सोमवार, 20 जनवरी 2020

👉 युगशक्ति की युग प्रत्यावर्तन लीला

युगशक्ति युग प्रत्यावर्तन के लिए हर युग में धरा पर अवतरित होती है। यह अपने युग की समस्याओं का निराकरण-निवारण अपनी रहस्यमयी-दैवी लीला से करती है। इसकी अपराजेय और दुर्जय सामर्थ्य से ही समस्याओं से जर्जरित और खण्डहर हो चुके युग से नवयुग प्रकट होता है। समस्याओं के विविध रूपों के अनुसार इसके भी बहुरूप प्रकट होते हैं। कभी तो यह वेदमाता ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की चेतना में अवतरित हो-मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को महाकाल की पुकार सुनाती है, तो कभी वामन से विराट् बनकर देवत्व को आश्वस्त करती है। श्रीकृष्ण के विश्वरूप में इन्हीं आदिमाता की युगलीला के दर्शन होते हैं। इन्हीं त्रिगुणात्मिकता महामाया की उपासना के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं। और फिर इन्हीं की युग प्रत्यावर्तन लीला का निमित्त बनने के लिए गाण्डीवधारी को निर्देश देते हैं-तस्मात् युद्धस्व भारत!
  
युग-युग में अवतरित होने वाली वही युगशक्ति इस युग संक्रान्ति में युगऋषि हमारे आराध्य परम पूज्य गुरुदेव की आध्यात्मिक चेतना में अवतरित हुई। हिमालय की दिव्य ऋषिसत्ता ने उनके अंतर्भावों में जो ब्रह्मबीज बोया था, उसी से वेदजननी इस युग में अपने अनगिन रूपों में प्रकट हो रही है। आज राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में घटने वाली घटनाएँ-हो रहीं विविध हलचलें उनकी रहस्यमयी लीला के सिवा और भला क्या हैं? हो रहे विनाश और किये जा रहे नवसृजन से युगशक्ति माता गायत्री केवल खण्डहर हो चुके पुराने युग से नये युग को प्रकट करने में लगी हैं।
  
उनकी इस युग प्रत्यावर्तन लीला के दृश्य रूप अनगिन हैं और अदृश्य रूप अनेक। दृश्य में यदि यह प्रक्रिया तीव्र है तो अदृश्य में तीव्रतम। हम सबके आराध्य युग देवता बनकर उन्हीं जगन्माता की दैवी लीला का संदेश सुनाने ही तो हमारे पास आये थे। उन महान गुरु के स्वरों में हममें से प्रत्येक के लिए महाकाल का आह्वान मंत्र गूँजा था। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री मंत्र में उनकी अवतार लीला की चौबीस कलाएँ प्रकट हुई थीं। माता के अवतरण दिवस पर-गायत्री जयन्ती के पुण्य क्षणों में वह वेदमाता की पुकार सुन, युगशक्ति की सूक्ष्म लीला के सूत्रधार बनकर चले गये। परन्तु अभी भी युगशक्ति की युग प्रत्यावर्तन लीला शेष है, जिसमें हम सबको भागीदार होना है। निमित्त बनना है, नये युग के सृजन का-श्रेय और सौभाग्य प्राप्ति का।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६५

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