बुधवार, 29 नवंबर 2017

👉 ऋण मुक्ति का आदर्श

🔷 भारत के प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता चितरंजन दास के पिता दस लाख रुपया कर्ज छोड़कर मरे थे। नवयुवक दास ने निश्चय किया कि वे सब का कर्ज चुकायेंगे। कर्ज रिश्तेदारों का था। सभी आसूदा थे इसलिए लड़के की परेशानी को देखते हुए कर्ज वापिस लेना नहीं चाहते थे। पर दास बाबू भी किसी का ऋण रखना अपनी बेइज्जती समझते थे वे जो कमाते गये, अदालत में जमा करते गये। उनने विज्ञापन प्रकाशित कराया कि जिनका कर्ज हो वह अपना पैसा ले जायें। बहुत दिन वह पैसा जमा रहा जब उनने ढूँढ़ ढूँढ़कर कर्जदारों का पता लगाया, उनका हिसाब चुकता किया।

🔶 किसी व्यक्ति की बेइज्जती यह है कि वह अनिवार्य आपत्ति के अवसर को छोड़कर अपना खर्च बढ़ाकर उसके लिए कर्ज ले। और उससे भी बड़ी बेइज्जती यह है कि होते हुए भी ऋण चुकाने में अपना कानी करें। चितरंजन दास ने अपने लिए निर्धनता निमंत्रित करके भी ऋण मुक्त होना अपना कर्तव्य समझा। यही आदर्श हर ईमानदार व्यक्ति का होना चाहिए।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 जीवन लक्ष्य और उसकी प्राप्ति भाग ३

👉 *जीवन का लक्ष्य भी निर्धारित करें * 🔹 जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन यापन ही रहता है। ...