बुधवार, 22 अप्रैल 2020

👉 Sadhna साधना

साधना है साधक के मन का साध्य में विसर्जन। लेकिन इस सरल-सुगम सत्य की समझ सबको नहीं हो पाती। वे मन की उलझनों में उलझे रहते हैं। मन की भटकनों में भटकते रहते हैं। मन के जाल को सुलझाने में वे खुद ही इतना उलझ जाते हैं कि उनका अपना अस्तित्त्व ही खोने लगता है। जो अनुभवी हैं उन सभी का यही कहना है कि मन ही तो अवरोध है, अड़चन है। इसके हटने, मिटने पर ही सत्य का अनुभव हो पाता है।

गृत्समद साधना में थे। अपने गुरु के आश्रम में सर्वथा एकान्त रहकर वह रात-दिन मन को साधने का अभ्यास करते रहते थे। क्योंकि उन्होंने कहीं से सुन रखा था कि साधना मन को साधने का नाम है। एक दिन उनके गुरु उनके कुटीर पर गए। गृत्समद ने उनकी ओर कोई ध्यान न दिया। बस अपने मन की गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करते रहे।
उनके कृपावन्त गुरु ने वहीं पर बैठकर ईंट को पत्थर से घिसना शुरू किया। ऐसा करते हुए उन्हें देर हो गयी। अब गृत्समद से रहा न गया। उन्होंने उनसे पूछा आप यह क्या कर रहे हैं? गुरु ने कहा- वत्स! इस ईंट का दर्पण बनाना है। इस बात पर चकित होते हुए गृत्समद ने कहा, आप यह क्या कह रहे हैं? जीवन भर घिसते रहने पर भी ईंट दर्पण नहीं बन सकेगी।

इस पर उनके गुरु ने कहा- वत्स! यदि ईंट दर्पण नहीं बनेगी, तो मन भी दर्पण न बन सकेगा। मन ही तो धूल है जिससे दर्पण ढका है। विचारों के संग्रह के अलावा भला मन और है ही क्या? उसके हटने पर जो शेष रह जाता है वह निर्दोष चैतन्य तो सदा से निर्दोष है। निर्विचार में, अ-मन में ही उस सनातन सत्य के दर्शन होते हैं। विचारों का धुँआ न हो तो फिर चेतना की निर्धूम शिखा ही शेष रह जाती है। गुरु की इस बात को आत्मसात करके गृत्समद ने ऋषित्व को उपलब्ध किया। वह ऋषि गृत्समद कहलाए।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१८

रविवार, 19 अप्रैल 2020

👉 विद्वता और मानवता

एक बहुत बड़ा मंदिर था। उसमें हजारों यात्री दर्शन करने आते थे। सहसा मंदिर का प्रबंधक प्रधान पुजारी मर गया। मंदिर के महंत को दूसरे पुजारी की आवश्यकता हुई और उन्होंने घोषणा करा दी कि जो कल सवेरे पहले पहर आकर यहां पूजा संबंधी जांच में ठीक सिद्ध होगा, उसे पुजारी रखा जाएगा।

बहुत से विद्वान सवेरे पहुंचने के लिए चल पड़े। मंदिर पहाड़ी पर था। एक ही रास्ता था। उस पर भी कांटे और कंकड़-पत्थर थे। विद्वानों की भीड़ चली जा रही थी मंदिर की ओर। किसी प्रकार कांटे और कंकड़ों से बचते हुए लोग जा रहे थे।

सब विद्वान पहुंच गए। महंत ने सबको आदरपूर्वक बैठाया। सबको भगवान का प्रसाद मिला। सबसे अलग-अलग कुछ प्रश्र और मंत्र पूछे गए। अंत में परीक्षा पूरी हो गई। जब दोपहर हो गई और सब लोग उठने लगे तो एक नौजवान वहां आया। उसके कपड़े फटे थे। वह पसीने से भीग गया था और बहुत गरीब जान पड़ता था।

महंत ने कहा- ‘‘तुम बहुत देर से आए।’’

वह बोला- ‘‘मैं जानता हूं। मैं केवल भगवान का दर्शन करके लौट जाऊंगा।’’

महंत उसकी दशा देखकर दयालु हो रहे थे। बोले- ‘‘तुम जल्दी क्यों नहीं आए?’’

उसने उत्तर दिया- ‘‘घर से बहुत जल्दी चला था। मंदिर के मार्ग में बहुत कांटे थे और पत्थर भी थे। बेचारे यात्रियों को उनसे कष्ट होता। उन्हें हटाने में देर हो गई।’’

महंत ने पूछा- ‘‘अच्छा, तुम्हें पूजा करना आता है?’’

