शनिवार, 25 जनवरी 2020

👉 कर्तव्यपालन का अपूर्व उदाहरण


👉 सत्संग

एक शिष्य ने अपने गुरुदेव से पूछा- "गुरुदेव, आपने कहा था कि धर्म से जीवन का रूपान्तरण होता है। लेकिन इतने दीर्घ समय तक आपके चरणों में रहने के बावजूद भी मैं अपने रूपान्तरण को महसूस नहीं कर पा रहा हूँ, तो क्या धर्म से जीवन का रूपान्तरण नहीं होता है?"

गुरुदेव मुस्कुराये और उन्होंने बतलाया- "एक काम करो, थोड़ी सी मदिरा लेकर आओ।" शिष्य चौंक गया पर फिर भी शिष्य उठ कर गया और लोटे में मदिरा लेकर आया।

गुरुदेव ने शिष्य से कहा- "अब इससे कुल्ला करो।" मदिरा को लोटे में भरकर शिष्य कुल्ला करने लगा। कुल्ला करते-करते लोटा खाली हो गया।

गुरुदेव ने पुछा- "बताओ तुम्हें नशा चढ़ा या नहीं?"

शिष्य ने कहा- "गुरुदेव, नशा कैसे चढ़ेगा? मैंने तो सिर्फ कुल्ला ही किया है। मैंने उसको कंठ के नीचे उतारा ही नहीं, तो नशा चढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

इस पर संत ने कहा- "इतने वर्षो से तुम धर्म का कुल्ला करते आ रहे हो। यदि तुम इसको गले से नीचे उतारते तो तुम पर धर्म का असर पड़ता।

जो लोग केवल सतही स्तर पर धर्म का पालन करते हैं। जिनके गले से नीचे धर्म नहीं उतरता, उनकी धार्मिक क्रियायें और जीवन-व्यवहार में बहुत अंतर दिखाई पड़ता है। वे मंदिर में कुछ होते हैं, व्यापार में कुछ और हो जाते है। वे प्रभु के चरणों में कुछ और होते हैं एवं अपने जीवन-व्यवहार में कुछ और, धर्म ऐसा नहीं हैं, जहाँ हम बहुरूपियों की तरह जब चाहे जैसा चाहे वैसा स्वांग रच ले। धर्म स्वांग नहीं है, धर्म अभिनय नहीं है, अपितु धर्म तो जीने की कला है, एक श्रेष्ठ पद्धति है।।"

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 1)

Q.1. What is the significance of Yagya in spirituality?              
Ans. Gayatri has been regarded as the mother and, Yagya as father of Indian spiritual tradition. Yagya finds place in all sacred and auspicious ceremonies in Indian culture. In Gayatri Upasana too, it is essential. The number of oblations in Havan may preferably be one-tenth of the number of  Japs in an Anusthan or Purascharan. However, if it is not found convenient, one-tenth of this number would also suffice.
  
The spiritual birth of a human being who is otherwise born as any other animal, takes place on his initiation by a Guru, whereafter he becomes a Dwij with Yagya and Gayatri as his parents. It, therefore, becomes obligatory for him to serve his spiritual parents.   

Scriptures prescribe daily ritual of Balivaishwa which means initially offering a small morsel of everyday food as an oblation to fire. (Saying a prayer at the dining table too is a variant of this ritual)  Poornahuti and Brahmabhoj are essential at the end of the Yagya. If one is not able to participate in a Yagya on account of some contingency, a coconut may be offered as oblation as Poornahuti somewhere else, where a large Yagya is being performed.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 63

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग ३)

शक्तिपात कैसे कर दिया? शक्तिपात क्या होता है? शक्तिपात को मामूली तौर पर समझते हैं कि गुरु की आँखों में से, शरीर में से बिजली का करेन्ट आता है और चेले में बिजली छू जाती है और चेला काँप जाता है। वस्तुतः यह कोई शक्तिपात नहीं है और शारीरिक शक्तिपात से कोई बनता भी नहीं। शक्तिपात कहते हैं चेतना का शक्तिपात, चेतना में शक्ति उत्पन्न करने वाला। चेतना की शक्ति भावनाओं के रूप में, संवेदनाओं के रूप में दिखाई पड़ती है, शरीर में झटके नहीं मारती। इसका सम्बन्ध चेतना से है, हिम्मत से है। चेतना की उस शक्ति का ही नाम हिम्मत है, जो सिद्धान्तों को, आदर्शों को पकड़ने के लिए जीवन में काम आती है। इसके लिए ऐसी ताकत चाहिए जैसी कि मछली में होती है। मछली पानी की धारा को चीरती हुई, लहरों को फाड़ती हुई उलटी दिशा में छलछलाती हुई बढ़ती जाती है।

यही चेतना की शक्ति है, यही ताकत है। आदर्शों को जीवन में उतारने में इतनी कमजोरियाँ आड़े आती हैं, जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता। लोभ की कमजोरी, मोह की कमजोरी, वातावरण की कमजोरी, पड़ोसी की कमजोरी, मित्रों की कमजोरी—इतनी लाखों कमजोरियों को मछली के तरीके से चीरता हुआ जो आदमी आगे बढ़ सकता है, उसे मैं अध्यात्म दृष्टि से शक्तिवान कह सकता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे इसी तरीके से शक्तिवान बनाया। बीस वर्ष की उम्र में तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद मैं घर से निकल गया और काँग्रेस में भर्ती हो गया। थोड़े दिनों तक उसी का काम करता रहा फिर जेल चला गया। इसे कहते हैं हिम्मत और जुर्रत, जो सिद्धान्तों के लिए, आदर्शों के लिए आदमी के अन्दर एक जुनून पैदा करती है, समर्थ पैदा करती है कि हम आदर्शवादी होकर जियेंगे। इसी का नाम शक्तिपात है।

शक्तिपात कैसे होता है, इसका एक उदाहरण मीरा का है। वह घर में बैठी रोती रहती थी। घर वाले कहा करते थे कि तुम्हें हमारे खानदान की बात माननी पड़ेगी और तुम घर से बाहर नहीं जा सकती। मीरा ने गोस्वामी तुलसीदास को एक चिट्ठी लिखी कि इन परिस्थितियों में हम क्या कर सकते हैं? गोस्वामी जी ने कहा—परिस्थितियाँ तो ऐसी ही रहती हैं। दुनिया में परिस्थितियाँ किसी की नहीं बदलतीं। आदमी की मनःस्थिति बदल दें तो परिस्थितियाँ बदल जाएँगी। चिट्ठी तो क्या उन्होंने एक कविता लिखी मीरा को—
‘जाके प्रिय न राम वैदेही।
तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।।’

