गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

👉 आज का सद्चिंतन 6 April 2018


👉 From one to many: its desirable and its necessary

🔶 The need as well as the desire to multiply and to go from being one to being many is what created this world. The creator thought that there was no joy nor meaning in being alone and that the universe must grow and expand. This wish turned into a resolution which manifested into the creation. Man is born with this innate tradition of procreation. This is the fire that burns in his heart - to grow and to expand. This is what subtly and subconsciously propels us humans toward socializing with friends, seeking large gatherings such as fairs and festivals, living in communities, wanting to grow into a family, and wanting to lead. The plant life follows this tradition as well. The tendency to multiply has given plant life a chance to prosper. This divine tradition of procreation is what is behind physical yearning, reproduction, marriage, relationships, and familial love. There is no escaping this tradition.

🔷 Nature has tied us beings with this material attraction so we may always strive to grow and expand. This is why mothers have such grand and deep love. This is why we accept the commitment and bonding of marriage. We enjoy these bonds despite the additional complexity and despite the additional responsibilities. We enjoy them because they provide a medium for us to satisfy our deep rooted internal desire of going "from one to many".

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana – The Vision, Structure and the Program – 66 (3.26)

👉 महान कैसे बनें?

🔶 मित्रो ! तुम्हें ऐसे व्यक्तियों का प्रेमपात्र बनने का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए जो कष्ट पडऩे पर तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और बुराइयों से बचाने की एवं निराशा में आशा का संचार करने की क्षमता रख्रते हैं।
  
🔷 खुशामदी और चापलूसों से घिर जाना आसान है। मतलबी दोस्त तो पल भर में इक्कठे हो सकते हैं, पर ऐसे व्यक्तियों का मिलना कठिन है, जो कड़वी समालोचना कर सकें, जो खरी सलाह दे सकें,फटकार सकें और खतरों से सावधान कर सकें । राजा और साहूकारों की मित्रता मूल्यवान् समझी जाती है, पर सबसे उत्तम मित्रता उन धार्मिक पुरूषों की है, जिनकी आत्मा महान् है। जिसके पास पूँजी नहीं है, वह कैसा व्यापारी? जिसके पास सच्चे मित्र नहीं हैं, वह कैसा बुद्धिमान? उन्नति के साधनों में इस बात का बड़ा मूल्य है, कि मनुष्य को श्रेष्ठ मित्रों का सहयोग प्राप्त हो। बहुत से शत्रु उत्पन्न कर लेना मूर्खता है, पर उससे भी बढ़कर मूर्खता है, यह है कि भले व्यक्तियों की मित्रता को छोड़ दिया जाए।
  
🔶 निर्मल बुद्धि और श्रम में श्रद्धा, यही दो वस्तुएँ तो किसी मनुष्य को महान् बनाने वाली हैं। उत्तम गुणों को अपनाने से नीच व्यक्ति उच्च बन सकते हैं और दुर्गुणों के द्वारा बड़े व्यक्ति छोटे हो जाते हैं। निरंतर लगन, सावधानी, समय का सदुपयोग छोटे को बड़ा बना सकते हैं, हीन मनुष्यों को कुलीन बना सकते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Laxman's Self-Confidence

🔶 During the epic Ram-Ravana war, the demon Meghnath used a spiritual weapon called Shakti and Laxman fell down unconscious. Hanumanji had to arrange the Sanjeevni medication to revive him. The second time when he faced Meghnath in the battle, Laxman easily overpowered the demon and killed him. Why couldn't he achieve this feat in the first attempt?

🔷 The difference was that Laxman lacked self-confidence. When his elder brother Ram reminded him of his immense potential and limitless powers, the energy of self-confidence aroused in him and he was successful.

📖 From Pragya Puran

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 5)

🔶 हमारा जीवन अनगढ़ है; चौरासी लाख योनियाँ घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा हैं और वे कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार के तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हमको आगे नहीं बढ़ने देंगे और ये हथकड़ियों और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे; न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे। इसलिए कुसंस्कारों के विरुद्ध जद्दोजहद करना—ये हमारा काम है। साधना इसी का नाम है। साधना करने से आपने देखा है न, कितनी घटिया-घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या-से बन जाती हैं! आदमी पेड़ों को काटता है, छाँटता है, कलम लगाता है। जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाये हुए पेड़ उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं! रंग-बिरंगे फूल आते हैं।

🔷 ये माली के हाथ की करामात है। क्यों? उन्हीं गुलाबों को जो जंगल में रहते हैं, खुशबू भी नहीं आती, बहुत छोटे-छोटे फूल होते हैं, उन्हीं गुलाबों को ऐसा बना देता है। इसका नाम क्या है? इसका नाम कलम लगाना कहिये, सुसंस्कारिता कहिये अथवा माली की साधना पौधे के साथ और आपकी जीवात्मा की साधना अपने जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना लें, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा लें, फिर मजा आ जाएगा। फिर देखिये आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब से आपको कीमत मिलनी शुरू हो जाएगी। आप एम.ए. तक पढ़े हैं, तो ज्यादा पैसा मिलेगा—मैट्रिक तक पढ़े हैं, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी हैं, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा।

🔶 पात्रता बढ़ाइये न, कीमत बढ़ाइये न अपनी और जो चाहते हैं पाइये। कीमत आप बढ़ाना नहीं चाहते, माँग करके लेना चाहते हैं। प्रार्थना करेंगे—माँगेंगे, माँगेंगे, माँगेंगे। अरे बाबा! माँगने से तो पाँच पैसे भी नहीं मिलते; उसमें भी पात्रता की जरूरत होती है। अन्धा, कोढ़ी होगा, तो शाम तक उसकी भीख में दो रुपये आ जाएँगे; हट्टा-कट्टा होगा, तो देगा नहीं, गालियाँ और सुनाएगा तुझे शर्म नहीं आती बेशर्म! भीख माँगने चला आया। काम, मेहनत, मजदूरी क्यों नहीं करता? पात्रता तो भिखारी को भी चाहिए, फिर सामान्य लोगों का तो पात्रता के बिना दुनिया में कुछ नहीं चलता। इसलिए पात्रता के लिए अपने गुण, अपने कर्म, अपने स्वभाव इन तीनों चीजों को परिष्कृत करना हर आदमी के लिए बेहद जरूरी है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 82)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति

🔶 भगवान् सदाशिव गुरुगीता के अगले प्रकरण में कहते हैं कि यदि भूल से, प्रभाव से अथवा अहंकारवश यदि कोई शिष्य गुरुवचनों की अवहेलना करता है, तो उसका अध्यात्म मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। माँ भवानी से इस प्रकरण को स्पष्ट करते हुए भोले बाबा कहते हैं-

एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दां करोति यः। स याति नरकं घोरं यावच् चन्द्रदिवाकरौ॥ १०१॥
यावत्कल्पांतको देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्। गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत्॥ १०२॥

हुंकारेण न वक्तव्यं प्राज्ञैः शिष्यैः कथञ्चन। गुरोरग्रे न वक्तव्यम् असत्यं च कदाचन॥ १०३॥
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य गुरुंनिर्जित्य वादतः। अरण्ये निर्जले देशे स भवेद् ब्रह्मराक्षसः॥ १०४॥

मुनिभिः पन्नगैर्वाऽपि सुरैर्वा शापितो यदि। कालमृत्युभयाद्वापि गुरूरक्षति पार्वति॥ १०५॥
अशक्ता हि सुराद्याश्च अशक्ता मुनयस्तथा। गुरुशापेन ते शीघ्रं क्षयं यान्ति न संशयः॥ १०६॥

🔷 गुरु की जो महिमा मैंने पहले बतायी, उसे जानकर, सुनकर भी यदि कोई गुरुनिन्दा करता है, वह जब तक चन्द्र, सूर्य है, तब तक घोर नरक में पड़ा रहता है॥ १०१॥ इसलिए जब तक देह है, तब तक यहाँ तक कि कल्पान्त तक भी गुरुदेव का स्मरण करते रहना चाहिए। शिष्य को चाहिए कि मुक्त होने पर भी वह गुरु स्मरण का लोप न होने दे॥ १०२॥ जो शिष्य प्रज्ञावान व विवेकी हैं, वे कभी भी अपने गुरु के सामने हुंकारपूर्वक (तेज स्वर में) बात नहीं करते। इतना ही नहीं, वे गुरु के सामने कभी भी असत्य नहीं बोलते॥ १०३॥ और जो गुरु के पास तू करके, हुं करके बाते करते हैं, वे किसी निर्जन अरण्य प्रदेश में ब्रह्मराक्षस का जीवन जीने के लिए विवश होते हैं॥ १०४॥ भगवान् शिव कहते हैं—हे पार्वती! मुनि, नाग, देवों के शाप से, काल और मृत्यु के भय से केवल गुरुदेव ही शिष्य का रक्षण करने में समर्थ हैं॥ १०५॥ लेकिन जो गुरु के शाप से ग्रस्त हैं, उनकी रक्षा कोई भी देवता अथवा मुनि नहीं कर पाते। ऐसे शिष्य शीघ्र ही नष्ट  होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है॥ १०६॥
  
🔶 देवाधिदेव भगवान् महादेव के इन वचनों में बड़ी गहरी अनुभूति समायी है। जो तार्किक हैं, वे तो इस सच को शायद ही छू पाएँ ; लेकिन जो तप करते हैं, जिन्होंने अपनी अन्तर्यात्रा में गुरु-महिमा को जाना है, वे इस अनुभूति कथा को पल-पल पीते हैं। इस अनुभव को साकार करने वाली बड़ी मर्मस्पर्शी घटना है, जो एक शिष्य के जीवन में तब हुई, जब उसका अपने आराध्य गुरुदेव से प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं हुआ था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 124

