रविवार, 18 मार्च 2018

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 18 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 18 March 2018


👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 7)

🔷 इष्टापूर्ति का मतलब क्षतिपूर्ति होता है, जो प्रायश्चित का बहुत महत्त्वपूर्ण अंग होता है। इसलिए कर्ज आपको चुकाना ही चाहिए। किसको चुकायें? जिसका नुकसान किया था, उसको तो आप चुकायेंगे नहीं, लेकिन सारा समाज एक है, एक कड़ी से जुड़ा हुआ है, इसलिए आप एक कड़ी में जुड़े हुए सारे समाज को यह मानकर चलिए कि किसी भी हिस्से पर नुकसान पहुँचाया है, तो कोई बात नहीं, दूसरे तरीके से पूरा कर देंगे।

🔶 मान लीजिए आप किसी के कान पकड़ने की गुस्ताख़ी करें तब? तब उसके पैर छू करके प्रणाम कर लीजिए। अरे साहब! हमसे गलती हो गई, माफ कर दीजिए, पैर छूते हैं आपके। कान पकड़ा था तो कान को छूना जरूरी नहीं है, आप पैर को भी छू सकते हैं। सारा समाज एक है। इसके किसी हिस्से को आपने नुकसान पहुँचाया है, तो आप उस नुकसान को पूरा करने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति के साथ में भलाई का सलूक कर सकते हैं। जो आदमी मर गया, जिसका आपने बेईमानी के साथ पैसा हजम कर लिया था, अब कैसे उसका पैसा चुकायेंगे? नहीं साहब, हम तो उसी को चुकायेंगे, लेकिन कैसे चुकायेंगे? वह तो मर गया।

🔷 किसी लड़की का चाल-चलन खराब किया था। अब आप बताइए उसके चाल-चलन को ठीक कैसे करेंगे? नहीं साहब, हम तो क्षमा माँगेंगे। क्षमा मागेंगे लेकिन वह लड़की अब किसी की घरवाली हो गई और जिसके बेटे भी बड़े हैं, सास-ससुर भी हैं, वहाँ उनसे कहते फिरें, साहब हमने इस लड़की का चाल-चलन खराब किया था और अब हम माफी माँगते हैं। इस तरह आप भी पिटेंगे और वह लड़की भी मरेगी। जरूरी नहीं है कि जिस आदमी का आपने नुकसान किया है, उसी को लाभ दें। सारा समाज एक है, इसलिए यह बात सही है कि सारे-के संसार के तालाब में एक बड़ा ढेला फेंका और लहरें पैदा कर दीं।

🔶 बुराई पैदा करने का मतलब एक व्यक्ति को ही नुकसान पहुँचाना नहीं है, बल्कि सारे समाज को नुकसान पहुँचाना है। बुरी आदतें आपने एक को सिखा दीं, शराब पीना आपने एक को सिखा दिया, वह फिर दूसरे को सिखाएगा, दूसरा तीसरे को सिखाएगा, तीसरा चौथे को, सिखाएगा, यह तो एक लहर है। बुराइयों की भी एक लहर है और अच्छाइयों की भी एक लहर है। आपने बुराइयों की एक बार लहरें पैदा की थीं, अब उसका प्रायश्चित एक ही हो सकता है कि आप अच्छाइयों की लहरें पैदा करें और उस अच्छाइयों की लहर को पैदा करके वातावरण ऐसा बनाएँ, जिससे की उसका खामियाजा पूरा हो सके, खाई पाटी जा सके, उस छेद को बन्द किया जा सके।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 66)

👉 श्री सद्गुरुः शरणं मम

🔷 इस सत्य को और भी स्पष्ट करते हुए भगवान् महेश्वर आदि- माता शैलसुता पार्वती से कहते हैं-

न मुक्ता देवगंधर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः। ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः॥ ८६॥
ध्यानं शृणु महादेवि सर्वानन्दप्रदायकम्। सर्वसौख्यकरं नित्यं भुक्तिमुक्तिविधायकम्॥ ८७॥

श्रीमत्परब्रह्म गुरुं स्मरामि श्रीमत्परब्रह्म गुरुं वदामि। श्रीमत्परब्रह्म गुरुं नमामि श्रीमत्परब्रह्म गुरुं भजामि॥ ८८॥

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूॄत द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥ ८९॥

नित्यं शुद्धं निराभासं निराकारं निरञ्जनम्। नित्यबोधं चिदानन्दं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहम्॥ ९०॥

