बुधवार, 14 मार्च 2018

👉 प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग का निधन

🔷 दुनिया के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग का 76 साल की आयु में बुधवार को ब्रिटेन के कैम्ब्रिज स्थित उनके घर पर निधन हो गया। स्टीफन हॉकिंग के बच्चों लुसी, रॉबर्ट और टिम ने बयान जारी कर कहा, 'हमें बेहद दुख है कि हमारे प्यारे पिता आज हमें छोड़कर चले गए।'

🔶 8 जनवरी, 1942 को इंग्लैंड को ऑक्सफर्ड में सेंकड वर्ल्ड वॉर के समय स्टीफन हॉकिंग का जन्म हुआ था।

🔷 गैलीलियो की मृत्यु के ठीक 300 साल बाद हॉकिंग का जन्म हुआ था। 1988 में उन्हें सबसे ज्यादा चर्चा मिली थी, जब उनकी पहली पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम: फ्रॉम द बिग बैंग टु ब्लैक होल्स' मार्केट में आई।

🔶 इसके बाद कॉस्मोलॉजी पर आई उनकी पुस्तक की 1 करोड़ से ज्यादा प्रतियां बिकी थीं। इसे दुनिया भर में साइंस से जुड़ी सबसे ज्यादा बिकने वाली पुस्तक माना जाता है।

🔷 2014 में स्टीफन हॉकिंग की प्रेरक जिंदगी पर आधारित फिल्म 'द थिअरी ऑफ एवरीथिंग' रिलीज हुई थी।

🔶 प्रफेसर स्टीफन हॉकिंग ने 1965 में 'प्रॉपर्टीज ऑफ एक्सपैंडिंग यूनिवर्सेज' विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की थी।


👉 दुनिया को बताई ब्लैक होल थिअरी

🔶 1974 में स्टीफन हॉकिंग ने दुनिया को अपनी सबसे महत्वपूर्ण खोज ब्लैक होल थिअरी के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि ब्लैक होल क्वॉन्टम प्रभावों की वजह गर्मी फैलाते हैं। पांच साल बाद ही वह कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में गणित के प्रफेसर बन गए। यह वही पद था जिस पर कभी महान वैज्ञानिक ऐलबर्ट आइनस्टाइन नियुक्त थे।

👉 ALS जैसी दुर्लभ बीमारी

🔷 हॉकिंग को (1963) में 21 साल की उम्र में amyotrophic lateral sclerosis (ALS) नामक गंभीर बीमारी हो गई थी। इस बीमारी की वजह से ही उनके शरीर ने धीरे-धीरे काम करना बंद कर दिया था। हॉकिंग जब ऑक्सफर्ड में फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहे थे तभी उन्हें सीढ़ियां चढ़ने में कठिनाइयों का समाना करना पड़ा। धीरे-धीरे यह समस्याएं इतनी बढ़ गईं कि उनकी बोली लड़खड़ाने लगी। डॉक्टर्स ने उस समय हॉकिंग को बताया था कि वह 2 साल से ज्यादा नहीं जी पाएंगे लेकिन यह दावा गलत साबित कर हॉकिंग ने अपनी रिसर्च जारी रखी।

👉 खास डिवाइस से करते थे सारे काम

🔶 हॉकिंग चल फिर नहीं सकते थे और हमेशा वील चेयर पर रहते थे। वह कम्प्यूटर और तमाम डिवाइसों के जरिए अपने शब्दों को व्यक्त करते थे। उन्होंने इसी तरह से भौतिकी के बहुत से सफल प्रयोग भी किए हैं।

👉 स्वर्ग की परिकल्पना को किया था खारिज

🔷 स्टीफन हॉकिंग ने स्वर्ग की परिकल्पना को सिरे से खारिज करते हुए इसे अंधेरे से डरने वाली कहानी बताया था। हॉकिंग ने कहा था कि हमारा दिमाग एक कम्प्यूटर की तरह है जब इसके पुर्जे खराब हो जाएंगे तो यह काम करना बंद कर देगा। खराब हो चुके कम्प्यूटरों के लिए स्वर्ग और उसके बाद का जीवन नहीं है। स्वर्ग केवल अंधेरे से डरने वालों के लिए बनाई गई कहानी है।

👉 किताब ने मचाया तहलका

🔶 साल 1998 में प्रकाशित हुई स्टीफन हॉकिंग की किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्ररी ऑफ टाइम' ने पूरी दुनिया में तहलका मचाया था। इस किताब में उन्होंने ब्रह्मांड विज्ञान के मुश्किल विषयों जैसे 'बिग बैंग थिअरी' और ब्लैक होल को इतने सरल तरीके से बताया कि एक साधारण पाठक भी उसे आसानी से समझ जाए। इस किताब की लाखों प्रतियां हाथों-हाथ बिक गई। हालांकि, स्टीफन हॉकिंग को किताब के लिए विरोध का भी सामना करना पड़ा था क्योंकि उन्होंने इस किताब में ईश्वर के अस्तित्व को नकारा था।

👉 ... तो धरती बन जाएगी आग का गोला

🔷 बीते साल ही स्टीफन हॉकिंग ने यह चेतावनी दी थी कि धरती पर जिस तेजी से आबादी और ऊर्जी की खपत बढ़ रही है, उस तरह से 600 सालों से भी कम समय में यह धरती आग का गोला बन जाएगी।

