शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

👉 हे महाकाल!

हे महाकाल! तुम्हारी यह कैसी लीला है? आज लाखों आदमी निर्दयता से मारे जा रहे है, करोड़ों आदमी भूखों मर रहे हैं, उन्हें रात में सोने को भी जगह नहीं हैं, जीवनोपयोगी पदार्थों का ध्वंस हो रहा है मनुष्य मनुष्य को खाये जा रहा है, यह सब क्या है! तुम्हारी संहार लीला असमय में ही ऐसा प्रलयंकर रूप क्यों धारण कर रही है?

क्या कहते हो? यह मनुष्य के पापों का ही फल है? मनुष्य दल बाँधकर जब दूसरे मनुष्यों को देशों और वर्गों को चूस डालना चाहता है तब उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।

हे भयंकर! आदमियत पढ़ाने का तुम्हारा यह तरीका बड़ा निर्दय है पर क्या तुम समझते हो कि आदमी में इस प्रकार शैतानियत बढ़ाकर नंगा चित्र खींचकर तुम उसे दूर कर सकोगे? अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ, शैतानियत बढ़ती ही जा रही है।

क्या कहते हो? जब तक आँच से लोहा गलेगा नहीं तब तक ढाला न जायगा! क्या इसीलिये मनुष्य जाति को इस प्रकार भट्टी में झोंके जाते हो। क्या मनुष्य जाति के भाग्य में और भी भयंकर विपदाएं वदी हैं? पर करोड़ों आदमी इतने में भी घबरा उठे है- उन्हें अभी भी यह सब असह्य है!

क्या कहते हो? जब वेदना असह्य होगी तब सब गल जायेंगे? क्या तभी अक्ल आयेगी? पर बहुतों को अक्ल आ चुकी है-वे गल भी गये हैं। अब तो थोड़े के पीछे बहुतों को गलना पड़ा रहा है।

ऐ! क्या कहते हो! बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है? तो क्या जब तक थोड़े न गलेंगे तब तक बहुतों को भी गलना पड़ेगा! हे न्याय मूर्ति! बात तो सच कहते हो। संसार पर शैतानियत का ताँडव करने वाले मुट्ठीभर लोग ही है, पर उनको उन लोगों का भी पीठ बल है जो उनकी शैतानियत से पिस रहे हैं। इन लड़ाकू स्वभाव के लोगों के पीछे उन मजबूरों, गरीबों तक का बल है जो खुद पूँजीवाद से कराह रहे हैं! पर दूसरे देशों के गरीबों को सताने में अपने नेताओं का साथ दे रहे हैं। तब तुम्हारा कहना ठीक ही है कि भस्म होकर भी बहुतों ने थोड़ों को छोड़ा नहीं है। पर हे शिव, ऐसे भी तो लोग हैं देश हैं जिनके न थोड़े न बहुत, किसी को पीसना नहीं चाहते है वे तो गले हुए हैं उन्हें भट्टी में क्यों डाल रक्खा है?

क्या कहा? वे कच्चा लोहा हैं? उनमें बहुत-सा भाग ऐसा है जिसे जलाकर नष्ट कर देना है। तो क्या उन्हें भी बहुत देर तक भट्टी में रहना पड़ेगा? हे शंकर यह क्या कहते हो? वे तो बहुत निर्बल हैं, दीन हैं, न्याय चाहते हैं। उन्हें यह दण्ड क्यों?

क्या कहते हो! निर्बलता का नाम या संयम नहीं है! ओह! तुम बड़े कठोर हो। पर मैं मानता हूँ कि तुम्हारे कहने में जरा भी झूठ नहीं है। निर्बल निर्बल नरों को चूसते हैं वहाँ हैवानियत है-संयम नहीं है। जब तक हैवानियत भस्म न हो जायेगी तब तक तुम उन्हें भी भट्टी में झोंके रहोगे। हे महादेव! तुम्हीं सत्य हो। जैसा समझो करो। तुम महाकाल हो, अनन्त हो। हम चार दिन के कीड़े तुम्हारी अनन्त गम्भीर, अनन्त उन्नति और अनन्त व्यापक नीति को क्या समझें! -संगम

📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 10

👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2020


👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 3 April 2020


👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग २)

यदि सब कठिनाइयों, कष्टों, व आपत्तियों को आशंकाओं को मिलाकर देखा जाय तो लगता है मनुष्य जाति अपने को बड़ा दुखी और व्यथित प्रभु कर रही है। किन्हीं-किन्हीं प्रदेशों पर कभी-कभी कुछ आपत्तियाँ आते रहने के उदाहरण इतिहास में प्राप्त हो गये हैं परन्तु ऐसे अवसर बहुत ही कम आये हैं जब समस्त संसार पर एक बारगी इतनी बड़ी चतुर्मुखी विपत्ति आई हो। आज तो युद्ध में लगे हुए और बिना लगे हुए, सभी देशों की जनता को ‘विविध प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। समस्त विश्व में एक साथ ऐसी विपत्ति क्यों आई? आइए, इसके सम्बन्ध में कुछ विचार विनिमय करें -