🔶 देव हों या गन्धर्व, पितर, यक्ष, किन्नर, सिद्ध अथवा ऋषि कोई भी हों, गुरु सेवा से विमुख होने पर उन्हें कदापि मोक्ष नहीं मिल सकता है॥ ८६॥ भगवान् भोलेनाथ कहते हैं, हे महादेवि! सुनो, गुरुदेव का ध्यान सभी तरह के आनन्द का प्रदाता है। यह सभी सुखों को देने वाला है। यह सांसारिक सुख भोगों को देने के साथ मोक्ष को भी देता है॥ ८७॥

🔷 सच्चे शिष्य को इस सत्य के लिए संकल्पित रहना चाहिए कि मैं गुरुदेव का स्मरण करूँगा, गुरुदेव की स्तुति-कथा कहूँगा। परब्रह्म की चेतना का साकार रूप श्री गुरुदेव की वाणी, मन और कर्म से सेवा आराधना करूँगा॥ ८८॥ श्री गुरुदेव ब्रह्मानन्द का परम सुख देने वाली साकार मूर्ति हैं। वे द्वन्द्वातीत चिदाकाश हैं। तत्त्वमसि आदि श्रुति वाक्यों का लक्ष्य वही हैं। वे प्रभु एक, नित्य, विमल, अचल एवं सभी कर्मों के साक्षी रूप हैं। श्री गुरुदेव सभी भावों से परे, प्रकृति के तीनों गुणों से सर्वथा रहित हैं। उन्हें भावपूर्ण नमन है॥

🔶 ८९॥ श्री गुरुदेव नित्य, शुद्ध, निराभास, निराकार एवं माया से परे हैं। वे नित्यबोधमय एवं चिदानन्दमय हैं। उन परात्पर ब्रह्म गुरुदेव को नमन है॥ ९०॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 106

शनिवार, 17 मार्च 2018

👉 चैत्र नवरात्री की मंगल कामनाए

🔶 सभी को चैत्र नवरात्री की मंगल कामनाए। इस वर्ष नवरात्री साधना का पर्व १८ मार्च को है। नवरात्रि को देवत्व के स्वर्ग से धरती पर उतरने का विशेष पर्व माना जाता है।  प्रातःकाल और सायंकाल की तरह इन दिनों की भी विशेष परिस्थितियाँ होती हैं उनमें सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह उभरते और मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं। न केवल प्रभावित करने वाली वरन् अनुमूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बनती हैं। इसे समय की विशेषता कह सकते हैं।

🔷 नवरात्रियों में कुछ ऐसा वातावरण रहता है जिसमें आत्मिक प्रगति के लिए प्रेरणा और अनुकूलता की सहज शुभेच्छा बनते देखी जाती है।

🔶 ऐसे ही अनेक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शी ऋषियों, मनीषियों ने नवरात्रि में साधना का अधिक माहात्म्य बताया है इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसरों पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकांश कर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं।

🔷 नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्य परम्परा के रूप में सदा सर्वदा से अपनाई जाती रही है।  २४,००० गायत्री महामंत्र द्वारा गायत्री लघु अनुष्ठान साधको के लिए अनिवार्य है।
 
🔶 जो साधारणतया दैनिक उपासना के अभ्यस्त नहीं हैं और यदा- कदा ही कभी कुछ पूजा पाठ करते हैं ऐसे लोगों पर भी जोर दिया जाता है कि वे कम से कम उन दिनों तो कुछ नियम निबाहें और निश्चित साधना की बात सोचें। इन अभ्यासों के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्था की जाती है ताकि उन्हें बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े।

🔷 मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं और २४ हजार वाली संख्या को घटा कर १० हजार तक हलका किया जा सकता है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तात्पर्य मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है। यह किसी के लिए भी भारी नहीं पड़ना चाहिए। मन्त्र लेखन हर रोज ११२ करने में नौ दिन में एक हजार लिख जाते हैं यह भी एक अनुष्ठान है। गायत्री चालीसा के हर दिन बारह पाठ करने से नवरात्रि में १०८ हो जाते हैं। ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ यह पंचाक्षरी गायत्री है। इतना तो अशिक्षित एवं बालक भी याद कर सकते हैं और सुविधानुसार संख्या निर्धारित करके उसकी पूर्ति करते रह सकते हैं। प्रमुख तथ्य नियमितता है, न्यूनाधिकता नहीं। नियमित साधना को अनुष्ठान कहते हैं। उसके साथ तपश्चर्याओं का अनुशासन जुड़ जाने से उसकी संज्ञा पुरश्चरण की जाती है।

🔶 अधिक जानकारी के लिए कृपया नीचे दिए बुक एवं आलेखों का अवलोकन अवश्य करें.