👉 पीएचडी थीसिस को 20 लाख ने देखा

🔶 स्टीफन हॉकिंग के पीएचडी शोधपत्र को सार्वजनिक करने के कुछ ही दिनों में इसे दुनियाभर के 20 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा था। 1966 में किया गया शोध इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे जारी करते ही कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की वेबसाइट ठप हो गई थी।

👉 मर्लिन मुनरो के दीवाने थे हॉकिंग

🔷 हॉकिंग एक टाइम मशीन बनाना चाहते थे। उन्होंने एक बार कहा था कि अगर उनके पास टाइम मशीन होती तो वह हॉलिवुड की सबसे खूबसूरत अदाकारा मानी जाने वाली मर्लिन मुनरो से मिलने जाते।

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 4)

🔶 इस प्रक्रिया को कौन किस प्रकार सम्पन्न करे, यह व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर ही एक सुनियोजित कार्यक्रम बन सकता है। जीवन साधना का तात्पर्य ही यह है कि दिशाधारा रीति-नीति में उत्कृष्टता का समावेश करना और ऐसी दिनचर्या बनाना जिसमें उपरोक्त तथ्यों का समुचित समन्वय हो सके। इसमें व्यक्तिगत दुर्बलताओं और अस्त-व्यस्तता को हटाने और उनके स्थान पर प्रगतिशील विधि-व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। आजीविका के औचित्य एवं स्तर को नये सिरे से निर्धारित करना होता है। परिवार में जो परम्परा चल रही है उसके ढर्रे में आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं, साथ ही लोक साधना के लिए नये सिरे से अधिक समय लगाने की गुंजायश निकालनी होती है।

🔷 यह सभी काम ऐसे हैं जो उथली कल्पना करते रहने से नहीं बन पड़ते वरन् अवांछनीयताओं के उन्मूलन और सत्परम्पराओं के प्रचलन-परिपोषण के लिए ऐसा ताना-बाना बुनना पड़ता है मानो कोई बड़ा उद्योग व्यवसाय खड़ा करने के लिए योजना बनाने, पूँजी जुटाने, शिल्पियों को कार्यरत करने तथा उत्पादन को खपाने का सरंजाम खड़ा किया जा रहा हो। राष्ट्रीय बचत की पंचवर्षीय योजनाओं का ढाँचा खड़ा करने में जैसे कौशल की आवश्यकता पड़ती है, प्रायः वैसी ही सूझबूझ प्रगतिशील जीवन के अभिनव निर्धारण के लिए आवश्यक होती है। इससे कम में बात बनती ही नहीं। यहाँ जादू चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। जिसे जो कुछ उपलब्ध हुआ है वह उसके नियोजन, निर्धारण और पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। इसका समन्वय ही दैवी वरदान के नाम से जाना जाता है।

🔶 जीवनचर्या में परिवर्तन कायाकल्प है। दृष्टिकोण और प्रयास में घुसी हुई अवांछनीयता को हटाकर इसके स्थान पर उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित किया जा सके तो समझना चाहिए कि महानता का श्रेय साधन हस्तगत हो गया। पर यह हो कैसे? इसका उत्तर एक ही है कि उच्चस्तरीय निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिए समय सम्पदा का नियोजन किया जाय। उसके साथ श्रम और मनोयोग को भी संयुक्त रखा जाय। इसके बिना समुन्नत जीवन क्रम का श्रेय साधन सम्पन्न कर सकने का और कोई मार्ग है नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Last Part)

The tradition for ideal marriage should become more prevalent

🔶 We should hold debates and competitions on this topic in schools and colleges. We should arrange for exhibitions and awaken the masses. If we focus on colleges, universities and technical institutes, we could bring about a particular atmosphere within a couple of years in the entire country. The amount and wealth that is saved through this movement could be used for establishing schools, colleges and for creating employment avenues for the poor. At Shantikunj  Haridwar, Gayatri Tapobhumi in Mathura, and in the 4000 shaktipeeths ideal weddings are solemnized with minimum expense.

🔷 These marriages are conducted through the entire year with vedic rituals and processes. These marriages are not influenced by any kind of muhurats. Till now, more than 1.5 lakh marriages have been performed in this manner. Are we geared up to fight against this evil? Are the youth ready to take a vow that they will not take dowry? Are the young women courageous enough to say that they are not ready to be ‘sold’ and will not give dowry? If this happens, then our country can become more financially secure and socially healthy and harmonious nation. Our aim is to become the torchbearer for establishing global harmony and peace – a sense of unity in diversity – in the whole world.