वर्तमान कष्टों के कारणों की विवेचना करते हुए हम देखते हैं कि भौतिक विज्ञान की उन्नति ने रेल, तार, रेडियो, गैस, जलयान, वायुयान आदि की सहायता से समस्त संसार को एक सूत्र में बाँध दिया है। इन साधनों की सहायता से सारी मनुष्य जाति आपस में बहुत अधिक सम्बन्धित हो गई है। व्यापारिक दृष्टि से एक देश दूसरे देश पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अब शारीरिक और मानसिक खुराकें प्राप्त करने के लिए अन्य देशवासियों के सहयोग की भी आवश्यकता अपेक्षित होती है। अब सेनाओं को केवल देश की आन्तरिक समस्याओं को ही हल नहीं करना पड़ता वरन् अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को भी उतना ही महत्व देना पड़ता है। इस प्रकार मानव परिवार का दायरा अधिक विस्तृत हो गया है और साथ ही एक देश की जनता के भले बुरे आचरण की जिम्मेदारी दूसरे देशों पर भी आ गई है! अक्सर अमेरिका के बुद्धिमान लोग ऐसा कहा करते हैं कि भारत की समस्या मित्र राष्ट्रों की समस्या है। भारत की अवनति का दोष इंग्लैण्ड को दिया जाया करता है। धुरी राष्ट्रों द्वारा पराधीन बनाये गये देशों की स्वतन्त्रता दिखाने का आश्वासन मित्र राष्ट्र दे रहे हैं। यह सब उदाहरण यह बताते हैं कि अब कोई देश केवल अपनी ही सीमा तक कर्तव्य बद्ध नहीं हैं वरन् उसकी जिम्मेदारी का दायरा बढ़कर अन्तर्राष्ट्रीय हो गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (भाग २)

चतुरंगिणी सेनाएं शत्रुओं का संहार करने के लिये कूच कर रही हैं, रोगों को मिटा देने के लिए वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाएं बड़े-बड़े अनुसन्धान कर रही हैं, आर्थिक कष्टों को मिटाने के लिए अर्थशास्त्री प्रयत्नशील हैं, राजनैतिक दिमाग लगे हुए हैं। वे लोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों में बड़े परिश्रम और जाँ किसानी के साथ लगे हुए हैं। कर्तव्य निष्ठा सराहनीय वस्तु है। जो लोग वर्तमान महा विपत्तियों का समाधान करने के लिए कार्य कर रहे हैं, वे सचमुच प्रशंसा के पात्र हैं। आग लगने पर उसे बुझाने का प्रयत्न करना हर एक विचारशक्ति रखने वाले का परम पवित्र कर्तव्य है। हिन्दू धर्म शास्त्रों की ऐसी आज्ञा है कि सामूहिक आपत्ति को निवारण करने में हर एक मनुष्य को सहयोग देना चाहिए, अन्यथा घोर पाप का भागी होना पड़ता है।

कहीं आग लगने पर जो बालक, रोगी या असमर्थ उसे बुझाने के लिए जाने में समर्थ नहीं होते उन्हें पाँच कदम उस दिशा में चल कर पाँच मुट्ठी रेत और एक लोटा पानी फैलाकर प्रायश्चित्त कर लेने का विधान है। आज संसार में आग लग रही है, जिसकी ज्वाला में देश के देश और परिवार के परिवार जले जा रहे हैं, इस अग्नि को बुझाने में जो लोग आना-कानी करते हैं, अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते, वे निःसन्देह एक महान पाप के भागी होते हुए अपने लिए घोर गौरव नरक का निर्माण करेंगे।

भौतिक और शारीरिक दृष्टि से किसे क्या करना चाहिए, इस पर हम अधिक प्रकाश नहीं डालेंगे, क्योंकि अनेक सूत्रों से उन कर्तव्यों की जानकारी पाठकों को प्राप्त होती रहती है। हमें तो उस मूल कारण के सम्बन्ध में कुछ कहना है, जिसके कारण यह सारी विपत्तियाँ उत्पन्न हुई हैं। तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भौतिक उपकरण प्रयोग होते हैं। पर स्थायी शान्ति के लिए उन आध्यात्मिक शस्त्रों की आवश्यकता हैं, जिनसे अधर्म की सारी किलेबन्दी को ढहा कर विस्मार कर दिया जाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

👉 वर्तमान दुर्दशा क्यों? (भाग १)

आज हम चारों ओर भयंकर दावानल सुलगती हुई देखते हैं। महायुद्ध का दानव लाखों मनुष्यों को अपनी कराल दाढ़ों के नीचे कुचल कुचल कर चबाते जा रहा है। खून से पृथ्वी लाल हो रही है। आकाश से ऐसी अग्नि वर्षा हो रही है जिससे सहस्रों निरपराध प्राणी अकारण ही चबाने की तरह जल-भुन रहे हैं। कराह और चीत्कारों से सारा आकाश मण्डल गुँजित हो उठा है। नन्हें नन्हें बालक अपने माता पिताओं के लिए बिलख रहे हैं। माताएं अपने पुत्रों के लिए और पत्नियाँ अपने पतियों के लिए, अश्रुपात कर रहीं हैं। कितने घरों में, किस प्रकार करुण क्रन्दन हो रहें हैं, इन मर्म कथाओं को यदि प्रत्यक्ष रूप से प्रकट किया जाये तो वज्र का भी कलेजा फटने लगेगा।

अकेला युद्ध ही क्यों महामारियों का प्रचंड प्रकोप आप देखिए। अनेक प्रकार के नये-नये अश्रुत पूर्व रोग उठ खड़े हुए हैं। चिकित्सा करने वाले परेशान हैं, उपचार हतवीर्य साबित होते हैं, अर्धमृत या मृत लाशों के ढेर घर एवं मरघटों में आसानी से देखे जा सकते हैं। रोगी और उनकी परिचर्या करने वाले सभी की बेचैनी बढ़ती चली जा रही है। जीवन भर बने हुए हैं, जो साँसें बीत रही हैं वह भारी और कष्टकर प्रतीत होती हैं। दवा के लिए पैसा नहीं, पथ्य के लिए पैसा नहीं, असहायवस्था में पड़े हुए लोग बेबसी आँसू घूँट रहे हैं।
महंगी का तो कुछ कहना ही नहीं, हर चीज पर चौगुने आठ गुने दाम बढ़ते जा रहे हैं। पैसा खर्च करने पर भी वस्तुएं प्राप्त होती नहीं। अच्छा अब नसीब नहीं, खाद्य पदार्थों का लोप होता जाता है। व्यापार चौपट हो रहे हैं, उद्योग धंधे बढ़ते नहीं, बेकारी में कमी नहीं होती खर्च बढ़ रहे हैं पर आमदनी नहीं बढ़ती आधे पेट खाने वालों और आधे अंग ढकने वालो की संख्या बढ़ती जा रही है। जी तोड़ परिश्रम करने पर भी भोजन वस्त्र की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती। कुछ अमीरों या युद्ध सम्बन्धी कोई व्यवसाय प्राप्त कर लेने वाले भाग्यवानों की बात अलग है, किन्तु साधारण जनता की जीवन निर्वाह समस्या दिन-दिन गिरती चली जा रही है, तिल तिल करके अभावों की ज्वाला में लोगों को झुलसना पड़ रहा है।

