थे। पर जब गुरु ने उसी धोवन का चमत्कार जानकर अपने पैरों को जल से धोकर वह जल औरों को दिया तो कुछ भी न हुआ। दोनों जल एक ही हैं, पर एक में श्रद्धा का चमत्कार है। उसी कारण वह अमृत बन गया, जबकि दूसरा मात्र धोवन का जल रह गया है। श्रद्धा विकसित करके कीजिए। साधनाएँ मात्र क्रिया हैं यदि उनमें श्रद्धा का समन्वय नहीं है। आदमी की जो भी कुछ आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हैं, वे श्रद्धा पर टिकी हैं।

🔷 आपकी अपने प्रति यदि श्रेष्ठ मान्यता है, आपकी श्रद्धा वैसी है तो असल में वही हैं आप। यदि इससे उल्टा है तो वैसे ही बन जाएँगे आप। गुरुपूर्णिमा श्रद्धा के विकास का त्यौहार है। हमारे गुरु ने अनुशासन की कसौटी पर कसकर हमें परखा है तब दिया है। हमारे जीवन की हर उपलब्धि उसी अनुशासन की देन है। वेदों के अनुवाद से लेकर ब्रह्मवर्चस् के निर्माण तथा चार हजार शक्तिपीठों को खड़ा करने का काम एक ही बलबूते हुआ। गुरु ने कहा—कर। हमने कहा—‘‘करिष्ये वचनं तव’’।। गुरु श्रीकृष्ण के द्वारा गीता सुनाए जाने पर शिष्य अर्जुन ने यही कहा कि सारी गीता सुन ली। अब जो आप कहेंगे, वही करूँगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 What holds us back from fully manifesting our potentialities?

🔶 A human being as an embodied soul is not as insignificant as he thinks himself to be. He is the highly evolved creation on earth of the Supreme Creator. Not only does he stand at the head of all other creatures, his achievements are also amazingly extraordinary. Nature’s wealth lies at his feet. The animal kingdom is under his control. His bodily configuration is not only unique but his senses are also richly endowed with qualities of spreading joy and bliss all around. There is no other creature who has got such a unique body.

🔷 His mental faculty is marvelously creative. Where other creatures can think of only self-preservation, a human mind is capable of making the best use of the present by learning from the events of the past and planning the future. He is endowed with two invaluable gifts of spirituality and science, which make him capable of accessing anything in the mundane and the divine worlds.

🔶 With these unique gifts of the Creator, considering oneself to be insignificant is ridiculous. The cause of this sense of inadequacy and insignificance is lack of willpower. Due to lack of self-confidence, a person tries to seek the help of others in order to solve his problems, to get rid of his difficulties and to avail of favorable opportunities. But who has the time to rush for his help? One gets success in one’s aim only when one stands on one’s own feet and, believing in one’s own capabilities, tries to move forward resolutely with the available resources and intelligence. It must be clearly understood that the willpower is the greatest force in this world. It is a superbly powerful magnet, which attracts every desired object towards itself.

📖 From Pragya Puran

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 162)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
🔷 माना कि आज स्वार्थपरता, संकीर्णता और क्षुद्रता ने मनुष्य को बुरी तरह घेर रखा है, तो भी धरती को वीर विहीन नहीं कहा जा सकता। ६० लाख साधु बाबा यदि धर्म के नाम पर घर बार छोड़कर मारे-मारे फिर  सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि मिशन की एक लाख वर्ष की समयदान की माँग पूरी न हो सके। एक व्यक्ति यदि दो घण्टे रोज समयदान दे सके तो एक वर्ष में ७२० घण्टे होते हैं। ७ घण्टे का दिन माना जाए तो यह पूरे १०३ दिन एक वर्ष में हो जाते हैं। यह संकल्प कोई २० वर्ष की आयु में ले और ७० का होने तक ५० वर्ष निवाहें तो कुल दिन ५ हजार दिन हो जाते हैं, जिसका अर्थ हुआ प्रायः १४ वर्ष। एक लाख वर्ष का समय पूरा करने के लिए ऐसे १०००००=१४७१४३ कुल इतने से व्यक्ति अपने जीवन में ही एक लाख वर्ष की समयदान याचना को पूर्ण कर सकते हैं। यह तो एक छोटी गणना हुई। मिशन में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं, जो साधु-ब्राह्मणों जैसा परमार्थ परायण जीवन अभी भी जी रहे हैं। और अपना समय पूरी तरह युग परिवर्तन की प्रक्रिया में नियोजित किए हुए हैं। ऐसे ब्रह्मचारी और वानप्रस्थी हजारों की संख्या में अभी भी हैं। उनका पूरा समय जोड़ लेने पर तो वह गणना एक लाख वर्ष से कहीं अधिक की पूरी हो जाती है।

🔶 बात इतने तक सीमित नहीं है। प्रज्ञा परिवार के ऐसे कितने ही उदारचेता हैं, जिनने हीरक जयंती के उपलक्ष्य में समयदान के आग्रह और अनुरोध को दैवी निर्देशन माना है और अपनी परिस्थितियों से तालमेल बिठाते हुए एक वर्ष से लेकर पाँच वर्ष तक का समय एक मुश्त दिया है। ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं, जो प्रवास पर तो नहीं जा सके, पर घर पर रहकर ही आए दिन मिशन की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने के लिए समय देते रहेंगे, स्थानीय गतिविधियों तक ही सीमित रहकर समीपवर्ती कार्यक्षेत्र को भी संभालते रहेंगे।

🔷 पुरुषों की तरह महिलाएँ भी इस समयदान यज्ञ में भाग ले सकती हैं। शारीरिक और बौद्धिक दोनों ही प्रकार के श्रम ऐसे हैं, जिन्हें अपनाकर वे महिला समाज में शिक्षा-सम्वर्धन जैसे अनेकों काम कर सकती हैं। अशिक्षित महिलाएँ तक घरों में शाक-वाटिका लगाने जैसा काम कर सकती हैं। जिनके पीछे पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं हैं, शरीर से स्वस्थ मन से स्फूर्तिवान् हैं, वे शान्तिकुञ्ज के भोजनालय विभाग में काम कर सकती हैं। और यहाँ के वातावरण में रहकर आशातीत संतोष भरा जीवन बिता सकती हैं।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.185