उसने कहा- ‘‘भगवान को स्नान कराके चंदन-फूल चढ़ा देना, धूप-दीप जला देना तथा भोग सामने रखकर पर्दा गिरा देना और शंख बजाना तो जानता हूं।’’

महंत ने पूछा- ‘‘और मंत्र?’’

वह उदास होकर बोला- ‘‘भगवान से नहाने-खाने को कहने के लिए मंत्र भी होते हैं, यह मैं नहीं जानता।’’

अन्य सब विद्वान हंसने लगे कि यह मूर्ख भी पुजारी बनने आया है। महंत ने एक क्षण सोचा और कहा- ‘‘पुजारी तो तुम बन गए। अब मंत्र सीख लेना, मैं सिखा दूंगा। मुझसे भगवान ने स्वप्न में कहा है कि मुझे मनुष्य चाहिए।’’

‘‘हम लोग मनुष्य नहीं हैं?’’ दूसरे आमंत्रितों ने पूछा।

वे लोग महंत पर नाराज हो रहे थे। इतने पढ़े-लिखे विद्वानों के रहते महंत एक ऐसे आदमी को पुजारी बना दे जो मंत्र भी न जानता हो, यह विद्वानों को अपमान की बात जान पड़ती थी।

महंत ने विद्वानों की ओर देखा और कहा- ‘‘अपने स्वार्थ की बात तो पशु भी जानते हैं। बहुत से पशु बहुत चतुर भी होते हैं लेकिन सचमुच मनुष्य तो वही है जो दूसरों को सुख पहुंचाने का ध्यान रखता है, जो दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए अपने स्वार्थ और सुख को छोड़ सकता है।’’

विद्वानों के सिर नीचे झुक गए। उन लोगों को बड़ी लज्जा आई। वे धीरे-धीरे उठे और मंदिर में भगवान को और महंत जी को नमस्कार करके उस पर्वत से नीचे उतरने लगे।

दोस्तों!! सोचने की बात है कि हममें से कौन मनुष्य है?

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 20 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 20 April 2020


👉 युग ऋषि का आश्वासन

कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से  चलेगा। यह दूसरी बात है कि कलम जो हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या दूसरी। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।

सहकार और अनुदान क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है। हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। पाठकों-आत्मीय परिजनों को सतत् हमारे विचार ‘ब्रह्मवर्चस’ नाम से पत्रिकाओं पुस्तिकाओं फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1984 पृष्ठ 2

👉 Enrich Your Heart

Great personalities do not accumulate wealth, neither do they desire for it; because, they have a generous heart full of a treasure that is bigger than that of Kuber (the God of wealth). It is said that there is no place for the one who is poor (miser) at heart; if there is no compassion in one’s heart, he will have no abode (of peace) – neither in this world, nor in the sublime world beyond… A materialistically poor man may have many chances of getting wealthy but the one whose heart is merciless will remain a beggar who will get scorn from everywhere.

Who can be a follower of truth and sainthood? Who is worthy of seeing God? The one, whose heart pulsates with generosity and love… Harsh, dry-hearted, cruel ones are infirm, they are impaired despite having healthy body, mind and resourceful life; they won’t be able to enjoy even the nectar kept in their closed vicinity. ‘O’ tyrants, just think before terrorizing others! What will happen the day when you will be in the place of your victims? Why be blinded by selfish passions, ego and follow apathy? You will have to bear the painful retribution life after life…Mother earth is a witness to this law of eternity; sooner or later the sinners have to face the dreadful punishments of the hell right here. Therefore, be gentle, sensitive, kind and helpful to others.

Those who possess the light of compassion in their hearts will never wander in the dark. So open your eyes to look inside and illumine your heart with the glow of kindness. Be considerate and compassionate to every one around you.