आये दिन जो अज्ञात विपत्तियाँ सामने आती रहती हैं, उनकी भयंकरता भी कम नहीं। राजनैतिक संघर्षों के कारण जनता के कष्टों में वृद्धि होती है, कोई उपद्रव करता है दण्ड किसी को सहना पड़ता है। निर्दोष व्यक्ति का भी कलेजा काँपता रहता है कि कही अकारण ही कोई चपेट मुझे न लग जाये। देवी प्रकोप का भी पूरा जोर है। इस साल नदियों में बड़ी भारी बाढ़ें आईं, जिससे हजारों गाँव का नुकसान हुआ लाखों बीघा कृषि नष्ट हो गई, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूचाल, तूफान, अंधड़ के कारण बहुत भारी क्षति उठानी पड़ी। गुँडे बदमाशों का जोर बढ़ने से आये दिन अपराध बढ़ते रहते हैं। आज का दिन किसी प्रकार कट गया हो कल के लिए आशंका बनी रहती है कि कही कोई नई विपत्ति न टूट पड़े। शान्ति, स्थिरता, संतोष में कमी होती जाती है और बेचैनी बढ़ती जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 4

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1.4

👉 वर्तमान संकट और हमारा कर्तव्य (भाग १)

वर्तमान काल में मनुष्य जाति पर जो विपत्तियाँ आई हैं, उनके तात्कालिक कारण अलग-अलग दिखाई पड़ते हैं, परन्तु इन सब के मूल में एक ही कारण काम कर रहा है वह यह है ‘धर्म के प्रति उपेक्षा।’ आत्मा का स्वाभाविक धर्म यह है कि सेवा बुद्धि से लोक कल्याणार्थ कर्तव्य करें। सब भूतों में ईश्वर की भावना रखकर उनकी क्रियात्मक पूजा करना, प्रेम, सहायता, सहयोग करना, सच्चा धर्म है। ईश्वर भक्ति का और धर्म पालन का एक ही सच्चा मार्ग है और वह यह कि अन्य प्राणियों के उत्थान के निमित्त निजी स्वार्थों का त्याग किया जाये। दया, उदारता, भ्रातृभाव, त्याग, सेवा, सहायता की उपकारी सद्भावनायें धर्म के प्रत्यक्ष चिन्ह हैं। अपने लिये कम लेने और दूसरों को अधिक देने का स्वभाव धर्मात्मा होने के प्रधान लक्षण हैं।

इस सत्य धर्म को लोगों ने त्याग दिया और जैसे भी बने वैसे नीति या अनीति से दूसरों की वस्तु को अपहरण करके अपनी भोगेच्छाओं को पूरा करने की प्रथा को अपना लिया। अपहरण को पाप और सेवा को पुण्य कहा जाता है, लेने की इच्छा को मोह, देने की इच्छा को प्रेम कहा जाता है। आत्मा को लोभ में गिराने को असत्य और भोग छोड़कर तप करने को सत्य बताया गया है। शक्ति को सहायता में लगाना न्याय, और संचय एवं परपीड़न में लगाना अन्याय कहा गया है। हम दृष्टि पसार कर देखते हैं, कि संसार में धर्म को, पुण्य को, सत्य को, प्रेम को, न्याय को, लोगों ने छोड़ दिया है और उसके स्थान पर अधर्म, पाप, असत्य, मोह एवं अन्याय को गर्वपूर्वक अपनायें फिर रहें हैं। एक दूसरे को लूटने की तरकीबें सोचने में व्यस्त हैं। एक भेड़िया दूसरे भेड़िये का माँस नोंच खाने के लिये अपने तीक्ष्ण दाँतों को और भी तेज करने में, मजबूत करने में, लगा हुआ है। ऐसी भावनायें जब उग्र रूप धारण करके सर्वत्र फैल रही हैं तो उसका यह एक ही परिणाम होना संभव है, कि सारी मनुष्य जाति घोर विपत्तियों के दलदल में फँस जाय। वह परिणाम हमारे सामने उपस्थित है। हम लोग नाना प्रकार की आधि व्याधियों में पड़े हुए कराह रहे हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1943 पृष्ठ 1
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1943/January/v1

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (अंतिम भाग)

जिनकी आत्मा अपनी इन्द्रियों के विषयों-खान-पान, चटकीले वस्त्र, दिखावा, विलासप्रियता, श्रृंगार, झूठी शान, बचपन की रंग रेलियाँ, सिनेमा की अभिनेत्रियों के जीवन या सामाजिक विकारों में ही लगा रहता है और स्वार्थ, क्रोध, ईर्ष्या, मोह, दगाबाजी-बेईमानी के कलुषित विचारों में रमा हुआ है, ऐसी नशोन्मुख आत्माओं का अवलोकन कर कौन पश्चाताप न करेगा?