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 ऋण मुक्ति का आदर्श

🔷 भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता चितरंजन दास के पिता दस लाख रुपया कर्ज छोड़कर मरे थे। नवयुवक दास ने निश्चय किया कि वे सब का कर्ज चुकायेंगे। कर्ज रिश्तेदारों का था। सभी आसूदा थे इसलिए लड़के की परेशानी को देखते हुए कर्ज वापिस लेना नहीं चाहते थे। पर दास बाबू भी किसी का ऋण रखना अपनी बेइज्जती समझते थे वे जो कमाते गये, अदालत में जमा करते गये। उनने विज्ञापन प्रकाशित कराया कि जिनका कर्ज हो वह अपना पैसा ले जायें। बहुत दिन वह पैसा जमा रहा जब उनने ढूँढ़ ढूँढ़कर कर्जदारों का पता लगाया, उनका हिसाब चुकता किया।

🔶 किसी व्यक्ति की बेइज्जती यह है कि वह अनिवार्य आपत्ति के अवसर को छोड़कर अपना खर्च बढ़ाकर उसके लिए कर्ज ले। और उससे भी बड़ी बेइज्जती यह है कि होते हुए भी ऋण चुकाने में अपना कानी करें। चितरंजन दास ने अपने लिए निर्धनता निमंत्रित करके भी ऋण मुक्त होना अपना कर्तव्य समझा। यही आदर्श हर ईमानदार व्यक्ति का होना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 ऋषिकल्प से मिलेगी दिशाधारा

🔷 प्रज्ञा युग के नागरिक बड़े आदमी बनने की नहीं- महामानव बनने की महत्वाकांक्षा रखेंगे। सच्ची प्रगति इसी में समझी जायेगी कि गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ समुन्नत बनाया। कोई किसी के विलास वैभव की प्रतिस्पर्धा नहीं करेगा। वरन् होड़ इस बात की रहेगी कि किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ सज्जन एवं श्रद्धास्पद बनाया। वैभव इस बात में गिना जायेगा कि दूसरे को अनुकरण करने के लिए कितनी कृतियां और परंपरायें विनिर्मित कीं। आज के प्रचलन में सम्पदा को सफलता का चिन्ह माना जाता है। अगले दिनों यह मापदंड सर्वथा बदल जायेगा और यह जाना जायेगा कि किसने मानवी और गौरव गरिमा को किस प्रकार और कितना बढ़ाया।

🔶 शरीर यात्रा के निर्वाह साधनों के अतिरिक्त प्रज्ञा युग का मनुष्य दूसरी आवश्यकता अनुभव करेगा- सद्ज्ञान की। इसके लिए आजीविका उपार्जन एवं लौकिक जानकारियां देने वाली स्कूली शिक्षा पर्याप्त न मानी जायेगी। वरन् यह खोजा जायेगा कि दृष्टिकोण के परिष्कृत करने- सद्गुणों की परंपरा बढ़ाने एवं व्यक्तित्व के प्रखर प्रामाणिक बनाने की रीति-नीति सीखने अपनाने का अवसर कहां से किस प्रकार मिल सकता है। इस प्रयोजन के लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहां से मिल सकती है। इसे खोज पाने का प्रयास निरंतर जारी रखा जायेगा। यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.27

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 161)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 इन आंदोलनों का एक लाख गाँवों में विस्तार हेतु शान्तिकुञ्ज ने पहला कदम बढ़ाया है। इसके लिए संचालन केन्द्रों की स्थापना की गई है। चार-चार नई साइकिलें, चार छोटी बाल्टियाँ, बिस्तरबंद, संगीत उपकरण, साहित्य आदि साधन जुटाए गए हैं। इनके सहारे यात्रा की सभी आवश्यक वस्तुएँ एक ही स्थान पर मिल जाती हैं और कुछ ही दिनों की ट्रेंनिंग के उपरांत समयदानियों की टोली आगे बढ़ चलती है। कार्यक्रम की सफलता तब सोची जाएगी जब कम से कम एक नैष्ठिक सदस्य उस गाँव में बने और समयदान और अंशदान नियमित रूप से देते हुए झोला पुस्तकालय चलाने लगे। यह प्रक्रिया जहाँ भी अपनाई जाएगी वहीं एक उपयोगी संगठन बढ़ने लगेगा और उसके प्रयास से गाँव की सर्वतोमुखी प्रगति का उपक्रम चल पड़ेगा। यही है तीर्थ-भावना - तीर्थ स्थापना। इसके लिए एक हजार ऐसे केन्द्र स्थापित करने की योजना है, जहाँ उपरोक्त तीर्थ यात्राओं का सारा सरंजाम सुरक्षित रहे। समयदानी तीर्थयात्री प्रशिक्षित किए जाते रहें और एक टोली का एक प्रवास चक्र पूरा होते-होते दूसरी टोली तैयार कर ली जाए और उसे दूसरे गाँव के भ्रमण प्रवास पर भेज दिया जाए। सोचा गया है कि पचास-पचास मील चारों दिशाओं में देखकर एक तीर्थ मण्डल बना लिया जाए, उनमें जितने भी गाँव हों, उन में वर्ष में एक या दो बार परिभ्रमण होता रहे।

🔶 देश में सात लाख गाँव हैं, पर अभी वर्तमान सम्भावना और स्थिति को देखते हुए एक लाख गाँव ही हाथ में लिए गए हैं। २४ लाख प्रज्ञा परिजन एक लाख गाँवों में बिखरे होंगे। उनकी सहायता से यह कार्यक्रम सरलतापूर्वक सम्पन्न हो सकता है। इसके बाद वह हवा समूचे देश को भी अपनी पकड़ में ले सकती है। क्रमिक गति से चलना और जितना सम्भव है, उतना तत्काल करते हुए आगे की योजना को विस्तार देते हुए चलना, यही बुद्धिमत्ता का कार्य है।

🔷 ५-एक लाख वर्ष का समयदानः जितने विशालकाय एवं बहुमुखी युग परिवर्तन की कल्पना की गई है, उसके लिए साधनों की तुलना में श्रम सहयोग की कहीं अधिक आवश्यकता पड़ेगी। मात्र साधनों से काम चला होता, तो अरबों-खरबों खर्च करने वाली सरकारें इस कार्य को भी हाथ में ले सकती थीं। धनी-मानी लोग भी कुछ तो कर ही सकते थे, पर इतने भर से काम नहीं चलता। भावनाएँ उभारना और अपनी प्रामाणिकता, अनुभवशीलता, योग्यता एवं त्याग भावना का जनसाधारण को विश्वास दिलाना, यही वे आवश्यकताएँ हैं, जिनके कारण लोकहित के कार्यों में दूसरों को प्रोत्साहित किया और लगाया जा सकता है अन्यथा लम्बा वेतन और भरपूर सुविधाएँ देकर भी यह नहीं हो सकता है कि पिछड़ी हुई जनता को आदर्शवादी चरण उठाने के लिए तत्पर किया जा सके। जला हुआ दीपक ही दूसरे को जला सकता है। भावनाशीलों ने ही भावना उभारने में सफलता प्राप्त की है। सृजनात्मक कार्यों में सदा कर्मवीर अग्रदूतों की भूमिका सफल होती है।

