साधना है साधक के मन का साध्य में विसर्जन। लेकिन इस सरल-सुगम सत्य की समझ सबको नहीं हो पाती। वे मन की उलझनों में उलझे रहते हैं। मन की भटकनों में भटकते रहते हैं। मन के जाल को सुलझाने में वे खुद ही इतना उलझ जाते हैं कि उनका अपना अस्तित्त्व ही खोने लगता है। जो अनुभवी हैं उन सभी का यही कहना है कि मन ही तो अवरोध है, अड़चन है। इसके हटने, मिटने पर ही सत्य का अनुभव हो पाता है।
गृत्समद साधना में थे। अपने गुरु के आश्रम में सर्वथा एकान्त रहकर वह रात-दिन मन को साधने का अभ्यास करते रहते थे। क्योंकि उन्होंने कहीं से सुन रखा था कि साधना मन को साधने का नाम है। एक दिन उनके गुरु उनके कुटीर पर गए। गृत्समद ने उनकी ओर कोई ध्यान न दिया। बस अपने मन की गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करते रहे।
उनके कृपावन्त गुरु ने वहीं पर बैठकर ईंट को पत्थर से घिसना शुरू किया। ऐसा करते हुए उन्हें देर हो गयी। अब गृत्समद से रहा न गया। उन्होंने उनसे पूछा आप यह क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा- वत्स! इस ईंट का दर्पण बनाना है। इस बात पर चकित होते हुए गृत्समद ने कहा, आप यह क्या कह रहे हैं? जीवन भर घिसते रहने पर भी ईंट दर्पण नहीं बन सकेगी।
इस पर उनके गुरु ने कहा- वत्स! यदि ईंट दर्पण नहीं बनेगी, तो मन भी दर्पण न बन सकेगा। मन ही तो धूल है जिससे दर्पण ढका है। विचारों के संग्रह के अलावा भला मन और है ही क्या? उसके हटने पर जो शेष रह जाता है वह निर्दोष चैतन्य तो सदा से निर्दोष है। निर्विचार में, अ-मन में ही उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं। विचारों का धुँआ न हो तो फिर चेतना की निर्धूम शिखा ही शेष रह जाती है। गुरु की इस बात को आत्मसात करके गृत्समद ने ऋषित्व को उपलब्ध किया। वह ऋषि गृत्समद कहलाए।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१८
गृत्समद साधना में थे। अपने गुरु के आश्रम में सर्वथा एकान्त रहकर वह रात-दिन मन को साधने का अभ्यास करते रहते थे। क्योंकि उन्होंने कहीं से सुन रखा था कि साधना मन को साधने का नाम है। एक दिन उनके गुरु उनके कुटीर पर गए। गृत्समद ने उनकी ओर कोई ध्यान न दिया। बस अपने मन की गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करते रहे।
उनके कृपावन्त गुरु ने वहीं पर बैठकर ईंट को पत्थर से घिसना शुरू किया। ऐसा करते हुए उन्हें देर हो गयी। अब गृत्समद से रहा न गया। उन्होंने उनसे पूछा आप यह क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा- वत्स! इस ईंट का दर्पण बनाना है। इस बात पर चकित होते हुए गृत्समद ने कहा, आप यह क्या कह रहे हैं? जीवन भर घिसते रहने पर भी ईंट दर्पण नहीं बन सकेगी।
इस पर उनके गुरु ने कहा- वत्स! यदि ईंट दर्पण नहीं बनेगी, तो मन भी दर्पण न बन सकेगा। मन ही तो धूल है जिससे दर्पण ढका है। विचारों के संग्रह के अलावा भला मन और है ही क्या? उसके हटने पर जो शेष रह जाता है वह निर्दोष चैतन्य तो सदा से निर्दोष है। निर्विचार में, अ-मन में ही उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं। विचारों का धुँआ न हो तो फिर चेतना की निर्धूम शिखा ही शेष रह जाती है। गुरु की इस बात को आत्मसात करके गृत्समद ने ऋषित्व को उपलब्ध किया। वह ऋषि गृत्समद कहलाए।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१८



















