शनिवार, 25 जनवरी 2020

👉 परमात्मा की प्रतीति

परमात्मा की प्रतीति प्रेम में होती है। यही उसकी सत्ता का सत्य है। इसी में उसकी शक्ति समाहित है। परमात्मा की अभिव्यक्ति का द्वार प्रेम के सिवा और कुछ भी नहीं है। जहाँ जितने अंशों में प्रेम है, समझो वहाँ उतने ही अंशों में परमात्मा है। आखिरकार यही तो परमात्मा की उपस्थिति का प्रकाश है।
  
याद रहे, जब कभी हमारा हृदय प्रेम से रोता रहता है, तब हम परमात्मा से विमुख होते हैं। यही कारण है कि जब भी हमारा मन क्रोध से भरता है, घृणा से भरता है, तभी हम स्वयं को अशक्त अनुभव करते हैं। क्योंकि उन क्षणों में परमात्मा से हमारे सम्बन्ध क्षीण हो जाते हैं। इसीलिए तो क्रोध में, घृणा में, द्वेष में दुःख और संताप पैदा होते हैं। संताप की मनोदशा केवल सर्व की सत्ता से पृथक् होने से होती है।
  
जबकि प्रेम हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को आनन्द से भर देता है। एक ऐसी भावदशा जन्मती है, जहाँ शान्ति का संगीत और करुणा की सुगन्धि हिलोरें लेती है। ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि प्रेम पूर्ण हृदय स्वाभाविक ही प्रभु के निकट होता है। क्योंकि प्रेम पूर्ण हृदय अपने आप ही परमात्मा के हृदय में स्थान पा लेता है और हम नहीं रह जाते, बल्कि प्रभु ही हमसे प्रकट होने लगते हैं।
  
इस सम्बन्ध में बड़ी मीठी कथा है। बंगाल के संत विजयकृष्ण गोस्वामी अपने शिष्य कुलदानन्द के साथ वृन्दावन में विचरण कर रहे थे। तभी राह में एक व्यक्ति ने आकर कुलदानन्द को रोक लिया और उनका अपमान करने लगा। पहले तो कुलदानन्द ने बड़ी शान्ति से उसके दुर्वचन सुने। उनकी आँखों में प्रेम और प्रार्थना बनी रही। लेकिन यह स्थिति देर तक न रह सकी। अंततः कुलदानन्द का धैर्य चुक गया और उनकी आँखों में घृणा और प्रतिशोध का ज्वार उमड़ने लगा। उनकी वाणी से भी दहकते अंगारे बरसने लगे।
  
संत विजयकृष्ण गोस्वामी अब तक यह सब शान्ति से बैठे देख रहे थे। अचानक वह उठे और एक ओर चल दिये। कुलदानन्द को उनके इस तरह चले जाने पर अचरज हुआ। बाद में उन्होंने अपने गुरु से इसका उलाहना दिया। अपने शिष्य के इस उलाहने पर संत विजयकृष्ण गोस्वामी ने गम्भीर होकर कहा-उस व्यक्ति के बुरे व्यवहार के प्रत्युत्तर में जब तक तुम शान्ति एवं प्रेम से भरे थे, तब तक प्रभु के पार्षद तुम्हारी रक्षा कर रहे थे। परन्तु ज्यों ही तुमने प्रेम व शान्ति का परित्याग कर क्रोध व घृणा का सहारा लिया, वे प्रभु पार्षद तुम्हें छोड़कर चले गये। और जब परमात्मा ने ही तुम्हारा साथ छोड़ दिया, तब भला मैं तुम्हारे साथ कैसे रह सकता था।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १६८

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