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 4)

🔶 आपको एक घटना सुनाता हूँ। एक बार स्वामी माधवाचार्य जी वृन्दावन रहते थे। उन्होंने तेरह साल तक गायत्री के अनुष्ठान किए, लेकिन उन अनुष्ठानों का कोई परिणाम उनको नहीं मिला। न उनको आत्मशान्ति मिली, न भगवान का साक्षात्कार हुआ, न कोई मनोकामना पूरी हुई, न कोई सन्तोष हुआ, कुछ नहीं हुआ। तब? तब बड़े खिन्न हुए, दुःखी हुए कि हमको सफलता के कोई चिन्ह नजर नहीं आते हैं, तो स्तुति करने का क्या फायदा? उन्होंने गायत्री अनुष्ठान तेरह वर्षों तक करने के बाद में वृन्दावन त्याग दिया और वृन्दावन त्यागने के बाद में बनारस चले गए।

🔷 वह वहाँ काशी के मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए थे, आँखों में आँसू भरे हुए थे, बड़े दुःखी थे। एक साधक का रूप और दुःखी देख करके एक महात्मा उधर से निकले, उन्होंने पूछा—भाई क्या बात है? कैसे दुःखी हो रहा है? कौन है तू? तो वह बोले—हम साधना करने वाले एक व्यक्ति हैं और तेरह वर्ष तक गायत्री की उपासना करते रहे, लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला, हम बहुत खिन्न हैं और यह सोचते हैं कि उपासना से कोई लाभ नहीं है, खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार हैं। महात्मा जी हँसने लगे। उन्होंने कहा—अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो तान्त्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं। तू तान्त्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले। एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा, इसलिए चमत्कार दिखाने की दृष्टि से तुझे हम एक साल की तान्त्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं।

🔶 स्वामी माधवाचार्य जी ने मान लिया। फिर उनको मणिकर्णिका घाट पर तन्त्र सम्बन्धी आवश्यक ज्ञातव्य बताया और यह कहा—एक साल तक तुमको इसी मर्यादा में रहना पड़ेगा। इससे बाहर जाना मना है। इसी में नहाना है, इसी में टट्टी जाना है, इसी में खाना पकाना है, इसी में सोना, उठना, बैठना, किसी भी कीमत पर मरघट की सीमा से बाहर मत जाना। ऐसा ही उन्होंने किया। एक साल तक उनको जो भैरव का मन्त्र बताया गया था, उसको वह जपते रहे। भैरव कभी शेर के रूप में आते, कभी औरत के रूप में आते, कभी डराते, कभी पैसा ले करके आ जाते, लेकिन माधवाचार्य जी से उन्होंने कह दिया था कि तू अपने काम में ही लगे रहना, दुनिया की बातों से प्रभावित मत होना। साधक को दुनिया की बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। अपनी साधना को ही सब कुछ मानकर चलना चाहिए। वैसा ही हुआ।

🔷 माधवाचार्य अपने गुरु के कहने के मुताबिक़ सब कुछ करते रहे। जो कोई आते रहे, सबको फटकारते रहे—आप लोग चले जाइए, हम तो साधना कर रहे हैं। एक दिन, साल जब पूरा हो गया, तब भैरव जी ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा—जिसका तू जप कर रहा है, वह मैं ही हूँ। हमारा नाम भैरव है और हम आ गए। अब तू हमसे वरदान माँग। उन्होंने कहा कि पहली माँग तो यह कि आप मुझे यह यकीन करा दीजिए कि आप भैरव ही हैं। अब तक पूरे साल में यही खुराफात होती रही है कि कोई शेर बनकर आ गया, तो कोई भूत बनकर आ गया—कोई भैंसा बनकर आ गया, तो कोई औरत बनकर आ गया। रोज यहाँ मेरे साथ में दिल्लगीबाजी होती है। अगर आप भैरव हैं, तो फिर मैं आपकी सूरत देखना चाहता हूँ और यह विश्वास करना चाहता हूँ कि आज मेरे साथ में कोई दगाबाजी तो नहीं हो रही है। आप सामने आइए और प्रगट हो जाइए। पहला वरदान माँगूँगा। आज तो बस इतना ही माँगना है। भैरव ने कहा—हम आपको दर्शन तो नहीं दे पायेंगे, आपकी पीठ पीछे खड़े होकर बात कर सकते हैं, लेकिन आपको दर्शन नहीं दे पायेंगे।

🔶 माधवाचार्य ने सन्देह से पूछा कि दर्शन क्यों नहीं दे पायेंगे? उन्होंने कहा—तेरे चेहरे पर गायत्री की शक्ति और तेजस् के आगे खड़े नहीं हो सकते। इसलिए सामने आने की हमारी हिम्मत नहीं है। पीठ पीछे तू जो कुछ हमसे पूछना चाहता है, वह पूछ! बात तो कर ही रहे हैं, यकीन भी कर ले कि हम भैरव हैं। नहीं महाराज जी मुझे यकीन नहीं होता, सामने आ जाइए। नहीं, सामने तो नहीं आ सकते। फिर वजह क्या है? तुझे बता तो दिया। तेरी आँखों में गायत्री का इतना तेजस्, चेहरे में इतना ओजस् और वर्चस् छाया है कि उसके सामने रह सकना हमारे लिए मुमकिन नहीं है। उनको बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारी आँखों में गायत्री का इतना जबर्दस्त तेज है, जिसकी वजह से भैरव हमारे सामने तक नहीं आ सकते। तो उन्होंने कहा—महाराज फिर एक वरदान और माँगता हूँ मैं आपसे। आप दर्शन नहीं देना चाहते तो मत दीजिए। आप एक इच्छा और पूरी कर दीजिए। क्या? आप यह इच्छा पूरी कर दीजिए कि मेरा गायत्री का तेरह वर्षों का जप और अनुष्ठान क्यों बेकार चला गया?