ऐसी विनाशकारी वृत्ति का एक उदाहरण पं. रामचंद्र शुक्ल ने दिया है। आपने मकदूनिया के बादशाह डेमेट्रियस के विषय में लिखते हुए निर्देश किया है कि वह कभी-कभी राज्य का सब कार्य त्याग कर अपने ही मेल के दस-पाँच साथियों को लेकर विषय वासना में लिप्त रहा करता था। एक बार बीमारी का बहाना करके, वह इसी प्रकार अपने दिन काट रहा था। इसी बीच उसका पिता उससे मिलने के लिए गया। उसने एक हंसमुख जवान को कोठरी से बाहर निकलते हुए देखा। जब पिता कोठरी के बाहर निकला, तब डेमेट्रियस ने कहा - “ज्वर ने मुझे अभी छोड़ा है।” पिता ने उत्तर दिया, “हाँ! ठीक है, वह दरवाजे पर मुझे मिला था।”

कुसंग का ज्वर ऐसा ही भयानक होता है। एक बार युवक इसके पंजे में फंस कर मुक्त नहीं हो पाता। अतः प्रत्येक युवक को अपने मित्रों, स्थानों, दिलचस्पियों, पुस्तकों इत्यादि का चुनाव बड़ी सतर्कता से करना चाहिए।

इसके विपरीत सत्संग एक ऐसा आध्यात्मिक साधन है जिससे मनुष्य की सर्वतोमुखी उन्नति हो सकती है। संसार में एक से एक पवित्र आत्माएं पुस्तकों के रूप में आपके साथ रह सकती हैं। उनके विचारों की विद्युत आपके चारों ओर रह कर सब प्रकार की गंदगी को, अशुभ विचारों को दूर भगाती है। उत्तम पुस्तकों को घर में रखने, उनका अध्ययन, मनन तथा सहवास करने से मनुष्य सबसे बुद्धिमान आत्माओं के सहवास में हो सकता है।

इसके अतिरिक्त विद्वान, साहित्य सेवियों, दर्शन शास्त्रियों, सम्पादकों, सन्तों के संपर्क में रह कर भी आध्यात्मिक जीवन व्यतीत किया जा सकता है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.26

मंगलवार, 31 मार्च 2020

👉Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 1 April 2020


👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 1 April 2020




👉 उपयोग और सदुपयोग:-

शीमक कठिन शीत ज्वर से पीड़ित है उनके पुत्र पात्रों ने उपचार की अच्छी व्यवस्था की है तो भी वे औषधि नाम मात्र को ही ले रहे है। उनका कथन है कि औषधि का काम विष के प्रभाव को रोकना भर है, रोग को नष्ट करना नहीं, वह काम तो प्रकृति स्वयं ही करती है। तब हम उसमें हस्तक्षेप क्यों करें!

पर उनके इस कथन का भी वही अर्थ लगाया गया जो अब तक लगाया जा रहा था। अर्थात् शीमक बड़ा कृपण है। घर में अथाह धनराशि होते हुये भी वह न तो अच्छा खा सकता है, न पहन सकता है, बाल-बच्चों को देना तो दूर, अब जब उसका अपना ही जीवन संकट में पड़ गया तब भी पैसे का इतना मोह-छिः शीमक की कृपणता- कलंक नहीं तो और क्या है।

बहुत बार तो शीमक को कई ऐसे व्यक्ति भी मिले थे जो उसे मुख पर ही कह गये थे- ”शीमक इतनी कृपणता तो न किया करो, कभी कुछ दान, कभी कुछ पुण्य, तीर्थ यात्रा, ब्राह्मण भोज, नगर भोज कुछ तो ऐसा कर डालो, जिससे यह धन ठिकाने लग जाये! मर गये तब वह धन किसी और के हाथ लग गया तो तुम्हारी इस कमाई का क्या लाभ।”

शीमक हंस पड़ते और 'अच्छा! अच्छा!! कहकर उस प्रसंग को टाल देते।

ऐसे अवसर आते तो दूर दृष्टि डालते हुये शीमक की मुख मुद्रा देखने से प्रतीत होता था मानो वे सुन्दर भविष्य में कुछ खोजना चाहते हैं, वे क्या चाहते हैं, यह आज तक उसके पुत्र परिजन भी नहीं समझ सके थे।

आज जितने चिन्तित शीमक बैठे थे, उससे अधिक विकल आचार्य महीधर दिखाई दे रहे थे। उन्होंने बड़े परिश्रम के साथ वेदों का भाष्य किया था। भाष्य भी ऐसा जो भी विद्वान उसे पढ़ता धन्य हो जाता। किन्तु धन के अभाव के कारण आज स्वयं महीधर इतने निराश हो गये थे कि उन्हें अपना सारा तप ही निरर्थक लगने लगा था। वे चाहते थे कि वेदों का यह भाष्य घर-घर पहुँचे ताकि बौद्धों के प्रभाव को रोका जा सके। उनकी आकांक्षा, आकांक्षा ही रही। कोई उपाय बन नहीं सका।

शीमक ने समाचार सुना तो चुपचाप घर से निकल पडे। कहा गए शीमक की कई दिन तक खोज की गयी। पर कुछ भी पता न चला!

बहुत दिन बाद जब महीधर के वेदभाष्य घर-घर पहुँचने लगे तब लोगों ने इतना भर सुना कि कोई एक देव पुरुष उनके पास आया था और उसने अपनी सारी सम्पत्ति उन्हें देकर कहा था- “आचार्य प्रवर! सद्इच्छाएं धन के अभाव में रुकती नहीं। यह मेरे जीवन भर की कमाई इसे काम में लेकर मेरा जीवन धन्य करें।“

उसके बाद फिर उस महापुरुष के कभी दर्शन नहीं हुए। कहते हैं, वह वानप्रस्थ ग्रहण कर अंतिम साधना के लिये अन्त:वासी हो गया था।

‘अखण्ड ज्योति, अप्रैल-1970’

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ८)