📖 Akhand Jyoti, Feb. 1942

👉 आध्यात्मिक जीवन

आध्यात्मिक जीवन अस्वस्थ होने में नहीं, स्वस्थ होने में है। यह रोग में नहीं आरोग्य में है, पीड़ा में नहीं प्रसन्नता में है, दमन में नहीं रूपान्तरण में है। लेकिन इस मुखर सच को समझने वाले लोग कम है। संख्या उनकी ज्यादा है जो दमन को, स्वयं के प्रति अनाचार को अध्यात्म समझते हैं। ऐसे लोग स्वयं को भले कितना ही समझदार समझें लेकिन हैं सिरे से नासमझ।
  
स्वामी विवेकानन्द के पास एक ऐसा ही अपने को समझदार समझने वाला नासमझ व्यक्ति आया। वह साधुवेश में था, बातों ही बातों में उसने बताया कि वह बाल ब्रह्मचारी है। उसकी सूखी, कृश देह, बुझा निस्तेज चेहरा यह बयान कर रहे थे कि उसने अपने शरीर पर बहुत अत्याचार किया है। स्वामी जी को उस पर बहुत दया आयी। वह बोले- अरे भाई! शरीर को इतना सताने की क्या जरूरत पड़ गयी। स्वामी जी के इस कथन पर वह कुछ चौंक सा गया। क्योंकि उसने दमन को त्याग, अस्वास्थ्य को आध्यात्मिकता, कुरूपता एवं विकृति को योग समझ रखा था। उसने असौन्दर्य साधने को ही साधना मान रखा था।
  
स्वामी विवेकानन्द उसके इस अज्ञान पर हँसे और बोले- तुमने स्वयं को शरीर तक क्यों सीमित कर रखा है। शरीर सब कुछ नहीं है। शरीर कुछ है और कुछ ऐसा भी है जो शरीर के पार और परे है। शरीर को न भोगी बनने देना है और न रोगी। न तो शरीर को उछालते फिरना है और न उसे तोड़ते फिरना है। देह तो बस गेह है, आत्मा का आवास है। उसका स्वस्थ और अच्छा होना आवश्यक है।
  
आध्यात्मिक जीवन स्वास्थ्य का विरोध नहीं है। वह तो परिपूर्ण स्वास्थ्य है। वह तो एक लय युक्त, संगीतपूर्ण सौन्दर्य की स्थिति का पर्यायवाची है। शरीर तो बस उपकरण है, अपना अनुगामी है। तुम जैसे बनते हो, वह वैसा बन जाता है। तुम वासना में हो, तो वह वहाँ साथ देता है, तुम साधना में हो तो वह साधना में साथ देता है। आध्यात्मिक जीवन का मतलब शारीरिक दमन नहीं बल्कि विचार, संस्कार और भावनाओं का परिमार्जन परिवर्तन व रूपान्तरण है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१७

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

👉 कहीं पहुँचना है, तो चलना होगा: -

एक व्यक्ति प्रतिदिन आकर महात्मा बुद्ध का प्रवचन सुना करता था। उसका यह क्रम एक माह तक बराबर चला पर इस सबका उसके जीवन पर कोई प्रभाव नही पडा। महात्मा बुद्ध उसको बारबार समझाते थे कि लोभ, द्वेष और मोह पाप के मूल हैं, इन्हें त्यागो। परंतु इन बुराइयों से बचना तो दूर वह इनमे और अधिक फँसता गया।

महात्मा बुद्ध कहते थे कि क्रोध करने वाले पर जो क्रोध करता है, उसका अधिक अहित होता है। लेकिन जो क्रोध का उत्तर क्रोध से नही देता, वह एक भारी युद्ध जीत लेता है। बुद्ध के ऐसे प्रवचन सुनने के बाद भी उस व्यक्ति का स्वभाव उग्र से उग्रतर होता जा रहा था।

एक दिन वह परेशान होकर बुद्ध के पास गया, और उन्हें प्रणाम निवेदन करके अपनी समस्या सुनाई।

बुद्ध ने कहा- “कहाँ के रहने वाले हो..?”

वो बोला- “श्रावस्ती का..।“

बुद्ध ने फिर पूछा- “ राजगृह से श्रावस्ती कितनी दूर है...?“

उसने बता दिया।

बुद्ध ने पूछा- “कैसे जाते हो वहाँ...?”

वो बोला- “सवारी से...।“

बुद्ध ने फिर पूछा- “कितना वक्त लगता है..?“

उसने हिसाब लगाकर ये भी बताया।

बुद्ध बोले- “अब ये बताओ, यहाँ बैठे-बैठे श्रावस्ती पहुँच सकते हो..।“

वो बोला- “ये कैसे हो सकता है..? वहाँ पहुँचने के लिये तो चलना होगा...।“

बुद्ध बडे प्यार से बोले- "तुमने सही कहा। चलने पर ही मँजिल तक पहुँचा जा सकता है। इसी तरह अच्छी बातों का असर तभी पडता है जब उन पर अमल किया जाए। ज्ञान के अनुसार कर्म ना होने पर वह व्यर्थ जाता है।“