🔷 तो भैरव ने कहा—तेरे इस सवाल का मतलब हम बता देंगे, चल आँखें बन्द कर। आँखें बन्द कर लीं, फिर उन्होंने एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा इस तरह तेरह जन्मों का दृश्य दिखाया। उसमें उन्होंने बुरे-बुरे कर्म किये थे। किसी में हत्या, किसी में चोरी, किसी में डाका, किसी में कुछ, किसी में कुछ। उनकी तेरह जन्मों में बड़ी घिनौनी जिन्दगी थी। उन्होंने कहा—देख तेरह वर्ष का जो तेरा उपवास है, अनुष्ठान है, एक-एक वर्ष का उपवास-अनुष्ठान, एक-एक जन्म के लिए पूरे हो गये। अब तू जा, चौदहवीं बार फिर अनुष्ठान कर। अबकी बार तेरा साक्षात्कार होगा। अबकी बार जो गायत्री का लाभ मिलना चाहिए था, मिल जाएगा। माधवाचार्य प्रसन्न हो गए, फिर वह वापस चले आये। अपनी छोड़ी हुई साधना को फिर करने लगे। गायत्री उपासना का चौदहवाँ वर्ष जो उन्होंने किया, उसका परिणाम मिला, गायत्री का साक्षात्कार हुआ, उन्होंने पूछा—क्या वरदान चाहते हो, तो माधवाचार्य ने कहा—मैं कोई अजर-अमर ऐसा काम करके दिखा दूँ, जिससे कि दुनिया मुझे याद करती रहे। उन्होंने फिर ‘माधवनिदान’ नाम का प्रख्यात ग्रन्थ लिखा। इसे गायत्री ने माधवाचार्य के सिर पर अदृश्य रूप में प्रकट होकर लिखवाया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 64)

👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु

🔶 उन्हीं सर्वव्यापी गुरुदेव की चेतना के अन्य आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हुए भगवान् भोलेनाथ जगदम्बा पार्वती से कहते हैं-

ज्ञानं विज्ञानसहितं लभ्यते  गुरुभक्तितः। गुरोः परतरं नास्ति ध्येयोऽसौ गुरुमार्गिभिः॥ ८१॥
यस्मात्परतरं नास्ति नेति नेतीति वै श्रुतिः। मनसा वचसा चैव नित्यमाराधयेद् गुरुम्॥ ८२॥
गुरोः कृपाप्रसादेन  ब्रह्मविष्णुसदाशिवाः। समर्थाः  प्रभवादौ च केवलं गुरुसेवया॥ ८३॥
देवकिन्नरगन्धर्वाःपितरो यक्षचारणाः। मुनयोपि न जानन्ति  गुरुशुश्रूषणे विधिम्॥ ८४॥
महाहंकारगर्वेण तपोविद्याबलान्विताः। संसारकुहरावर्ते घटयंत्रे यथा घटाः॥ ८५॥
  
🔷 गुरुदेव की भक्ति से ज्ञान-विज्ञान सहित सब कुछ अपने आप मिल जाता है। उन सद्गुरु से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। इसलिए उन्हीं के बताए मार्ग का ध्यान करना चाहिए॥ ८१॥ श्रुतियों में इन्हीं की पराचेतना को नेति-नेति कहकर निरूपित किया गया है। इसलिए मन और वाणी से इन्हीं सद्गुरु की आराधना नित्य करते रहना चाहिए॥ ८२॥ ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव गुरुकृपा के प्रभाव से ही समर्थ हुए हैं। इसलिए गुरुसेवा को ही अपना कर्तव्य मानना चाहिए॥ ८३॥ हालाँकि गुरु सेवा की ठीक-ठीक विधि कोई भी नहीं जानता। फिर भले ही वह देव, किन्नर, गन्धर्व, पितर, यक्ष, चारण अथवा श्रेष्ठ मुनि ही क्यों न हों॥ ८४॥ तप और विद्या को सब कुछ समझने वाले अहंकारी जन इस संसार चक्र में बारम्बार भटकते रहते हैं, जैसे कि घट यंत्र के चक्र में घट घूमता रहता है॥ ८५॥
  
🔶 गुरुदेव की पराचेतना में सब कुछ है। उन्हीं में सभी लौकिक एवं अलौकिक शक्तियाँ समाहित हैं। इसी सत्य को भगवान् सदाशिव ने आदिमाता पार्वती से कहा है। सद्गुरु अगम एवं अगोचर हैं। वे साकार होते हुए भी निराकार हैं। देहधारी होते हुए भी देहातीत हैं। उन्हीं में अपनी अहंता को विलीन करने से परमज्ञान मिलता है। यह परम सत्य है। भले ही इसे बुद्धि परायण जन समझे अथवा न समझे। हालाँकि इसे समझे बिना तप की कठिन साधनाएँ एवं दुरूह विद्याओं का अभ्यास अज्ञान के अहंकार को ही बढ़ाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 102

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 14 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 14 March 2018


सोमवार, 12 मार्च 2018

👉 उपकार का प्रत्युपकार

🔷 बेंजामिन फ्रेंकलिन ने एक अखबार निकाला। आर्थिक कठिनाई में पड़कर उसने अपने एक मित्र से बीस डालर लिये। जब उसकी स्थिति ठीक हो गई तो वह मित्र की वह रकम लौटाने लगा। मित्र ने कहा- वह रकम तो मैंने आपको सहायता में दी थी। फ्रेंकलिन ने कहा- सो ठीक है पर जब मैं लौटाने की स्थिति में हूँ तो आपकी सहायता का ऋणी क्यों बनूँ?

