बुधवार, 14 मार्च 2018

👉 प्रायश्चित क्यों? कैसे? (भाग 4)

🔶 आपको एक घटना सुनाता हूँ। एक बार स्वामी माधवाचार्य जी वृन्दावन रहते थे। उन्होंने तेरह साल तक गायत्री के अनुष्ठान किए, लेकिन उन अनुष्ठानों का कोई परिणाम उनको नहीं मिला। न उनको आत्मशान्ति मिली, न भगवान का साक्षात्कार हुआ, न कोई मनोकामना पूरी हुई, न कोई सन्तोष हुआ, कुछ नहीं हुआ। तब? तब बड़े खिन्न हुए, दुःखी हुए कि हमको सफलता के कोई चिन्ह नजर नहीं आते हैं, तो स्तुति करने का क्या फायदा? उन्होंने गायत्री अनुष्ठान तेरह वर्षों तक करने के बाद में वृन्दावन त्याग दिया और वृन्दावन त्यागने के बाद में बनारस चले गए।

🔷 वह वहाँ काशी के मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए थे, आँखों में आँसू भरे हुए थे, बड़े दुःखी थे। एक साधक का रूप और दुःखी देख करके एक महात्मा उधर से निकले, उन्होंने पूछा—भाई क्या बात है? कैसे दुःखी हो रहा है? कौन है तू? तो वह बोले—हम साधना करने वाले एक व्यक्ति हैं और तेरह वर्ष तक गायत्री की उपासना करते रहे, लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला, हम बहुत खिन्न हैं और यह सोचते हैं कि उपासना से कोई लाभ नहीं है, खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार हैं। महात्मा जी हँसने लगे। उन्होंने कहा—अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो तान्त्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं। तू तान्त्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले। एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा, इसलिए चमत्कार दिखाने की दृष्टि से तुझे हम एक साल की तान्त्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं।

🔶 स्वामी माधवाचार्य जी ने मान लिया। फिर उनको मणिकर्णिका घाट पर तन्त्र सम्बन्धी आवश्यक ज्ञातव्य बताया और यह कहा—एक साल तक तुमको इसी मर्यादा में रहना पड़ेगा। इससे बाहर जाना मना है। इसी में नहाना है, इसी में टट्टी जाना है, इसी में खाना पकाना है, इसी में सोना, उठना, बैठना, किसी भी कीमत पर मरघट की सीमा से बाहर मत जाना। ऐसा ही उन्होंने किया। एक साल तक उनको जो भैरव का मन्त्र बताया गया था, उसको वह जपते रहे। भैरव कभी शेर के रूप में आते, कभी औरत के रूप में आते, कभी डराते, कभी पैसा ले करके आ जाते, लेकिन माधवाचार्य जी से उन्होंने कह दिया था कि तू अपने काम में ही लगे रहना, दुनिया की बातों से प्रभावित मत होना। साधक को दुनिया की बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। अपनी साधना को ही सब कुछ मानकर चलना चाहिए। वैसा ही हुआ।

🔷 माधवाचार्य अपने गुरु के कहने के मुताबिक़ सब कुछ करते रहे। जो कोई आते रहे, सबको फटकारते रहे—आप लोग चले जाइए, हम तो साधना कर रहे हैं। एक दिन, साल जब पूरा हो गया, तब भैरव जी ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा—जिसका तू जप कर रहा है, वह मैं ही हूँ। हमारा नाम भैरव है और हम आ गए। अब तू हमसे वरदान माँग। उन्होंने कहा कि पहली माँग तो यह कि आप मुझे यह यकीन करा दीजिए कि आप भैरव ही हैं। अब तक पूरे साल में यही खुराफात होती रही है कि कोई शेर बनकर आ गया, तो कोई भूत बनकर आ गया—कोई भैंसा बनकर आ गया, तो कोई औरत बनकर आ गया। रोज यहाँ मेरे साथ में दिल्लगीबाजी होती है। अगर आप भैरव हैं, तो फिर मैं आपकी सूरत देखना चाहता हूँ और यह विश्वास करना चाहता हूँ कि आज मेरे साथ में कोई दगाबाजी तो नहीं हो रही है। आप सामने आइए और प्रगट हो जाइए। पहला वरदान माँगूँगा। आज तो बस इतना ही माँगना है। भैरव ने कहा—हम आपको दर्शन तो नहीं दे पायेंगे, आपकी पीठ पीछे खड़े होकर बात कर सकते हैं, लेकिन आपको दर्शन नहीं दे पायेंगे।