यह कविता नहीं शक्तिपात था। शक्तिपात के सिद्धान्तों को पक्का करने के लिए यह मुझे बहुत पसन्द आती है और जब तब मेरा मन होता है, उसे याद करता रहता हूँ और हिम्मत से, ताकत से भर जाता हूँ। मुझमें असीम शक्ति भरी हुई है। सिद्धान्तों को पालने के लिए, हमने सामने वाले विरोधियों, शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरों और अपने नजदीक वाले मित्रों—सभी का मुकाबला किया है। सोने की जंजीरों से टक्कर मारी है। जीवनपर्यन्त अपने लिए, आपके लिए, समाज के लिए, सारे विश्व के लिए, महिलाओं के लिए, अधिकारों के लिए मैं अकेला ही टक्कर मारता चला गया। अनीति से संघर्ष करने के लिए युग-निर्माण का, विचार-क्रान्ति का सूत्रपात किया। इस मामले में हम राजपूत हैं। हमारे भीतर परशुराम के तरीके से रोम-रोम में शौर्य और साहस भर दिया गया है। हम महामानव हैं। कौन-कौन हैं? बता नहीं सकते हम कौन हैं? ये सारी की सारी चीजें वहाँ से हुईं, जो मुझे गुरु ने शक्तिपात के रूप में दी, हिम्मत के रूप में दीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमात्मा की प्रतीति

परमात्मा की प्रतीति प्रेम में होती है। यही उसकी सत्ता का सत्य है। इसी में उसकी शक्ति समाहित है। परमात्मा की अभिव्यक्ति का द्वार प्रेम के सिवा और कुछ भी नहीं है। जहाँ जितने अंशों में प्रेम है, समझो वहाँ उतने ही अंशों में परमात्मा है। आखिरकार यही तो परमात्मा की उपस्थिति का प्रकाश है।
  
याद रहे, जब कभी हमारा हृदय प्रेम से रोता रहता है, तब हम परमात्मा से विमुख होते हैं। यही कारण है कि जब भी हमारा मन क्रोध से भरता है, घृणा से भरता है, तभी हम स्वयं को अशक्त अनुभव करते हैं। क्योंकि उन क्षणों में परमात्मा से हमारे सम्बन्ध क्षीण हो जाते हैं। इसीलिए तो क्रोध में, घृणा में, द्वेष में दुःख और संताप पैदा होते हैं। संताप की मनोदशा केवल सर्व की सत्ता से पृथक् होने से होती है।
  
जबकि प्रेम हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को आनन्द से भर देता है। एक ऐसी भावदशा जन्मती है, जहाँ शान्ति का संगीत और करुणा की सुगन्धि हिलोरें लेती है। ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि प्रेम पूर्ण हृदय स्वाभाविक ही प्रभु के निकट होता है। क्योंकि प्रेम पूर्ण हृदय अपने आप ही परमात्मा के हृदय में स्थान पा लेता है और हम नहीं रह जाते, बल्कि प्रभु ही हमसे प्रकट होने लगते हैं।
  
इस सम्बन्ध में बड़ी मीठी कथा है। बंगाल के संत विजयकृष्ण गोस्वामी अपने शिष्य कुलदानन्द के साथ वृन्दावन में विचरण कर रहे थे। तभी राह में एक व्यक्ति ने आकर कुलदानन्द को रोक लिया और उनका अपमान करने लगा। पहले तो कुलदानन्द ने बड़ी शान्ति से उसके दुर्वचन सुने। उनकी आँखों में प्रेम और प्रार्थना बनी रही। लेकिन यह स्थिति देर तक न रह सकी। अंततः कुलदानन्द का धैर्य चुक गया और उनकी आँखों में घृणा और प्रतिशोध का ज्वार उमड़ने लगा। उनकी वाणी से भी दहकते अंगारे बरसने लगे।
  
संत विजयकृष्ण गोस्वामी अब तक यह सब शान्ति से बैठे देख रहे थे। अचानक वह उठे और एक ओर चल दिये। कुलदानन्द को उनके इस तरह चले जाने पर अचरज हुआ। बाद में उन्होंने अपने गुरु से इसका उलाहना दिया। अपने शिष्य के इस उलाहने पर संत विजयकृष्ण गोस्वामी ने गम्भीर होकर कहा-उस व्यक्ति के बुरे व्यवहार के प्रत्युत्तर में जब तक तुम शान्ति एवं प्रेम से भरे थे, तब तक प्रभु के पार्षद तुम्हारी रक्षा कर रहे थे। परन्तु ज्यों ही तुमने प्रेम व शान्ति का परित्याग कर क्रोध व घृणा का सहारा लिया, वे प्रभु पार्षद तुम्हें छोड़कर चले गये। और जब परमात्मा ने ही तुम्हारा साथ छोड़ दिया, तब भला मैं तुम्हारे साथ कैसे रह सकता था।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६८

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

👉 "जीवन चलने का नाम"

सरला नाम की एक महिला थी। रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे। दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की ‘डेडलाइन’ से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था। बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी-कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था। पत्नी सरला भी एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी। वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी। ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है। खाना बनाती है। शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को वे दोनों नाकारा होने के लिए डाँटते थे पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है। घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।

थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन खूंखार होता जा रहा है। बच्चे विद्रोही हो चले हैं। एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में देर कर दी। पूछने पर बताया कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया, ड्रिल मशीन खराब हो गई, जेब से पर्स गिर गया...। इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।

काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई और वह उसे गाड़ी में छोड़ने चली गई। प्लंबर ने उसे बहुत आदर से चाय पीने का आग्रह किया। प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया, चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया। घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया, मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा।

सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया - यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है। मैं सारी समस्याओं का बोझा रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ। चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता। सुबह जब थैला उतारता हूं तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है- मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं। प्रार्थना करता हूँ कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है, तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ। उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था...!