नवरात्रि पर्व और गायत्री की विशेष तप- साधना
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.1

असामान्य सुयोग उपलब्ध कराने वाली नवरात्रियाँ
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.1

नवरात्रि अनुष्ठान का विधि- विधान
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.2

गायत्री अनुष्ठान और कन्या पूजन
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.3

नवरात्रि अनुशासन का तत्वदर्शन
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.4

अनेकों सत्प्रवृत्तियों का उभार नवरात्रि आयोजनों मे
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.5

सामूहिक साधना का उपयुक्त अवसर नवरात्रि पर्व
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http://literature.awgp.org/book/navaratri_parv_aur_gayatree_kee_vishesh_tap_sadhana/v1.6

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

👉 औकात का पता

🔶 एक राजा के दरबार मे एक अजनबी इंसान नौकरी मांगने के लिए आया।

🔷 उससे उसकी क़ाबलियत पूछी गई, तो वो बोला, "मैं आदमी हो चाहे जानवर, शक्ल देख कर उसके बारे में बता सकता हूँ।

🔶 राजा ने उसे अपने खास "घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज" बना दिया। चंद दिनों बाद राजा ने उससे अपने सब से महंगे और मनपसन्द घोड़े के बारे में पूछा, उसने कहा, "नस्ली नही  हैं।"

🔷 राजा को हैरानी हुई, उसने जंगल से घोड़े वाले को बुला कर पूछा.. उसने बताया, घोड़ा नस्ली तो हैं, पर इसकी पैदायश पर इसकी मां मर गई थी, ये एक गाय का दूध पी कर उसके साथ पला है। राजा ने अपने नौकर को बुलाया और पूछा तुम को कैसे पता चला के घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?"

🔶 "उसने कहा "जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुह में लेकर सर उठा लेता हैं।😊

🔷 राजा उसकी काबलियत से बहुत खुश हुआ, उसने नौकर के घर अनाज ,घी, मुर्गे, और अंडे बतौर इनाम भिजवा दिए।

🔶 और उसे रानी के महल में तैनात कर दिया। चंद दिनो बाद , राजा ने उस से रानी के बारे में राय मांगी, उसने कहा, "तौर तरीके तो रानी जैसे हैं लेकिन पैदाइशी नहीं हैं।”

🔷 राजा के पैरों तले जमीन निकल गई, उसने अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा "हक़ीक़त ये हैं,  कि आपके पिताजी ने मेरे पति से हमारी बेटी की पैदाइश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी 6 माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपके रजवाड़े से करीबी रखने के लिए किसी और की बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।"

🔶 राजा ने फिर अपने नौकर से पूछा "तुम को कैसे पता चला ?" ""उसने कहा, " रानी साहिबा का नौकरो के साथ सुलूक गंवारों से भी बुरा हैं। एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक तरीका होता हैं, जो रानी साहिबा में बिल्कुल नही।

🔷 राजा फिर उसकी पारखी नज़रों से खुश हुआ और बहुत से अनाज, भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं साथ ही उसे अपने दरबार मे तैनात कर दिया।

🔶 कुछ वक्त गुज़रा, राजा ने फिर नौकर को बुलाया,और अपने बारे में पूछा। नौकर ने कहा "जान की सलामती हो तो कहूँ।”

🔷 राजा ने वादा किया। उसने कहा, "न तो आप राजा के बेटे हो और न ही आपका चलन राजाओं वाला है।" राजा को बहुत गुस्सा आया, मगर जान की सलामती का वचन दे चुका था, राजा सीधा अपनी मां के महल पहुंचा।

🔶 मां ने कहा, "ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हे गोद लेकर हम ने पाला।”

🔷 राजा ने नौकर को बुलाया और पूछा , बता, "तुझे कैसे पता चला ?” उसने कहा " जब राजा किसी को "इनाम दिया करते हैं, तो हीरे मोती और जवाहरात की शक्ल में देते हैं....लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें दिया करते हैं...ये रवैया किसी राजाओं का नही,  किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।"

🔶 किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी दिखावा हैं।

🔷 इंसान की असलियत की पहचान उसके व्यवहार और उसकी नियत से होती हैं...

