बुधवार, 14 मार्च 2018

👉 क्षमताओं का सदुपयोग-प्रगति का राजमार्ग (भाग 4)

🔶 इस प्रक्रिया को कौन किस प्रकार सम्पन्न करे, यह व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर ही एक सुनियोजित कार्यक्रम बन सकता है। जीवन साधना का तात्पर्य ही यह है कि दिशाधारा रीति-नीति में उत्कृष्टता का समावेश करना और ऐसी दिनचर्या बनाना जिसमें उपरोक्त तथ्यों का समुचित समन्वय हो सके। इसमें व्यक्तिगत दुर्बलताओं और अस्त-व्यस्तता को हटाने और उनके स्थान पर प्रगतिशील विधि-व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। आजीविका के औचित्य एवं स्तर को नये सिरे से निर्धारित करना होता है। परिवार में जो परम्परा चल रही है उसके ढर्रे में आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं, साथ ही लोक साधना के लिए नये सिरे से अधिक समय लगाने की गुंजायश निकालनी होती है।

🔷 यह सभी काम ऐसे हैं जो उथली कल्पना करते रहने से नहीं बन पड़ते वरन् अवांछनीयताओं के उन्मूलन और सत्परम्पराओं के प्रचलन-परिपोषण के लिए ऐसा ताना-बाना बुनना पड़ता है मानो कोई बड़ा उद्योग व्यवसाय खड़ा करने के लिए योजना बनाने, पूँजी जुटाने, शिल्पियों को कार्यरत करने तथा उत्पादन को खपाने का सरंजाम खड़ा किया जा रहा हो। राष्ट्रीय बचत की पंचवर्षीय योजनाओं का ढाँचा खड़ा करने में जैसे कौशल की आवश्यकता पड़ती है, प्रायः वैसी ही सूझबूझ प्रगतिशील जीवन के अभिनव निर्धारण के लिए आवश्यक होती है। इससे कम में बात बनती ही नहीं। यहाँ जादू चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। जिसे जो कुछ उपलब्ध हुआ है वह उसके नियोजन, निर्धारण और पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। इसका समन्वय ही दैवी वरदान के नाम से जाना जाता है।

🔶 जीवनचर्या में परिवर्तन कायाकल्प है। दृष्टिकोण और प्रयास में घुसी हुई अवांछनीयता को हटाकर इसके स्थान पर उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित किया जा सके तो समझना चाहिए कि महानता का श्रेय साधन हस्तगत हो गया। पर यह हो कैसे? इसका उत्तर एक ही है कि उच्चस्तरीय निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिए समय सम्पदा का नियोजन किया जाय। उसके साथ श्रम और मनोयोग को भी संयुक्त रखा जाय। इसके बिना समुन्नत जीवन क्रम का श्रेय साधन सम्पन्न कर सकने का और कोई मार्ग है नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

कोई टिप्पणी नहीं:

👉 को धर्मानुद्धरिष्यसि?

हिमालय के हिमशिखरों से बहती हुई बासन्ती बयार हमारे दिलों को छूने आज फिर आ पहुँची है। इस बयार में दुर्गम हिमालय में महातप कर रहे महा-ऋषिय...