यह घर-घर की हकीकत है। गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है। सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं। प्लंबर का वह ‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है। क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ लें ताकि घर की दहलीज पार करने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ।

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग २)

शंकराचार्य ने फैसला कर लिया कि मम्मी का कहना नहीं मानना है। एक दिन वह पानी में घुस गया और चिल्लाने लगा—मम्मी क्या करूँ, अब मेरे मरने का समय आ गया। मुझे शंकर भगवान दिखाई पड़ते हैं और कहते हैं कि अगर इस बच्चे को मेरे सुपुर्द कर दोगी तो हम मगर से इसे बचा सकते हैं। मम्मी चिल्लाई—अच्छा बेटे जिन्दा तो रहेगा, मुझे मंजूर है और मैंने तुझे भगवान को दे दिया। बस शंकराचार्य ने उछाल मारी और किनारे आ गए। वे बोले देखो मगर ने छोड़ दिया, अब मैं शंकर भगवान् का हूँ।

बहुत-सी शृंखला मैंने देखी हैं। उसी शृंखला में एक और कड़ी शामिल हो जाती है वसन्त पंचमी की। यही दिन थे, पचपन वर्ष पहले एक आया? कौन आया? मेरा सौभाग्य आया। वसन्त पंचमी के दिन हर एक का सौभाग्य आता है, एक उमंग आती है, एक तरंग आती है। मेरे ऊपर भी एक तरंग आई सौभाग्य के दिन मेरे गुरु के रूप में, मास्टर के रूप में। मेरा गुरु प्रकाश के रूप में आया। जब कोई महापुरुष आता है तो कुछ लेकर के आता है। कोई महाशक्ति आती है तो कुछ लेकर के आती है, बिना लिए नहीं आती। मेरा भी गुरु, मेरा भी बॉस, मेरा भी मास्टर और भी सौभाग्य की धारा और लहर मेरे पास आई थी, काश! आपके पास भी आ जाती तो आप धन्य हो जाते।

जब आती है हूक, जब आती है उमंग तो फिर क्या हो जाता है? रोकना मुश्किल हो जाता है और जो आग उठती है, ऐसी तेजी से उठती है कि इन्तजार नहीं करना पड़ता। जब वक्त आता है तो आँधी-तूफान के तरीके से आता है। मेरी जिन्दगी में भी आँधी-तूफान के तरीके से वक्त आया। मेरे गुरु आए और आकर के उन्होंने आत्म-साक्षात्कार कराया, पूर्वजन्मों का हाल दिखाया और जाते वक्त कहा कि हम दो चीजें देकर जाते हैं। दोनों चीजें जिनको हम शक्तिपात और कुण्डलिनी जागरण कहते हैं, दोनों की दोनों सेकण्डों में पूरी हो गई और मैं कुछ से कुछ हो गया। मेरी आँखों में कुछ और चीज दिखाई पड़ने लगी। नशा पीकर आदमी को कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। ऐसे ही मुझे दुनिया किसी और तरीके से दिखाई पड़ने लगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 8)

Q.17. What are the restrictions on Upasana during the inauspicious days (birth or death in family etc.)?

Ans. On such occasions, although regular chanting of Mantra with rosary and standard rituals are forbidden, mental Jap and meditation may be done. The objective is two-fold. On the one hand, it protects the devotee from mental and physical exertion, On the other, a quarantine (Sootak) has to follow this rule. Members of such families should avoid touching the idols of the deity, rosary, implements of Sadhana etc. and do only mental recitations of the Mantra. 

Q.18.  Should women discontinue Upasana during  menstrual periods?           
Ans. While undergoing menstrual cycles, women are both mentally and physically under exertion. Besides, they are unable to maintain the required degree of physical cleanliness. As such, they are recommended to do mental Jap only. This rule is also applicable to other states of cleanliness (when there are discharges through sweat, nose, eyes, boils etc.). Proper cleanliness is a pre-requisite for any spiritual exercise.

Q.19. What is the posture recommended for turning the rosary (Mala) during Jap?

Ans. 1. For Jap, select a secluded, noiseless place beneath a tree, in a temple, or at the bank of a river.

2. Be seated in an upright position with crossed-legs (Sukhasan) or on a raised platform if there is some discomfort on sitting on ground. For sitting use a cotton or woollen spread.  Animal hides are prohibited. Let the spine be straight and relaxed. Now keep the left hand on the palm turned upwards on the right lap.

3. Hold the rosary in the right hand so that it hangs like a garland across the bridge formed by joining the thumb and ring finger.

4. Keeping the elbow of the right hand on the palm of the left hand and the arm in a vertical position, turn the beads of the rosary inwards (towards yourself) with the help of middle finger-beginning from the main knot (Brahma Granthi). (Use of little finger and index finger is forbidden).

5. On completion of each cycle of rosary, turn it backwards so that the main knot is not crossed, i.e. the Jap in the rosary is “unidirectional”. It can be done with the help of same fingers which are used for turning the rosary. Keep the body still. There is no harm in changing position if discomfort is felt after some time.

6. Pronounce the Mantra in whispers, so that it is audible to you only.

7. If there is difficulty in using a rosary, fixed time for Jap may be maintained with the help of a clock.
As far as practicable, uniformity of fixed time, duration and place should be maintained. 

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 62

👉 राष्ट्रीय कर्त्तव्य

स्वाधीनता प्राप्ति की घड़ी में भारत माता की आँखें छलक पड़ी थीं। इस सच की अनुभूति उस समय सभी ने की थी, परन्तु इस तथ्य को कम ही लोग अनुभव कर पाये थे कि भारत माँ की एक आँख में खुशी के आँसू छलक रहे थे, जबकि उसकी दूसरी आँख दुःख के आँसुओं से डबडबायी हुई थी। खुशी स्वाधीनता की थी और दुःख विभाजन का था। अपनी ही संतानों ने माता के अस्तित्व एवं अस्मिता के हिस्से को काटकर अलग कर दिया था। विभाजन की यह पीड़ा बड़ी दारुण थी और यातना बड़ी असहनीय। फिर भी उम्मीद थी कि स्वाधीन देशवासी सम्भवतः समझदार हो जायेंगे और अपनी माँ को अब यह दर्द न देंगे।
  
परन्तु दुर्देव और दुर्भाग्य-स्वाधीनता प्राप्ति के वर्ष पर वर्ष बीतते गये और विभाजन के नये-नये रूप सामने आते गये। भूमि तो नहीं बँटी पर भावनाएँ बँटती गयीं। भूगोल तो वही रहा, परन्तु उसमें खिंची संवेदनाओं की लकीरें मिटती गयीं। संवेदनाओं की सरिता को सोखने वाले, इसे दूषित-कलुषित करने वाले विभाजनों के कितने ही रूप सामने आते गये। विभाजन धर्म के नाम पर, विभाजन जाति के नाम पर, विभाजन भाषा के, विभाजन साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीयता के। अब तो इनकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गयी है कि इन्हें ठीक से गिन पाना भी मुश्किल है।
  
स्वाधीनता की हर वर्षगाँठ पर भारत माता की आँखें छलकती तो जरूर हैं, परन्तु यह अनुभूति गिने-चुने लोग ही कर पाते हैं कि अब उसकी दोनों आँखों में खुशी के आँसू नहीं दुःख के आँसू डबडबा रहे हैं। इस वर्ष की स्थिति तो और बदतर है। आज स्वाधीनता दिवस पर भारत माता की आँखें फिर से आँसुओं से भरी हुई हैं। लेकिन ये आँसू खून के आँसू हैं। इनमें जातीयता के संघर्ष का खून है। अब उससे सही नहीं जा रही इन नित-नये विभाजनों की पीड़ा।
  
