🔵 साकार उपासना में गायत्री को माता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। माता होते हुए भी उसका स्वरूप नवयौवना के रूप में दो कारणों से रखा गया है। एक तो इसलिए कि देवत्व को कभी वार्धक्य नहीं सताता। सतत् उसका यौवन रूपी उभार ही झलकता रहता है। सभी देवताओं की प्रतिमाओं में उन्हें युवा सुदर्शन रूप में ही दर्शाया जाता है। यही बात देवियों का चित्रण करते समय भी ध्यान में रखी जाती है और उन्हें किशोर निरूपित किया जाता है। दूसरा कारण यह है कि युवती के प्रति भी विकार भाव उत्पन्न न होने देने- मातृत्व की परिकल्पना परिपक्व करते चलने के लिये उठती आयु को इस अभ्यास के लिये सर्वोपयुक्त माना गया है। कमलासन पर विराजमान होने का अर्थ है- कोमल, सुगन्धित, उत्फुल्ल कमल पुष्प जैसे विशाल में उसका निवास होने की संगति बिठाना। यही है विभिन्न रूपों में उसकी उपासना का तात्विक दर्शन।
🔴 स्त्रियों को गायत्री का अधिकार है या नहीं, यह आशंका सभी उठाते देखे जाते हैं- धर्माचार्य भी तथा शोषक पुरुष समुदाय भी। वस्तुतः नर और नारी भगवान के दो नेत्र, दो हाथ, दो कान, दो पैर के समान मनुष्य जाति के दो वर्ग हैं। दोनों की स्थिति गाड़ी के दो पहियों की तरह मिल-जुलकर चलने और साथ-साथ सहयोग करने की है। दोनों कर्त्तव्य और अधिकार समान हैं। प्रजनन प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए एक का कार्य क्षेत्र परिवार, दूसरे का उपार्जन- उत्तरदायित्व इस रूप में बँट गए हैं। इस पर भी वह कोई विभाजन रेखा नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, साहित्य, राजनीति आदि में किसी भी वर्ग पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। इसी प्रकार धर्म-अध्यात्म क्षेत्र में- साधना-उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं।
🔵 नर और नारी को- सवर्ण और असवर्ण को ऊंचा-नीचा मानना, एक को अधिकारी- दूसरे को अनधिकारी ठहराने का प्रचलन मध्यकालीन अन्धकार युग की देन है। उसमें समर्थों ने असमर्थों को पैरों तले रौंदने, उनसे मनमाने लाभ उठाने और विरोध की आवाज न उठा सकने के लिए जहाँ डण्डे का उपयोग किया, वहाँ पण्डिताऊ प्रतिपादन भी लालच या भय दिखाकर अपने समर्थन में प्राप्त कर लिये। शूद्रों को- स्त्रियों को नीचा या अनधिकारी ठहराने के पीछे मात्र एक ही दुरभि सन्धि है कि समर्थों को मनमाने लाभ मिलते रहें और किसी विरोध- प्रतिरोध का सामना न करना पड़े।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति जून 1983 पृष्ठ 47
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1983/June.47




