कुसंग का भयानक अभाव-

कुसंग में रह कर युवक परिवार से छूट जाता है। ये कुसंग बढ़े आकर्षण रूप में उसके सम्मुख आते हैं-मित्रों, सिनेमा, थियेटर, वैश्या, गन्दा साहित्य, गर्हित चित्र, मद्यपान, सिगरेट तथा अन्य उत्तेजित पदार्थ। वे सभी प्रत्यक्ष विष के समान है, जिनके स्पर्श मात्र से मनुष्य पाप कर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उनकी कल्पना सर्वथा विनाशकारी है। बड़े सावधान रहें।

इस सम्बन्ध में हम पं. रामचन्द्र शुक्ल की बहुमूल्य वाणी उद्धृत करना चाहते हैं। इसमें गहरी सत्यता है :-

कोई भी युवा पुरुष ऐसे अनेक युवा पुरुषों को पा सकता है जो उसके साथ थियेटर देखने जायेंगे, नाच रंग में जायेंगे, सैर-सपाटे में जायेंगे, भोजन का निमंत्रण स्वीकार करेंगे। ऐसे लोगों से हानि होगी तो बड़ी होगी।

सोचो तो, तुम्हारा जीवन कितना नष्ट होगा, यदि ये जान पहिचान के लोग उन मनचले युवकों में से निकले जिनकी संख्या दुर्भाग्यवश आजकल बहुत बढ़ रही है, यदि उन शोहदों में से निकले जो अमीरों की बुराइयों और मूर्खताओं का अनुकरण किया करते हैं, दिन रात बनाव श्रृंगार में रहा करते हैं, कुलटा स्त्रियों के फोटो मोल लिया करते हैं, महफिलों में अहाँ -हा, वाह किया करते हैं, गलियों में ठट्ठा मारते और सिगरेट का धुआँ उड़ाते चलते हैं। ऐसे नवयुवकों से बढ़कर शून्य, निःसार और शोचनीय जीवन और किसका है ?
वे अच्छी बातों से कोसों दूर हैं। उनके लिए न तो संसार में सुन्दर और पवित्र उक्ति वाले कवि हुए, और न उत्तम चरित्र वाले महात्मा हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.26

👉 The Illusive Reality

One who knows that he knows not, but claims he knows – is a liar. One who knows little bit but thinks he knows – is ignorant. One who knows not and knows and accepts that he knows not – is sincere. One who knows partially and knows that he knows not – is a learner. But none can know it because it is impossible to know it. This is what, is the maya – the ‘grand illusion’ of our perception of the gigantic creation of God.

One who knows that he knows and also knows that he does not – is wise. He does not say it despite knowing a lot. Because he knows a lot and therefore knows that nothing could be said or discussed about it. One who knows that it is undecipherable infinity and immerses and ‘illusion’ of self-identity into devotion of the Omniscient – is enlightened…

His existence is unified with the devotion and love of god. He has realized the absolute void in the infinity (of maya – the illusive creation) and the infinity (of God) in the void (sublime). What doubts or queries he would have? Nothing! What he would know and about what? Nothing! He says nothing. What he would say and to whom? He knows God and knows that God alone knows his maya.

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 दरिद्रता

दरिद्रता इच्छाओं की कोख से पैदा होती है। जिसकी इच्छाएँ जितनी अधिक हैं उसे उतना ही दरिद्र होना पड़ेगा। उसे उतना ही याचना और दासता के चक्रव्यूह में फँसना पड़ेगा। इसी के साथ उसका दुःख भी उतना ही बढ़ेगा। इसलिए जिसे दरिद्रता निवारण के लिए कदम आगे बढ़ाने हैं, उसे इच्छाओं की ओर से अपने पाँव उतना ही पीछे हटाने होंगे। क्योंकि जो जितना अपनी इच्छाओं को छोड़ पाता है, वह उतना ही स्वतन्त्र, सुखी और समृद्ध होता है। जिसकी चाहत कुछ भी नहीं है, उसकी निश्चिंतता एवं स्वतंत्रता अनन्त हो जाती है।
  
इस सम्बन्ध में सूफियों में एक कथा कही जाती है। फकीर बालशेम ने एक बार अपने एक शिष्य को कुछ धन देते हुए कहा- इसे किसी दरिद्र व्यक्ति को दान कर देना। शिष्य अपने गुरु के पास से चल कर थोड़ा आगे बढ़ा और सोचने लगा कि उसके गुरु ने गरीब के स्थान पर दरिद्र व्यक्ति को यह धन देने के लिए कहा है। और जैसा कि उसने बालशेम के सत्संग में जाना था कि गरीब व गरीबी परिस्थितियों वश होता है। लेकिन दरिद्र व दरद्रिता मनःस्थिति जन्य है। सो उसने किसी दरिद्र व्यक्ति की तलाश करनी शुरू की।
  
अपनी इस तलाश में वह एक राजमहल के पास जाकर रुक गया। वहाँ कुछ लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि राजा ने अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए प्रजा पर कितने कर लगाए हैं, कितने लोगों को लूटा है। इन बातों को सुनकर उसे लगा कि उसकी तलाश पूरी हुई। बस उसने राजा के दरबार में हाजिर होकर उस राजा को अपने सारे रूपये सौंप दिए। एक फकीर के द्वारा इस तरह अचानक रूपये दिये जाने से वह राजा हैरान हुआ। इस पर बालशेम के शिष्य ने उसे अपने गुरु की बात कह सुनायी। और कहा- राजन्! इच्छाएँ हो तो दरिद्रता व दुःख बने ही रहेंगे। इसलिए जो इन इच्छाओं के सच को जान लेता है वह दुःख से नहीं अपनी चाहतों से मुक्ति खोजता है। क्योंकि जो अपनी इच्छाओं व चाहतों से छुटकारा पा लेता है, उसके जीवन से दरिद्रता, दुःख, याचना व दासता स्वतः ही हट एवं मिट जाते हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २११

रविवार, 29 मार्च 2020

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ७)