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 17 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 17 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 1)

🔶 सर्वांगीण प्रगति को ही प्रगति कहा जा सकता है। यदि शरीर के किसी एक अंग की उन्नति हो और शेष अंग अवनत पड़े रहें तो उससे कोई सन्तोषजनक परिणाम नहीं निकल सकता। पेट खूब मोटा हो जाए और हाथ पैर पतले रहें तो इससे कुरूपता और असुविधा ही बढ़ेगी। फील पाँव रोग में एक पैर मोटा हो जाता है और शेष सब अंग स्वाभाविक रहते हैं तो वह एक पैर का मोटा होना किसी प्रकार की प्रसन्नता नहीं बढ़ा सकता। इसी प्रकार यदि हमारी आर्थिक स्थिति अच्छी रहे और जीवन की अन्य दिशाएं अविकसित रहें तो वह आर्थिक उन्नति सुखदायक न होकर मोटे पैर वाले व्यक्ति की तरह कष्ट कारक ही होगी।

🔷 माना कि धन बहुत है। पर उसकी उपयोगिता तभी है जब उसका सदुपयोग होने की व्यवस्था हो, यदि उसका दुरुपयोग होने लगा तो वह अमीरी वस्तुतः गरीबी से भी अधिक कष्टदायक एवं विपत्ति उत्पन्न करने वाली होती है। उपार्जित धन को अकेला कमाने वाला ही खर्च नहीं करता उसका लाभ वह अकेला ही नहीं उठाता वरन् परिवार के सब लोग मिलजुल कर ही उसका उपयोग करते हैं। घर के अन्य सदस्य यदि बुद्धि वाले हों तो संग्रहित धन ही उनके लिये आपस में लड़ मरने या तरह-तरह के दुरुपयोग करके अन्ततः रोग, अपकीर्ति, कलह, पाप एवं दण्ड के भोगने का कारण बनता है।

🔶 आज धन उपार्जन को प्रवृत्ति बड़े प्रबल वेग से हर मनुष्य के मस्तिष्क में काम कर रही है। व्यक्ति का एक ही लक्ष्य मालूम पड़ता है, अधिकाधिक धन उपार्जन करना और उसकी होली जलाकर तमाशा देखना। आमतौर से यही प्रधान आकाँक्षा है, यह दूसरी बात है कि सफलता किसे कितनी मात्रा में मिले। धन को महत्व देना उचित है और आवश्यक भी। पर उसे इतना महत्व मिलना नहीं चाहिये कि जीवन की अन्य महत्वपूर्ण दिशाएं उपेक्षित ही पड़ी रहें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 26

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.26

👉 The Last Meeting with Buddha

🔶 Buddha was lying on his death bed. He was not meeting anyone. A rich man, Subhadra arrived and requested Anand ,"These are the last moments of Lord Buddha. I need to urgently discuss some important future plans, please allow me to meet Him". Anand expressed his inability to do so. Lord Buddha heard the discussion.

🔷 He called Subhadra in a feeble voice and said, "Although I am gravely ill, yet in my last moments if I cannot meet a person who has come to seek my advice on the future plans for social awakening, I will consider my life wasted". This last meeting changed the entire course of life for Subhadra. He dedicated himself to the spreading of religious thoughts and established Buddhism far and wide.

📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 6)

🔶 यही ईसाई धर्म में भी होता है। ईसाई धर्म में जब आदमी मरने को होता है, तो जीवन की सारी-की बातें, बुरी-से घटनाएँ पादरी के सामने कह देते हैं। पादरी प्रार्थना करता है—इन्होंने जी खोलकर कह दिया, पाप हल्का हुआ भगवान तुम्हारे मन को शान्ति दे। आप भी जो यहाँ कल्प-साधना शिविर में आये हैं, तो अपने भीतर के संचित किये हुए पाप-कर्मों को जी खोलकर कह दें—एक तो काम यह हुआ। दूसरा, आपने जो पाप-कर्म किये थे, भविष्य में वह न करें, इसके लिए ऐसा दबाव डालिए, ताकि आपको यह ख्याल रहे कि हमने गलती की थी और अब गलती नहीं करेंगे। इसके लिए यदि मन पर दबाव नहीं डालेंगे, तो फिर आप ऐसे ही हो जाएँगे, जो पहले करते रहे हैं, फिर वैसा ही करने लगेंगे।