इसी तरह हर जानी गई अच्छी बात असर तभी लाती है जब उसको कर्म में ढाला जाए या उसका व्यवहार किया जाए। बिना अमल किया ज्ञान सिर्फ व्यर्थ ही नहीं चला जाता बल्कि वह समय के साथ भूल भी जाता है। फिर कुछ लोग यह कहते पाए जाते हैं कि वह यह अच्छी बात इसलिए नही अपना पाते हैं कि परिस्थिति अनुकूल नहीं है, तो जरा विचार कीजिए अनुकूल परिस्थिति इसीलिए तो नहीं है कि कोई भी अच्छाई पर अमल ही नही कर रहा है। बिना अच्छाई पर अमल किए अच्छी परिस्थिति कैसे आएगी। आखिर कहीं से तो शुरुआत करनी होगी॥

👉 भविष्य का सतयुगी समाज

बूंदें अलग-अलग रह कर अपनी श्री गरिमा का परिचय नहीं दे सकती। उन्हें हवा का एक झोंका भर सुखा देने में समर्थ होता है। पर जब वे मिलकर एक विशाल जलाशय का रूप धारण करती है, तो फिर उनकी समर्थता और व्यापकता देखते ही बनती है। इस तथ्य को हमें समूची मानव जाति को एकता के केन्द्र पर केन्द्रित करने के लिए साहसिक तत्परता अपनाते हुए संभव कर दिखाना होगा।

धर्म सम्प्रदाओं की विभाजन रेखा भी ऐसी है जो अपनी मान्यताओं को सच और दूसरों के प्रतिपादनों को झूठा सिद्ध करने में अपने बुद्धि वैभव से शास्त्रार्थों, टकरावों के आ पड़ने पर उतरती रही है। अस्त्र शस्त्रों वाले युद्धों ने कितना विनाश किया है, उसका प्रत्यक्ष होने के नाते लेखा जोखा लिया जा सकता है। पर अपनी धर्म मान्यता दूसरों पर थोपने के लिए कितना दबाव और कितना प्रलोभन, कितना पक्षपात और कितना अन्याय कामों में लगाया गया है, इसकी परोक्ष विवेचना किया जाना संभव हो तो प्रतीत होगा कि इस क्षेत्र के आक्रमण भी कम दुखदायी नहीं रहे है। आगे भी उसका इसी प्रकार परिपोषण और प्रचलन होता रहा तो विवाद, विनाश और विषाद घटेंगे नहीं बढ़ते ही रहेंगे। अनेकता में एकता खोज निकालने वाली दूरदर्शिता को सम्प्रदायवाद के क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए।

आरंभिक दिनों में सर्व-धर्म-समभाव, सहिष्णुता, बिना टकराये अपनी-अपनी मर्जी पर चलने की स्वतंत्रता अपनाए रहना ठीक है काम चलाऊ नीति है। अन्ततः विश्व मानव का एक ही मानव-धर्म होगा। उसके सिद्धान्त चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलम्बित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण, परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर करने के उपरान्त ही विश्व धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलम्बित माना जाएगा। विश्व धर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो पर वह समय दूर नहीं, जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस बेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यहीं है आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1988 पृष्ठ 54

👉 The Light of Truth

I have seen wonderful things in this world and have experienced a log, but I have not yet found any thing, which is greater than “Truth”. So many sparkling lights are there in this world but the great savants regard only the Light of Truth as the true Light. If one follows the religion of truthfulness then he is truly religious; he does not need to adopt any other religion then… The physical body can be cleansed by water but the cleanliness and sanctity of mind is possible only by truthfulness. The heart, which is purified by truth, can rule over all hearts.

A truthful person is revered in the scriptures as the greatest ascetic devotee, supreme charitable person. Siddhis (supernatural successes) will lie under his feet. What else could be bigger glory for a person other than being known as “truthful”…

Speaking truth is not only the utterance of fact as it is, it should also be auspicious and should not hurt or insult anyone. It’s better to keep quite, rather than telling a truth that harms someone and does not help anybody’s welfare. Don’t tell a lie or anything, which is false, which is not acceptable to you from within or which is unwise or unnecessary. Remember that adoption of falsehood
hurts your inner self and invites your soul’s anger and curse.