🔶 झगड़े का अन्त इस प्रकार हुआ कि मित्र ने वह रुपये फ्रेंकलिन के पास इस उद्देश्य से जमा किये कि जब कोई जरूरतमंद उधार माँगे तक इसे उसी शर्त पर दे दें कि वह भी स्थिति ठीक होने पर उन रुपयों को अपने पास जमा रखेगा और फिर किसी जरूरतमंद को इसी प्रकार इसी शर्त पर दे देगा।

🔷 आवश्यकता के समय दूसरों से सहायता ली जा सकती है पर यह ध्यान रखना चाहिए कि समर्थ होते ही वह सहायता किसी अन्य जरूरत मन्द को लौटा दी जाय। सहायता के साथ जो दान वृत्ति जुड़ी हुई है वह दुहरा कर्ज है। उसका चुकाना एक विशिष्ट नैतिक कर्तव्य है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 13 March 2018


👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 4)

🔷 चिन्तन और आचरण के समन्वय से ही व्यक्तित्व बनता है। स्वभाव संस्कार इसी प्रक्रिया को अपनाने से विनिर्मित होते हैं। इसके लिए अपनी कार्य पद्धति इस प्रकार की निर्धारित करनी होती है जिसमें आदर्शवादी गतिविधियों में संलग्न रहना पड़े, साथ ही निर्वाह का उपक्रम भी बनता रहे। क्षमता संवर्धन भी इसी प्रक्रिया का एक अंग है। शारीरिक और मानसिक योग्यताएँ जितनी बढ़ती हैं उसी अनुपात से कुछ अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं। इस दृष्टि से आत्म-निर्माण के लिए परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी विधि व्यवस्था बनानी पड़ती है जिसमें उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए उपयुक्त अवसर नियमित रूप से मिलता रहे।

🔶 ईश्वर ने जिस आकांक्षा से इतनी बड़ी धरोहर सौंपी है उसका निर्वाह भी परमार्थ प्रयोजनों के सहारे ही सधता है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में दान-पुण्य ही काम आते हैं। इन्हीं की परिणति सुयोग सौभाग्यों के रूप में सामने आती है। इसी प्रकार सीमित ‘स्व’ को असीम ब्रह्म के साथ जोड़ने की परम सिद्धि विराट् के साधन से ही सम्भव होती है। वसुधैव कुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु की दो कसौटियों पर खरा सिद्ध होने के लिए मनुष्य को परमार्थ परायण बनना पड़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात बढ़ाते चलने के लिए सेवा धर्म अपनाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जो जीवन क्रम में आत्मोत्कर्ष की तरह लोक मंगल का समुचित समावेश करने के लिए बाधित करते हैं।

🔷 उपरोक्त दोनों ही उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मात्र सोचते या पढ़ते सुनते रहने से ही काम नहीं चलता। भजन भाव से भी उसकी आंशिक पूर्ति ही होती है। समग्रता तब मिलती है जब उन्हें दिनचर्या में सम्मिलित किया जाय और विधि व्यवस्था ऐसी बनाई जाय जिसमें निर्वाह प्रयोजनों के साथ-साथ इन महान निर्धारणों का भी सुयोग बनता रहे। स्पष्ट है कि इसके लिए समय और श्रम लगाना पड़ेगा। व्यक्ति और समाज की, आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती कड़ी परिवार है। यह जब छोटा रहता है तो उसे कुटुम्ब कहते हैं और जब बढ़ता है तब विश्व परिवार के रूप में सुविस्तृत बनकर सामने आता है। परिवार ही वह प्रयोगशाला, पाठशाला एवं कर्मशाला है जिसमें पौरुष को प्रकट करने और अभ्यासों को परिपक्व करने का अवसर मिलता है। अस्तु उत्कृष्टता की साधना के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा रहे। इसके लिए निजी जीवनचर्या में एक समन्वित कार्य पद्धति का निर्धारण करना पड़ता हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 6)

What can we do?

🔷 We have to think of a solution to this. We should conduct debates on this topic in the entire country. We have to awaken the people. If required, we have to resort to an organized campaign against it. Wherever there is a display of vulgar extravagance in weddings, awakened youth should express their disagreement through silent satyagraha. In a country where millions of people sleep on hungry stomach, how can we tolerate the wanton wastage of food and frivolous spending? We could stand with large flexi banners at the venue. Through the use of placards, we can hold a rally or take out a procession to spread awareness in people.

🔶 The placards should display that each day is auspicious so that the myth about muhurat is broken. We should create awareness for simple weddings and ideal life. Young men and women should be made to take an oath for weddings without dowry. We should meet their parents and relatives and request them to read Yug Sahitya. We should request them to spend a part of their savings to help the couple in setting up their home and give as ‘Streedhan’; while some part could be spent for activities related to social welfare.