पता नहीं उसकी अपनी संतानों में से कौन और कितने माँ की इस पीड़ा की अनुभूति कर पायेंगे? क्योंकि यह अनुभूति तो राष्ट्रीयता की अनुभूति से जुड़ी हुई है। जबकि आज के इस दौर में यह पवित्र अनुभूति न तो सरकारें कर पा रही हैं और न ही राजनीतिक दल। हालाँकि यह अनुभूति प्रत्येक भारतवासी का राष्ट्रीय कर्त्तर्व्य है। उसे अपनी इसी कर्त्तव्य निष्ठा में अपने धर्म, जाति एवं क्षेत्रीयता को विलीन कर देना चाहिए।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६९

बुधवार, 22 जनवरी 2020

👉 आदर्श चरित्र बल


👉 उत्तराधिकार

एक राजा के तीन योग्य पुत्र थे, सभी परीक्षा में एक समान नम्बर लाते थे, एक से बढ़कर एक साधक थे, एक से बढ़कर एक योद्धा थे, एक से बढ़कर एक राजनीतिज्ञ थे। लेकिन राज्य किसके हाथ मे सौंपा जाय, यह तो अनुभव और जीवन जीने की कला पर निर्णय होना था। राजा ने सबसे सलाह ली, जिनमें एक बुद्धिमान किसान की युक्ति राजा को पसन्द आयी।

तीनो राजकुमार को बुलाकर एक एक बोरा गेहूँ का दाना दिया। बोला मैं तीर्थ यात्रा में जा रहा हूँ कुछ वर्षों में लौटूंगा। मुझे मेरे गेहूँ तुमसे वापस चाहिए होगा।

पहले राजकुमार ने पिता की अमानत तिज़ोरी में बन्द कर दी, पहरेदार सैनिक लगवा दिए।

दूसरे ने सैनिक बुलाये और बोरी को  खाली जमीन में फिकवा दिया, और भगवान से प्रार्थना कि हे भगवान जैसे आप प्रत्येक जीव का ख्याल रखते हो, इन बीजों का भी रखना। मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ इसलिए तुम इन बीजों को पौधे बना देना और खाद-पानी दे देना। न जमीन के खर-पतवार हटाये और न ही स्वयं खाद पानी दिया, सब कुछ भगवान भरोसे छोड़के साधना में लग गया।

तीसरा राजकुमार किसानों को बुलवाया, उनसे खेती के गुण धर्म समझा। उचित भूमि का चयन किया, स्वयं किसान-मज़दूरों के साथ लगकर जमीन तैयार की, गेहूं बोया और नियमित खाद पानी दिया। रोज यज्ञ गायत्री मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र से खेत पर करता, बची हुई राख खेत मे छिड़कर भगवान से प्रार्थना करता भगवान मेरे खेत की रक्षा करना और पिता के गेंहू मैं लौटा सकूँ इस योग्य बनाना। फ़सल अच्छी हुई और गेहूं अन्य किसानों से उत्तम क़्वालिटी का निकला। अन्य किसानों ने बीज मांगा तो उसने सहर्ष भेंट कर दिए, साथ में बीजो में प्राण भरे इस हेतु साधना और यज्ञ सिखा दिया। सभी किसानों की खेती अच्छी हुई तो आसपास के समस्त गांवों में भी खेती के गुण, साधना-स्वाध्याय के गुण, यज्ञ इत्यादि सिखा दिया। खेतों में अनाज के साथ साथ लोगों के हृदय में अध्यात्म की खेती लहलहा उठी। सर्वत्र राजकुमार की जय हो उठी।
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पांच वर्ष बाद राजा लौटा, बड़े पुत्र को बुलाया और गेहूं मांगा तो तिज़ोरी खोली गयी। घुन ने गेंहू को राख कर दिया था। राजा बोला जिसने जीवित सम्भवनाओ के बीज को मृत कर दिया। वो इस राज्य को भी मृत कर देगा। तुम अयोग्य उत्तराधिकारी साबित हुए।

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दूसरे को बुलाया, तो भगवान को कोसने लगा। बोला गुरुजी झूठे है, भगवान पक्षपाती है। गुरुजी ने कहा था भगवान भक्त की रक्षा करता है, लेकिन भगवान ने मेरे गेंहू के बीजो की रक्षा नहीं की और न हीं उन्हें पौधा बनाया। जो प्रकृति का निर्माता है उसने मेरे बीजों के साथ पक्षपात किया। राजा पिता ने कहा, तूने तो जीवन की शिक्षा पाई ही नहीं केवल पुस्तको का कोरा ज्ञान अर्जित किया। कर्मप्रधान सृष्टि को समझा ही नहीं, ईश्वर उसकी मदद करता है जो अपनी मदद स्वयं करता हैं। उपासना के साथ साधना और आराधना भी करनी होती है ये समझा ही नहीं। उपासना रूपी सम्भावना को साधना -आत्मशोधन/मिट्टी की परख/निराई-गुणाई की ही नहीं। तू अयोग्य है। तू मेरा राज्य भी भगवान भरोसे चलाएगा। तूने तो धर्म का मर्म ही नहीं समझा, तू अयोग्य साबित हुआ।

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तीसरे पुत्र को बुलाया, लेकिन यह क्या कई सारे ग्रामवासी बैलगाड़ियों में गेहूँ लिए आये चले जा रहे हैं। राजकुमार और राजा जी की जय बोलते हुए। राजा ने कहा, बेटा मुझे केवल मेरा गेहूँ वापस चाहिए गांव वालों से नहीं।

राजुकमार ने मुस्कुरा के पिता को प्रणाम करके कहा- पिताजी आपके द्वारा दिये सम्भवनाओ के बीज अत्यंत उच्च कोटि के थे, हम सबने मेहनत करके उसको विस्तारित कर दिया। ये इतनी सारी बोरियां उसी सम्भवनाओ/गेंहू के बीज से उपजी है। यह सब आपकी ही है, इन्होंने ने लाखों लोगों की क्षुधा भी शांत की। धन्यवाद पिताश्री आपने मुझे सेवा का सौभाग्य दिया।

पिता पुत्र पर गौरान्वित हुआ, हृदय से लगा लिया और अपने राज्य का उत्तराधिकार सहर्ष सौंप दिया।

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 7)

Q. 14. What is the purpose of self-control in Abhiyan Sadhana?  

Ans. Tap is meant for conservation of life-force and utilising it for elevation of soul to higher levels of consciousness. The three outlets through which about 80% of this vital force continues to leak out of human body are: indulgence in delicious food, intemperate utterances and sexual distractions and actions. The moment these are controlled, the doors to progress open.