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

👉 अपना अपना महत्त्व

🔷 एक समुराई जिसे उसके शौर्य ,निष्ठा और साहस के लिए जाना जाता था, एक जेन सन्यासी से सलाह लेने पहुंचा।  जब सन्यासी ने ध्यान पूर्ण कर लिया तब समुराई ने उससे पूछा, “ मैं इतना हीन क्यों महसूस करता हूँ ? मैंने कितनी ही लड़ाइयाँ जीती हैं, कितने ही असहाय लोगों की मदद की है। पर जब मैं और लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि मैं उनके सामने कुछ नहीं हूँ, मेरे जीवन का कोई महत्त्व ही नहीं है।”

🔶 “रुको; जब मैं पहले से एकत्रित हुए लोगों के प्रश्नों का उत्तर दे लूँगा तब तुमसे बात करूँगा।”, सन्यासी ने जवाब दिया।

🔷 समुराई इंतज़ार करता रहा, शाम ढलने लगी और धीरे -धीरे सभी लोग वापस चले गए। “ क्या अब आपके पास मेरे लिए समय है ?”, समुराई ने सन्यासी से पूछा। सन्यासी ने इशारे से उसे अपने पीछे आने को कहा, चाँद की रौशनी में सबकुछ बड़ा शांत और सौम्य था, सारा वातावरण बड़ा ही मोहक प्रतीत हो रहा था। “ तुम चाँद को देख रहे हो, वो कितना खूबसूरत है! वो सारी रात इसी तरह चमकता रहेगा, हमें शीतलता पहुंचाएगा, लेकिन कल सुबह फिर सूरज निकल जायेगा, और सूरज की रौशनी तो कहीं अधिक तेज होती है, उसी की वजह से हम दिन में खूबसूरत पेड़ों, पहाड़ों और पूरी प्रकृति को साफ़ –साफ़ देख पाते हैं, मैं तो कहूँगा कि चाँद की कोई ज़रुरत ही नहीं है….उसका अस्तित्व ही बेकार है !!”

🔶 “अरे! ये आप क्या कह रहे हैं, ऐसा बिलकुल नहीं है ”- समुराई बोला, “ चाँद और सूरज बिलकुल अलग -अलग हैं, दोनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है, आप इस तरह दोनों की तुलना नहीं कर सकते”,  समुराई बोला। “तो इसका मतलब तुम्हे अपनी समस्या का हल पता है. हर इंसान दूसरे से अलग होता है, हर किसी की अपनी -अपनी खूबियाँ होती हैं, और वो अपने -अपने तरीके से इस दुनिया को लाभ पहुंचाता है; बस यही प्रमुख है बाकि सब गौण है”,  सन्यासी ने अपनी बात पूरी की।

🔷 मित्रों! हमें भी स्वयं के अवदान को कम अंकित कर दूसरों से तुलना नहीं करनी चाहिए, प्रायः हम अपने गुणों को कम और दूसरों के गुणों को अधिक आंकते हैं, यदि औरों में भी विशेष गुणवत्ता है तो हमारे अन्दर भी कई गुण मौजूद हैं।

🌹 परम पूज्य गुरुदेव का प्रवचन
🌹 स्वयं को ऊँचा उठायें - व्यक्तित्ववान ब

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 April 2018


👉 THINK OVER IT

🔷 The expectation to get grants and blessings for free, no one should have from anybody. One has to show his worthiness to get blessings from God and grants from fat cats. They too remain dumb and deaf for parasites and free-seekers. Good lucks and fortunes do not fall from sky in fluke. For this achievement, one has to earn his attaining capacity from the very beginning. The property in the hands of incapable and worthless people is looted and snatched by looters and thieves. Though the available future is created as per the desire, determination and management of that Creator (Almighty), but to avail them the wishers and curious ones have to become a bit extra-ordinary.

🔶 What to say about this world or the next world, the humans or the gods; everywhere the tradition and rule of blessing the capable and worthy ones only is seen working.                

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 विचारणीय

🔷 मुफ्त में अनुदान-वरदान पाने की अपेक्षा, किसी को भी, किसी से भी नहीं करनी चाहिए। देवताओं से वरदान और धन-कुबेरों से अनुदान प्राप्त करने के लिए अपनी पात्रता का परिचय देना पड़ता है। मुफ्तखोरों के लिए तो वे भी गूँगे-बहरे बनकर बैठे रहते हैं। सौभाग्य अनायास ही कहीं से आ नहीं टपकते। उस उपलब्धि के लिए बहुत पहले से ही अपनी धारण कर सकने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है। अक्षमों, दुर्बलों के तो हाथ में आयी सम्पदा भी चोर-उचक्कों द्वारा ठग ली या झपट ली जाती है। उपलब्ध भविष्य, यों बनता तो स्रष्टा की इच्छा, निर्धारण और व्यवस्था के अनुरूप ही है, पर उससे लाभान्वित होने के लिए इच्छुकों और उत्सुकों को भी कुछ असाधारण बनना पड़ता है।

🔶 क्या लोक, क्या परलोक, क्या मनुष्य, क्या देवता, सर्वत्र सत्पात्रों को ही उपहार-वरदानों से निहाल करने की प्रथा-परंपरा काम आती देखी जाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 5 April

🔷 Man is bound to progress either by way of enjoying pleasure, social service or for realization of soul. If we keep our aim to develop all of above, we will be able to progress and walk on the royal – path of successful life.

🔶 Dear readers,
We got a direct physical guidance of the sacred soul of this era for such a long time. It is no doubt a great gift of our life. But to develop our life under such an affectionate and radiant personality, our devotion to Revered Guru will change our life if we follow his guidance with full obedience and discipline.

🔷 If you want to progress and achieve success in life, don’t envy to other. Others progress should be taken as a guidance of successful achievement in life and thus on one side you will not be hurt by jealousy and on other – you will be encouraged to progress like him.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 4)

🔷 आप ध्यान दीजिए और गौर कीजिए। पात्रता का विकास किये बिना न संसार में रास्ता है और न पात्रता का विकास किए बिना आध्यात्मिक क्षेत्र में कोई रास्ता है। आपको अफसर बनना है? बल्कि सर्विस कमीशन के सामने जाइये और अपनी पात्रता साबित कीजिये; अच्छा डिवीजन लाइये और अच्छे नम्बर लीजिये। आपको अच्छा स्थान मिल सकता है। नहीं साहब! हम तो परीक्षा से दूर रहेंगे; हम तो भगवान जी की आरती गाएँगे; हमको अफसर बना दीजिए। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। पात्रता विकसित करना बहुत जरूरी है। पात्रता का इससे क्या मतलब है? पात्रता का अर्थ होता है—जीवन को परिष्कृत करना। जीवन को परिष्कृत करने के लिए साधना करनी पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना।

🔶 साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्मांतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा। बच्चे को तो कोई कह नहीं सकता। बच्चा कहीं भी पेशाब कर देता है, कहीं भी खड़ा हो जाता है, कुछ भी करने लगता है, कुछ भी चीज फैला देता है; लेकिन बड़ा आदमी तो न केवल स्वयं सँभल के रहता है, वरन् दूसरों की चीजों को भी सँभालकर रखता है। ये बड़प्पन की निशानियाँ हैं। पात्रता से मेरा मतलब उसी से है। चिन्तन की दृष्टि से सुसंस्कृत और व्यवहार की दृष्टि से सज्जन और सभ्य—इन दो विशेषताओं को अपने भीतर पैदा करे आदमी, तो ये माना जाएगा कि उसने पात्रता का विकास कर लिया।

🔷 पात्रता का विकास अगर कर लिया है, तो संसार में भी इज्जत और भगवान के यहाँ भी इज्जत। पात्रता का अगर आपने विकास नहीं किया तो संसार में भी उपहास और तिरस्कार और भगवान के यहाँ भी नाराजगी। आप कहीं भी, कुछ भी नहीं पा सकते। पात्रता की ओर ध्यान एकाग्र कीजिए। पात्रता आपके हाथ की बात है। उपासना भगवान का अनुग्रह, भगवान के हाथ की बात है; पर साधना तो आपके हाथ की बात है। अपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए।  आपको अनगढ़ और सुगढ़ बनाना है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 81)

👉 सबसे सच्ची सिद्धि : गुरुभक्ति

🔷 गुरुगीता के भक्तिगीत अन्तस् में गुरुभक्ति का अंकुरण-स्फुरण करते हैं। इन भक्ति गीतों के पठन-मनन-गायन से अन्तःकरण गुरुभक्ति से आप्लावित होता है। चित्त की गहराइयों में गुरुदेव के प्रति अनुराग प्रगाढ़ होता है। यह प्रगाढ़ अनुराग ही तो अध्यात्म साधना की घनीभूत ऊर्जा है। जिसके अन्तस् में इस महाऊर्जा का घनत्व जितना अधिक है, वह अध्यात्म पथ पर उतनी ही अधिक तीव्रता से गतिशील होता है। इसके विपरीत जिसके अन्तस् में गुरुभक्ति की ऊर्जा का घनत्व अविकसित, अल्प अथवा शून्य है, उसका आध्यात्मिक जीवन भी शून्य बना रहता है। उसके आध्यात्मिक लक्ष्य उससे हमेशा दूर बने रहते हैं। फिर भले ही वह कितना जप-तप अथवा कर्मकाण्ड करता रहे। जो विज्ञ हैं, विवेकी हैं वे जानते हैं कि साधना के सभी कर्मकाण्ड स्थूल देह के कलेवर का निर्माण भर करते हैं। इसमें प्राण का संचरण केवल गुरुभक्ति से ही होता है।
    
🔶 पिछले मंत्रों में भगवान् सदाशिव के यही वचन थे कि गुरुदेव जो भी राह दिखाएँ, उसी राह पर चलते हुए मन की शुद्धि करना शिष्य का कर्त्तव्य है। शिष्य का यही कर्त्तव्य है कि मन व इन्द्रियों से भोगे जाने वाले सभी भोगों को और सभी नाशवान् पदार्थों को त्याग दे। सम्पूर्ण जगत् को अपनी आत्मा के विस्तार के रूप में अनुभव करे। गुरुकृपा से यदि यह अनुभूति निरन्तर होती रहे, तो शिष्य, साधक अपने परम गन्तव्य तक, जीवन के चरम आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँच जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 123

मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

👉 "पागलपन"

🔷 एक छोटे से सम्राज्य मे एक राजा राज करता था, और प्रजा भी ज्यादातर खुश थी, एक देख राजा के पडोसी देश और उनके शुभचिन्तक जलने लगे थे!