Be truthful; don’t feel shy or scared in following the path of justice. Make sure that what you think as fair is truly so, then remain firm on it forever…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

👉 प्रश्न

प्रश्न मन की लहरों के साथ उपजते हैं। मन की हर हिलोर-प्रत्येक लहर एक नया प्रश्न खड़ा करती है। जीवन की प्रत्येक घटना जो मन को स्पन्दित करती है, अनायास ही नये प्रश्न अथवा नए प्रश्नों को जन्म दे देती है। इसी तरह परिस्थितियाँ व परिवेश की हलचलें जो विचार व भावों में लहरें पैदा करने में समर्थ हैं, स्वाभाविक ही अन्तर्चेतना में प्रश्नों को जन्म देती हैं। यह क्रम न तो रुकता है न थमता है, बस नित्य-निरन्तर-अविराम चलता रहता है।
  
प्रत्येक प्रश्न मन के मौन को तोड़ता है। मन में अशान्ति, बेचैनी व तनाव को जन्म देता है। ये प्रश्न जितने अधिक, जितने गहरे व जितने व्यापक होते हैं, मन की अशान्ति, बेचैनी व तनाव भी उतना ही ज्यादा, गहरा, घना व व्यापक होता जाता है। इसी अशान्ति, बेचैनी व तनाव में मन अपनी ही कोख में उपजे प्रश्न या प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता है। उसे अपने इस प्रयास में सफलता भी मिलती है। उत्तर मिलते भी हैं, पर नए प्रश्नों के साथ। न जाने क्यों, बिना चाहे और बिना जाने हर उत्तर के साथ कोई न कोई प्रश्न चिपक ही जाता है।
  
साथ ही बढ़ जाती है, मन की बेचैनी व अशान्ति। क्योंकि जो भी घटना फिर वह चाहे प्रश्न की हो या उत्तर की मन में लहरें व हिलोरें पैदा करेंगी, मन को तनाव, बेचैनी व अशान्ति से ही भरेगी। इस समस्या का समाधान तभी है, जब मन की लहरें मिटें, हिलोरें हटें। फिर न कोई प्रश्न उभरेंगे और किसी उत्तर की खोज होगी। इसके लिए मन को मौन होना होगा। केवल तभी चेतना प्रश्नों के पार जा पाएगी। तभी यह समझ में आएगा कि पूछने को कुछ नहीं है, उत्तर पाने को कुछ नहीं है। इसी को समाधि कहते हैं। जहाँ सभी प्रश्न स्वाभाविक ही गिर जाते हैं। जहाँ बेचैनी, अशान्ति, तनाव अपने आप ही मिट जाता है। बस बनी रहती है तो केवल प्रश्न विहीन अमिट शान्ति।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१६

👉 आत्म-चिंतन की साधना

रात को सब कार्यों से निवृत होकर जब सोने का समय हो तो सीधे चित्त लेट जाइये। पैर सीधे फैला दीजिए, हाथों को मोड़कर पेट पर रख लीजिए। सिर सीधा रहे। पास में दीपक या लाइट जल ररही हो तो बुझा दीजिए या मंद कर दीजिए। नेत्रों को अधखुला कर रखिए।

अनुभव कीजिए कि आपका आज का एक दिन एक जीवन था। अब जबकि एक दिन समाप्त हो रहा हैं तो एक जीवन की इतिश्री हो रही हैं। निद्रा एक मृत्यु हैं। अब इस घडी में एक दैनिक जीवन को समाप्त करके मृत्यु की गॉद में जा रहा हूँ।

आज के जीवन की आध्यात्मिक द्रष्टि से समलोचना कीजिए। प्रात:काल से लेकर सोते समय तक के कार्यों पर द्रष्टिपात कीजिए। मुझ आत्मा के लिए वह कार्य उचित था या अनुचित? यह उचित था तो उतनी सावधानी एवं शक्ति के साथ उसे करना चाहिए था उसके अनुसार किया या नहीं। बहुमूल्य समय का कितना भाग उचित रीति से व्यतीत क्या? वह दैनिक जीवन सफल रहा या असफल? आत्मिक पूँजी में लाभ हुआ या घाटा? सद्-वृत्तियाँ प्रधान रहीं या असद्-वृत्तियाँ? इस प्रकार के प्रश्नों के साथ दिनभर के कार्यों का भी निरीक्षण कीजिए।

जितना अनुचित हुआ हो उसके लिए आत्म-देव के सम्मुख पश्चाताप हैं। जो उचित हुआ हो उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आगामी जीवन में, उस दिशा में विशेष रूप से अग्रसर करें। इसके पश्चात् शुभ वर्ण आत्म-ज्योति का ध्यान करते हुए निद्रा देवी की गॉद में सुखपूर्वक चले जाइए।

युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

👉 शरणागति


👉 "आंतरिक सामर्थ्य ही सांथ देगी"

एक दिन मैं किसी पहाड़ी से गुजर रहा था। एक बड़ा विशाल बरगद का पेड़ खड़ा तलहटी की शोभा बढ़ा रहा था। उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई संसार में कैसे कैसे सामर्थ्यवान् लोग हैं, ऐसे लोग दूसरों का कितना हित करते हैं। इस तरह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया।

कुछ दिन बीते उसी रास्ते से पुनः लौटना हुआ। जब उस पहाड़ी पर पहुँचा तो वहाँ वट वृक्ष न देखकर बड़ा विस्मय हुआ। ग्रामवासियों से पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले तेज तूफान आया था, वृक्ष उसी में उखड़ कर लुढ़क गया। मैंने पूछा - "भाई वृक्ष तो बहुत मजबूत था फिर वह उखड़ कैसे गया।” उन्होंने बताया- "उसकी विशालता दिखावा मात्र थी। भीतर से तो वह खोखला था। खोखले लोग हल्के आघात भी सहन नहीं कर सकते।”

"तब से मैं बराबर सोचा करता हूँ कि जो बाहर से बलवान्, किन्तु भीतर से दुर्बल हैं, ऐसे लोग संसार में औरों का हित तो क्या कर सकते हैं, वे स्वयं अपना ही अस्तित्व सुरक्षित नहीं रख सकते। खोखले पेड़ की तरह एक ही झोंके में उखड़ कर गिर जाता है और फिर कभी ऊपर नहीं उठ पाता। जिसके पास भावनाओं का बल है, साहस की पूँजी है, जिसने मानसिक शक्तियों को, संसार की किसी भी परिस्थिति से मोर्चा लेने योग्य बना लिया है, उसे विपरीत परिस्थितियों से लड़ने में किसी प्रकार परेशानी अनुभव न होगी।

भीतर की शक्ति सूर्य की तेजस्विता के समान है जो घने बादलों को चीर कर भी अपनी शक्ति और अस्तित्व का परिचय देती है। हम में जब तक इस तरह की आन्तरिक शक्ति नहीं आयेगी, तब तक हम उस खोखले पेड़ की तरह ही उखड़ते रहेंगे, जो उस पहाड़ी पर उखड़ कर गिर पड़ा था।"

अखण्ड ज्योति मई, 1969

👉 भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा

इन दिनों दुनिया का विस्तार सिमट कर राजनीति के इर्द गिर्द जमा हो गया है। जिसके पास जितनी प्रचण्ड मारक शक्ति है वह अपने को उतना ही बलिष्ठ समझता है। जो जितना सम्पन्न और धूर्त है, वह अपनी शेखी उसी अनुपात से धारता है और अपने को सर्वसमर्थ घोषित करता है। इसी बलबूते वह छोटे देशों को डराता और फुसलाता भी है। यही क्रम इन दिनों चलता रहा है, किन्तु अगले दिनों यह सिलसिला न चल सकेगा। परिस्थितियां इस प्रकार करवटें लेंगी कि जो पिछले दिनों होता रहा है अगले दिनों उसके ठीक विपरीत घटित होगा। भविष्य में नैतिक शक्ति ही सबसे भारी पड़ेगी। आत्मबल और दैब बल जनसमुदाय को आकर्षित, प्रभावित एवं परिवर्तित करेगा। इस नयी शक्ति का उदय होते लोग पहली बार प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। यों प्राचीन काल में भी इसी क्षमता का मूर्धन्य प्रभाव रहा है।

बुद्ध, गान्धी ने कुछ ही समय पूर्व न केवल अपने देश को बदला था, वरन् विशाल भू भाग को नव चेतना से प्रभावित किया था। विवेकानन्द विचार परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि बना कर गये थे। कौडिन्य ओर कुमारजीव एशिया के पूर्वांचल को झकझोर चुके थे। विश्वामित्र, भागीरथ, दधिचि, परशुराम, अगस्त्य, व्यास, वशिष्ठ जैसी प्रतिभाओं का तो कहना ही क्या, जिनने धरातल को चौंकाने वाले कृत्य प्रस्तुत किये थे। चाणक्य की राजनीति ने भारत को विश्व का मुकुटमणि बनाया था। देश को संभालने में तो अनेक प्रतापी सत्ताधीश और प्रतिभा के धनी मनीषी बहुत कुछ कर गुजर हैं।