🔶 बात पर्वत जैसी भारी किन्तु साथ ही राई जितनी सरल भी है। व्यक्ति औसत नागरिक स्तर स्वीकार कर ले और परिवार को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाने भर की जिम्मेदारी वहन करे तो समझना चाहिए कि सेवा-साधना के मार्ग में जो अड़चन थी, सो दूर हो गई। मनोभूमि का इतना सा विकास-परिष्कार कर लेने पर कोई भी विचारशील व्यक्ति लोक-सेवा के लिए युग परिवर्तन हेतु ढेरों समय निकाल सकता है। प्राचीन काल में ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और सद्गृहस्थ ऐसा साहस करते और कदम उठाते थे। गुरुगोविंद सिंह ने अपने शिष्य समुदाय में से प्रत्येक गृहस्थ से बड़ा बेटा संत सिपाही बनने के लिए माँगा था। वे मिले भी थे और इसी कारण सिखों का भूतकालीन इतिहास बिजली जैसा चमकता था। देश की रक्षा प्रतिष्ठा के लिए असंख्यों ने जाने गँवाई और भारी कठिनाइयाँ सहीं। यही परम्परा गाँधी और बुद्ध के समय में भी सक्रिय हुई थी। विनोबा का सर्वोदय आंदोलन इसी आधार पर चला था। स्वामी विवेकानन्द, दयानंद आदि ने समाज को अनेकानेक उच्चस्तरीय कार्यकर्ता प्रदान किए थे। आज वही सबसे बड़ी आवश्यकता है। समय की माँग ऐसे महामानवों की है, जो स्वयं बढ़ें और दूसरों को बढ़ाएँ ।।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.184

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

👉 सर्वोच्च शिखर

🔶 एक युवक ने एक संत से कहा, 'महाराज, मैं जीवन में सर्वोच्च शिखर पाना चाहता हूं लेकिन इसके लिए मैं निम्न स्तर से शुरुआत नहीं करना चाहता।

🔷 क्या आप मुझे कोई ऐसा रास्ता बता सकते हैं जो मुझे सीधा सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा दे।' संत बोले, 'अवश्य बताऊंगा। पहले तुम आश्रम के बगीचे से सबसे सुंदर गुलाब का फूल लाकर मुझे दो। लेकिन एक शर्त है। जिस गुलाब को तुम पीछे छोड़ जाओगे, उसे पलटकर नहीं तोड़ोगे।' युवक यह आसान सी शर्त मानकर बगीचे में चला गया।

🔶 वहां एक से एक सुंदर गुलाब खिले थे। जब भी वह एक गुलाब तोड़ने के लिए आगे बढ़ता, उसे कुछ दूर पर उससे भी अधिक सुंदर गुलाब नजर आते और वह उसे छोड़ आगे बढ़ जाता। ऐसा करते-करते वह बगीचे के मुहाने पर आ पहुंचा। लेकिन यहां उसे जो फूल नजर आए वे एकदम मुरझाए हुए थे।

🔷 आखिरकार वह फूल लिए बिना ही वापस आ गया। उसे खाली हाथ देखकर संत ने पूछा, 'क्या हुआ बेटा, गुलाब नहीं लाए?' युवक बोला, 'बाबा, मैं बगीचे के सुंदर और ताजा फूलों को छोड़कर आगे और आगे बढ़ता रहा, मगर अंत में केवल मुरझाए फूल ही बचे थे। आपने मुझे पलटकर फूल तोड़ने से मना किया था। इसलिए मैं गुलाब के ताजा और सुंदर फूल नहीं तोड़ पाया।' उस पर संत मुस्करा कर बोले, 'जीवन भी इसी तरह से है।

🔶 इसमें शुरुआत से ही कर्म करते चलना चाहिए। कई बार अच्छाई और सफलता प्रारंभ के कामों और अवसरों में ही छिपी रहती है। जो अधिक और सर्वोच्च की लालसा पाकर आगे बढ़ते रहते हैं, अंत में उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ता है।' युवक उनका आशय समझ गया।

👉 आज का सद्चिंतन 29 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 29 Nov 2017


👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 5)

🔶 यदि आप किसी आशीर्वाद की कामना से, देवी-देवता की सिद्धी की कामना से आए हैं तो मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपने व्यक्तित्व को विकसित कीजिए ताकि आप निहाल हो सकें। दैवी कृपा मात्र इसी आधार पर मिल सकती है और इसके लिए माध्यम है श्रद्धा। श्रद्धा मिट्टी से गुरु बना लेती है। पत्थर से देवता बना देती है। एकलव्य के द्रोणाचार्य मिट्टी की मूर्ति के रूप में उसे तीरन्दाजी सिखाते थे। रामकृष्ण की काली भक्त के हाथों भोजन करती थी। उसी काली के समक्ष जोते ही विवेकानन्द नौकरी, पैसा भूलकर शक्ति, भक्ति माँगने लगे थे। आप चाहे मूर्ति किसी से भी खरीद लें। मूर्ति बनाने वाला खुद अभी तक गरीब है, पर मूर्ति में प्राण श्रद्धा से आते हैं। हम देवता का अपमान नहीं कर रहे। हमने खुद पाँच गायत्री माताओं की मूर्ति स्थापित की हैं, पर पत्थर में से हमने भगवान् पैदा किया है श्रद्धा से। मीरा का गिरधर गोपाल चमत्कारी था। विषधर सर्पों की माला, जहर का प्याला उसी ने पी लिया व भक्त को बचा लिया। मूर्ति में चमत्कार आदमी की श्रद्धा से आता है। श्रद्धा ही आदमी के अन्दर से भगवान् पैदा करती है।
               