🔶 पडोसी देश के राजाओ ने उस राजा को बर्वाद करने के लिए एक जादूगर को वह राज्य देने की पेस कस कर दी, ताकतवर जादूगर ने उस शहर को तबाह कर देने की नीयत से वहां के कुँए में कोई जादुई रसायन डाल दिया।

🔷 जिसने भी उस कुँए का पानी पिया वह पागल हो गया। क्योकि वह मुख्य कुआं था और सारा शहर उसी कुँए से पानी लेता था। अगली सुबह उस कुँए का पानी पीने वाले सारे लोग अपने होशहवास खो बैठे।

🔶 शहर के राजा और उसके परिजनों ने उस कुँए का पानी नहीं पिया था क्योंकि उनके महल में उनका निजी कुआं था जिसमें जादूगर अपना रसायन नहीं मिला पाया था।

🔷 राजा ने अपनी जनता को सुधबुध में लाने के लिए कई फरमान जारी किये लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि सारे कामगारों और पुलिस वालों ने भी जनता कुँए का पानी पिया था और सभी को यह लगा कि राजा बहक गया है और ऊलजलूल फरमान जारी कर रहा है।

🔶 सभी राजा के महल तक गए और उन्होंने राजा से गद्दी छोड़ देने के लिए कहा। राजा उन सबको समझाने-बुझाने के लिए महल से बाहर आ रहा था तब रानी ने उससे कहा – “क्यों न हम भी जनता कुँए का पानी पी लें! हम भी फिर उन्हीं जैसे हो जायेंगे।”

🔷 राजा और रानी ने भी जनता कुँए का पानी पी लिया और वे भी अपने नागरिकों की तरह बौरा गए और बे सिर पैर की हरकतें करने लगे।

🔶 अपने राजा को ‘बुद्धिमानीपूर्ण’ व्यवहार करते देख सभी नागरिकों ने निर्णय किया कि राजा को हटाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने तय किया कि राजा को ही राजकाज चलाने दिया जाय।

🔷 मित्रों कहानी से तात्पर्य है कि अगर हजारों लोग हमारे विरुद्ध है तो हम गलत हो गए क्या, कभी - कभी ऐसी भी परिश्थितियाँ आ जाती है कि सिर्फ हम सही होते है और हजारों गलत, इसलिए अगर आप सही है तो सिर्फ अपने आप पर विश्वास रखिये, लोगों का क्या है उनका तो काम है कहना।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 4 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 4 April 2018


👉 THE COMPULSORY RULE OF REACTION OF ACTION

🔶 The reaction of each action is a universal rule of this world. This can be seen being characterised anytime anywhere. A farmer reaps what he sows. Though the opportunities of fortune and misfortune appear naturally; but behind them too, the deeds of human beings work only. However they have been done ever in the past, not in the present. Nothing happens all of a sudden here. Whatsoever happens, its background is reared much before. The birth of a child is seen directly with these eyes after delivery; but its foundation has been set up much before during insemination. The time of dawn is accepted as sunrise with these skinny eyes; but in reality this is connected with the time of ending of darkness.

🔷 Similar convention shows its miracle behind good time and fortune too. The consequeces of one’s deeds are everything here. Everything in the market of this world is well decorated, preserved and pre defined. But no one gets free of cost out of it. The venture of buying and selling works here. The universal truth of barter introduces its fixed mechanism continuously. Even the sand and soil spreaded on the ground do not get collected in the basket free of cost on its own. For this too, someone or other has to work for digging and collecting. The lines of Sanskrit rightly describe this—a deer doesn’t go inside the mouth of a sleeping lion on its own.          

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 Amrit Chintan 4 April

🔷 Four habits constitute human nature – mind, nature, instinct and ego. Mind’s job is to decide yes or no to the proposals of thoughts. Chit is memory chip and ego which covers self. These four factors always keep man in body sense and does allow to be conscious of soul. Hence, the only way to become soul conscious is through process of self rectification and selfless love which permits soul radiation to come out.

🔶 The aim of sadhana is realization. Most of the devotees do all their worship for worldly gains and for that they do Anusthan – a – disciplined package of enchanting. This intense to become a type of ritual oriented results of material things. Such way of worship does not help to grow spiritual power. Sadhana can only bring result when a long steady practice is done under the guidance of a Guru in most disciplined way.

🔷 Every one who has chosen the field for spiritual developments, a wave of that discipline must spread. Diet control, chasticity in life, income, daily routine of life, expense, reading of good books, help to become soul conscious. Worship, exercise, helping others and like activities will have to be imposed on our-self strictly. Vices must be controlled. Restrain in life and adopting of good virtues must be the aim of everyone in this field of spirituality.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 3)

🔶 आज दूसरी बात बताते हैं आपको। अपनी पात्रता का विकास करना पड़ेगा, पात्र इसके लिए बनना पड़ेगा। पात्र अगर न होंगे तब? शादी कोई लड़की करना चाहे किसी अच्छे लड़के से और वह बुड्ढी हो तब? गूँगी, बहरी, अन्धी हो तब? तो कौन शादी करेगा? इसीलिए पात्रता बहुत जरूरी है। कल हमने कहा था न—उस दिन आपसे कहा था, पानी का गड्ढा होना जरूरी है, बादलों की कृपा प्राप्त करने के लिए। बादल तो बरसते ही रहते हैं। उनकी कृपा तो सबके ऊपर है। गड्ढा जहाँ होगा, वहीं तो पानी जमा होगा न। गड्ढा न होगा तब? सूरज की कृपा तो हरेक के ऊपर है; लेकिन जिसकी आँखें खराब हो गई हों, उसके लिए क्या कर सकता है सूरज! दुनिया में एक से एक सुहावने दृश्य दिखाई पड़ते हैं; पर एक-से सुहावने दृश्य को देख कौन सकेगा?

🔷 जिसकी आँखों का तिल साबुत होगा, वही तो देखेगा? जिसकी आँखों का तिल साबुत नहीं है, तो कैसे देखेगा! जरा आप ही बताइये। जिसके कानों की झिल्ली खराब हो गई है, दुनिया में एक-से बढ़िया संगीत और आवाज निकलती है, पर कानों की झिल्ली खराब हो जाए, तब दुनिया के संगीत सुनने के लिए आदमी की कोई सहायता-सेवा नहीं कर सकता। आदमी का दिमाग खराब हो जाए तब? तब एक से एक बढ़िया परामर्श देने वाले, एक-से सहायता देने वाले क्या कर सकते हैं? कोई सहायता नहीं कर सकता। किसकी? जिसका दिमाग खराब हो गया है। क्या करेंगे? अपना दिमाग तो सही हो, अपनी झिल्ली तो सही हो, अपनी आँखों का तिल तो सही हो। ये सही होंगे, तो फिर सूरज भी सहायता करेगा, वायु भी सहायता करेगी।

🔶 पाँच तत्त्व दुनिया में हैं, जिसमें से हवा भी है, रोशनी भी है, सूरज भी है—ये सब आदमी की सहायता करते हैं। इन्हीं की सहायता से तो आदमी जिन्दा है; लेकिन आदमी जिन्दा तो होना चाहिए। मर गया होगा तब, साँस क्या करेगी? बहुत अच्छी प्रातःकाल की हवा है; हवा फेफड़ों को मिलनी चाहिए; पर लेगा तो तभी, जब वह जिन्दा हो। जिन्दा नहीं हो, तो क्या करेगी हवा। एक से एक बढ़िया आहार है और भोजन है; लेकिन आहार और भोजन के होते हुए अगर किसी आदमी का पेट खराब हो जाए तब? आप क्या खिला करके करेंगे? और उल्टा पेट में दर्द हो जाएगा। आप पौष्टिक पदार्थ दीजिए, मलाई-मिठाई दीजिए। अगर पेट खराब है, पचता नहीं है, तो मलाई-मिठाई क्या करेगी? और जहर पैदा कर देगी। मेरा मतलब पात्रता से है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 80)

👉 गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य समान

🔶 इस अनुभूति को बताने वाली एक शिष्य की बड़ी मधुर आप बीती है। गुरु के स्पर्श ने इस शिष्य को अनायास ही लोहे से सोने में बदल दिया। बंगाल के एक गाँव सिहुड़ में जन्म हुआ। माँ-बाप ने नाम दिया सिद्धेश्वर। जिसे बाद में गाँव-टोले के लोगों ने मिलकर सिधुआ बना दिया। जैसा नाम वैसा गुण, सिद्धेश्वर बचपन से ही सीधा और भोला था। दैव का प्रकोप माँ-बाप बचपन में ही चल बसे। अनाथ होने का दर्द उसके सिवा भला और कौन अनुभव कर सकता था। अपमान से दिया गया अन्न और तिरस्कार से दिया गया जल उसकी भूख-प्यास बुझा देता था, पर कभी-कभी जब और अधिक अपमान सहने की हिम्मत न पड़ती, तो वह भूखा ही सो जाता।
  