समय आ गया है कि भारत अपनी भीतरी समस्याओं को हल करके रहेगा। अभी कितनी ही ऐसी समस्याऐं दीखती हैं जिनसे आशंका होती है कि कहीं अगले दिन विपत्ति से भरे हुए तो न होंगे। चिनगारियाँ दावानल बन कर तो न फूट पड़ेंगी। बाढ़ का पानी सिर से ऊपर होकर तो न निकल जायगा। ऐसी आशंकाएं करने वाले सभी लोगों को हम आश्वस्त करना चाहते हैं कि विनाश को विकास पर हावी न होने दिया जायगा। मार्ग में रोड़े भल ही अड़चनें उत्पन्न करती रहें, पर काफिला रुकेगा नहीं। वह उस लक्ष्य तक पहुँचेगा। जिससे विश्व को शान्ति से रहने और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। वह दिन दूर नहीं जब भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा और वह एक एक करके विश्व उलझनों के निराकरण में अपनी दैवी विलक्षणता का चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर रहा होगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1987 पृष्ठ 58

👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 15 April 2020


👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 15 April 2020


👉 आत्मचिंतन के क्षण 15 April 2020

अपने माता-पिता गुरुजनों आदि के साथ उन पर एहसान चढ़ाने वाली भाषा न बोलें।

जीवन में अनेक बार व्यक्तियों का आपस में टकराव हो जाता है। माता-पिता के साथ, गुरुजनों के साथ, मित्रों के साथ, पड़ोसियों के साथ, व्यापारियों और ग्राहकों के साथ इत्यादि , अनेक जगह पर टकराव हो जाता है। कभी-कभी यह टकराव, गलतियों के कारण होता है, और कभी-कभी एक दूसरे के व्यवहार को ठीक तरह से न समझने के कारण, भ्रांतियों से भी ऐसा टकराव हो जाता है।

यह टकराव हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, स्वाभाविक है। क्योंकि सभी लोग अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान् हैं। अल्पज्ञ और अल्पशक्तिमान होने के कारण अनेक बार भूल चूक हो जाती है। गलतियां हो जाती हैं। किसी भी व्यक्ति से हो सकती हैं। केवल परमात्मा ही एक ऐसा तत्व है जो कभी गलती नहीं करता. उसे छोड़ कर सभी से कुछ न कुछ छोटी बड़ी गलतियां हो जाती हैं।

जब कभी ऐसी गलतियां हो जाएं, तो आपस में लड़ाई झगड़ा आरोप प्रत्यारोप इत्यादि का व्यवहार नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से अपने माता-पिता और गुरुजनों के साथ तो ऐसा झगड़ा कभी भी नहीं करना चाहिए।

चाहे आप प्रधानमंत्री पद पर भी क्यों न पहुंच जाएं, तब भी आप अपने माता-पिता के सामने तो छोटे ही रहेंगे। क्योंकि आपको उनके ही आशीर्वाद से सेवा से प्रशिक्षण से अनेक प्रकार के सहयोग से ऊंची ऊंची योग्यताएं प्राप्त हुई हैं। इसलिए उनके साथ सदा नम्रता का व्यवहार रखना चाहिए। जैसा कि आजकल हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री जी अपनी माता जी के चरण स्पर्श करते और उनका आशीर्वाद लेकर आगे बढ़ रहे हैं। यह बात सबको मालूम है.

जब हम सब अल्पज्ञ हैं, गलतियाँ होनी संभव हैं, तो बड़ी नम्रता से अपनी गलतियाँ स्वीकार कर लेनी चाहिएँ,  और समस्याओं को निपटा देना चाहिए। बड़े बुजुर्गों के साथ असभ्यतापूर्ण या एहसान चढ़ाने वाली भाषा न बोलें, कि मैंने आपके लिए यह काम किया, वह काम किया, और आपने मेरे साथ यह किया, यह ठीक नहीं किया इत्यादि। बड़ों के साथ ऐसा व्यवहार करना असभ्यता है। इस प्रकार की असभ्यता नहीं करनी चाहिए।