पिता के प्रति पुत्र के तीन कर्त्तव्य हैं - 1-स्नेह, 2-सम्मान तथा आज्ञा पालन। जिस युवक ने पिता का, प्रत्येक बुजुर्ग का आदर करना सीखा है, वही आत्मिक शान्ति का अनुभव कर सकता है।

स्मरण रखिये, आप जो कुछ गुप्त रखते हैं, दूसरों के समक्ष कहते हुए शर्माते है, वह निंदय है। जब कोई युवक पिता के कानों में बात डालते हुए हिचके, तो उसे तुरन्त सम्भल जाना चाहिए क्योंकि बुरे मार्ग पर चलने का उपक्रम कर रहा है। उचित अनुचित जानने का उपाय यह है कि आप उसे परिवार के सामने प्रकट कर सकें। जब किसी पदार्थ का रासायनिक विश्लेषण हो जाता है, तब सभी उसके शुभ अशुभ अंशों को जान जाते हैं। परिवार में यह विश्लेषण तब होता है, तब युवक का कार्य परिवार के सदस्यों के सम्मुख आता है।

परिवार से युवक का मन तोड़ने में विशेष हाथ पत्नी का होता है। उसे अपने स्व का बलिदान कर संपूर्ण परिवार की उन्नति का ध्यान रखना चाहिए। समझदार गृहणी समस्त परिवार को सम्भाल लेती है।

आज के युवक प्रेम-विवाह से प्रभावित हैं। जिसे प्रेम-विवाह कहा जाता है, वह क्षणिक वासना का ताँडव, थोथी समझ की मूर्खता, अदूरदर्शिता है। जिसे ये लोग प्रेम समझते हैं, वह वासना के अलावा और कुछ नहीं होता। उसका उफान शान्त होते ही प्रेम-विवाह टूक टूक हो जाता है। चुनावों में भारी भूलें मालूम होती है। समाज में प्रतिष्ठा का नाश हो जाता है। ऐसा व्यक्ति सन्देह की दृष्टि से देखा जाता है।

अनेक पुत्र विचारों में विभिन्नता होने के कारण झगड़ों का कारण बनते हैं। संभव है युवक पिता से अधिक शिक्षक हो। किन्तु पिता का अनुभव अपेक्षाकृत अधिक होता है। पुत्र को उदारतापूर्वक अपने विचार अपने पास रखने चाहिए और व्यर्थ के संपर्क से बचना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 25

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.25

👉 बासन्ती रंग व उमंग

वसन्त में रंग व उमंग है। ये बासन्ती रंग व उमंग सदा ही भारतीय संस्कृति व संस्कारों से सराबोर हैं। बासन्ती बयार में ये घुले-मिले हैं। ये रंग हैं पवित्रता के, उमंग हैं प्रखरता की। इन रंगों में भगवान् का भावभरा स्मरण छलकता है, तो उमंग में सद्गुरु के प्रति समर्पण की झलक झिलमिलाती है। इस बासन्ती रंग में श्रद्धा के सजल आँसुओं के साथ इसकी उमंग में प्रज्ञा का प्रखर तेज है। इन रंगों में निष्ठा की अनूठी चमक के साथ इसकी उमंगों में अटूट नैतिकता सदा छायी रहती है।
  
वसन्त के ये रंग यदि विवेक का प्रकाश अपने में समेटे हैं, तो इसकी उमंगों में वैराग्य की प्रभा है। वसन्त के इन रंगों की अद्भुत छटा में त्याग की पुकार है और इसकी उमंगों में बलिदानी शौर्य की महाऊर्जा है। वसन्त के इन्हीं रंगों व उमंगों ने हमेशा ही भारतीय संस्कृति को संजीवनी व संस्कारों को नवजीवन दिया है। इन बासन्ती रंगों व उमंगों को अपने में धारण करके भारत माता की सुपुत्रियों व सपूतों ने हँसते-हँसते स्वयं को बलिदान करके सद्ज्ञान व सन्मार्ग को प्रकाशित किया है।
  
यदि कभी काल के कुटिल कुचक्र के कारण बासन्ती रंग व उमंग फीके पड़े हैं, तो इसी के साथ भारत की संस्कृति व संस्कारों की छवि भी धूमिल हुई है। जब कभी किसी ने बासन्ती रंग व उमंग को प्रकाशित व ऊर्जावान् करने का सत्प्रयास किए तो उसी के साथ भारत की संस्कृति व संस्कार भी अपने आप समुज्ज्वल हो गए। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी इसी प्रक्रिया को अपनाकर युग परिवर्तन की बासन्ती बयार प्रवाहित की। उनके द्वारा प्रेरित व प्रवाहित परिवर्तन की बयार में बासन्ती रंगों का अनूठा उनका प्यार है, तो साथ हैं बासन्ती उमंगों के तपपुञ्ज अंगार भी। जो उन्हीं के इस जन्मशताब्दी वर्ष में नव वसन्त का सन्देश सुना रहे हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१०

शनिवार, 28 मार्च 2020

👉 पारिवारिक कलह और मनमुटाव कारण तथा निवारण (भाग ६)

जरमी टेलर कहते हैं -”जीवन एक बाजी के समान है। हार-जीत तो हमारे हाथ में नहीं है, पर बाजी का ठीक तरह से खेलना हमारे हाथ में है। यह बाजी हमें बड़ी समझदारी से, छोटी-छोटी भूलों से बचाते हुए निरन्तर आत्म विकास और मनोवेगों का परिष्कार करते हुए करनी चाहिए।”

डॉक्टर आर्नल्ड ने लिखा है - “इस जगत में सबसे बड़ी तारीफ की बात यह है कि जिन लोगों में स्वभाविक शक्ति की न्यूनता रहती है, यदि वे उसके लिए सच्चा साधन और अभ्यास करें, तो परमेश्वर उन पर अनुग्रह करता है।” बक्सटन ने भी निर्देश किया है - “युवा पुरुष बहुत से अंशों में जो होना चाहें, हो सकते हैं।” एटी शेकर ने कहा है- “जीवन में शारीरिक और मानसिक परिश्रम के बिना कोई फल नहीं मिलता। दृढ़ चित्त और महान् उद्देश्य वाला मनुष्य जो चाहे कर सकता है।”