Self-control, however, does not simply mean control on sensory organs and the thought process. The field of self-control encompasses control on misuse of all types of resources. For instance, one is advised to utilize each and every moment of life judiciously right from leaving the bed in the morning till one falls asleep. Other self-controls are maintenance of balance in physical labour, honest earnings i.e. taking a livelihood based on just and lawful means of production and expenditure of earnings for noble purposes. Amongst all these, control on sensory organs is of prime importance.

Q.15. What are the rules of Akhand (unbroken) Jap?

Ans. Akhand Jap  is performed on special auspicious occasions like Gayatri Jayanti, Guru Poornima, Vasant Panchami etc. There are two ways of doing it. It may be performed either for twenty-four hours or between sunrise and sun-set. During the visibility of the sun (day-time) a vocal mass chanting  with rosary may be performed.

The time of beginning and end of an  Akhand Jap should be the same in the forenoon and afternoon. When it is meant for twenty-four hours, the period involved includes a day and night in equal proportion. Traditions permit a vocal chanting during the day and mental Jap in the night. Wherever this procedure can be conveniently adhered to, it may be adopted. Otherwise, mental Jap  is generally more convenient for the sake of uniformity. Dhoop-Deep should be kept continuously burning during the period of Jap.

Q.16. What to do if there are disruptions during Jap?

Ans. If one is required to go to toilet in between a sessions, the Jap can be resumed after cleaning of hands and feet. Taking bath after each such disruption is not necessary. On sneezing, passing of wind, yawning etc., purification is achieved by taking three Aachmans.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 59

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग १)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूभुर्वः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!
वसन्त पंचमी उमंगों का दिन है, प्रेरणा का दिन है, प्रकाश का दिन है। वसन्त के दिनों में उमंग आती है, उछाल आता है। समर्थ गुरु रामदास के जीवन में इन्हीं दिनों एक उछाल आया—क्या हम अपनी जिन्दगी का बेहतरीन इस्तेमाल नहीं कर सकते? क्या हमारी जिन्दगी अच्छी तरह से खर्च नहीं हो सकती? एक तरफ उनके विवाह की तैयारियाँ चल रही थीं। समर्थ गुरु रामदास को शक्ल दिखाई पड़ी, औरत, औरत के बच्चे, बच्चे के बच्चे, शादियाँ, ब्याह आदि की बड़ी लम्बी शृंखला दिखाई पड़ी। दूसरी तरफ आत्मा ने संकेत दिया, परमात्मा ने संकेत दिया और कहा—अगर आपको जिन्दगी इतनी कम कीमत की नहीं जान पड़ती है, अगर आपको महँगी मालूम पड़ती है तो आइए दूसरा वाला रास्ता आपके लिए खुला पड़ा है। महानता का रास्ता खुला हुआ पड़ा है। समर्थ गुरु ने विचार किया। उछाल आया, उमंग आई और ऐसी उमंग आई कि रोकने वालों से रुकी नहीं। वह उछलते ही चले गए। मुकुट को फेंका अलग और कंगन को तोड़ा अलग। ये गया, वो गया, लड़का भाग गया। दूल्हा कौन हो गया? समर्थ गुरु रामदास हो गया। कौन? मामूली-सा आदमी छोटा-सा लड़का छलाँग मारता चला गया और समर्थ गुरु रामदास होता चला गया।

यहाँ मैं उमंग की बात कह रहा था। उमंग जब भीतर से आती है तो रुकती नहीं है। उमंग जब आती है वसन्त के दिनों में। इन्हीं दिनों का किस्सा है बुद्ध भगवान का। उनका ऐसा ही किस्सा हुआ था। सारे संसार में फैले हुए हाहाकार ने पुकार और कहा कि आप समझदार आदमी हैं। आप विचारशील आदमी हैं और आप जबरदस्त आदमी हैं। क्या आप दो लोगों के लिए जियेंगे? औरत और बच्चे के लिए जियेंगे? यह काम तो कोई भी कर सकता है। बुद्ध भगवान के भीतर किसी ने पुकारा और वे छलाँग मारते हुए, उछलते हुए कहीं के मारे कहीं चले गए। बुद्ध भगवान हो गये।

शंकराचार्य की उमंग भी इन्हीं दिनों की है। शंकराचार्य की मम्मी कहती थीं कि मेरा बेटा बड़ा होगा, पढ़-लिखकर गजेटेड ऑफिसर बनेगा। बेटे की बहू आएगी, गोद में बच्चा खिलाऊँगी। मम्मी बार-बार यही कहतीं कि मेरा कहना नहीं मानेगा तो नरक में जाएगा। शंकर कहता—अच्छा मम्मी कहना नहीं मानूँगा तो नरक जाऊँगा। हमको जाना है तो अवश्य जाएँगे महानरक में अच्छे काम के लिए। मेरे संकल्प में रुकावट लगाती हो तो आत्मा और परमात्मा का कहना न मानकर तुम कहाँ जाओगी? विचार करता रहा, कौन? शंकराचार्य।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्गुरु की खोज

सद्गुरु की खोज कठिन है। साधक के प्राणों की पीर जब पुकार बनती है, तभी वह इस डगर पर पहला कदम रख पाता है। इसके लिए उसे अपने अस्तित्व को गला कर, प्राणों को पिघलाकर स्वयं को एक नये रूप में ढालना पड़ता है। और यह नया रूप होता है-शिष्य का। जो साहस, संकल्प एवं समर्पण की त्रिधातु से ढाला जाता है। जो स्वयं को शिष्य के रूप में रूपान्तरित नहीं कर पाते, वे कभी भी सद्गुरु की खोज में सफल नहीं होते।
    
सद्गुरु सदा ही केवल शिष्य को मिलते हैं। जो स्वयं को शिष्य के रूप में नहीं गढ़ पाया, उसे वे मिलकर भी नहीं मिलते। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से उस युग के सभी जन सुपरिचित थे, लेकिन किसी के वे सखा थे, तो किसी के भ्राता, तो कोई उन्हें भगवान् के रूप में पूजता था। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, निषादराज गुह, परम अनुरागिनी शबरी सभी के प्राणों में वह बसे थे। महामति विभीषण तो उन्हें पाने के लिए अपने प्रियजनों व कुटुम्बियों को भी छोड़ आये थे। वानरराज सुग्रीव एवं युवराज अंगद भी उनके लिए रण-समर में प्राणोत्सर्ग करने के लिए दौड़ आये थे।
    