🔷 उसका बचपन ऐसे ही बीत रहा था। तभी एक दिन बाबा सोमेश्वर उसके गाँव में आये। उनकी भव्य देह यष्टि, शुभ्र केश, ज्योति बिखेरती आँखें, आशीर्वचन सुनाते होंठ उसने जब पहली बार उनको देखा तो देखता ही रह गया। समझ में नहीं आया क्या कहे? कैसे कहे? उसने तो बस इतना ही सुना कि बाबा को लोग परमहंस देव कह रहे हैं। उसने जब उनके पास जाने के लिए सोचा, तो किसी ने उसे जोर का धक्का दिया, पर बाबा ने अपने बलिष्ठ हाथों से उसे सम्भाल लिया। वह तो बस डर के मारे उनसे चिपट गया। भीड़ जब बाबा के पास से विदा हुई, तो बाबा उसका सिर सहलाते हुए बोले-बेटा! मैं इस गाँव में केवल तुम्हारे लिये आया हूँ।
  
🔶 उसका भी कोई अपना है, यह उसके लिए बड़े अचरज की बात थी। पर बाबा ने उसे बड़े प्यार से माँ दुर्गा का मंत्र स्मरण करना सिखाया और बोले-बेटा! तुम बिना परेशान हुए इसी गाँव में रहते हुए सबकी सेवा करते रहो। पर बाबा ये लोग तो ......! वह आगे और कुछ बोल पाता तभी बाबा बोले ‘बहुत सताते हैं न तुम्हें।’ हाँ बाबा। उसकी हाँ सुनकर बाबा सोमेश्वर ने अपनी आँखें शून्य में टिका ली और कहीं आकाश में खो गये। कुछ सोचते हुए उनकी आँखों में आँसू भर आये। फिर थोड़ी देर में प्रकृतिस्थ हुए और बोले- ये सब जो भी सतायें, उसे प्रसन्नतापूर्वक सहन करो। इन सबके उत्पीड़न को प्रसन्नतापूर्वक सहते हुए इनकी सेवा करो। यही तुम्हारा साधना पथ है। मानोगे मेरी बात, कर सकोगे ऐसा।
  
🔷 १५-१६ साल का सिद्धेश्वर चुप हो गया। पर मना कैसे करता, जिन्दगी में पहली बार तो किसी ने उससे प्रेम से बात की है। उसने हामी भर दी। माँ दुर्गा का स्मरण, सारे तिरस्कार को सहकर सबकी सेवा, यही उसका जीवन बन गया। लोग जितना अधिक अपमानित करते, माँ दुर्गा उसे उतनी ज्यादा याद आती। बड़े विह्वल होकर वह माँ को पुकारने लगता। रात में जब सोता, तब सपने में कभी-कभी वह परमहंस बाबा सोमेश्वर उसके सिरहाने बैठे दिखते। इन सालों में उसमें एक फर्क यह हुआ कि अब वह युवा हो गया। एक दूसरा फर्क यह हुआ कि अब सोते-जागते उसका मन जगन्माता माँ दुर्गा और अपने प्यारे गुरुदेव में विलीन रहता।
  
🔶 अब धीरे-धीरे उसे लोगों ने अपमानित करना बन्द कर दिया। पर उसका मन अब माँ का हो गया था। माँ के स्मरण से ही उसकी सुबह होती और माँ के स्मरण से ही उसकी पलके मुँदती। एक रात जब वह सो रहा था, तभी अचानक मूलाधार में सोई महासर्पिणी जाग उठी। अजीब सा प्रभाव हुआ उस पर। लगभग विक्षिप्त सा हो गया। यह दशा सालों बनी रही, परन्तु बाद में उसका मन स्थिर और शान्त हो गया। उसके मन के ज्ञान-कपाट खुल गए। इतने दिनों में चौबीस सालों का अन्तराल हो गया था। एक दिन बाबा सोमेश्वर फिर से उसके पास आए और बोले बेटा! तुम्हारी साधना सफल हो गयी है। अब तुम सिद्ध हो। उसने विह्वल हो उनके पाँव पकड़ लिए और बोला बाबा मैं तो इन चरणों का दास हूँ। मैं तो कुछ किया ही नहीं, बस आपके कहे को करता रहा हूँ। बाबा हँसते हुए बोले, गुरु के कहे हुए को जो अक्षरशः कर लेता है, वह शुद्ध, बुद्ध व मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो गुरु का विरोध करता है, वह दुर्गति को प्राप्त होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 121

👉 आत्म-चिन्तन

🔷 सुजाता ने खीर दी, वृद्ध ने उसे ग्रहण कर परम सन्तोष का अनुभव किया। उस दिन उनकी जो समाधि लगी तो फिर सातवें दिन जाकर टूटी। जब वे उठे, उन्हें आत्म-साक्षात्कार हो चुका था।

🔶 निरञ्जरा नदी के तट पर प्रसन्न मुख आसीन भगवान् बुद्ध को देखने गई सुजाता बड़ी विस्मित हो रही थी कि यह सात दिन तक एक ही आसन पर कैसे बैठे रहे? तभी सामने से एक शव लिये जाते हुए कुछ व्यक्ति दिखाई दिये। उस शव को देखते ही भगवान् बुद्ध हँसने लगे।

🔷 सुजाता ने प्रश्न किया- योगिराज! कल तक तो आप शव देखकर दुःखी हो जाते थे, आज वह दुःख कहाँ चला गया?

🔶 भगवान बुद्ध ने कहा- बालके! सुख-दुःख मनुष्य की कल्पना मात्र है। कल तक जड़ वस्तुओं में आसक्ति होने के कारण यह भय था कि कहीं यह न छूट जाय, वह न बिछुड़ जाये। यह भय ही दुःख का कारण था, आज मैंने जान लिया कि जो जड़ है, उसका तो गुण ही परिवर्तन है, पर जिसके लिये दुःख करते हैं, वह तो न परिवर्तनशील है न नाशवान्। अब तू ही बता जो सनातन वस्तु पा ले, उसे नाशवान् वस्तुओं का क्या दुःख?

🔷 सुजाता यह उत्तर सुन कर प्रसन्न हुई और स्वयं भी आत्म-चिन्तन में लग गई।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1970 पृष्ठ 31

👉 O GOD! MAY YOUR WISHES GET FULFILLED.

🔷 Lin-Chi was contemporary to the famous Chinese philosopher Confucius and he deserved his honor too. Confucius always used to say that God listens only to the prayers of Lin-Chi. One of his disciples, in curiosity, went to see Lin-Chi. He asked Lin-Chi about his daily routine. Lin-Chi laughed and said—I am a common farmer. I passed my day in the farm. I take my meal when am hungry. I go to sleep when feel drowsy. Why to pray separately—everything in my life is all His and is dedicated to Him only.

🔶 The disciple got disappointed hearing all this. He narrated this incident to Confucius. Confucius said—Son! Whose life has already become the psalm of God; he doesn’t need any kind of pomposity. True devotee calls Him with his soul, not through any external sources. The disciple learnt that the secret of devotion is in true sigh of soul, not inside any external coverings and colorings.

📖 From Akhand Jyoti

👉 हे ईश्वर! तेरी इच्छा पूर्ण हो।

🔷 लिंची चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्फ्यूशियस के समकालीन थे और उनके सम्मान के पात्र भी। वे सदा कहा करते थे कि भगवान सिर्फ लिंची की प्रार्थनाएँ सुनता है। कौतूहलवश कन्फ्यूशियस का एक शिष्य लिंची से मिलने पहुँचा। उसने लिंची से उनकी दिनचर्या के विषय में पूछा। लिंची हँसे और बोले—मैं साधारण किसान हूँ। दिन खेत में गुजर जाता है। जब भूख लगती है, खा लेता हूँ। जब नींद आती है तो सो जाता हूँ। भगवान की अलग से प्रार्थना क्या करनी—यह सब तो उसी का है, उसी को अर्पित है।

🔶 शिष्य यह सुनकर बड़ा निराश हुआ। उसने यह घटना कन्फ्यूशियस को सुनाई। कन्फ्यूशियस बोले—वत्स! जिसका जीवन ही भगवान की प्रार्थना बन गया हो, उसे अलग से आडम्बर करने की क्या आवश्यकता है। सच्चा भक्त परमात्मा को अंतरात्मा से पुकारता है, बाहर के साधनों से नहीं। शिष्य की समझ में आ गया कि भक्ति का मर्म अंतर्मन की सच्ची पुकार में है, बाह्य कलेवरों में नहीं।

📖 अखण्ड ज्योति से

👉 Amrit Chintan 3 April

🔷 The motto of our life our action and reaction must not be self centered but others welfare must also be considered. It must be constructive ans should not hurt others – anyway. Our life is a part of society and we owe society for its big share to develop the present civilization. Our development depends on the growth of the society we live. If we participate in the development of society with our utmost sincerity at individual level – we will create heaven on earth.

🔶 Society grows and develops it’s– culture and establish its civilization by a collective efforts of the individuals of the society. But our all abilities status, position must also be used to help downtrodden people and impart help to those who are trying to stand on their feet. Only then we are making proper use of our life given by the creator. This way our all habits and actions should not be individualistic but for others too. The philosophy of our life must be so that we are for others too. The interest and welfare of masses must be the aim of our life.