🔷 श्रद्धा का आरोपण करने के लिए ही यह गुरुपूर्णिमा का त्यौहार है। श्रद्धा से हमारे व्यक्तित्व का सही मायने में उदय होता है। मैं अन्धश्रद्धा की बात नहीं करता। उसने तो देश को नष्ट कर दिया। श्रद्धा अर्थात् आदर्शों के प्रति निष्ठा। जितने भी ऋषि, सन्त हुए हैं, उनमें श्रेष्ठता के प्रति अटूट निष्ठा देखी जा सकती है। जो कुछ भी आप हमारे अन्दर देखते हैं, श्रद्धा का ही चमत्कार है। आज से ५५ वर्ष पूर्व हमारे गुरु की सत्ता हमारे पूजाकक्ष में आई। हमने सिर झुकाया व कहा कि आप हुक्म दीजिए, हम पालन करेंगे। अनुशासन व श्रद्धा-गुरुपूर्णिमा इन दोनों का त्यौहार है। अनुशासन आदर्शों के प्रति। यह कहना कि जो आप कहेंगे वही करेंगे।
  
🔶 श्रद्धा अर्थात् प्रत्यक्ष नुकसान दीखते हुए भी आस्था, विश्वास, आदर्शों को न खोना। श्रद्धा से ही सिद्धि आती है। हमें अपने आप पर घमण्ड नहीं है, पर विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि वह देवशक्तियों के प्रति हमारी गहन श्रद्धा का ही चमत्कार है, जिसके बलबूते हमने किसी को खाली हाथ नहीं जाने दिया। गायत्री माता श्रद्धा में से निकलीं। श्रद्धा में मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं व सिद्धान्तों का संरक्षण करना पड़ता है। हमारे गुरु ने कहा संयम करो, कई दिक्कतें आएँगी पर उनका सामना करो। हमने चौबीस वर्ष तक तप किया। जायके को मारा। हम जौ की रोटी खाते। हमारी माँ बड़ी दुःखी होती। हमारी तपस्या की अवधि में उन्होंने भी हमारी वजह से कभी मिठाई का टुकड़ा तक न चखा। हमारे गायत्री मन्त्र में चमत्कार इसी तप से आया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 The Nectar of Generosity

🔶 This is a story from the life of Swami Ramteerth. He used to wander around the whole day preaching kindness and love for God. He used to cook dinner himself. One evening he came home very tired after along tour and preaching session and started cooking his dinner. Just then a group of kids came to him. Swamiji served all his dinner to the children. One onlooker was amazed and asked him, "Swamiji, you have given away all your dinner, now what will you have?" A bright smile crossed Swami Ramteerth's lips as he replied, "The purpose of dinner is to satiate hunger. It doesn't matter whose stomach it has gone into, it has served its purpose. But, to me, the joy of giving is million times the joy of receiving"

🔷 Another story is from the life of the great Indian poet Magh who was also famous for his generosity. His financial condition was not very sound, yet that made no difference to his generous attitude. One late night a poor man came to seek his help and said, "I have to arrange my daughter's marriage ceremony, but I am penniless. I have heard about your kindness. Would it be possible for you to help me, sir?"

🔶 Poet Magh's heart was filled with compassion. He looked around his house. There was nothing to offer. Suddenly, he saw the golden bracelets in the hands of his wife who was asleep. Very slowly, he took off one bracelet from his wife's hand, and said, "I do not have much to offer, please accept this gift."

🔷 Just then his wife opened her eyes and said with a smile, "How can a marriage ceremony be arranged with a single bracelet?" And she took off the other bracelet and gave it too. Magh and his wife were filled with a divine joy that cannot be described in words.

📖 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 Nov 2017

🔶 अपनी यह आस्था चट्टान की तरह अडिग होनी चाहिए कि युग बदल रहा है, पुराने सड़े-गले मूल्याँकन नष्ट होने जा रहे हैं। दुनिया आज जिस लोभ-मोह और स्वार्थ, अनाचार से सर्वनाशी पथ पर दौड़ रही है, उसे वापिस लौटना पड़ेगा। अंध-परम्पराओं और मूढ़ मान्यताओं का अंत होकर रहेगा। अगले दिनों न्याय, सत्य और विवेक की ही विजय-वैजयन्ती फहरायेगी।       

🔷 खेद का विषय है कि हम नित्य प्रति के जीवन में विचार शक्ति का बड़ा अपव्यय करते हैं। जितनी शक्ति फिजूद बर्बाद होती है उसके थोड़े से भाग को यदि उचित रीति से इस्तेमाल करें तो स्वभाव तथा आदतें आसानी से बदली जा सकती है। जिस समय विचारधारा नीचे से ऊपर को चढ़ती है तो मनुष्य स्वयं अपना मित्र बन जाता है। जब विचारधारा ऊपर से नीचे को गिरती है तो वह अपने आप ही अपना शत्रु बन जाता है।

🔶 अच्छाई से बुराई की ओर पलायन का प्रमुख कारण है आज की अर्थ प्रधान मनोवृत्ति। हम हर काम पैसे के बल पर करना चाहते हैं। पैसा कमाना चाहते हैं तो पैसे के बल पर, धर्म करना चाहते हैं तो पैसे के बल पर, स्वस्थ रहना चाहते हैं तो पैसे के बल पर, सुख-शान्ति, सम्मान भी चाहते हैं तो पैसे के बल पर-मानो पैसा एक ऐसा वरदान है, जिसके मिलते ही हमारी सारी कामनाएँपूर्ण हो जाएँगी, परन्तु हम यह कभी नहीं सोचते कि जिनके पास असंख्य धन है, क्या उन्हें यह सब कुछ प्राप्त है? क्या उनकी सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो गई हैं? क्या वे अपने जीवन में पूरी तरह से सुखी और संतुष्ट हैं?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 4)