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 3)

🔷 हिन्दू धर्म में पाप प्रायश्चित का ही नाम है। गंगा में स्नान के बारे में जो कहा गया है, उसका मतलब केवल यह है कि उससे हमारी पाप करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगे, हमारा पाप करने को जो मन चलता है, वह न चले, भविष्य में हम वह सब काम न करें, जिससे हमारे अहम् को प्रेरणा मिल जाए, प्रोत्साहन मिल जाए, वातावरण मिल जाए, यह मतलब है। यह मतलब नहीं है कि आप भूतकाल में जो कर चुके हैं, उसके दण्डों से आपको राहत मिल जाएगी। ऐसा नहीं हो सकता। आपके ऊपर जो बुरे कामों का किया हुआ कर्ज है, उससे भी निपटिए और जिन बुरे कर्मों का वातावरण बना रखा है, जरा उसको भी ठीक कीजिए। आपने जो-जो गलतियाँ कर रखी हैं, जरा उनको भी फिर से एक बार सुधारिए। नहीं सुधार पायेंगे, तो भावी उन्नति का दरवाजा बन्द है।

🔶 मैं आपसे यह कह रहा था कि आप आध्यात्मिक उन्नति के लिए पूजा करते हैं, तो आपको मुबारक, आप उपवास रखते हैं, बहुत अच्छी बात, आप यहाँ अनुष्ठान करते हैं, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? लेकिन इसके साथ-साथ यह मत भूलिए कि इनके जो मुनासिब लाभ हैं, वह आपको उस समय तक नहीं मिल सकेंगे जब तक कि पिछले वाले दबाव आप पर पड़े हुए हैं। पिछले वाले पाप एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिससे न आपकी पूजा सफल हो सकती है, न उपासना सफल हो सकती है, न आपका मन लग सकता है, न ध्यान लग सकता है। क्यों? क्योंकि आपको दण्ड मिल रहे हैं। दण्ड नहीं मिलेंगे तो आपका ध्यान लग जाएगा। ध्यान लग जाएगा फिर पाप का दण्ड कहाँ जाएगा?

🔷 इसीलिए वह आसुरी शक्तियाँ शुभ-कर्मों में बराबर विघ्न उपस्थित करती रहती है। आसुरी शक्तियों से क्या मतलब है? आसुरी शक्तियों से कोई मतलब नहीं है, आपका किसी से वैर नहीं है, फिर कोई आपको बेकार ही हैरान नहीं कर सकता। आसुरी शक्तियाँ बेकार ही हैरान क्यों करेंगी? केवल आपके पाप कर्म ही वह आसुरी शक्तियाँ हैं, जो आपको हैरान कर देती हैं और आपको अच्छे कर्म में सफलता मिलने पर अवरोध खड़ा कर देती हैं, उनसे आपको लड़ना ही पड़ेगा। भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आप जप करते हैं, तप करते हैं, अनुष्ठान करते हैं—भगवान को प्राप्त करने के लिए, मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए तो फिर उज्ज्वल भविष्य में रुकावट डालने वाले जो पिछले वाले पाप कर्म हैं, वही हैं, आसुरी शक्तियाँ उन्हीं का नाम है। उन आसुरी शक्तियों से निपटने की भी कोशिश नहीं करेंगे, तो वह हमला करके आपके अच्छे प्रयासों को मटियामेट करके रख देंगी। खेती आपने की है।

🔶 जंगली जानवर जो हमला करते हैं, तो रातभर में सारी-की फसल को खा-पी करके बराबर कर देते हैं। आप जानवरों को रोकेंगे नहीं? कृपा करके रोकिए, नहीं तो फिर यह हो जाएगा कि आप चाहे जितना पानी लगाते रहिए, खाद लगाते रहिए, बीज बोते रहिए, फसल के नाम पर आपको कोई भी चीज हाथ लगने वाली नहीं है। तब? तब मैं यही कह रहा था आपसे कि आपको इस महत्त्वपूर्ण बात के ऊपर गौर करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 63)

👉 चेतना के रहस्यों का जानकार होता है सद्गुरु

🔷 गुरुगीता अध्यात्मविद्या का परम दुर्लभ शास्त्र है। इस परम शास्त्र के प्रवर्तक भगवान् शिव का कथन है कि अध्यात्म साधना में परम अनिवार्य तत्त्व है ‘गुरुभक्ति का जागरण’। साधक में यदि गुरुभक्ति का विकास हो जाए, तो अध्यात्म साधना सहज ही विकसित एवं फलित होने लगती है। साधक की निर्मल एवं निष्कपट भावनाएँ उसमें परिष्कृत चिन्तन को जन्म देती हैं। चिन्तन का परिष्कार होने से उसके कर्मों में उदात्तता आती है। तत्त्वकथा यही कहती है कि यदि भावनाएँ सँवरती हैं, तो ज्ञान एवं कर्म भी सँवर जाते हैं। गुरुभक्ति यदि अन्तःकरण में पनप सके, तो गुरुकृपा भी सहज ही अवतरित होती है। इस सद्गुरु कृपा के बल पर सहज ही आध्यात्मिक विभूतियों एवं यौगिक ऐश्वर्यों का स्वामी बन जाता है।
  