🔷 To develop greatness in life is to leave an example on the hearts of people for ages, we will have to develop own will power. A constant divine light in yourself must guide you. It is that divine light which every man has. One can successfully overpower all sorts of hurdles in life. A firm believes on self – the purest and sacred most consciousness of yours – is the secret to lead you the true success is life and also to achieve greatness – the excellence of life.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 2)

🔷 नारद एक बार मनोकामना माँगने के लिए भगवान के पास गए और ये कहने लगे—एक युवती का स्वयंवर होने वाला है और मुझे आप राजकुमार बना दीजिये, सुन्दर बना दीजिए, ताकि मेरी अच्छी लड़की से शादी भी हो जाए और मैं सम्पन्न भी हो जाऊँ; दहेज जो मिलेगा, उससे मालदार भी हो जाऊँगा। मालदार बनने की और सम्पन्न बनने की दो ही तो मनोकामनाएँ हैं और क्या मनोकामना है? एक लोभ की मनोकामना है, एक मोह की मनोकामना है। दोनों के अलावा और कोई तीसरी मनोकामना दुनिया में है ही नहीं। इन दोनों मनोकामनाओं को लेकर जब नारद भगवान के यहाँ गए, तो भगवान के अचम्भे का ठिकाना नहीं रहा। भक्त कैसा? जिसकी मनोकामना हो। मनोकामना होगी तो भक्त नहीं होगा—भक्त होगा तो मनोकामना नहीं होगी। दोनों का निर्वाह एक साथ नहीं हो सकता।

🔶 जहाँ अँधेरा होगा, वहाँ उजाला नहीं रहेगा; जहाँ उजाला रहेगा, वहाँ अँधेरा नहीं होगा। दोनों एक साथ जोड़ कैसे होगा? इसलिए भगवान सिर पर हाथ रख करके जा बैठे। अरे! तुम क्या कहते हो नारद? लेकिन नारद ने अपना आग्रह जारी रखा—नहीं, मेरी मनोकामना पूरी कीजिए, मुझे मालदार बनाइये, मेरी विषय-वासना पूरी कीजिए। भगवान चुप हो गए। नारद ने सोचा—भगवान ने चुप्पी साध ली है, शायद मेरी बात को मान लिया होगा। भगवान को माननी चाहिए भक्त की बात ऐसा ख्याल था। बस वो चले गए स्वयंवर में। स्वयंवर में जाकर के बैठे। राजकुमारी ने देखा—कौन बैठा है? नारद जी का और भी बुरा रूप बना दिया—बन्दर जैसा। राजकुमारी देखकर मजाक करने लगी, हँसने लगी; ये बन्दर जैसा कौन आ करके बैठा है? बस, उसको माला तो नहीं पहनाई और दूसरे राजकुमार को माला पहना दी।

🔷 नारद जी दुःखी हुए, फिर विष्णु भगवान के पास गए; गालियाँ बकने लगे। विष्णु ने कहा—अरे नारद! एक बात तो सुन। हमने किसी भक्त की मनोकामना पूरी की है क्या आज तक। इतिहास तो ला भक्तों का उठा करके। जब से सृष्टि बनी है और जब से भक्ति का विधान बना है, तब से भगवान् ने एक भी भक्त की मनोकामना पूरी नहीं की है। हर भक्त को मनोकामना का त्याग करना पड़ा है और भगवान की मनोकामना को अपनी मनोकामना बनाना पड़ा है। बस, कल हम ये बता रहे थे कि आप अगर उपासना कर सकते हों, तो आप भी भगवान के बराबर हो सकते हैं और उनसे बड़े भी हो सकते हैं और भगवान के गुण और आपके गुण एक बन सकते हैं; आप महापुरुष हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं, ऋषि हो सकते हैं, देवात्मा हो सकते हैं और अवतार हो सकते हैं, अगर आप उपासना का ठीक तरीके से अवलम्बन लें तो। कल का ये विषय था।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 78)

👉 गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य समान

🔷 इस सच के नये आयाम खोलते हुए भगवान् सदाशिव आदि माता भवानी से कहते हैं-

गुरुदर्शितमार्गेण मनःशुदिं्ध तु कारयेत्। अनित्यं खण्डयेत् सर्वं यतिं्कञ्चिदात्मगोचरम्॥ ९९॥
ज्ञेयं सर्वस्वरूपं च ज्ञानं च मन उच्यते। ज्ञानं ज्ञेयसमं कुर्यात् नान्यः पन्था द्वितीयकः॥ १००॥

🔶 गुरुदेव जो भी राह दिखायें, उसी राह पर चलते हुए मन की शुद्धि करना कर्त्तव्य है। शिष्य को चाहिए कि मन व इन्द्रियों से भोगे जाने वाले सभी भोगों को और सभी अनित्य पदार्थों को त्याग दे ॥ ९९॥ सभी को आत्मस्वरूप अनुभव करना ज्ञान हैं। जिसे ज्ञान हो रहा है और जिसका ज्ञान हो रहा है, ये दोनों ही समान है अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् अपनी आत्मा का विस्तार है। ऐसा अनुभव ही मोक्ष कारक है। इसके सिवा अन्य कोई पथ नहीं है॥ १००॥

🔷 गुरुगीता के रूप में उचारे गये इन शिव वचनों में साधना, साध्य व सिद्धि का मर्म छिपा है। साधना वही, जो गुरुदेव बतायें। साध्य वही, जिसकी ओर वे इशारा करें और सिद्धि वही, जिसमें कि उनकी आत्मतत्त्व के विस्तार रूप में अनुभव हो। इस सम्पूर्ण जगत् में एक ही तत्त्व है-एक ही सत्य है। इस आत्मतत्त्व के अनुभव में जो प्रतिष्ठित हो गये, वही ज्ञानी हैं। ज्ञान, ज्ञाता व ज्ञेय में कोई भेद नहीं है। सब एक ही का विस्तार है। गुरु द्वारा दिखाई गयी राह पर चलने से प्रत्येक शिष्य को यह अनुभूति हो जाती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 120

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 3 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 3 April 2018


रविवार, 1 अप्रैल 2018

👉 चरवाहे की सम्पत्ति

🔶 ईरानी शाहंशाह अब्बास शिकार के लिए जंगल में भटक रहे थे। वहाँ उनकी भेंट एक चरवाहे बालक से हो गई। नाम था- मुहम्मद अलीवेग। चरवाहा होते हुए भी उसकी हाजिर जबावी तथा व्यक्तित्व से शाह बड़े प्रभावित हुए और लौटते समय उसे भी अपने साथ ले आए।

🔷 मुहम्मद अलीवेग को राज्य का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। यद्यपि वह एक निर्धन परिवार का था, इतनी धन-दौलत को देखकर फिर भी उसका मन तनिक भी विचलित न हुआ। वह अपने को कोषालय के समस्त धन का रक्षक मानता था। इतने बड़े पद पर रहते हुए भी उसके जीवन में सादगी थी। शाह अब्बास के बाद उनका अल्प वयस्क पौत्र शाह सफी राज सिंहासन पर आसीन हुआ। किसी ने शाह के कान भर दिए कि मुहम्मद अली राज्य के धन का दुरुपयोग करता है। शाह ने उस प्रकरण को जाँच के लिए अपने पास रखा और एक दिन बिना सूचना के उसकी हवेली का निरीक्षण करने जा पहुँचे।

🔶 शाह ने हवेली के सब कमरों का निरीक्षण किया। थोड़ी-सी वस्तुओं के अतिरिक्त वहाँ कुछ दिखाई ही न दे रहा था। शाह निराश होकर लौटने लगा, तो खोजियों के संकेत पर शाह की दृष्टि एक बंद कमरे की ओर गयी। उसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे। अब शाह की शंका को कुछ आधार मिला था। उन्होंने पूछा-''इसमें क्या चीज है, जिसके लिए इतने मजबूत ताले लगाये हैं।''

🔷 तुरंत ताले खोल दिए गए। शाह ने कक्ष के मध्य मेज पर एक लाठी, शीशे की सुराही आदि बर्तन तथा पोशाक और दो मोटे कंबल देखे। मुहम्मद ने कहा-'' जब स्वर्गीय शाह मुझे यहाँ लाए थे उस समय मेरे पास यही वस्तुएँ थीं और आज भी मेरे पास अपनी कहने को यही हैं। मैं इससे प्रेरणा ग्रहण करता और उसी स्तर के जीवन का अभ्यास बनाए रखता हूँ।'' युवा बादशाह इस आदर्शनिष्ठा को देखकर नत-मस्तक हो गया।
 
📖 प्रज्ञा पुराण भाग 2 पृष्ठ 16

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 April 2018

👉 आज का सद्चिंतन 2 April 2018


👉 NEVER MISUSE WHAT YOU HAVE RECEIVE

🔶 Born, played for couple of days, made castles in the air during adolescence, got married when became adult, worked restlessly to earn to carry on the laden load, solved somehow, to some extent, the endless problems of self-extended family, attacked by feebleness and sickness with passing age, all the property which was added throughout life being seized by worthy progeny, forcing ourselves to pass the remaining life in insult, helplessness and disgraced position and at last being curbed by death while sighing and crying—is this the destiny of a common human being?

🔷 Being far away from the reality of their closest self and remained entangled in illusions, most of the persons find themselves incapable of even self-introspection. Though the load of life is carried away somehow, but what did we ourselves, this enormous world and that Creator (Almighty) get who blessed us with great care and expectations? When conferred this way, only reply which echoes is- the opportunity and privilege we got, it did make some trail like a raising black fume after burning; but it vanished somewhere in this infinite space like a forgotten story!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्राप्त का दुरूपयोग न होने दें

🔶 जन्मा, कुछ दिन खेला-कूदा, किशोरावस्था आने पर कल्पना की रंगीली उड़ानें भरना, युवा होते-होते विवाह बंधनों में बंधना, जो बोझ लादा उसे वहन करते रहने के लिए दिन-रात कमाने के लिए खटते रहना, बढाए हुए परिवार की बढती समस्याओं को जिस-तिस प्रकार किसी हद तक सुलझाना, ढलती आयु के साथ अशक्तता और रुग्णता का चढ़ दौड़ना, समर्थ संतानों द्वारा समस्त वैभव पर कब्ज़ा जमा लेना, स्वयं को असहाय, अपमानित स्थिति में दिन गुजारने के लिए बाधित होना और रोते-कलपते मौत द्वारा दबोच लिया जाना, क्या यही है आम लोगों की नियति?