🔶 मैंने आपको दो शक्तियों के बारे में बताया। पहली श्रम की शक्ति, जो आपको दौलत, कीर्ति, यश देती है। दूसरी विचारणा की शक्ति, जो आपको प्रसन्नता व सही दृष्टिकोण देती है। तीसरी शक्ति रूहानी है। वह है आदमी का व्यक्तित्व। व्यक्ति का वजन। कुछ आदमी रुई के होते हैं व कुछ भारी। जिनकी हैसियत वजनदार व्यक्तित्व की होती है, वे जमाने को हिलाकर रख देते हैं। कीमत इनकी करोड़ों की होती है। वजनदार आदमी यदि हिन्दुस्तान की तवारीख से काट दें तो इसका बेड़ा गर्क हो जाए, जिसके लिए हम फूले फिरते हैं, वह वजनदार आदमियों का इतिहास है। वजनदारों में बुद्ध को शामिल कीजिए। वे पढ़े-लिखे थे कि नहीं, किन्तु वजनदार थे। हजारों सम्राटों ने, दौलतमन्दों ने थैलियाँ खाली कर दीं। बुद्ध ने जो माँगा वह उन्होंने दिया। हरिश्चन्द्र, सप्तर्षि, व्यास, दधीचि, शंकराचार्य, गाँधी, विवेकानन्द के नाम हमारी कौम के वजनदारों में शामिल कीजिए। इन्हीं पर हिन्दुस्तान की हिस्ट्री टिकी हुई है। यदि इन्हें खरीदा जा सका होता तो बेशुमार पैसा मिला होता।
               
🔷 आदमी की कीमत है उसका व्यक्तित्व। ऐसे व्यक्ति दुनिया की फिजाँ को बदलते हैं, देवताओं को अनुदान बरसाने के लिए मजबूर करते हैं। पेड़ अपनी आकर्षण शक्ति से बादलों को खींचते व बरसने के लिए मजबूर करते हैं। वजनदार आदमी अपने व्यक्तित्व की, मैग्नेट की शक्ति से देवशक्तियों को खींचते हैं। यदि आप भी दैवी अनुदान चाहते हो तो अपने व्यक्तित्व को वजनदार बनाना होगा। दैवी शक्तियाँ सारे ब्रह्माण्ड में छिपी पड़ी हैं। सिद्धियाँ जो आदमी को देवता, महामानव, ऋषि बनाती हैं, सब यहीं हमारे आसपास हैं। कभी इस धरती पर तैंतीस कोटि देवता बसते थे। सभी व्यक्तित्ववान थे। व्यक्तित्व एक बेशकीमती दौलत है, यह तथ्य आप समझिए। व्यक्तित्व सम्मान दिलाता है, सहयोग प्राप्त कराता है। गाँधी को मिला, क्योंकि उनके पास वजनदार व्यक्तित्व था।
  
🔶 व्यक्तित्व श्रद्धा से बनता है। श्रद्धा अर्थात् सिद्धान्तों व आदर्शों के प्रति अटूट व अगाध विश्वास। आदमी आदर्शों के लिए मजबूत हो जाता है तो व्यक्तित्व ऐसा वजनदार बन जाता है कि देवता तक नियन्त्रण में आ जाते हैं। विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस की शक्ति पाई, क्योंकि स्वयं को वजनदार वे बना सके। भिखारी को दस पैसे मिलते हैं। कीमत चुकाने वाले को, वजनदार व्यक्तित्व वाले को सिद्ध पुरुष का आशीर्वाद मिलता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 160)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 हर गाँव को एक तीर्थ रूप में विकसित करने के लिए तीर्थयात्रा टोलियाँ निकालने की योजना है। पद यात्रा को साइकिल यात्रा के रूप में मान्यता दी है। चार साइकिल सवारों का एक जत्था पीले वस्त्रधारण किए गले में पीला झोला लटकाए, साइकिलों पर पीले रंग के कमंडल टाँगे प्रवास चक्र पर निकलेगा। यह प्रवास न्यूनतम एक सप्ताह के, दस दिन के, पंद्रह दिन के अथवा अधिक से अधिक एक माह के होंगे। जिनका निर्धारण पहले ही हो चुका होगा। यात्रा जहाँ से आरम्भ होगी, एक गोल चक्र पूरा करती हुई वहीं समाप्त होगी। प्रातःकाल जलपान करके टोली निकलेगी। रास्ते में सहारे वाली दीवारों पर आदर्शवाक्य लिखती चलेगी। छोटी बाल्टियों में रंग घुला होगा। सुंदर अक्षर लिखने का अभ्यास पहले से ही कर लिया गया होगा। १. हम बदलेंगे-युग बदलेगा। २. हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा। ३. नर और नारी एक समान, जाति वंश सब एक समान। वाक्यों की प्रकाशित शृंखलाएँ जो जहाँ उपयुक्त हों वहाँ उन्हें ब्रुश से लिखते चलना चाहिए।

🔶 रात्रि को जहाँ ठहरना निश्चय किया हो वहाँ शंख-घड़ियालों से गाँव की परिक्रमा लगाई जाए और घोषणा की जाए कि अमुक स्थान पर तीर्थयात्री मण्डली के भजन-कीर्तन होंगे।

🔷 गाँव में एक दिन के कीर्तन में जहाँ सुगम संगीत से उपस्थित जनों को आह्लादित किया जाएगा वहाँ उन्हें यह भी बताया जाएगा कि गाँव को सज्जनता और प्रगति की प्रतिमूर्ति बनाया जा सकता है। प्रौढ़ शिक्षा, बाल संस्कारशाला, स्वच्छता, व्यायामशाला, घरेलू शाक वाटिका, परिवार नियोजन, नशाबन्दी, मितव्ययिता, सहकारिता, वृक्षारोपण आदि सत्प्रवृत्तियों की महिमा और आवश्यकता बताते हुए यह बताया जाए कि इन सत्प्रवृत्तियों को मिलजुलकर किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है। और उन प्रयत्नों का कैसे भरपूर लाभ उठाया जा सकता  है।

🔶 सम्भव हो तो सभा के अंत में उत्साही प्रतिभा वाले लोगों की एक समिति बना दी जाए जो नियमित रूप से समयदान-अंशदान देकर इन सत्प्रवृत्तियों को कार्यान्वित करने में जुटे। गाँव की एकता और पवित्रता का ध्वज अशोक वृक्ष के रूप में दूसरे दिन प्रातःकाल स्थापित किया जाए। यह देव प्रतिमा उपयोगिता और भावना की दृष्टि से अतीव उपयोगी है।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.183

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 PROMISE YOURSELF

🔶 To be so strong that nothing can disturb your peace of mind.

🔷 To talk health, happiness and prosperity to every person you meet.

🔷 To make all your friends feel that there is something in them.

🔶 To look at the sunny side of everything and make your optimism come true.

🔷 To think only of best, to work only for best, and to expect only the best.

🔶 To be just as enthusiastic about the success of others as you are about your own.

🔷 To forget the mistakes of the past and press on to the greater achievements of the future.

🔶 To wear a cheerful countenance at all times and give every living creature you meet a smile.