🔶 माधवाचार्य ने सन्देह से पूछा कि दर्शन क्यों नहीं दे पायेंगे? उन्होंने कहा—तेरे चेहरे पर गायत्री की शक्ति और तेजस् के आगे खड़े नहीं हो सकते। इसलिए सामने आने की हमारी हिम्मत नहीं है। पीठ पीछे तू जो कुछ हमसे पूछना चाहता है, वह पूछ! बात तो कर ही रहे हैं, यकीन भी कर ले कि हम भैरव हैं। नहीं महाराज जी मुझे यकीन नहीं होता, सामने आ जाइए। नहीं, सामने तो नहीं आ सकते। फिर वजह क्या है? तुझे बता तो दिया। तेरी आँखों में गायत्री का इतना तेजस्, चेहरे में इतना ओजस् और वर्चस् छाया है कि उसके सामने रह सकना हमारे लिए मुमकिन नहीं है। उनको बहुत आश्चर्य हुआ कि हमारी आँखों में गायत्री का इतना जबर्दस्त तेज है, जिसकी वजह से भैरव हमारे सामने तक नहीं आ सकते। तो उन्होंने कहा—महाराज फिर एक वरदान और माँगता हूँ मैं आपसे। आप दर्शन नहीं देना चाहते तो मत दीजिए। आप एक इच्छा और पूरी कर दीजिए। क्या? आप यह इच्छा पूरी कर दीजिए कि मेरा गायत्री का तेरह वर्षों का जप और अनुष्ठान क्यों बेकार चला गया?

🔷 तो भैरव ने कहा—तेरे इस सवाल का मतलब हम बता देंगे, चल आँखें बन्द कर। आँखें बन्द कर लीं, फिर उन्होंने एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा इस तरह तेरह जन्मों का दृश्य दिखाया। उसमें उन्होंने बुरे-बुरे कर्म किये थे। किसी में हत्या, किसी में चोरी, किसी में डाका, किसी में कुछ, किसी में कुछ। उनकी तेरह जन्मों में बड़ी घिनौनी जिन्दगी थी। उन्होंने कहा—देख तेरह वर्ष का जो तेरा उपवास है, अनुष्ठान है, एक-एक वर्ष का उपवास-अनुष्ठान, एक-एक जन्म के लिए पूरे हो गये। अब तू जा, चौदहवीं बार फिर अनुष्ठान कर। अबकी बार तेरा साक्षात्कार होगा। अबकी बार जो गायत्री का लाभ मिलना चाहिए था, मिल जाएगा। माधवाचार्य प्रसन्न हो गए, फिर वह वापस चले आये। अपनी छोड़ी हुई साधना को फिर करने लगे। गायत्री उपासना का चौदहवाँ वर्ष जो उन्होंने किया, उसका परिणाम मिला, गायत्री का साक्षात्कार हुआ, उन्होंने पूछा—क्या वरदान चाहते हो, तो माधवाचार्य ने कहा—मैं कोई अजर-अमर ऐसा काम करके दिखा दूँ, जिससे कि दुनिया मुझे याद करती रहे। उन्होंने फिर ‘माधवनिदान’ नाम का प्रख्यात ग्रन्थ लिखा। इसे गायत्री ने माधवाचार्य के सिर पर अदृश्य रूप में प्रकट होकर लिखवाया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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