प्रतिभा की वृद्धि कीजिए। आपको नौकरी, रुपया, पैसा, प्रतिष्ठा और आत्म सम्मान प्राप्त होगा। उसके अभाव में आप निखट्टू बने रहेंगे। प्रतिभा आपके दीर्घकालीन अभ्यास, सतत परिश्रम, अव्यवसाय, उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर है। प्रतिभा हम अभ्यास और साधन से प्राप्त करते हैं। मनुष्य की प्रतिभा स्वयं उसी के संचित कर्मों का फल है। अवसर को हाथ से न जाने दें, प्रत्येक अवसर का सुँदर उपयोग करें और दृढ़ता, आशा और धीरता के साथ उन्नति के पथ पर अग्रसर होते जायें। स्व संस्कार का कार्य इसी तरह सम्पन्न होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1951 पृष्ठ 25
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1951/January/v1.25

👉 प्रतिभा

प्रतिभा का अर्थ है जीवन के प्रश्नों का उत्तर देने की क्षमता। जीवन सर्वथा मौलिक है। यह बँधी-बँधाई राहों, घिसी-पिटी परम्पराओं के अनुरूप नहीं चलता। इसमें घटने वाली सभी आन्तरिक एवं बाहरी घटनाएँ पूर्णतया मौलिक व अनूठा नयापन लिये होती हैं। इसके हर मोड़ पर आने वाली चुनौतियाँ, उभरने वाले प्रश्न पूरी तरह से अपनी नवीनता का परिचय देते हैं। जो इन प्रश्नों का जितना अधिक सटीक, सकारात्मक, सक्षम व सृजनात्मक उत्तर दे पाता है, समझो वह उतना ही प्रतिभाशाली है।
  
जीवन प्रवाह में प्रतिपल-प्रतिक्षण सजग व सचेष्ट रहने की जरूरत है। तभी यह जान पाना सम्भव हो पाता है कि जीवन हमसे क्या माँग रहा है? परिस्थिति की क्या चुनौती है? प्रतिभावान् व्यक्ति परिस्थिति व प्रश्न के अनुरूप व्यवहार करता है, जबकि मूढ़ व परम्परावादी व्यक्ति घिसे-पिटे उत्तरों को दुहराते रहते हैं। फिर ये पुरानी बातें किसी धार्मिक पुस्तक में लिखी हुई हों अथवा फिर ऐसी किसी अवतार, पैगम्बर द्वारा कही गयी हों। स्व-विवेक का त्याग कर इन्हें अपना लेना प्रकारान्तर से मूढ़ता ही है।
  
विवेकहीन व्यक्ति, शास्त्रों, धर्मग्रन्थों का पुरातन बोझ ढोते रहते हैं। वह अवतार, मसीहा, पैगम्बर पर अपना सारा बोझ डालकर निशिं्चत हो जाना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें अपने ऊपर भरोसा करने से भय लगता है। जबकि अन्तदृष्टि सम्पन्न प्रतिभावान् व्यक्ति स्वयं पर भरोसा करता है। वह अवतार, मसीहा व पैगम्बर तथा धर्मग्रन्थों पर श्रद्धा-आस्था रखते हुए इनकी नए युग के अनुरूप नयी व्याख्या करता है। किसी तरह के सामाजिक-धार्मिक कारागृह उसे कैद नहीं कर पाते। क्योंकि अपनी प्रतिभा के बल पर वह इन्हें तोड़ने में सक्षम होता है। इसीलिए तो कहते हैं- प्रतिभा का अर्थ है- अन्तर्दृष्टि सम्पन्न दूरदर्शी विवेकशीलता, जो जीवन की सभी समस्याओं का सार्थक हल ढूँढने में सक्षम है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०९

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

👉 यह भी नहीं रहने वाला

एक साधु देश में यात्रा के लिए पैदल निकला हुआ था। एक बार रात हो जाने पर वह एक गाँव में आनंद नाम के व्यक्ति के दरवाजे पर रुका।
आनंद ने साधू  की खूब सेवा की। दूसरे दिन आनंद ने बहुत सारे उपहार देकर साधू को विदा किया।

साधू ने आनंद के लिए प्रार्थना की  - "भगवान करे तू दिनों दिन बढ़ता ही रहे।"

साधू की बात सुनकर आनंद हँस पड़ा और बोला - "अरे, महात्मा जी! जो है यह भी नहीं रहने वाला।" साधू आनंद  की ओर देखता रह गया और वहाँ से चला गया।

दो वर्ष बाद साधू फिर आनंद के घर गया और देखा कि सारा वैभव समाप्त हो गया है। पता चला कि आनंद अब बगल के गाँव में एक जमींदार के यहाँ नौकरी करता है । साधू आनंद से मिलने गया।

आनंद ने अभाव में भी साधू का स्वागत किया। झोंपड़ी में फटी चटाई पर बिठाया। खाने के लिए सूखी रोटी दी। दूसरे दिन जाते समय साधू की आँखों में आँसू थे। साधू कहने लगा - "हे भगवान्! ये तूने क्या किया?"