🔷 To give so much time to the improvement of yourself that you have no time to criticize others.

🔶 To be too large for worry, too noble for anger, too strong for fear; and too happy to permit the presence of trouble.

🔷 To think well of yourself and to proclaim this fact to the world, not in loud words but in great deeds.

🔶 To live in the faith that the whole world is on your side as long as you are true to the best in yourself.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 Nov 2017

🔶 जिन आन्दोलनों के पीछे तप नहीं होता वह कुछ समय के लिए तूफान भले ही मचा ले, पर अंत में वे असफल हो जाते हैं। जिन आत्माओं के पीछे तपस्या नहीं रहतीं वे कितनी ही चतुर, चालाक, गुणी, धनी क्यों न हो, महापुरुषों की श्रेणी में नहीं गिनी जा सकतीं। वे मनुष्य जिन्होंने मानव जाति को ऊँचा उठाया है, संसार की अशान्ति को दूर करके शान्ति की स्थापना की है, अपना नाम अमर किया है, युग प्रवाह को मोड़ा है, वे तप-शक्ति से संपन्न रहे हैं।      

🔷 हमारा कर्त्तव्य है कि हम लोगों को विश्वास दिलावें कि वे सब एक ही ईश्वर की संतान हैं और इस संसार में एक ही ध्येय को पूरा करना उनका धर्म है। उनमें से प्रत्येक मनुष्य इस बात के लिए बाधित है कि वह अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिन्दा रहे। जीवन का ध्येय कम या ज्यादा संपन्न होना नहीं, बल्कि अपने को तथा दूसरों को सदाचारी बनाना है। अन्याय और अत्याचार जहाँ कहीं भी हों उनके विरुद्धा आन्दोलन करना एकमात्र अधिकार नहीं, धर्म है और वह भी ऐसा धर्म जिसकी उपेक्षा करना पाप है। 

🔶 युग परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में जिन्हें घसीटा या धकेला गया है उन्हें अपने को आत्मा का, परमात्मा का प्रिय भक्त ही अनुभव करना चाहिए और शान्त चित्त से धैर्यपूर्वक उस पथ पर चलने की सुनिश्चित तैयारी करनी चाहिए। यदि आत्मा की पुकार अनसुनी करके वे लोभ-मोह के पुराने ढर्रे पर चलते रहें तो आत्म-धिक्कार की इतनी विकट मार पड़ेगी कि झंझट से बच निकलने और लोभ-मोह को न छोड़ने की चतुरता बहुत मँहगी पड़ेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भगवान् देगा

🔷 एक बार एक राजा था, वह जब भी मंदिर जाता, तो 2 फ़क़ीर उसके दाएं और बाएं बैठा करते! दाईं तरफ़ वाला कहता: "हे भगवान, तूने राजा को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!"

🔶 बाईं तरफ़ वाला कहता: "ऐ राजा! भगवान ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे!"

🔷 दाईं तरफ़ वाला फ़क़ीर बाईं तरफ़ वाले से कहता: "भगवान से माँग! बेशक वह सबसे बैहतर सुनने वाला है!"

🔶 बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: "चुप कर बेवक़ूफ़

🔷 एक बार राजा ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मंदिर में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा भगवान से मांगता है तो बेशक भगवान् उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!

🔶 वज़ीर ने ऐसा ही किया... अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते-खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: "हुह... बड़ा आया 'भगवान् देगा...' वाला, यह देख राजा से माँगा, मिल गया ना?"

🔷 खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: "ले पकड़... तू भी खाले, बेवक़ूफ़

🔶 अगले दिन जब राजा  आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!

🔷 राजा नें चौंक कर उससे पूछा: "क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला?"

🔶 फ़क़ीर: "जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी, मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!"

🔷 राजा: "फिर?"

🔶 फ़क़ीर: "फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: 'भगवान् देगा, भगवान् देगा!'

🔷 राजा मुस्कुरा कर बोला: "बेशक, भगवान् ने उसे दे दिया!"

👉 आज का सद्चिंतन 28 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 Nov 2017


सोमवार, 27 नवंबर 2017

👉 माता पिता की सेवा से सिद्धि प्राप्ति

🔷 महर्षि पिप्पल बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे। उन की कीर्ति दूर दूर तक फैली हुई थीं एक दिन सारस और सारसी दोनों जल में खड़े आपस में बातें कर रहे थे कि पिप्पल को जितना बड़प्पन मिला हुआ है उससे भी अधिक महिमा सुकर्मा की है, पर उसे लोग जानते नहीं

🔶 पिप्पल ने सारस सारसी के इस वार्तालाप को सुन लिया। वे सुकर्मा को तलाश करते हुए उसके घर पहुँचें। सुकर्मा साधारण गृहस्थ था पर उसने बिना पूछे ही पिप्पल का मनोरथ कह सुनाया। तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह एक साधारण गृहस्थ जो योग तथा अध्यात्म के तत्वज्ञान से अपरिचित है, किस प्रकार इतनी आत्मोन्नति कर सका?

🔷 सुकर्मा से उन्होंने जब अपनी शंका उपस्थिति की तो उसने बताया कि पिता माता को साक्षात भगवान का अवतार मानकर सच्चे मन से मैं उनकी सेवा करता हूँ। यही मेरी साधना है और उसी के बल पर मैं जो कुछ बन सका हूँ सो आप की जानकारी में है ही।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 Nov 2017

🔶 दूसरा दूसरों को न तो खींच सकता है और न दबा सकता है। बाहरी दबाव क्षणिक होता है। बदलता तो मनुष्य अपने आप है, अन्यथा रोज उपदेश-प्रवचन सुनकर भी इस कान से उस कान निकाल दिये जाते हैं। दबाव पड़ने पर बाहर से कुछ दिखा दिया जाता है, भीतर कुछ बना रहता है। इन विडम्बनाओं से क्या बनना है। बनेगा तो अंतःकरण के बदलने से और इसके लिए आत्म-प्रेरणा की आवश्यकता है। क्रान्ति अपने से ही आरंभ होगी।      

🔷 प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं बरसती। वह अंदर से ही जागती है। उसे जगाने के लिए केवल मनुष्य होना पर्याप्त है, फिर वह अन्य कोई प्रतिबन्ध नहीं मानती। मनुष्यत्व जगाने की स्थिति में तब वह तमाम सवर्णों को छोड़कर रैदास और कबीर का वरण करती है, बलवानों और सुन्दरों को छोड़कर गाँधीजी जैसे कमजोर शरीर और चाणक्य जैसे कुरूप को वह प्राप्त होती है। मनुष्यत्व के अनुशासन में जो आ जाता है तो बिना भेदभाव के उसका वरण कर लेती है।