🔶 पिछले मंत्रों में यह बताया गया है कि परम पूज्य गुरुदेव की दिव्यमूर्ति ध्यान का मूल है। उनके चरण पूजा के मूल हैं। उनके वचन मंत्र मूल है। उनकी कृपा मोक्ष का मूल है। गुरुदेव ही आदि एवं अनादि हैं, उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं। यहाँ तक कि गुरुदेव के पाद प्रक्षालन के जल बिन्दु में सभी तीर्थों का सार समावेश है। भगवान् शिव स्वयं कहते हैं कि मेरे रूठने पर तो सद्गुरु अपने शिष्य का त्राण करने में सक्षम हैं; परन्तु यदि वही रूठ जाएँ, तो फिर कहीं भी त्रिलोकी में रक्षा नहीं हो सकती। इसलिए शिष्य को सदा अपने सद्गुरु की शरण में रहना चाहिए। उन्हीं की सब भाँति अर्चना-आराधना करनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 101

👉 लेडी डॉक्टर ने 'स्वच्छ भारत' के लिए दान किए 45 लाख रुपये

🔶 जम्मू-कश्मीर में  एक 33 वर्षीय महिला डॉक्टर ने स्वच्छ भारत अभियान के लिए 45 लाख रुपये की भारी भरकम राशि दान कर दी है. उस डॉक्टर का नाम मेघा महाजन है. जानकारी के मुताबिक मेघा को ये पैसे पति से तलाक के बाद गुजारा भत्ते के तौर पर मिले थे. मेघा ने कहा कि वह अभी काफी यंग हैं और डॉक्टर भी हैं तो अभी काफी पैसा कमा सकती हैं. वह कहती हैं कि हमें जिंदगी एक बार ही मिलती है उसे समाज की सेवा में लगा देना चाहिए. इसी वजह से उन्होंने अपने गुजारे भत्ते के लिए मिले पैसे स्वच्छ भारत अभियान के लिए दान कर दिए.

👉 लोगों में आई है जागरुकता
🔷 आपको बता दें कि इस देश में जब पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो उनका सबसे पहला बड़ा कदम भारत को साफ-सुथरा बनाना था. इसी उद्देश्य से उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी. कई शहरों में इस मुहिम का असर दिखा है और लोगों में भी साफ-सफाई को लेकर काफी जागरुकता आई है.

👉 इसलिए दान किया अपना गुजारा भत्ता
🔶 मेघा ने बताया, "पिछले साल नवंबर में पति से तलाक लेने के बाद मुझे गुजारा भत्ते के तौर पर 45 लाख रुपये मिले थे. मैंने इन पैसों को स्वच्छ भारत अभियान फंड में देने का फैसला किया. आपको बता दें कि मेघा जम्मू के I.G.G.D.C हॉस्पिटल में बतौर डेंटल सर्जन काम कर रही हैं. उन्होंने कहा कि आमतौर पर जब पत्नी को तलाक के बाद गुजारा भत्ता मिलता है तो लोग यह सोचते हैं कि महिलाएं गलत नीयत से और पति का शोषण करने के लिए गुजारा भत्ता मांगती हैं. मेघा ने कहा कि वह ऐसे लोगों को जवाब दे उन्हें गलत साबित करना चाहती थीं.

👉 दान किए गए पैसों का नहीं है अफसोस
🔷 मेघा ने आगे कहा, "मैं चाहती तो इतने सारे पैसों का कुछ भी कर सकती थी. चाहती तो अपने लिए भी खर्च कर सकती थी. लेकिन, मैंने उन लोगों को जवाब देना जरूरी समझा." मेघा ने बताया, "मेरे परिवार वालों ने मुझे अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए हैं. मुझे दान किए गए पैसों का कोई अफसोस नहीं है." उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार का एक अच्छा और जरूरी कदम है. मेघा ने दान देने के साथ ही पानी और साफ हवा के लिए चलने वाले प्रॉजेक्ट के बारे में भी सरकार को लिखा है.

रविवार, 11 मार्च 2018

👉 प्रेम की कसौटी

🔶 नारदजी को अभिमान हो गाया कि मैं भगवान को बहुत प्यार करता हूँ। भगवान ने इस बात को जाना और अभिमान के निवारण का प्रयत्न किया क्योंकि अभिमान ही अध्यात्म मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

🔷 भगवान नारद को साथ लेकर भ्रमण को चल दिये। चलते-चलते एक तपस्वी ब्राह्मण मिला जो सूखे पत्ते खाकर तप कर रहा था। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था। फिर भी कमर में तलवार लटकाए था।

🔶 भगवान साधारण वेश में थे। उनने तपस्वी से पूछा “आपके पत्ते खाने और तलवार धारण करने का क्या कारण है?”

