बुधवार, 29 नवंबर 2017

👉 ऋषिकल्प से मिलेगी दिशाधारा

🔷 प्रज्ञा युग के नागरिक बड़े आदमी बनने की नहीं- महामानव बनने की महत्वाकांक्षा रखेंगे। सच्ची प्रगति इसी में समझी जायेगी कि गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ समुन्नत बनाया। कोई किसी के विलास वैभव की प्रतिस्पर्धा नहीं करेगा। वरन् होड़ इस बात की रहेगी कि किसने अपने आपको कितना श्रेष्ठ सज्जन एवं श्रद्धास्पद बनाया। वैभव इस बात में गिना जायेगा कि दूसरे को अनुकरण करने के लिए कितनी कृतियां और परंपरायें विनिर्मित कीं। आज के प्रचलन में सम्पदा को सफलता का चिन्ह माना जाता है। अगले दिनों यह मापदंड सर्वथा बदल जायेगा और यह जाना जायेगा कि किसने मानवी और गौरव गरिमा को किस प्रकार और कितना बढ़ाया।

🔶 शरीर यात्रा के निर्वाह साधनों के अतिरिक्त प्रज्ञा युग का मनुष्य दूसरी आवश्यकता अनुभव करेगा- सद्ज्ञान की। इसके लिए आजीविका उपार्जन एवं लौकिक जानकारियां देने वाली स्कूली शिक्षा पर्याप्त न मानी जायेगी। वरन् यह खोजा जायेगा कि दृष्टिकोण के परिष्कृत करने- सद्गुणों की परंपरा बढ़ाने एवं व्यक्तित्व के प्रखर प्रामाणिक बनाने की रीति-नीति सीखने अपनाने का अवसर कहां से किस प्रकार मिल सकता है। इस प्रयोजन के लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन की उच्चस्तरीय दिशाधारा कहां से मिल सकती है। इसे खोज पाने का प्रयास निरंतर जारी रखा जायेगा। यह कार्य ईश्वर उपासना, जीवन साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1984/July/v1.27

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