🔷 अपने आस-पास की ही वास्तविकता से कोसों दूर, भ्रांतियों में उलझे रहकर, अधिकांश लोगों से तो आत्म-समीक्षा तक नहीं बन पड़ती। जिंदगी का बोझ तो किसी प्रकार वहन कर लिया जाता है, पर उसके साथ अपने को, विशाल विश्व को और भारी अरमानो के साथ हमें निहाल करने वाले स्रष्टा को क्या मिला? इस प्रकार विचार करने पर एक ही उत्तर प्रतिध्वनित होता है, कि जो सुयोग-सौभाग्य उपलब्ध हुआ था, वह जलने-भुनने पर उठने वाले काले धुएँ की तरह कुछ बना तो सही; पर अदृश्य अंतरिक्ष में एक विस्मृत तथ्य बनकर न जाने कहाँ तिरोहित (विलीन) हो गया! 

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Amrit Chintan 2 April

🔶 The Omnipresent God - is a law, a system, which controls the entire creation, Existence of all – animates and in-animates are under that system. Any one who does not follow – gets destroyed. If we can assure our-self to this law and follow we are true devotee to God.

🔷 Love is a great force of attraction which moves a man towards God. Then he will love every creature of the universe. It means now he truly believe presence of invisible God visible in every body. God is always with him. Love is God and God is love, that is all you know and you need to know. This practice of love for all is easiest and blissful worship of God.

🔶 Science of Spirituality is the way to achieve the true wisdom of life. It is that path which leads to make the proper use of this finest gift of the creator. If God’s worship does not take care of his own life – it is a waste of time in – worship.
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियो! भाइयो!!

🔶 कल आपको उपासना की महत्ता के बारे में बताया जा रहा था। भगवान के नजदीक आप बैठें, उपासना करें, तो देखेंगे कि उनके सारे गुण आप में आते चले जाते हैं। बिजली को छूता है, तो उसके अन्दर करेण्ट आ जाता है। भगवान् को जो छुएगा, भगवान से उसमें करेण्ट आ जाएगा। दो तालाबों को आपस में जोड़ दें, तो नीचे वाले तालाब का लेवल बढ़ता हुआ चला जाता है और दोनों का तल एक हो जाता है। भगवान और भक्त एक हो जाते हैं। सच तो ये है भक्त भगवान से भी बड़े हो जाते हैं; क्योंकि भगवान भक्त का उत्साह बढ़ाना चाहते हैं और दूसरे कामों में उपयोग करना चाहते हैं।

🔷 शबरी के जूठे बेर भगवान ने खाये थे न! गोपियों के यहाँ भगवान छाछ माँगने गए थे न! बलि के दरवाजे पर बावन अंगुल के बन करके भगवान गए थे न! कर्ण के दरवाजे पर सोना माँगने के लिए साधु और भिखारी का रूप बनाकर गए थे न! ये बड़प्पन है, भक्त का बड़प्पन। भृगु ने भगवान के सीने में लात मारी थी, कहाँ कैसे भगवान हैं! जो अपने कर्तव्य का ध्यान नहीं रखते और भगवान ने महर्षि भृगु की लात के निशान को अपनी छाती पर अभी तक सुरक्षित रखा हुआ है। विष्णु की मूर्तियों में महर्षि भृगु की लात का निशान बना रहता है। महर्षि भृगु बड़े थे भगवान से।

🔶 भक्त बड़ा होता है भगवान से; पर सही भक्त होना चाहिए। सही भक्त की कल हम आपको पहचान बता चुके हैं और ये बता चुके हैं कि भक्त को भगवान के अनुशासन पर निर्भर रहना चाहिए; भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए; अपनी मनोकामना की बाबत ध्यान नहीं रखना चाहिए की हमारी मनोकामना खत्म कर दी गई। भक्त अपनी मनोकामना खत्म कर देते हैं और भगवान की मनोकामना को अपने ऊपर बनाए रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 77)

👉 गुरु का वाक्य ब्रह्मवाक्य समान

🔶 ‘गुरुगीता’ गुरुगत प्राण शिष्यों के लिए मंत्रमय है। जो शिष्य हैं, वे महामंत्रमयी गुरुगीता का मर्म समझते हैं। उन्हें मालूम है कि मंत्र साधक की मानसिक चेतना की दशा व दिशा को आमूल-चूल बदल देता है। यह बदलाव लोहे को सोने में बदलने जैसा है। ‘मंत्र’ पारस के छूते ही सब कुछ बदल जाता है। लोहे की कलंक-कालिख सोने की स्वर्णिम आभा बिखरने लगती है। साधना व गुरुकृपा से अनजान चित्त के लिए यह पारस कथा अतिशयोक्ति भरा झूठ लग सकती है। पर जिन्हें गुरु की कृपा छाँव मिली है, वे जानते हैं कि गुरुदेव की छुअन में सारे आश्चर्यकारी परिवर्तन समाये हैं। उनकी कृपा से सारे असम्भव सहज सम्भव हो जाते हैं। साधना का सच-गुरुकृपा का प्रभाव तार्किक विश्लेषण व गणित शास्त्र के समीकरण की सभी सीमाओं से पार है।
  
🔷 इसका अतुलनीय प्रभाव हमेशा ही हमें अनुभव करने का नेह निमंत्रण देता है। जिन्हें यह निमंत्रण मिला है, जिन्होंने इसका अनुभव पाया है, उनके हृदय इन क्षणों में भी गद्गद एवं पुलकित हैं। इस पुलकन के कुछ पल इस गुरुभक्ति कथा के  पूर्वोक्त मंत्रों में विवेचित किये गये हैं। इसमें शिव संदेश यही है कि गुरुदेव से अधिक और कुछ नहीं है। भगवान् भोलेनाथ ने यही कहा है-गुरुतत्त्व परम कल्याणकारी है। यह मेरा (शिव का) आदेश है। गुरु ध्यान की सहज परिणति साफ है। उन कृपालु सद्गुरु की कृपा से मैं मुक्त हूँ, ऐसा चिंतन करना चाहिए। ऐसा चिंतन करने वाला सदा ही मुक्त रहता है। कर्मों की शृंखला उसे बाँधने में कभी समर्थ नहीं होती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 119

शनिवार, 31 मार्च 2018

👉 उपासना

🔷 मित्रो ! आप भगवान के अनुग्रह तक पहुँच सकते हैं और भगवान का अनुग्रह एवं जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने वालों ने जिंदगी के जो आनंद उठाए  हैं, वे उठा सकते हैं। शर्त यही है कि आप अपनी उपासना को भजन से आरंभ तो करें, पर उसे वहीं तक सीमित न करें। उसके साथ-साथ में जीवन की साधना, स्वाध्याय, विचारों  का परिमार्जन, संयम, अपनी जिंदगी के छिद्रों का निराकरण और सेवा, इनको आप मिला दीजिए, फिर देखिए कि आपकी उपासना फलित होती है कि नहीं?

🔶 आप सिद्धपुरुष बनते हैं कि नहीं? आप चमत्कृत होते हैं कि नहीं? भगवान आपके घर में सेवा-सहायता करने के लिए आते हैं कि नहीं? ऐसी है साधना, जिसको मैंने किया। मैं चाहता हूँ कि आपमें से हरेक आदमी को उसी तरीके से साधना करनी चाहिए जो कि सफल होती है और होती रहेगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 क्या कहीं अर्जुन एवं हनुमान हैं?

👉 परम पूज्य गुरुदेव का एक सामयिक लेख-
👉 (चैत्र नवरात्रि 1990 की पूर्वबेला में लिखा गया एक अप्रकाशित लेख)

🔶 महाभारत युद्ध चल रहा था। आवश्यकता थी कि पाँचों पाण्डवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ऐसे में अपना पराक्रम दिखाए। किन्तु उस पर तो व्यामोह सवार था। वह कर्त्तव्य युद्ध में कटिबद्ध होने से कतरा रहा था। नाना प्रकार के बहाने गढ़ रहा था। श्रीकृष्ण ने उसकी बहाने-बाजी के मूल में छिपे चोर को पकड़ा और कहा- हे समर्थ परंतप! कमर कस, आँतरिक दुर्बलता को छोड़ और युद्ध में प्रवृत्त हो। बहानेबाजी पर करारी चोट करते हुए कहा-अनाड़ियों जैसा मानस न बता। जो तुझे पतन के गर्त्त में धकेल रहा है। इस उद्बोधन ने अर्जुन की मूर्च्छना जगाई, उसे झकझोर डाला एवं वह गाण्डीव उठाकर नयी मानसिकता के साथ रथ में जा बैठा। कृष्ण उसके सारथी बने वह वह प्रयोजन पूरा हुआ जो श्रीकृष्ण अर्जुन को निमित्त बनाकर पूरा करना चाहते थे।

🔷 ऐसा ही कुछ त्रेता के अन्त में हुआ था। उस समय दो कार्य पूरे होने थे-एक अवांछनीयता का उन्मूलन, दूसरा सतयुग की वापसी वाले उच्चस्तरीय वातावरण की रामराज्य के रूप में स्थापना। इस प्रयोजन को राम की अवतारी समर्थसत्ता और लक्ष्मण की पुरुषार्थ-परायणता मिलजुल कर एकनिष्ठ भाव से पूरा कर रही थीं। राम-रावण युद्ध चल रहा था, इसी बीच एक व्यक्तिक्रम आ गया। लक्ष्मण को प्राणघातिनी शक्ति लगी, वे मरे तो नहीं पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े।

🔶 लक्ष्मण के बिना एक पक्षीय अर्धांग के पक्षाघात जैसी स्थिति से उद्देश्य पूर्ति में व्यवधान उत्पन्न होने जा रहा था। लक्ष्मण के बिना राम सर्वसमर्थ होते हुए भी अपने को असहाय अनुभव कर रहे थे। आवश्यकता यह गुहार मचा रही थी कि लक्ष्मण की मूर्च्छा किसी प्रकार दूर हो। संजीवनी बूटी कहीं से भी तुरंत लाया जाना अनिवार्य था, पर हिमालय जाये कौन? प्रश्न जटिल था किन्तु हनुमान की साहसिकता उभरी, बीड़ा उठाया और वे राम का नाम लेकर चल पड़े। प्राण हथेली पर रखकर जैसे भी बने पड़ा। ढूँढ़-खोज करते हुए संजीवनी बूटी लेकर वापस लौटे। संकट टल गया। दोनों भाई वह करने में जुट गए जिसके लिए उनका अवतरण हुआ था। अवाँछनीयता से पीछा छूटा एवं वह बन पड़ा जो सतयुग की वापसी के लिए अभीष्ट था।