🔷 तपस्वी ने कहा- पत्ते इसलिए खाता हूँ कि मेरे भगवान की प्रजा को अन्न दूध आदि वस्तुऐं पर्याप्त मात्रा में मिले। मेरे खाने के कारण किसी जीव के आहार में कमी न पड़े, और तलवार इसलिए बाँधे हुए हूँ कि संसार में तीन भक्ति को कलंकित करने वाले है, ये कभी मिल जायें तो इस तलवार से उनका सिर काट दूँ।

🔶 नरवेशधारी भगवान ने पूछा- भक्ति को कलंकित करने वाले तीन भला वे कौन-कौन है? तपस्वी ने कहा-एक अर्जुन जिसने मेरे भगवान से अपने स्वार्थ के लिए रथ हँकवाया; दूसरी, द्रौपदी जिसके चीर को बढ़ाने के लिए भगवान को नंगे पैरों दौड़ना पड़ा; तीसरा, नारद जिसे आत्मज्ञान पर संतोष नहीं, कभी कुछ कभी कुछ पूछकर मेरे भगवान का सिर खाता रहता है।

🔷 दोनों तपस्वी को प्रणाम करके चल दिए। नारद की समझ में अब आया कि उच्च कोटि के प्रेम का क्या लक्षण है? अपने प्रेमी को ही नहीं उसके प्रिय जनों को भी अपने कारण कुछ कष्ट न पहुँचने देना और अपने सुख के लिये किसी प्रकार की भी प्रेमी से याचना न करना।

🔶 नारद ने अपने प्रेम की तुलना उस तपस्वी के प्रेम से की तो उनका अभिमान चूर हो गया।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 March 2018

👉 आज का सद्चिंतन 12 March 2018


👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 3)

🔶 दूरदर्शी विवेकशीलता, महाप्रज्ञा यदि किसी बड़भागी पर अनुग्रह करे तो उसका स्वरूप एक ही होना चाहिए कि वह जीवन सम्पदा की गरिमा समझें और उसके सदुपयोग की बात सोचे। इस चिन्तन से एक ही निष्कर्ष उभरकर ऊपर आता है कि समय को प्रत्यक्ष सौभाग्य माना जाय और इसके उपयोग का जो सर्वश्रेष्ठ निर्धारण सम्भव हो उसे कर गुजरने का साहस अपनाया जाय।

🔷 महामानवों के पराक्रम का उपयोग दो प्रयोजनों के निमित्त होता रहा है। एक में उनने अपनी क्षमता एवं वरिष्ठता का अभिवर्धन किया है और दूसरे में उनने विश्व वसुधा के साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को संकल्प पूर्वक निभाया है। इन्हीं दो कार्यों को आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के नाम से जाना जाता है। कोई चाहे तो उसे आत्मा और परमात्मा को प्रसन्नता उपलब्ध कराने वाली साधना भी कह सकता है। इनमें से एक स्वार्थ है और दूसरा परमार्थ। इनके समन्वय से ही मनुष्य जन्म सार्थक और कृत-कृत्य होता है।

🔶 आत्म-कल्याण का तात्पर्य है-व्यक्तित्व का निखार परिष्कार। इसके लिए आन्तरिक संघर्ष करना पड़ता है और गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने वाले निर्धारणों का जीवनचर्या में समावेश करना पड़ता है। संचित कुसंस्कारों का एक पहाड़ हर किसी के सामने है। प्रचलन, वातावरण, स्वजन और आदतों का एक ऐसा जाल-जंजाल है जिसके रहते न कुछ उच्चस्तरीय सोचते बनता है और न करते धरते। इससे बाहर निकल सकना परम पुरुषार्थ है। जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का स्वरूप सही अर्थों में समझ सकना आत्मबोध है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए वर्तमान चिन्तन प्रवाह को एक प्रकार से उलटना ही पड़ता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन जैसे उच्चस्तरीय पुरुषार्थों में मन को बलपूर्वक नियोजित करना पड़ता है। साधना-उपासना भी इसी एक प्रयोजन के लिए की जाती है। यह अध्यात्म क्षेत्र का मानसिक पराक्रम हुआ जिसके लिए समय भी लगाना पड़ता है और श्रम भी करना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 How long can we go on tolerating vulgarly and extravagant weddings? (Part 5)

Some statistics that will touch your hearts

🔶 I feel like presenting some more statistics to you. According to an estimate, the annual average income of an individual is around Rs 25000. But the same society buys around 800 tonnes of gold per year (note that the cost of gold has become more than 18000/- for 10gms). 600 tonnes of gold is exclusively used for making jewellery. In this country, a mere 3% of the people pay income tax every year. Then where does this huge amount come from? So, definitely the money being spent in profligate weddings must be the savings of the family. These savings can be brought into circulation through various mediums. This amount is beyond any kind of taxation. In the name of celebration and public merry-making, is this not a display of our sick mindset? Each and every intelligent person in the society should think about this.

🔷 More than 70 crores of our country’s population eke out a living with less than Rs. 30 income per day. More than 39 crores of the people are below the poverty line. Clean drinking water is not available for more than 60 crore people. 35 crore do not have access to primary education. 62 crores do not have their own houses. 20 crore sleep on the city footpaths.  15 crore are living out of compensation. On the contrary, political leaders have an average annual income of 9 lakh rupees. The annual income of about 30 crore of the population is more than Rs. 2 crores.  In India, 15 crore people are millionaires and 24 are billionaires. 25 crore people spend about 50 crore rupees on bottled water. 1.5 crore like to live in hotels while 7 crore own more than one house.

🔶 Aren’t these statistics an eye opener? But they depict a little less than the entire truth. Where do these expensive weddings take birth? This can be understood. Will group conflicts not rise in such situations? Why are divorces becoming more rampant? Why is domestic and social violence continuing on women? Why are social thinkers mum on this issue?

✍🏻 Pranav Pandya
📖 From Akhand Jyoti

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...