🔷 जब आपको नफरत ही नहीं हुई, जब आपको कोई दुःख ही नहीं हुआ, जब कोई प्रायश्चित ही नहीं हुआ, तब फिर यह कैसे विश्वास करें कि भविष्य में आप ऐसा नहीं करेंगे। इसलिए भविष्य में न करने की दृष्टि से एक काम बहुत जरूरी है कि आप अपने आपको थोड़ा-सा कष्ट दें। चान्द्रायण व्रत इसी कष्ट का नाम है। आपको भी यहाँ तपश्चर्या कराई जा रही है। तपश्चर्या का मतलब यही है कि आपको जो कष्ट मिले, उससे आपको याद बना रहे, कि हमने जिस पाप के प्रायश्चित के निमित्त कष्ट उठाया था, वह पाप आइन्दा नहीं करेंगे। आइन्दा नहीं करने के लिए कष्ट उठाना पड़ता है, आइन्दा याद बनी रहे, इसलिए तपश्चर्या की जाती है।

🔶 पिछला जो हो गया है, गलती हो गई है, वह स्वतः दूर हो जाएगी, यह वहम निकाल दीजिए। इसका तो एक ही उपाय है कि आपने जो गड्ढा खोदा है, उसको पूरा करना चाहिए। गड्ढे को अगर पूरा नहीं करेंगे, तो गड्ढा बना रहेगा, आप खाई में गिरेंगे, आपकी टाँग टूट जाएगी और दूसरों की टाँग टूटेगी। इसका कोई दूसरा उपाय है ही नहीं, सिवाय इसके कि आपने जो खाई खोदी है, उसको पूरा कीजिए, जो गड्ढा बना दिया है, उसमें मिट्टी डालिए, समतल बना दीजिए। यही तो प्रायश्चित है और क्या प्रायश्चित हो सकता है? इस प्रायश्चित को हमारे यहाँ इष्टापूर्ति कहते हैं, क्षतिपूर्ति भी कहते हैं।

🔷 आपने जो नुकसान किया है चुकाइए। बैंक से रुपया ले करके भाग गए हैं? हाँ, साहब पन्द्रह हजार रुपया ले करके भाग गए थे और हमारा वारण्ट है। आप ऐसा कीजिए बैंक वालों से मिलिए और खबर भेजिए। पन्द्रह हजार में से एक हजार रुपया हमने खर्च कर डाला है और चौदह हजार बचा। चौदह हजार रुपया उसको रिफण्ड कर दीजिए, बाकी एक हजार रुपयों की किस्तें कर लीजिए, फिर आप पर जो मुकदमा चलने वाला है, उससे आप बच जाएँगे। इसलिए क्या करना चाहिए कि आप उस खामियाजे को पूरा कीजिए। खामिखाजे को पूरा नहीं करेंगे, तब फिर बात कैसे बनेगी?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 66)

👉 श्री सद्गुरुः शरणं मम

🔶 गुरुगीता गुरुभक्ति की गंगोत्री है। यहाँ से प्रवाहित होने वाली गुरुभक्ति की गंगा जब शिष्यों के अन्तःकरण में प्रवेश करती है, तो उनके जन्म-जन्मान्तर के पापों का शमन होता है। साठ हजार सगर पुत्रों की आत्मशक्ति की ही भाँति यह भक्ति गंगा भी असंख्य शिष्यों के त्रिविध तापों को शान्त करती है। यह भक्ति गंगा सब भाँति कल्मषहारी है। शिष्य-साधक के कषाय-कल्मष इसके भक्ति जल में धुलते हैं। शिष्यों का अन्तर्मन इसके जल में धुल कर धवल होता है। इसे वे सभी अनुभव करते हैं, जो अपने आपको सच्चा शिष्य सिद्ध करने के लिए प्राण-प्रण से बाजी लगाए हुए हैं। इनकी एक ही टेर रहती है कि प्राण भले ही जाए, पर किसी भी भाँति उनका शिष्यत्व कलंकित न होने पाए।