लेकिन इन सभी अनुरागियों में कुछ निजता का अंश शेष था। सभी को प्रभु प्रिय थे, तो सब प्रभु को प्रिय। प्रभु ने अपने इन प्रियजनों को, इनकी निजता को कृतार्थ भी किया। पर हनुमान इन सभी में एक होते हुए भी इन सबसे भिन्न थे। उनमें निजता का लेश भी शेष न था। उनकी बज्रांग मूर्ति साहस, संकल्प एवं समर्पण की त्रिधातु से ही बनी थी। उनकी न तो कोई चाहत थी और न ही उनमें अपने किसी कर्तृत्व का अभिमान था। सच तो यह कि वे कभी भी अपने प्रभु से विलग ही नहीं थे। उन्होंने सहज ही अपना अतीत, वर्तमान एवं भविष्य प्रभु अर्पित कर दिया था।
    
वह न तो मोक्ष के अभिलाषी थे और न तत्त्वज्ञान के। उनके लिए तो प्रभु स्मरण एवं प्रभु समर्पण ही जीवन का सार-सर्वस्व था। उन्हें तो प्रभु के प्रत्यक्ष सान्निध्य का भी कोई लोभ न था। लेकिन जीवन की जिस डगर पर वह चले थे, उसने उन्हें सहज ही शिष्य के रूप में रूपान्तरित कर दिया। अध्यात्म रामायण की कथा कहती है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम उन्हें और केवल उन्हें ही सद्गुरु के रूप में मिले। माता सीता की खोज के साथ वह सद्गुरु की खोज में भी सफल हुए। श्रीराम ने उन्हें तत्त्वज्ञान प्रदाता एवं मोक्षदाता बनाया। उनके शिष्यत्व में सद्गुरु की खोज के सभी सूत्र निहित हैं।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६६

सोमवार, 20 जनवरी 2020

👉 "पांच प्रेत"

नगर अभी दूर था। वन हिंसक जन्तुओं से भरा पड़ा था। सो विशाल वटवृक्ष, सरोवर और शिव मंदिर देखकर आचार्य महीधर वहीं रुक गये। शेष यात्रा अगले दिन पूरी करने का निश्चय कर थके हुए आचार्य महीधर शीघ्र ही निद्रा देवी की गोद में चले गये।

आधा रात, सघन अन्धकार, जीव-जन्तुओं की रह-रहकर आ रहीं भयंकर आवाजें- आचार्य प्रवर की नींद टूट गई। मन किसी बात पर विचार करे इससे पूर्व ही उन्हें कुछ सिसकियाँ सुनाई दीं उन्हें लगा पास में कोई अन्ध-कूप है उनमें कोई पड़ा हुआ रुदन कर रहा है अब तक सप्तमी का चन्द्रमा आकाश में ऊपर आ गया था, हल्का-हल्का प्रकाश फैल रहा था, आचार्य महीधर कूप के पास आये और झाँककर देखा तो उसमें पाँच प्रेत किलबिला रहे थे।

यों दुःखी अवस्था में पड़े प्रेतों को देखकर महीधर को दया आ गई उन्होंने पूछा-तात! आप लोग कौन हैं यह दुर्दशा आप लोग क्यों भुगत रहे हैं ? इस पर सबसे बड़े प्रेत ने बताया हम लोग प्रेत है मनुष्य शरीर में किये गये पापों के दुष्परिणाम भुगत रहे हैं आप संसार में जाइये और लोगों को बताइये जो पाप कर हम लोग प्रेत योनि में आ पड़े है वह पाप और कोई न करें। आचार्य ने पूछा- आप लोग यह भी तो बताइये कौन कौन से पाप आप सबने किये हैं तभी तो लोगों को उससे बचने के लिए कहा जा सकता है।

“मेरा नाम पर्युषित है आर्य” पहले प्रेत ने बताना प्रारम्भ किया- मैं पूर्व जन्म में ब्राह्मण था, विद्या भी खूब पढ़ी थी किन्तु अपनी योग्यता का लाभ समाज को देने की बात को तो छुपा लिया हाँ अपने पाँडित्य से लोगों में अन्ध-श्रद्धा, अन्धविश्वास जितना फैला सकता था फैलाया और हर उचित अनुचित तरीके से केवल यजमानों से द्रव्य-दोहन किया उसी का प्रतिफल आज इस रूप में भुगत रहा हूँ ब्राह्मण होकर भी जो ब्रह्म नहीं रखता, समाज को धोखा देता है वह मेरी ही तरह प्रेत होता है।

“मैं क्षत्रिय था पूर्व जन्म में” अब सूचीमुख नामक दूसरे प्रेत ने आत्म कथा कहनी प्रारम्भ की। मेरे शरीर में शक्ति की कमी नहीं थी मुझे लोगों की रक्षा के लिये नियुक्त किया गया। रक्षा करना तो दूर प्रमोद वश मैं प्रजा का भक्षक ही बन बैठा। चाहे किसी को दण्ड देना, चाहे जिसको लूट लेना ही मेरा काम था एक दिन मैंने एक अबला को देखा जो जंगल में अपने बेटे के साथ जा रही थी मैंने उसे भी नहीं छोड़ा उसका सारा धन छीन लिया, यहाँ तक उनका पानी तक लेकर पी लिया। दोनों प्यास से तड़प कर वहीं मय गये उसी पाप का प्रतिफल प्रेतयोनि में पड़ा भुगत रहा हूँ।

तीसरे शीघ्राग ने बताया- मैं था वैश्य। मिलावट, कम तौल, ऊँचे भाव तक ही सीमित रहता तब भी कोई बात थी, व्यापार में अपने साझीदारों तक का गला काटा। एक बार दूर देश वाणिज्य के लिए अपने एक मित्र के साथ गया। वहाँ से प्रचुर धन लेकर लौट रहा था रास्ते में लालच आ गया मैंने अपने मित्र की हत्या करदी और उसकी स्त्री, बच्चों को भी धोखा दिया व झूठ बोला उसकी स्त्री ने इसी दुःख में अपने प्राण त्याग दिये उस समय तो किसी की पकड़ में नहीं आ सका पर मृत्यु से आखिर कौन बचा है तात ! मेरे पाप ज्यों ज्यों मरणकाल समीप आता गया मुझे संताप की भट्टी में झोंकते गये और आज जो मेरी स्थिति है वह आप देख ही रहे है। पाप का प्रतिफल ही है जो इस प्रेतयोनि में पड़ा मल-मूत्र पर जीवन निर्वाह करने को विवश हूँ अंग-अंग से व्रण फूट रहे हैं दुःखों का कहीं अन्त नहीं दिखाई दे रहा।