आनंद पुन: हँस पड़ा और बोला - "महाराज  आप क्यों दु:खी हो रहे है? महापुरुषों ने कहा है कि भगवान्  इन्सान को जिस हाल में रखे, इन्सान को उसका धन्यवाद करके खुश रहना चाहिए। समय सदा बदलता रहता है और सुनो! यह भी नहीं रहने वाला।"

साधू मन ही मन सोचने लगा - "मैं तो केवल भेष से साधू  हूँ। सच्चा साधू तो तू ही है, आनंद।"

कुछ वर्ष बाद साधू फिर यात्रा पर निकला और आनंद से मिला तो देखकर हैरान रह गया कि आनंद  तो अब जमींदारों का जमींदार बन गया है।  मालूम हुआ कि जिस जमींदार के यहाँ आनंद  नौकरी करता था वह सन्तान विहीन था, मरते समय अपनी सारी जायदाद आनंद को दे गया।

साधू ने आनंद  से कहा - "अच्छा हुआ, वो जमाना गुजर गया। भगवान् करे अब तू ऐसा ही बना रहे।"

यह सुनकर आनंद  फिर हँस पड़ा और कहने लगा - "महाराज  ! अभी भी आपकी नादानी बनी हुई है।"

साधू ने पूछा - "क्या यह भी नहीं रहने वाला?"

आनंद उत्तर दिया - "हाँ! या तो यह चला जाएगा या फिर इसको अपना मानने वाला ही चला जाएगा। कुछ भी रहने वाला नहीं है और अगर शाश्वत कुछ है तो वह है परमात्मा और उस परमात्मा की अंश आत्मा।"

आनंद  की बात को साधू ने गौर से सुना और चला गया।

साधू कई साल बाद फिर लौटता है तो देखता है कि आनंद  का महल तो है किन्तू कबूतर उसमें गुटरगूं कर रहे हैं, और आनंद  का देहांत हो गया है। बेटियाँ अपने-अपने घर चली गयीं, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है।

कह रहा है आसमां यह समा कुछ भी नहीं।

रो रही हैं शबनमें, नौरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।
जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस।
झाड़ उनके कब्र पर, बाकी निशां कुछ भी नहीं।

साधू कहता है - "अरे इन्सान! तू किस बात का अभिमान करता है? क्यों इतराता है ? यहाँ कुछ भी टिकने वाला नहीं है, दु:ख या सुख कुछ भी सदा नहीं रहता। तू सोचता है पड़ोसी मुसीबत में है और मैं मौज में हूँ। लेकिन सुन, न मौज रहेगी और न ही मुसीबत। सदा तो उसको जानने वाला ही रहेगा। सच्चे इन्सान वे हैं, जो हर हाल में खुश रहते हैं। मिल गया माल तो उस माल में खुश रहते हैं, और हो गये बेहाल तो उस हाल में खुश रहते हैं।"

साधू कहने लगा - "धन्य है आनंद! तेरा सत्संग, और धन्य हैं तुम्हारे सतगुरु! मैं तो झूठा साधू हूँ, असली फकीरी तो तेरी जिन्दगी है। अब मैं तेरी तस्वीर देखना चाहता हूँ, कुछ फूल चढ़ाकर दुआ तो मांग लूं।"

साधू दूसरे कमरे में जाता है तो देखता है कि आनंद  ने अपनी तस्वीर  पर लिखवा रखा है - "आखिर में यह भी नहीं रहेगा।"


108 Gayatri Mantra
Gurudev Pt. Shriram Sharma Acharya's Voice
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https://youtu.be/Fv7Iy3g42QY

👉 दुःख का सुअवसर

दुःख की कल्पना मात्र से कंपकपी होने लगती है। इसके अहसास से मन विकल, विह्वल, बेचैन हो जाता है। ऐसे में दुःख से होने वाले दर्द की कौन कहे? यही वजह है कि दुःख से सभी भागना चाहते हैं। और अपने जीवन से दुःख को भगाना चाहते हैं। दुःख से भागने और दुःख को भगाने की बात आम है। जो सामान्य जनों और सर्वसाधारण के लिए है। लेकिन इसकी एक खास बात भी है। जो सत्यान्वेषियों के लिए, साधकों के लिए और भगवद्भक्तों के लिए है। यह अनुभूति विरले लोग पाते हैं। ऐसे लोग दुःख से भागते नहीं, बल्कि दुःख में जागते हैं।
  
दुःख उनके लिए रोने, कलपने का साधन नहीं बल्कि परमात्मा द्वारा प्रेरित और उन्हीं के द्वारा प्रदत्त जागरण का अवसर बनता है। दुःख के क्षणों में उनकी अन्तर्चेतना में संकल्प, साहस, संवेदना, पुरुषार्थ की प्रखरता और प्रज्ञा की पवित्रता जागती है। उनकी आत्मचेतना में अनुभूतियों के नए गवाक्ष खुलते हैं, उपलब्धियों के नए अवसर आते हैं। इसीलिए तपस्वियों ने दुःख को देवों के हाथ का हथौड़ा कहा है। जो चेतना में उन्नयन के नए सोपान सृष्ट करता है। विकास और परिष्कार के नए द्वार खोलता है।
  
तभी तो सन्तों ने, साधुओं, दरवेशों और फकीरों ने भगवान् से हमेशा दुःख के वरदान मांगे हैं। सुख की चाहत तो बस आलसी, विलासी करते हैं। जो सुखों के बीच पले, बढ़े हैं, उनकी चेतना सदा-सदा से सुषुप्ति की ओर अग्रसर होती है। उनके जीवन में भला परिष्कार व पवित्रता का दुर्लभ सौभाग्य कहाँ? यह तो बस केवल उन्हीं को मिलता है, जो पीड़ाओं में पलते हैं और दुःख के दरिया में प्रसन्नतापूर्वक बहते हैं। जो बदनामी के क्षणों में प्रभु भक्ति में जीना और गुमनामी के अँधेरों में प्रभु चिन्तन करते हुए मरना जानते हैं। उन्हें ही परमात्म मिलन का अनन्त सौभाग्य मिलता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २०८


यज्ञोपचार पद्धति
Yagya Upchar Paddhti
Shraddheya Dr. Pranav Pandya
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https://youtu.be/s9eVfFZ3ZFc

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...