जहाँ तक दुर्गासप्तशती की बात है, तो इस रहस्यमय ग्रन्थ में वेदों में वर्णित सभी तांत्रिक प्रक्रियाएँ कूटभाषा में वर्णित हैं। इसके अलग- अलग पाठक्रम अपने अलग- अलग प्रभावों को प्रकट करते हैं। यूं तो इसके पाठक्रम अनेक हैं। पर प्रायः इसके ग्यारह पाठक्रमों की चर्चा मिलती है। ये ग्यारह पाठक्रम कुछ इस प्रकार हैं- १. महाविद्या क्रम, २. महातंत्री क्रम, ३. चण्डी क्रम, ४. महाचण्डी क्रम, ५. सप्तशती क्रम, ६. मृत संजीवनी क्रम, ७. रूपदीपिका क्रम, ८. निकुंभला क्रम, ९. योगिनी क्रम, १०. संहार क्रम, ११. अक्षरशः विलोम क्रम। पाठक्रम की ये सभी विधियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। और प्रयोग के पूर्ण होते ही अपने प्रभाव को प्रकट किए बिना नहीं रहतीं।
इन पाठ क्रमों के अतिरिक्त श्री दुर्गासप्तशती के सहस्रों प्रयोग हैं। इनमें से कुछ साधारण हैं तो कुछ अतिविशिष्ट। इन सब की चर्चा यहाँ सम्भव नहीं जान पड़ रही। क्योंकि यह विषय अति गोपनीय एवं गम्भीर है, जिसे गुरुमुख से सुनना- जानना व करना ही श्रेयस्कर है। संक्षेप में हम यहाँ इतना ही कहेंगे कि पृथ्वी पर ही नहीं समस्त सृष्टि में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे दुर्गासप्तशती के समर्थ प्रयोगों से हासिल न किया जा सके। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले इसे रंचमात्र भी अतिशयोक्ति न समझें। लगातार जो अनुभव किया गया है, वही कहा गया है। वैसे यदि बात अपने स्वयं के व्यक्तित्व की चिकित्सा की हो तो दुर्गासप्तशती के साथ गायत्री महामंत्र के प्रयोग को श्रेष्ठतम पाया गया है।
वृन्दावन के उड़िया बाबा की दुर्गासप्तशती पर भारी श्रद्धा थी। अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए जब उन्होंने घर छोड़ा, तो कोई सम्बल न था। कहाँ जाएँ, किधर जाएँ, कुछ भी सुझायी न देता था। ऐसे में उन्हें जगन्माता का स्मरण हो आया। मां के सिवा अपने बच्चे की और कौन देखभाल कर सकता है। बस मां का स्मरण करते हुए वे शतचण्डी के अनुष्ठान में जुट गए। दुर्गासप्तशती के इस अनुष्ठान ने उनके व्यक्तित्व को आध्यात्मिक ऐश्वर्य से भर दिया। अपने इस अनुष्ठान के बारे में वे भक्तों से बताया करते थे। गायत्री महामंत्र के साथ दुर्गासप्तशती के पाठ के संयोग से अपने जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा की जा सकती है। इतना ही नहीं स्वयं भी आध्यात्मिक चिकित्सक होने का गौरव पाया जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 44
इन पाठ क्रमों के अतिरिक्त श्री दुर्गासप्तशती के सहस्रों प्रयोग हैं। इनमें से कुछ साधारण हैं तो कुछ अतिविशिष्ट। इन सब की चर्चा यहाँ सम्भव नहीं जान पड़ रही। क्योंकि यह विषय अति गोपनीय एवं गम्भीर है, जिसे गुरुमुख से सुनना- जानना व करना ही श्रेयस्कर है। संक्षेप में हम यहाँ इतना ही कहेंगे कि पृथ्वी पर ही नहीं समस्त सृष्टि में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे दुर्गासप्तशती के समर्थ प्रयोगों से हासिल न किया जा सके। इन पंक्तियों को पढ़ने वाले इसे रंचमात्र भी अतिशयोक्ति न समझें। लगातार जो अनुभव किया गया है, वही कहा गया है। वैसे यदि बात अपने स्वयं के व्यक्तित्व की चिकित्सा की हो तो दुर्गासप्तशती के साथ गायत्री महामंत्र के प्रयोग को श्रेष्ठतम पाया गया है।
वृन्दावन के उड़िया बाबा की दुर्गासप्तशती पर भारी श्रद्धा थी। अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए जब उन्होंने घर छोड़ा, तो कोई सम्बल न था। कहाँ जाएँ, किधर जाएँ, कुछ भी सुझायी न देता था। ऐसे में उन्हें जगन्माता का स्मरण हो आया। मां के सिवा अपने बच्चे की और कौन देखभाल कर सकता है। बस मां का स्मरण करते हुए वे शतचण्डी के अनुष्ठान में जुट गए। दुर्गासप्तशती के इस अनुष्ठान ने उनके व्यक्तित्व को आध्यात्मिक ऐश्वर्य से भर दिया। अपने इस अनुष्ठान के बारे में वे भक्तों से बताया करते थे। गायत्री महामंत्र के साथ दुर्गासप्तशती के पाठ के संयोग से अपने जीवन की आध्यात्मिक चिकित्सा की जा सकती है। इतना ही नहीं स्वयं भी आध्यात्मिक चिकित्सक होने का गौरव पाया जा सकता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ 44










