🔷 दोनों उदाहरण आज भी आधुनिक संस्करण के रूप में देखे जा सकते है। युगान्तरीय चेतना का दिव्य आलोक देवी आकाँक्षा की पूर्ति में जुटा है। प्रज्ञापुत्रों की सामूहिक संगठन शक्ति और निर्धारित क्रिया–कलापों में जुटी तत्परता को लक्ष्मण स्तर की प्रतिभा कहा जा सकता है। दोनों की समन्वित शक्ति यदि ठीक तरह काम कर रही होती तो युगसंधि के विगत कुछ ही वर्षों में ही महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हो गया होता। फिर किसी को इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण में किसी प्रकार का संदेह करने की गुँजाइश नहीं रहती।

🔶 पर उस दुर्भाग्य का क्या किया जाय जो लक्ष्मणी रूपी परिजनों की संगठित शक्ति की तत्परता में मूर्च्छना की स्थिति में ले जा पहुँची। उसे उस मेघनाद रूपी विग्रह का मायाजाल भी कहा जा सकता है जो आड़े समय में उदासीनता-उपेक्षा के रूप में सामने आ खड़ा हुआ है। आपत्तिकाल की चुनौती सामने हो और परिजनों के समक्ष यह व्यामोह हो कि वे युगधर्म से कन्नी काट लें तो इस विडम्बना को क्या कहा जायेगा? इसे उज्ज्वल भविष्य के मार्ग आड़े आने वाला दुर्भाग्य भी कह सकते हैं एवं असुरता का आक्रमण भी। लक्ष्मण की साँसें तो चल रही हैं पर उनका धनुषबाण इन दिनों वह चमत्कार नहीं दिखा पा रहा है जिसकी महाकाल ने अपेक्षा की थी। लक्ष्मण की यह विपन्नता तपस्वी राम को खल रहा है इसका आकलन जीवन्तों की प्राण चेतना ही कर सकती है। लिप्सा-तृष्णाएँ तो केवल मूकदर्शक भर बने रहने का परामर्श दे सकती है। ऐसे में सबसे बड़ी आवश्यकता उस हनुमान स्तर की भाव चेतना की है जो अभीष्ट पुरुषार्थ प्रदर्शित करके बिगड़े काम को बनाने में संलग्न होकर अपनी वरिष्ठता और यशोगाथा को चिरकाल तक जन-जन की चर्चा का विषय बनाने। अनुकरण और अभिनंदनीय स्तर का पौरुष प्रदर्शन करने का ठीक यही समय है।

🔷 मिशन के समस्त दायित्व युगसंधि के साथ जुड़े है। इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण को इस भगीरथ की आवश्यकता है जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए भाव तरंगित हों और राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप−साधना का मार्ग अपनाने का साहस दिखा सके।

🔶 जिनका साहस उभरे उन्हें करना इतना भर है कि युगधर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप उन्हें समझाते हुए उन्हें नये सिरे से नयी उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न कर सकें। अपने समर्थ, प्रबुद्ध एवं पच्चीस लाख व्यक्तियों के परिकर के लोग ही नवसृजन में जुट सकें तो असंख्यों अनेकों को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। संयोगवश दैवी प्रवाह भी इसी दिशा में बह रहा है। उसके साथ जुड़कर रज, कण और तिनके, पत्ते भी आकाश चूमने में समर्थ हो सकते हैं। नवसृजन की, औचित्य की प्राणप्रतिष्ठा के लिए आकुल-व्याकुल युगान्तरीय चेतना अब तक के सभी महान् परिवर्तनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध होगी, अगले दिनों हम उन्हीं चर्मचक्षुओं से ऐसी संरचना को सामने खड़ी देखेंगे।

🔷 प्रयोजन की पूर्ति के लिए इसी नवरात्रि से लेकर आगामी आश्विन नवरात्रि तक के प्रायः छः महीनों के लिए एक छोटी योजना सामयिक दृष्टि से बताई गई है। जिनके मनों में अनुरोधजन्य स्फुरणा उठे, उन्हें इतना छोटा निर्धारण तो पूरा कर लेना चाहिए जो इस प्रकार है-

🔶 अपने संपर्क क्षेत्र के प्रज्ञा परिजनों के घरों तक पहुँचने का योजनाबद्ध कार्यक्रम बनायें और उनसे कहें कि यह समय शिथिलता, उपेक्षा का है नहीं। अपने समय में से दो घण्टे नित्य तो युगधर्म के निर्वाह में लगना ही चाहिए। घर-घर दीपयज्ञ जन्मदिवसोत्सव मनाते हुए धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का यह समय है।

🔷 समयदान को नियोजित करने के लिये दो कार्यक्रम चलाएँ (।) झोला पुस्तकालय-जिसके अंतर्गत अपने क्षेत्र के शिक्षितों से संपर्क साधकर उन्हें युगसाहित्य पढ़ने वापस लेने का सिलसिला जारी कर देना चाहिए। वह स्वाध्याय की प्रक्रिया है (॥) साप्ताहिक सत्संग-जिसमें सप्ताह में कम से कम एक दिन प्रस्तुत विचारधारा के समर्थक मिल बैठ लिया करें। सहगान कीर्तन, अभिनव संदेशों का प्रवचन तथा दीपयज्ञों का संक्षिप्त आयोजन कर लिया करें।

🔶 अखण्ड-ज्योति, युगनिर्माण योजना एवं युगशक्ति गायत्री पत्रिका के पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहना। इसी के माध्यम से युग चेतना का संदेश जन-जन तक हर माह अपनी प्राण चेतना समेत जा पहुँचता है। जहाँ संभव हो वहाँ ज्ञानरथ स्वयं चलायें।

🔷 अपने समय की ज्ञानसत्ता को युगदेवता को गली-गली घुमाने घर-घर पहुँचाने का यह पुण्य उपक्रम है। अब तो इनमें टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर भी लगा दिये गये हैं जिनसे युगसंगीत भी सुनाया जा सकता है। यह कार्य नौकरों, फेरीवालों से न कराके स्वयं करें।

🔶 पुराने या नये प्रतिभावान परिजनों को शान्तिकुँज में निरन्तर चलने वाले शिक्षण सत्रों में से किन्हीं में इन्हीं दिनों सम्मिलित होने के लिए भेजना। यह बैटरीचार्ज कराने की प्रक्रिया है। युगनेतृत्व सँभालने के लिए उपयुक्त पात्रता इसी से उपलब्ध होगी। ये सत्र तारीख 1 से 9, 11 से 19, 21 से 30 में हर माह चलते हैं। किस सत्र में सम्मिलित होना है, इसका विवरण अपने विस्तृत परिचय के साथ भेजकर स्वीकृति की प्रतीक्षा करने को कहा जाय। जिनके लिये संभव हो, उन्हें हर वर्ष आने, नया संदेश, नया उत्साह प्राप्त करते रहने के लिये कहा जाय।

🔷 इन पाँचों कार्यों में किसने क्या प्रगति की, इसकी रिपोर्ट लेकर परिजन शरदपूर्णिमा किन्हीं सत्रों में शान्तिकुँज पहुँचे तथा मार्गदर्शन प्राप्त करें। इससे भावी नीति का निर्धारण करने में मदद मिलेगी।

📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1993 पृष्ठ 47-48

गुरुवार, 29 मार्च 2018

👉 ज्ञान और आस्था

🔷 एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

🔶 नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दुहती, फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।

🔷 पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

🔶 अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गयी। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। उन्हें सिर्फ लक्ष्मी का इन्तजार था। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

🔷 लक्ष्मी ने भी बड़ी मासूमियत से पंडित जी से कह दिया कि- “नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, मै नदी कैसे पार करती ? इसलिए देर हो गयी।“

🔶 पंडित जी गुस्से में तो थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, ‘‘क्यों बहाने बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती?”

🔷 पंडित जी की बातों का लक्ष्मी पर बहुत गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो नदी के किनारे मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी की सतह पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देख कर पंडित जी हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह इतनी जल्दी नहीं आता है।

🔶 उन्होंने लक्ष्मी से पूछा- “ तुमने आज नदी कैसे पार की ? इतनी सुबह तो कोई मल्लाह नही मिलता।”

🔷 लक्ष्मी ने बड़ी सरलता से कहा- ‘‘पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से नदी पार कर ली। मैंने भगवान् का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली।’’

🔶 पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गयी और उसने भगवान का नाम जपते-जपते बड़ी आसानी से नदी पार कर ली।

🔷 पंडित जी हैरान रह गये। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करनी चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाये और धड़ाम से पानी में गिर गये।

🔶 पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा- ‘‘आपने तो भगवान का नाम लिया ही नहीं, आपका सारा ध्यान अपनी नयी धोती को बचाने में ही लगा हुआ था।’’

🔷 पंडित जी को अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी ज्ञान की जरूरत नहीं होती। उसे तो पाने के लिए सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 30 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 30 March 2018


👉 MICRO-ANALYSIS OF SPIRITUALISM

🔷 What is spiritualism? It is upside down process of our life. Do you see it as juggling or thaumaturgy? There is nothing like that. Albeit, the direction of life is flipped and turned out here. The way common persons of the world think, wish and do, on the contrary the processes of spiritualistic life is completely different.