🔷 शिष्यत्व की कसौटी पर अपने आप को खरा साबित करने के लिए  इस गुरुभक्ति कथा के पूर्व मंत्र में बताया गया है कि गुरुदेव की भक्ति ही सार है। उनकी भक्ति से ज्ञान-विज्ञान सभी कुछ मिल जाता है। श्रुतियों में उन्हीं प्रभु की पराचेतना का निरूपण हुआ है। इसलिए मन और वाणी से उन्हीं सद्गुरुदेव की आराधना करते रहना चाहिए। गुरुसेवा को कमतर मानकर तप और विद्या को सब कुछ मानने वाले भले ही कुछ भी पा लें; लेकिन संसार चक्र से उनका छुटकारा नहीं हो पाता। इसीलिए सद्गुरु के शरणापन्न बने रहना ही साधना जीवन की सर्वोच्च कसौटी है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 104

गुरुवार, 15 मार्च 2018

👉 "फुट डालो और लूट खाओ"

🔷 कोई चालाक चोर था। वह बटमारी करता था। एक दिन अकेला ही गया। सामने से चार राहगीर आ रहे थे उसका मन उन्हें लूटने का हुआ पर था अकेला। चारों को कैसे लूटे? उसने “फूट डालो लूट खाओ” की नीति अपनाई।

🔶 पूछने पर मालूम हुआ कि चारों अलग-अलग वर्ण के हैं एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक नाई। उस चोर ने अलग-अलग ढंग से बात करना शुरू किया।

🔷 चोर ने कहा ब्राह्मण हमारे पुरोहित क्षत्रिय हमारे भाई, वैश्य हमारे टेका नाई से क्या वास्ता? तीनों खड़े हो गये अकेला नाई लुटता रहा और इसके हाथ पैर बाँध कर अलग डाल दिया।

🔶 इस प्रकार लालजी को लूटा और बाँधा। इसके बाद क्षत्रिय को और अन्त में पण्डित जी की दुर्गति हुई। आपस में एकता न होने के कारण चारों राहगीर एक चोर से अपनी दुर्गति करा बैठे।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल,1993 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1993/April/v1.22

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 16 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 16 March 2018


👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (अन्तिम भाग)

🔷 अभीष्ट प्रयोजन के लिए समय निकालें कैसे? मनोयोग जुड़े कैसे? श्रम संलग्नता बने कैसे? इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने दिनों अपनी क्षमताएँ संलग्न रही हैं, उन्हें वहाँ से विरत किया जाय। वैराग्य इसी का नाम है। जिस त्याग संन्यास की चर्चा अध्यात्म क्षेत्र में होती रहती है उसका तात्पर्य कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों को छोड़ बैठना नहीं वरन् यह है कि अवांछनीय ललक लिप्साओं से अपने समय श्रम को बचाने छुड़ाने का प्रयास किया जाय ताकि उस बचत को सत्प्रयोजनों में लगाकर प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना बन पड़े।

🔶 उत्थान और पतन के दो सर्वविदित राजमार्ग हैं। तृष्णा ग्रसित होकर वैभव, विलास और अहंता की परितृप्ति के प्रयास में संलग्न रहा जा सकता है। इसमें न समय बचने वाला है, न श्रम, न मनोयोग। इस भट्टी को जितना प्रज्वलित किया जायेगा, उतनी ही ऊँची लपटें उठेंगी और उतना ही अधिक ईंधन माँगेंगी। इस स्तर की लालसा यदि आतुरता स्तर तक जा पहुँचे तो फिर उनका समाधान दो ही उपायों से सूझता है, जिसमें एक है आत्महत्या और दूसरा ब्रह्महत्या। आत्महत्या का तात्पर्य है अपने स्तर और व्यक्तित्व को गिराकर हेय परिस्थितियों में प्रवेश करना और उनके साथ जुड़ी हुई नरक यंत्रणाओं को निरन्तर सहन करना। दूसरा मार्ग इससे भिन्न है, उसमें लिप्साओं पर नियंत्रण रखना होता है, ताकि सीमित समय, श्रम में उसकी पूर्ति हो सके और बची हुई क्षमता उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लग सके।

🔷 क्षमता से तात्पर्य है-ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा का उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए नियोजन। इसी आधार पर क्षमता बढ़ती है और महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति में समर्थ होती है। दुष्प्रयोजनों में समय और श्रम लगा रहे तो उसे क्षमता की सार्थकता नहीं, दुर्गति एवं विकृति ही कहा जायेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 God Suffered due to His Ruthless Devotee

🔷 A devotee used to take bath in the river Ganga every morning and take its water to offer in a nearby temple. This was his daily practice. One day, on his way to the temple, the devotee he saw a sick man suffering from high fever. The poor man had been lying there the whole night. Seeing the devotee passing by, the sick man pleaded for some water. The devotee sharply scolded him, "You idiot! How dare you ask for this holy water? I am taking it to the temple to offer it to God. There may be hundreds like you lying around sick, should I waste my time offering them water and ignore the God?" And he went ahead and offered the water in the temple as usual.