अब चौथे की बारी थी- उसने अपने घावों पर बैठी मक्खियों को हाँकते और सिसकते हुये कहा- तात! मैं पूर्व जन्म में “रोधक” नाम का शूद्र था। तरुणाई में मैंने व्याद्द किया कामुकता मेरे मस्तिष्क पर बुरी तरह सवार हुई। पत्नी मेरे लिये भगवान् हो गई उसकी हर सुख सुविधा का ध्यान दिया पर अपने पिता-माता, भाई बहनों का कुछ भी ध्यान नहीं दिया। ध्यान देना तो दूर उन्हें श्रद्धा और सम्मान भी नहीं दिया। अपने बड़ों के कभी पैर छुये हों मुझे ऐसा एक भी क्षण स्मरण नहीं। आदर करना तो दूर जब तब उन्हें धमकाया और मारा-पिटा भी। माता-पिता बड़े दुःख और असह्यपूर्ण स्थिति में मरे। एक स्त्री से तृप्ति नहीं हुई तो और विवाह किये। पहली पत्नियों को सताया घर से बाहर निकाला। उन्हीं सब कर्मों का प्रतिफल भुगत रहा हूँ मेरे तात् और अब छुटकारे का कोई मार्ग दीख नहीं रहा।

चार प्रेत अपनी बात कह चुके किन्तु पांचवां प्रेत तो आचार्य महीधर की ओर मुख भी नहीं कर रहा था पूछने पर अन्य प्रेतों ने बताया-यह तो हम लोगों को भी मुँह नहीं दिखाते-बोलते बातचीत तो करते हैं पर अपना मुँह इन्होंने आज तक नहीं दिखाया।

“आप भी तो कुछ बताइये”- आचार्य प्रवर ने प्रश्न किया-इस पर घिंघियाते स्वर में मुँह पीछे ही फेरे-फेरे पांचों प्रेत ने बताया-मेरा नाम “कलाकार” है मैं पूर्व जन्म में एक अच्छा लेखक था पर मेरी कलम से कभी नीति, धर्म और सदाचार नहीं लिखा गया। कामुकता, अश्लीलता और फूहड़पन बढ़ाने वाला साहित्य ही लिखा मैंने, ऐसे ही संगीत, नृत्य और अभिनय का सृजन किया जो फूहड़ से फूहड़ और कुत्सायें जगाने वाला रहा हो। मैं मूर्तियाँ और चित्र एक से एक भावपूर्ण बना सकता था, किन्तु उनमें भी कुरुचि वर्द्धक वासनायें और अश्लीलतायें गढ़ी। सारे समाज को भ्रष्ट करने का अपराध लगाकर मुझे यमराज ने प्रेत बना दिया। किन्तु मैं यहाँ भी इतना लज्जित हूँ कि अपना मुंह इन प्रेत भाइयों को भी नहीं दिखा सकता।

आचार्य महीधर ने अनुमान लगाया अपने अपने कर्त्तव्यों से गिरे हुये यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और कलाकार कुल पाँच ही थे इन्हें प्रेतयोनि का कष्ट भुगतना पड़ रहा है और आज जबकि सृष्टि का हर ब्राह्मण, हर क्षत्रिय, वैश्य और प्रत्येक शूद्र कर्त्तव्यच्युत हो रहा है, हर कलाकार अपनी कलम और तूलिका से हित-अनहित की परवाह किये बिना वासना की गन्दी कीचड़ उछाल रहा है तब आने वाले कल में प्रेतों की संख्या कितनी भयंकर होगी। कुल मिलाकर सारी धरती नरक में ही बदल जायेगी। सो लोगों को कर्त्तव्य जागृत करना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अब तक प्रातःकाल हो चुका था आचार्य महीधर यह संकल्प लेकर चल पड़े पाँचों प्रेतों की कहानी सुनकर मार्ग भ्रष्ट लोगों को सही पथ प्रदर्शन करने लगे।

📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1971

👉 वीरता का सम्मान


👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग ३)

हमें अपने एक उत्पातकारी विद्यार्थी की स्मृति आज भी हरी है। वह कालेज आते हुए बाग के पेड़ और फल तोड़ता, मालियों को परेशान करता, छोटे विद्यार्थियों को पीटता था। सभी उससे तंग थे। पढ़ने में उसका किंचित भी मन न था। उसे फौज में जाने की सलाह दी गई। वही पेशा उसके कठोर भावों के अनुकूल पड़ता था। विद्यार्थी ने राय मान ली। आज वही उत्पातकारी विद्यार्थी अच्छा जनरल है। फौजी जीवन की कठोरताओं में भी सफलता प्राप्त करता जा रहा है। जब तक उसे अपनी रुचि, प्रकृति, स्वभाव, संस्कारों के अनुकूल क्षेत्र नहीं मिला, तभी तक वह शरारती रहा। अपना क्षेत्र मिलते ही, वह द्रुतगति से आगे बढ़ने लगा। अभी सफलता तो तभी मिली हुई समझिये जब मनुष्य अपने मनोनुकूल क्षेत्र पा ले।

जीविका उपार्जन के बाद किसी दूसरे प्रिय आनन्ददायक, प्रेरणाप्रद, मनोरंजक कार्य में तन्मय हो जाने से अवरुद्ध मनोग्रन्थियों को खुलने और बचपन तक की भावात्मक शक्ति को बाहर निकलने का स्वस्थ अवसर मिलता है।

अपने से पूछिए क्या मैं अपने भावों को ठीक तरह पहचानता हूँ? जब मैं क्रोधित हो उठता हूँ तो क्या उसमें दूसरे का कसूर होता है या यह स्वयं मेरी भावात्मक कमजोरी है? मेरे व्यक्तित्व में वह छिपा हुआ भाव कौन सा है, जो प्रायः मुझे परेशान किया करता है? क्या मैं उसे किसी उत्पादक शुभ कार्य की ओर मोड़ सकता हूँ?

निश्चय जानिये, आपको अपनी भावना के उदात्तीकरण का कोई न कोई स्वस्थ मार्ग अवश्य मिल जायगा। यह मनुष्य के स्वयं अपने आपको अध्ययन करने, स्व परीक्षा द्वारा अपनी गुप्त रुचि का ज्ञान प्राप्त करने तथा मन की नाना क्रियाओं को देखने से सम्बन्ध रखता है। आप खुद ही अपनी मनोवृत्तियों की दिशा तथा प्रवाह को पहचान सकते हैं। भावनाओं के प्रवाह में केवल यह ध्यान रखिए कि वह दिशा स्वस्थ, सुन्दर और समाज के लिए कल्याणकारी हो, जन हितकारी हो। आपका भी लाभ हो तथा अधिक जनता का हित साधन हो। विषय वासना की कलुषितता तथा दुर्गन्धि से उसका सम्बन्ध तनिक भी न हो। आपका चुना हुआ मार्ग नैतिक हो और आपके अन्दर के देवता को जगाने वाला हो। उसके प्रति आपका उत्साह सदा ही बना रहे और उससे आपकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ सतत जागृत और विकसित होती रहें।

📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 22

👉 QUERIES ABOUT JAP AND DAILY UPASANA (Part 6)

Q.13 What are the rules of Abhiyan Sadhana?