🔶 Different types of flirtations and handiwork you perform for a glimpse of God, for worshipping, miraculous enlightenment and getting prosperity, it is better not to indulge into that, because this will be too tough to you. You’ll be shattered into pieces at the very first step. When you will be asked for celibacy and you will be directed that physical celibacy is not as necessary as mental and internal one, then you’ll start biting your finger and say, firstly we are not able to celibate physically, then what to say about going mental celibacy! Our mind and eyes remain indulged in misconduct and vices 24 hours. When whole of your power will be destroyed in this only, then how on earth your serpent power (secret centers of immense divine powers hidden in one’s spinal cord) would get awakened? When you’ll spoil whole of your power needed to awaken the serpent power in these vices and misconducts through your eyes in the form of vicious waves, then you’ve definitely ended up all of your power and energy in vain.

🔷 Similarly, the blood which is formed after you take food and which in turn creates your mind and thoughts, has got contaminated due to intake of improper, fraudulently-earned and ill gotten food. How the hell you’ll be able to make it stable and concentrated in spiritualism and Almighty?

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 Amrit Chintan 30 March

🔷 The path followed by great men of the time show us the right way of living. If we follow them we will also attain the same aim of life as they could. Success of our life and wisdom can be attained on their guidance. Our life should not be like depressed, pessimistic or like those who are totally materialistic. We should not be hippocratic either in our talks and actions. That is our show of life totally different then what we are.

🔶 We should work hard for our progress in life, but should not disturbed in our present situation. Money is not everything in life. If we develop our nature and behavior and create an atmosphere of happiness by sharing and caring for other. We can enjoy the bliss of life.

🔷 When one’s Soul attain oneness with super-consciousness or God, it means that beastile behavior (selflessness) gets change into divinity, the beggar becomes a donor and so on. This type of change in human nature is known as unity with God – vilay, visarjan and sharnagati or total surrender to God. At that level the devotee and God become one or adwait i.e. oneness (no two). 
                                       
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (अन्तिम भाग)

🔷 भावी जीवन की आपकी रूपरेखा क्या हो, आप केवल अपने ही लिए ही नहीं जिएँ, उसमें समाज की भी हिस्सेदारी है, लोगों की भी हिस्सेदारी है, भगवान की भी हिस्सेदारी है, आदर्शों की भी हिस्सेदारी है, धर्म और संस्कृति की भी हिस्सेदारी है—उस हिस्सेदारी को आप कैसे निभा पायेंगे? उसके बारे में शिक्षण, आपका सायंकाल का शिक्षण इस उद्देश्य के लिए है, आप इस उद्देश्य को समझिये। आप घटना को देखेंगे और यहाँ के क्रम को देखेंगे, तो ऊपर ही दृष्टि रह जाएगी। दृष्टि को भीतर ले जाइए, दर्शन समझिये यहाँ के कल्प का और यह मानकर चलिए कि यहाँ कल्प का मतलब है—बदल डालना।

🔶 अब आपको यहाँ से बदलते हुए जाना है। घर जाकर आपको अपना बदला हुआ रूप दिखाना है। घर जाकर के आपके भावी जीवन में आपका क्रिया-कलाप और आपका उपक्रम ऐसा होना चाहिए, जिसमें पिछले जीवन से कोई संगति न हो। आप एक, आपका ईमान दो, आपका भगवान तीन, तीन तो आप ही के हैं सहपाठी। इन तीनों के साथ में तो आप सारे जीवन की मंजिल पूरी कर सकते हैं। जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों का दबाव मानें? जरूरी क्या है कि आप दूसरों के बहकावे में आएँ? जरूरी क्या है कि आप दूसरों को प्रसन्न करने की कोशिश करें? अपने ईमान को प्रसन्न कर लीजिए, बहुत है—भगवान को प्रसन्न कर लीजिए बहुत है।

🔷 आत्मा और परमात्मा को जो आदमी प्रसन्न कर सकते हैं, सारी दुनिया उनसे प्रसन्न रहती है अथवा चलिए यह मान लें—सारी दुनिया प्रसन्न न भी है, नाराज बनी है, तो उस नाराजगी से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। आपकी आत्मा नाराज हो, आपका परमात्मा नाराज और सारी दुनिया आपसे प्रसन्न बनी रहे और आरती उतारती रहे, तो उससे कुछ बनने वाला भी नहीं है। यही चिन्तन है, जो आपको एक महीने लगातार अपने मनःक्षेत्र में घुमाते रहना चाहिए। मन को बदलिए, सोचने के तरीके बदलिए, जीवन की कार्य-पद्धति बदलिये। बहुत कुछ बदलना है आपको। अगर बदल डालेंगे, तो मजा आ जाएगा! बस, आज तो मुझे इतना ही कहना था आपसे।

॥ॐ शान्ति:॥

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 76)

👉 सहस्रदल कमल पर सद्गुरु की दिव्यमूर्ति का ध्यान

🔷 सद्गुरु के ध्यान में रमी ऐसी ही एक गुरुकृपा सिद्ध महातपस्विनी माँ ज्योतिर्मयी का कथा प्रसंग बड़ा ही प्रेरक है। माता ज्योतिर्मयी का विवाह अल्पायु में उनके मायके वालों ने कर दिया था; पर देव का आघात उनके पति नहीं रहे। पति के बूढ़े माता-पिता भी इकलौते पुत्र के वियोग की वजह से स्वर्ग सिधार गए। इधर मायके वालों पर भी दुर्भाग्य की कुदृष्टि थी। वह थी भी माता-पिता की इकलौती कन्या। पुत्री की इस दारुण वेदना से विह्वल माता-पिता अधिक दिन जीवित न रह पाये। वे भी परलोकवासी हो गए। बारह-तेरह वर्ष की बालिका ज्योतिर्मयी का इस संसार में अपना कोई न रहा।
  
🔶 रोती-बिलखती, यह विधवा बालिका अपने जीवन के घने अँधेरे से घबरा गई। क्या करें? कहाँ जाएँगे? ये सवाल उसके सामने भूखे शेर की तरह गर्जने लगे। इनसे छुटकारा पाने के लिए उसके पास मात्र गंगा की गोद के सिवा और कोई भी रास्ता न था। सो उसने अपने गाँव के पास बहती हुई गंगा नदी की धारा में प्राण त्यागने की ठान ली। रात के घने अँधेरे में जब वह गंगा की गोद में छलाँग लगाने के लिए उद्यत थी, तभी किसी ने पीछे से आकर उसका हाथ पकड़ लिया। अचानक इस तरह हाथ पकड़ लेने पर वह चिहुँकी और चौंकी। पीछे मुड़कर देखा, तो गैरिक वस्त्रधारी एक वृद्ध संन्यासी खड़े थे। उनके श्वेत केश शुभ्र चाँदनी में चाँदी की तरह चमक रहे थे।
  
🔷 उन्होंने प्यार से उसका हाथ थाम कर केवल इतना कहा- बेटी! जिसका कोई नहीं होता, उसका भगवान् होता है। भगवान् अपने इस सबसे प्यारे बच्चे की सहायता के लिए किसी न किसी को अवश्य भेजता है। उसी ने तुम्हारे लिए मुझे भेजा है। आओ तुम मेरे साथ आओ। उन संन्यासी के स्वरों में माँ की ममता थी। बालिका ज्योतिर्मयी ने उन पर सहज विश्वास कर लिया। वही उनके गुरु हो गए और भरोसा, गुरु का ध्यान ही उसका धर्म बन गया। इसी धर्म के निर्वाह में उसके दिवस-रात्रि बीतने लगे।
  
🔶 प्रातः स्नान आदि नित्यकर्मों से निबटकर वह सद्गुरु के ध्यान में खो जाती। सहस्रदल कमल पर गुरुदेव की भव्यमूर्ति का ध्यान यही उसकी साधना थी। नियमित अभ्यास के प्रभाव से ध्यान का चुम्बकत्त्व घना होता गया और इस चुम्बकत्व ने उसके प्राण प्रवाह की गति बदल दी। निम्नगामी प्राण विद्युत् ऊर्ध्वगामी होने लगी। जो ऊर्जा निम्न केन्द्रों पर एकत्रित रहती थी। अब उसने ऊर्ध्वगामी होकर चेतना के उच्च केन्द्रों को जाग्रत् करना प्रारम्भ कर दिया। चक्रों के जागरण, बेधन एवं प्रस्फुटन की क्रिया चल पड़ी। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, काम करते हुए ज्योतिर्मयी की भावनाएँ सहस्रदल कमल में स्थापित सद्गुरु की चेतना में विलीन होती रहती थी। समय के साथ इसमें प्रगाढ़ता आती गयी।
  
🔷 वर्षों बीत गए और गुरु ने स्थूल देह का त्याग कर दिया; पर उनकी सूक्ष्म चेतना के साथ ज्योतिर्मयी का अभिनव साहचर्य था। वह हमेशा कहती थी कि सच्चा शिष्य हमेशा अपने गुरु के साथ रहता है। वह अपने गुरु में रहता है और गुरु उसमें समाए रहते हैं। अब उसका व्यक्तित्व सभी आध्यात्मिक सिद्धियों, शक्तियों एवं विभूतियों का भण्डार बन गया। आध्यात्मिक साधना की दुर्लभ कही जाने वाली अवस्थाओं को उसने सहज प्राप्त कर लिया। हालाँकि उसके आस-पास के लोग उसकी इस उच्च स्थिति से अनजान थे। उन्हें तो इस सत्य का तब पता चला, जब हिमालय की दुर्गम कन्दराओं में तप करने वाले योगिराज महानन्द ने उन्हें बताया कि तुम्हारे गाँव के पास गंगा किनारे वास करने वाली माँ ज्योतिर्मयी परम योगसिद्ध हैं और उन्हें यह अवस्था सद्गुरु के ध्यान से मिली है। इस सच को सुनकर सभी कह उठे- सद्गुरु की महिमा अनन्त! इस अनन्त महिमा के अनन्त विस्तार का अगला आयाम इस प्रकार है

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 118

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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