🔶 ईश्वर की सौंपी हुई और सीना खोलकर स्वीकार की हुई जिम्मेदारी (युग निर्माण योजना) को छोड़ भागना यह अपने बस की बात नहीं। ईश्वरीय इच्छा की उपेक्षा करके अपनी असुविधाओं की चिन्ता करना यह गायत्री परिवार के लिए सब प्रकार अशोभनीय होगा। ऐसे अशोभनीय जीवन से तो मरण अच्छा। अब हमारे सामने एकमात्र कर्त्तव्य यही है कि हम धर्मयुग लाने की महान् प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दें। 

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Minimum for Self, Maximum for the Society

🔶 We have amazing examples of generosity in the history of India. Kings lead the society with their own examples. Emperor Harshavardhana performed Sarvamedha Yagya and gave always all his possessions to the needy citizens, retain only the bare minimum facilities for his own livelihood; whereas, he was the undisputed ruler of the Indian subcontinent and could have led a lavish life style.

🔷 Janaka was a great king with immense wealth and power, but led the life of a saint and dedicated all his wealth for social welfare. He became famous as Videha, meaning one who is free from bodily lusts. Ishwar Chand Vidyasagar was a professor who gave away all his salary as scholarship for poor students. Such generosity is the real worship of God.

📖 From Pragya Puran

👉 गुरुतत्त्व की गरिमा और महिमा (भाग 3 )

🔶 दृष्टिकोण विकसित होते ही ऐसा आनन्द, ऐसी मस्ती आती है कि देखते ही बनता है। दाराशिकोह मस्ती में डूबते चले गए। जेबुन्निसा ने पूछा—‘‘अब्बाजान ! आपको क्या हुआ है आज? आप तो पहले कभी शराब नहीं पीते थे। फिर यह मस्ती कैसी?’’ बोले—‘‘बेटी ! आज मैं हिन्दुओं के उपनिषद् पढ़कर आया हूँ। जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं। जीवन का असली आनन्द उसमें भरा पड़ा है। बस यह मस्ती उसी की है।’’
               
🔷 यह है असली आनन्द। मस्ती, खुशी, स्वर्ग हमारे भीतर से आते हैं। स्वर्ग सोचने का एक तरीका है। किताब में क्या है? वह तो काला अक्षर भर है। हर चीज की गहराई में प्रवेश में प्रवेश कर जो आनन्द खुशी मिलती है, वह सोचने के तरीके पर निर्भर है। इसी तरह बन्धन-मुक्ति भी हमारे चिन्तन में निहित है। हमें हमारे चिन्तन ने बाँधकर रखा है। हम भगवान् के बेटे हैं। हमारे संस्कार हमें कैसे बाँध सकते हैं? सारा शिकंजा चिन्तन का है। इससे मुक्ति मिलते ही सही अर्थों में आदमी बन्धनमुक्त हो जाता है। हमारी नाभि में खुशी रूपी कस्तूरी छिपी पड़ी है। ढूँढ़ते हम चारों ओर हैं। हर दिशा से वह आती लगती है, पर होती अन्दर है।
  
🔶 यदि आपको सुख-शान्ति, मुस्कुराहट चाहिए तो दृष्टिकोण बदलिए। खुशी सब ओर बाँट दीजिए। माँ को दीजिए, पत्नी को दीजिए, मित्रों को दीजिए। राजा कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना दान करता था। आपकी परिस्थितियाँ नहीं हैं देने की, किन्तु आप सोने से भी कीमती आदमी की खुशी बाँट सकते हैं। आप जानते नहीं हैं, आज आदमी खुशी के लिए तरस रहा है। जिन्दगी की लाश इतनी भारी हो गई है कि वजन ढोते-ढोते आदमी की कमर टूट गई है। वह खुशी ढूँढ़ने के लिए सिनेमा, क्लब, रेस्टोरेण्ट, कैबरे डान्स सब जगह जाता है, पर वह कहीं मिलती नहीं। खुशी दृष्टिकोण है, जिसे मैं ज्ञान की सम्पदा कहता हूँ। जीवन की समस्याओं को समझाकर अन्यान्य लोगों से जो डीलिंग की जाती है वह ज्ञान की देन है। वही व्यक्ति ज्ञानवान होता है, जिसे खुशी तलाशना व बाँटना आता है। ज्ञान पढ़ने-लिखने को नहीं कहते। वह तो कौशल है। ज्ञान अर्थात् नजरिया, दृष्टिकोण, व्यावहारिक बुद्धि।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 159)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञा परिजन उत्साह पूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जन समुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखती भी नहीं है। उन्हें देवालय की प्रतिष्ठा दी जाएगी। बिहार के हजारी किसान ने हजार आम्र-उद्यान निज के बलबूते खड़े करा दिए थे, तो कोई कारण नहीं कि एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का उद्देश्य पूरा न हो सके। इनकी पौध शान्तिकुञ्ज से देने का निश्चय किया गया है और हर प्रज्ञापुत्र को कहा गया है कि वह अशोक वाटिका लगाने-लगवाने में किसी प्रकार की कमी न रहने दें। उसके द्वारा वायुशोधन का होने वाला कार्य शाश्वत शास्त्र सम्मत यज्ञ के समतुल्य ही समझें। अग्निहोत्र तो थोड़े समय ही कार्य करता है, पर यह पुनीत वृक्ष उसी कार्य को निरंतर चिरकाल तक करता रहता है।

🔶 ४-हर गाँव एक युग तीर्थः जहाँ श्रेष्ठ कार्य होते रहते हैं, उन स्थानों की अर्वाचीन अथवा प्राचीन गतिविधियों को देखकर आदर्शवादी प्रेरणा प्राप्त होती रहती है, ऐसे स्थानों को तीर्थ कहते हैं। जिन दर्शनीय स्थानों की श्रद्धालु जन तीर्थयात्रा करते हैं, उन स्थानों एवं क्षेत्रों के साथ कोई ऐसा इतिहास जुड़ा है, जिससे संयमशीलता, सेवा भावना का स्वरूप प्रदर्शित होता है। प्रस्तुत तीर्थों में कभी ऋषि आश्रम रहे हैं। गुरुकुल आरण्यक चले हैं और परमार्थ सम्बन्धी विविध कार्य होते रहे हैं।