इसलिए कभी माता पिता या गुरुजनों के साथ टकराव हो भी जाए, तो उनके उपकारों को याद रखें, और उनके साथ नम्रता पूर्वक ही व्यवहार करें। गलतियाँ हो जाने पर आपस में मिल बैठकर शांति से उन्हें सुलझा लेना चाहिए। यदि आपस में न सुलझे, तो किसी अन्य बुद्धिमान परिवार के अनुभवी बुजुर्ग अथवा किसी विद्वान की सहायता से उस समस्या को सुलझा लेना चाहिए। इससे आपका परिवार संगठित व्यवस्थित सुखी और संपन्न बना रहेगा । अन्यथा आपका परिवार कुछ ही समय में आपसी भ्रांतियों के कारण नष्ट हो जाएगा

👉 पीड़ा और प्रार्थना

पीड़ा और प्रार्थना में गहरा सम्बन्ध है। पीड़ा का अनुभव सकारात्मक हो, दृष्टिकोंण रचनात्मक हो तो पीड़ा स्वतः ही प्रार्थना बन जाती है। ऐसा न हो तो हर पीड़ा- निषेध व नकारात्मक दृष्टिकोंण के जाल में उलझ-फँस कर कभी वैर बनती है तो कभी द्वेष बन जाती है। इतना ही नहीं, ज्यादातर दशाओं में यह वैर-द्वेष के साथ मन को सन्ताप देने वाला विषम-विषाद बन जाती है। जीवन को अवसन्न करने वाला अवसाद बन जाती है।
  
पीड़ा का अनुभव सकारात्मक होने का मतलब है अन्तर्मन में प्रभु प्रेम उपस्थित होना। भगवान् के मंगलमय विधान में गहरी आस्था होना। ऐसा हो तो जीवन की पीड़ाएँ-दर्द का उन्माद जगाने की बजाय प्रार्थना को जन्म देती हैं। ऐसी स्थिति में पीड़ा जितनी गहरी होती है, प्रार्थना उतनी ही घनीभूत होती जाती है। पीड़ा के क्षणों में मन स्वाभाविक रूप से भगवान् के समीप सरकने लगता है। सच तो यह है कि यदि पीड़ा दर्द है, तो प्रार्थना उसकी दवा है।
  
पीड़ा और प्रार्थना का यही मिलन तप है। तपश्चर्या का अर्थ धूप में खड़ा हो जाना नहीं है, न भूखे रहकर उपवास करना है। तपश्चर्या का सही अर्थ जीवन के पीड़ादायक क्षणों में भगवान् के भाव भरे स्मरण, सर्वस्व समर्पण व उनमें ही लीन होना है। यथार्थ तप है- जीवन के खालीपन की पीड़ा को उसकी समग्रता में अनुभव करना, जीवन की अर्थहीनता को उसकी पूरी त्वरा में अनुभव करना। जीवन की यह बेकार भागदौड़ जिसको अभी बड़ी उपयोगी समझते हैं, यदि अचानक यह निरर्थक लगने लगे तो बड़ी घबराहट होगी। गहरी पीड़ा पनपेगी। इस पीड़ा को झेलने का नाम, इसे भगवान् के प्रेम व स्मरण तथा समर्पण में भीग कर सहने का नाम है तपश्चर्या। पीड़ा व प्रार्थना का अद्भुत मिलन, जिसके भी जीवन में आता है, उसका जीवन स्वाभाविक ही रूपान्तरित हो जाता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ २१५

👉 Darkness to Light

Truth! Truth!! Truth!!! What a force and impact this word carries that even uttering this word seems to sooth the tongue, thought of it itself gives some light to the mind and feeling of it rejuvenates the heart. The transition from falsehood to truth is an ascent from filthy mire to pious skies, a transmutation from beastly instincts, devilish darkness to divine virtues and eternal light.

Truth is absolute, eternal. God is Truth, the Soul is Truth, God’s creation of Nature is Truth; Truth is Omnipresent. It is the ultimate goal of life; truth is the ceaseless perennial quest of the individual self, for which it takes birth, life after life, Age after Age… This life is bestowed upon us as yet another opportunity to realize the ultimate truth and savor the nectar of infinite bliss.

It is pitiable that we remain ignorant of this fact that – what we think of the world around (and die hunting for the mirage of joy in it) is not true; it is nothing but the image of our own perception. Once you understand this fact, you will turn towards truth. You will become a follower of Truth; it will be your ideal; an integral part of your character. “Truth” will then show you the divine radiance of your inner self.

If every word, every deed of yours is truthful, the world will truthfully honor you and you will inspire many others towards its noble path. The Vedic teaching reminds all of us to follows the path of truth – “Asato Ma Sadgamaya”, as this is the only source of auspicious welfare of all…

📖 Akhand Jyoti, Jan. 1942

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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