🔶 That night the devotee had a horrible dream. He saw that the God had become horribly sick. The devotee asked him about the cause of his sickness. And God said grimly," You did not help a suffering man. Ignoring the need of a sick person, you offered the water to me. This is the cause of my sickness." The devotee was alarmed and woke up in a shock. From the next day he dedicated his time to help the suffering regularly, since he had now understood the true form of worship.

📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 5)

🔷 आप समझ गए न, उनकी इच्छा कब और कैसे पूरी हुई? आप यह बात नोट कीजिए, आपको पिछले वाले पापों से निजात पाने के लिए कुछ-न करना ही होगा। क्या करना चाहिए? इस ओर ध्यान दीजिए। भविष्य के निर्माण की ओर ध्यान दें, यह तो बहुत अच्छी बात है, पर भूतकाल को भुला मत दीजिए। आप यह विचार कीजिए कि आपने कितनी गलतियाँ की, उनकी एक बार लिस्ट बना लीजिए। गलतियाँ दो तरह की होती हैं—एक गलतियाँ वह, जो आपने दूसरों को नुकसान पहुँचाने के लिए की हैं और एक गलतियाँ वह, जो आपने अपनी उन्नति में रुकावट डाल करके आलस्य और प्रमाद के रूप में की हैं। इन दोनों गलतियों को आप नोट कर लीजिए और एक फेहरिस्त बना लीजिए।

🔶 आप नोट कर लेंगे और फेहरिस्त बन लेंगे, तो पता चलेगा कि कितना बड़ा जखीरा अपनी बुराइयों का, अपने ही सिर पर लाद के रखा है, इसको दूर करने के की कोशिश कीजिए। क्या कोशिश करें? यही तो एक विकल्प है। एक काम यह कीजिए कि अपना जी खोल करके अपने मन की गाँठ को हल्का कर लीजिए, जैसा कोई चीज खा जाते हैं, गन्दी चीज खा जाते हैं, तो उलटी कराई जाती है। आप मुँह के रास्ते उलटी कर दीजिए। आपने जो कुछ भी पाप-कर्म किये हैं, उन सबको एक बार जी खोल के कह दीजिए। किससे कहें? दूसरों के सामने तो मैं आपको सलाह नहीं दे सकता कि आप हर एक के सामने कहते फिरें, क्योंकि दूसरे आदमी इसका गलत फायदा उठाते हैं, नाजायज फायदा उठाते हैं।

🔷 हमको हजारों घटनाएँ याद हैं। स्त्रियों से उनके पतियों ने कसम खिलाकर उगलवा लिया कि उनसे क्या गलती हो गई, फिर जिन्दगी भर के लिए उनकी एसी फजीहत की कि वह बेचारी सोचती रहीं कि सच्चाई अगर हम न बताते, तो नफे में रहते। दुनिया बड़ी निकम्मी है, दुनिया बड़ी पाजी है। आप हर आदमी से अपनी कमजोरियाँ कहते फिरें, ऐसा तो मैं नहीं कहूँगा, लेकिन आपको मेरी एक सलाह है कि एक बार अपना जी खोलकर हमसे सब कुछ कह दीजिए। अपनी हर घटना को बता दीजिए, विस्तार से बता दीजिए, कहीं दुराव न हो, कहीं छुपाव न हो। आप क्या करेंगे? अरे भाई साहब! हमें क्या करना है? हर आदमी गलतियों से भरा पड़ा है।

🔶 आपकी गलतियों में मुझे जायका लेने का, मजा लेने का, दिल्लगीबाजी करने का और बकवास करने का हमारे पास कहाँ समय है? हमारे यहाँ तो केवल दुःखी-ही आते हैं। धोबी की दुकान है। हर आदमी मैला कपड़ा ले करके आता है और हम धोते रहते हैं। हमको न किसी से व्यंग्य करने की फुर्सत है, न मजाक करने की फुर्सत है, न घृणा करने की फुर्सत है, केवल धोबी के तरीके से लोगों के कपड़े धोने की फुर्सत है, इसलिए आपको अपने मन के पापों को एक बार ठीक कर लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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