Ans. The basic rules of Abhiyan Sadhana are given hereunder:-
       
(a) The time of commencement:  All days are considered auspicious for initiating  a good work. However, for this purpose a Parva (religious auspicious period) would be the best choice. Amongst the auspicious festivals, one may choose days like Basant Panchami, Guru Poornima, Gayatri Jayanti etc. As regards of  “Tithis”, Panchami, Ekadashi and Poornima are considered auspicious and amongst the days, Ravivar, (Sunday) Guruvar (Thursday) are the best suited.

(b) Self control (Samyam): Involvement in Upasana should be a gradual process. In the beginning one attempts to adopt regularity in practice by doing a minimum number of Malas each day at a fixed convenient time. The same is true about other restrictions of self- control. In the beginning one may follow these on Thursdays. Later, if it is possible to adopt these self-controls  for longer periods, greater benefits accrue. The basic rules of the Sadhana are the same as for any other Anusthan. Fasting (Half or full day), abstention from sex, self service, Titikcha (Tolerance of heat and cold of natural weather cycles with minimum necessities) are adopted at least on Thursdays. During any form of fasting, mentioned earlier, refraining from unnecessary chattering and abstention from sex are must.   

(c) Fasting : For food, liquid diets like milk, buttermilk, fruit juices etc. are the best. Otherwise, one may depend on vegetables. Even if this much is not possible only one meal may be taken each day. It should, however, be free of salt and sugar (Aswad vrat).   

(d) Keeping silent : One aspect of control on tongue is through the control on taste. The other is by balanced and cultured speech. To adopt it, one has to get rid of the old habits of intemperate utterances. Maintenance of silence creates the ground for the change in speech habits. For a working man, it is difficult to keep quiet throughout the day. Nevertheless, it should not be difficult to find out two hours in the morning or at any other convenient time during the day for keeping silent. During the duration of silence, one should do an introspection (Manan) to identify one’s weaknesses, vices and bad habits and think of ways to get rid of them. The void thus created should be planned to be filled with good constructive habits (Chintan).  

Thus, refraining from speech does not simply mean keeping quiet anywhere. Seclusion is also necessary, where no communication is needed even through signs and gestures.    (e) Chastity : Amongst all physical activities of entertainment, overindulgence in sex has the most disastrous consequences. One has to pay heavily for the sexual acts during which vital life force is drained out of the human body, making one progressively weaker spiritually. On Thursdays, therefore, it is advised not only to refrain from sex but also avoid thoughts and actions arousing sexual impulse.

The above five principles are adopted on Thursdays only symbolically. The objective is to train oneself in self-control in day to day living so that one may ultimately persevere to follow them throughout life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 58

👉 युगशक्ति की युग प्रत्यावर्तन लीला

युगशक्ति युग प्रत्यावर्तन के लिए हर युग में धरा पर अवतरित होती है। यह अपने युग की समस्याओं का निराकरण-निवारण अपनी रहस्यमयी-दैवी लीला से करती है। इसकी अपराजेय और दुर्जय सामर्थ्य से ही समस्याओं से जर्जरित और खण्डहर हो चुके युग से नवयुग प्रकट होता है। समस्याओं के विविध रूपों के अनुसार इसके भी बहुरूप प्रकट होते हैं। कभी तो यह वेदमाता ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की चेतना में अवतरित हो-मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को महाकाल की पुकार सुनाती है, तो कभी वामन से विराट् बनकर देवत्व को आश्वस्त करती है। श्रीकृष्ण के विश्वरूप में इन्हीं आदिमाता की युगलीला के दर्शन होते हैं। इन्हीं त्रिगुणात्मिकता महामाया की उपासना के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं। और फिर इन्हीं की युग प्रत्यावर्तन लीला का निमित्त बनने के लिए गाण्डीवधारी को निर्देश देते हैं-तस्मात् युद्धस्व भारत!
  
युग-युग में अवतरित होने वाली वही युगशक्ति इस युग संक्रान्ति में युगऋषि हमारे आराध्य परम पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना में अवतरित हुई। हिमालय की दिव्य ऋषिसत्ता ने उनके अंतर्भावों में जो ब्रह्मबीज बोया था, उसी से वेदजननी इस युग में अपने अनगिन रूपों में प्रकट हो रही है। आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में घटने वाली घटनाएँ-हो रहीं विविध हलचलें उनकी रहस्यमयी लीला के सिवा और भला क्या हैं? हो रहे विनाश और किये जा रहे नवसृजन से युगशक्ति माता गायत्री केवल खण्डहर हो चुके पुराने युग से नये युग को प्रकट करने में लगी हैं।
  
उनकी इस युग प्रत्यावर्तन लीला के दृश्य रूप अनगिन हैं और अदृश्य रूप अनेक। दृश्य में यदि यह प्रक्रिया तीव्र है तो अदृश्य में तीव्रतम। हम सबके आराध्य युग देवता बनकर उन्हीं जगन्माता की दैवी लीला का संदेश सुनाने ही तो हमारे पास आये थे। उन महान गुरु के स्वरों में हममें से प्रत्येक के लिए महाकाल का आह्वान मंत्र गूँजा था। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री मंत्र में उनकी अवतार लीला की चौबीस कलाएँ प्रकट हुई थीं। माता के अवतरण दिवस पर-गायत्री जयन्ती के पुण्य क्षणों में वह वेदमाता की पुकार सुन, युगशक्ति की सूक्ष्म लीला के सूत्रधार बनकर चले गये। परन्तु अभी भी युगशक्ति की युग प्रत्यावर्तन लीला शेष है, जिसमें हम सबको भागीदार होना है। निमित्त बनना है, नये युग के सृजन का-श्रेय और सौभाग्य प्राप्ति का।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६५

रविवार, 19 जनवरी 2020

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए (भाग २)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।

वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।

मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।

आत्म-निरीक्षण कर देखिए कि किस प्रकार की भावात्मक शक्ति आप में जमी पड़ी है? और उसके विकास का सबसे स्वस्थ रूप क्या हो सकता है? किससे आपकी आन्तरिक तृप्ति होती है? क्रोध का ज्वालामुखी, घृणा का तूफान, आवेश की सुलगती अग्नि मनोनुकूल प्रिय कार्यों से लगने से शान्त होती है। जिस भावना से सम्बन्धित रुकी हुई शक्ति हो, उसके अनुकूल ही रुचिकर उत्पादक प्रिय कार्य का चुनाव कीजिए। इन माध्यमों पर सही सफलता निर्भर है।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1960 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/March/v1.22

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...