🔷 इन दिनों प्रख्यात तीर्थ थोड़े ही हैं। वहाँ पर्यटकों की धकापेल भर रहती है। पुण्य प्रयोजनों का कहीं अता-पता नहीं है। इन परिस्थितियों में तीर्थ भावना को पुनर्जीवित करने के लिए सोचा यह गया है कि भारत के प्रत्येक गाँव को एक छोटे तीर्थ के रूप में विकसित किया जाए। ग्राम से तात्पर्य यहाँ शहरों में द्वेष या उपेक्षा भाव रखना नहीं है, वरन् पिछड़ेपन की औसत रेखा से नीचे वाले वर्ग को प्रधानता देना है। मातृभूमि का हर कण देवता है। गाँव और झोंपड़ा भी। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर छाया पिछड़ापन धो दिया जाए और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना की जाए।

🔶 इतने भर से वहाँ बहुत कुछ उत्साहवर्धक प्रेरणाप्रद और आनंददायक मिल सकता है। ‘‘हर गाँव एक तीर्थ’’ योजना का उद्देश्य है, ग्रामोत्थान, ग्राम सेवा, ग्राम विकास। इस प्रचलन के लिए घोर प्रयत्न किया जाए और उस परिश्रम को ग्राम देवता की पूजा माना जाए।  यह तीर्थ स्थापना हुई, जिसे स्थानीय निवासी और बाहर के सेवा भावी उद्बोधनकर्त्ता मिल-जुलकर पूरा कर सकते हैं। पिछड़ेपन के हर पक्ष से जूझने और प्रगति के हर पहलू को उजागर करने के लिए आवश्यक है कि गाँवों की सार्थक पद यात्राएँ की जाएँ, जन संपर्क साधा जाए और युग चेतना का अलख जगाया जाए।

🌹  क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.181

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

👉 दूरदर्शी विवेकशीलता का युग आ रहा है

🔷 हमने भविष्य की झाँकी देखी है एवं बड़े शानदार युग के रूप में देखी है। हमारी कल्पना है कि आने वाला युग प्रज्ञायुग होगा। ‘प्रज्ञा’ अर्थात् दूरदर्शी विवेकशीलता के पक्षधर व्यक्तियों का समुदाय। अभी जो परस्पर आपाधापी, लोभ-मोहवश संचय एवं परस्पर विलगाव की प्रवृत्ति नजर आती है, उसको आने वाले समय में अतीत की कड़वी स्मृति कहा जाता रहेगा। हर व्यक्ति स्वयं में एक आदर्श इकाई होगा एवं हर परिवार उससे मिलकर बना समाज का एक अवयव। सभी का चिन्तन उच्चस्तरीय होगा। कोई अपनी अकेले की ही न सोचकर सारे समूह के हित की बात को प्रधानता देगा।

🔶 प्रज्ञायुग में हर व्यक्ति अपने आपको समाज का एक छोटा-सा घटक किन्तु अविच्छिन्न अंग मानकर चलेगा। निजी लाभ-हानि का विचार न करके विश्व हित में अपना हित जुड़ा रहने की बात सोचेगा। सबकी महत्वाकाँक्षाएँ एवं गतिविधियाँ लोकहित पर केन्द्रित रहेंगी न कि संकीर्ण स्वार्थपरता पर। अहंता को परब्रह्म में समर्पित कर आध्यात्मिक जीवन-मुक्ति का लक्ष्य अगले दिनों इस प्रकार क्रियान्वित होगा कि किसी को अपनी चिन्ता में डूबे रहने की- अपनी ही इच्छा पूर्ति की- अपने परिवार जनों की प्रगति की न तो आवश्यकता अनुभव होगी, न चेष्टा चलेगी। एक कुटुम्ब के सब लोग जिस प्रकार मिल-बाँटकर खाते और एक स्तर का जीवन जीते हैं वही मान्यता व दिशाधारा अपनाये जाने का औचित्य समझा जायेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 27 Nov 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Nov 2017


👉 सफलता की तैयारी

🔷 शहर से कुछ दूर एक बुजुर्ग दम्पत्ती रहते थे वो जगह बिलकुल शांत थी और आस -पास इक्का -दुक्का लोग ही नज़र आते थे।

🔶 एक दिन भोर में उन्होंने देखा की एक युवक हाथ में फावड़ा लिए अपनी साइकिल से कहीं जा रहा है, वह कुछ देर दिखाई दिया और फिर उनकी नज़रों से ओझल हो गया दम्पत्ती ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया, पर अगले दिन फिर वह व्यक्ति उधर से जाता दिखा अब तो मानो ये रोज की ही बात बन गयी, वह व्यक्ति रोज फावड़ा लिए उधर से गुजरता और थोड़ी देर में आँखों से ओझल हो जाता।

🔷 दम्पत्ती इस सुन्सान इलाके में इस तरह किसी के रोज आने -जाने से कुछ परेशान हो गए और उन्होंने उसका पीछा करने का फैसला किया अगले दिन जब वह उनके घर के सामने से गुजरा तो दंपत्ती भी अपनी गाडी से उसके पीछे -पीछे चलने लगे कुछ दूर जाने के बाद वह एक पेड़ के पास रुक और अपनी साइकिल वहीँ कड़ी कर आगे बढ़ने लगा १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका और अपने फावड़े से ज़मीन खोदने लगा।

🔶 दम्पत्ती को ये बड़ा अजीब लगा और वे हिम्मत कर उसके पास पहुंचे, “तुम यहाँ इस वीराने में ये काम क्यों कर रहे हो ?”

🔷 युवक बोला, “ जी, दो दिन बाद मुझे एक किसान के यहाँ काम पाने क लिए जाना है, और उन्हें ऐसा आदमी चाहिए जिसे खेतों में काम करने का अनुभव हो, चूँकि मैंने पहले कभी खेतों में काम नहीं किया इसलिए कुछ दिनों से यहाँ आकार खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”

🔶 दम्पत्ती यह सुनकर काफी प्रभावित हुए और उसे काम मिल जाने का आशीर्वाद दिया।

🔷 मित्रो, किसी भी चीज में सफलता पाने के लिए तैयारी बहुत ज़रूरी है जिस लगन के साथ युवक ने खुद को खेतों में काम करने के लिए तैयार किया कुछ उसी तरह हमें भी अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...