रविवार, 4 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 32)


🔵 तपस्या का एक प्रकार है जो मैं तुम्हारे लिए निर्दिष्ट करूँगा। भयंकर का ध्यान करो क्योंकि वह सर्वत्र है। एक सन्त ने ठीक ही कहा है, जिस किसी वस्तु का तुम स्पर्श करते हो वह दुःख ही है। इसे निराशा के अर्थ में न लो किन्तु एक विजयी के अर्थ में ग्रहण करो। सभी आध्यात्मिक अनुभवों में किसी न किसी रूप में तुम इस भयंकर की पूजा पाओगे। वस्तुतः  यह भयंकर की पूजा नहीं है। जो इन्द्रियों में बद्ध है उसी के लिये यह भयंकर है। सुखकर एवं भयंकर -शब्दों का अर्थ उसी व्यक्ति के लिए है जो कि देहबुद्धि का क्रीतदास है किन्तु तुम इससे ऊपर उठ चुके हो, कम से कम विचारों और आकांक्षाओं में, अनुभूति में न सही।

🔵 भयंकर का ध्यान करने से तुम निश्चित रूप से इन्द्रियजनित वासनाओं को जीत सकोगे। तुम आध्यात्मिक जीवन का आलिंगन करोगे। तुम शुद्ध और मुक्त हो जाओगे। तथा मैं, जो जीवन के छोर पर हूँ  उससे तुम अधिक एकत्व का अनुभव करते जाओगे। जीवन को शरीर मात के रूप में न देखो, मानसिक रूप में उसका अध्ययन करो। आध्यात्मिक रूप में उसकी अनुभूति करो तब आध्यात्मिक जीवन का समस्त तात्पर्य तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जायेगा और तब तुम्हें ज्ञात होगा कि संतगण क्यों अपरिग्रह तथा पवित्रता से प्रेम करते हैं तथा युद्ध या पलायन द्वारा ऐसी सभी वस्तुओं से बचते हैं जिसमें काम कांचन का रस है।

🔴 इतना पर्याप्त है। जो मैंने कहा है उसका पालन करो। इस पर तब तक विचार करो जब तक कि तुम्हारा स्नायुजाल उसे ग्रहण न कर ले तथा इन विचारों का सौरभ एवं उसकी उदात्तता और दिव्यानन्द तुम्हारी नाड़ियों में बहने न लगे। अपने व्यक्तित्व का नवीनीकरण करो तथा स्वयं को पूर्ण कर लो।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शनिवार, 3 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 31)

🔵 तुम्हारे लिए मेरा केवल एक ही -सन्देश है: - स्मरण रखो कि तुम आत्मा हो। तुम्हारे पीछे शक्ति है। निष्ठावान होना मुक्त होना है। अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकार के प्रति प्रमाणिक रहो क्योंकि प्रमाणिक होना मुक्त होने के समान है। तुम्हारा प्रत्येक पद आगे बढ़ने की दिशा में ही हो तथा जैसे जैसे तुम जीवन के राजपथ में बढ़ते जाओगे वैसे वैसे ही तुम अधिकाधिक अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करते जाओगे। यदि तुम्हारे पीछे प्रामाणिकता है तो तुम सभी व्यक्तियों का सामना कर सकते हो। स्वयं के प्रति ईमानदार बनो तब तुम्हारे शब्द सत्य की ध्वनि से गुंजित होंगे, तुम अनुभुति की भाषा बोलोगे तथा तुम वह शक्ति प्राप्त करोगे, जो दूसरों को भी पूर्ण बना देगी।

🔵 प्रत्येक व्यक्ति अपने चरित्र की शक्ति विकीर्ण करता है। स्वयं को छिपा नहीं सकता। यदि किसी व्यक्ति में कोई शारीरिक विकृत है तो सभी लोग उसे देख पाते हैं। उसी प्रकार यदि तुम में आध्यात्मिक विकृति होगी तो सभी लोग उसे अन्तःप्ररेणा से अपने आप जान लेंगे। क्योंकि जब तुम आत्मा की बात करोगे तब लोग यह अनुभव करेंगे कि तुम जो कह रहे हो वह तुम्हारे हृदय की बात नहीं है। तुम उन्हें आध्यात्मिक जीवन का कुछ भी नहीं दे पाओगे क्योंकि तुम स्वयं आध्यात्मिक जीवन में प्रतिष्ठित नहीं हो, न ही तुम्हारे पास आध्यात्मिकता ही है। अत: यदि तुम परमात्मा के सन्देशवाहक होना चाहते हो तो आत्मसुधार के प्रयत्न में लग जाओ।

🔴 अपनी मूल प्रवृत्तियों का अध्यात्मीकरण करो। निष्ठावान बनो। किन्तु मैं तुमसे कहूँगा कि अपनी अनुभूतियों को गोपन रखो। भैंस के आगे बीन न बजाओ। यदि तुम आत्मा की आश्चर्यजनक अवस्थाओं का अनुभव करते हो तो -मौन रखो जिससे कि तुम्हारी बातचीत से उस अनुभूति की तीव्रता कम न हो जाय। तुमने जो उपलब्ध किया है उस पर विचार करो। सभी चीजो के साथ आत्मा की शांति में प्रवेश करो। कृपण व्यक्ति जिस प्रकार अपने धन की रक्षा करता है उसी प्रकार अपनी अनुभूति और ज्ञान की रक्षा करो। स्वयं का संग्रह करो। और जब तुम कुछ समय तक मौन का अभ्यास कर चुकोगे तब जिस तत्त्व से तुम्हारा हृदय परिपूर्ण हो गया है वह छलकने लगेगा और तब तुम मनुष्य के लिए संपत्ति तथा शक्ति हो उठोगे। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 30)

🔵 हम शव को फूलों से ढकते हैं किन्तु शव तो शव ही है। अत: संसार जिसे महान् कहता है अमृतपुत्र को गहराई से उनका अध्ययन करने दो। क्योंकि अत्यन्त कायिक ओर भौतिक होने के कारण भीतर यह सड़ा हुआ दुर्गन्धयुक्त ही है। संसार के नाशवान पदार्थ तथा उनके आकर्षणों से कोई संबंध न रखो। शरीर जिन मुखौटों से अपने दोष ढकता है उन्हें झाडू डालो। उस अन्तर्ज्ञान मैं प्रवेश करो जहाँ तुम यह जान लेते हो कि तुम इन नाशवान वस्तुओं के बने नहीं हो। तुम आत्मा हो। जान लो, साम्राज्यों के उत्थान पतन, संस्कृति और सभ्यताओं की प्रवृत्तियों का, उच्च आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। समझ लो, वह जो अदृश्य हैं वही महान् है, वस्तुत: वही स्पृहणीय है।

🔵 अपरिग्रह की संतान बनो। पवित्रता की तीव्र इच्छा जागृत करो! काम कांचन ही सांसारिकता के ताने बाने हैं। इन्हें अपने स्वभाव से निर्मूल कर दो। इनकी सभी प्रवृत्तियों को विषवत् समझो। अपने स्वभाव से सभी मलीनताओं को निकाल फेंकी। अपनी आत्मा की सभी अपवित्रताओं को धोकर साफ कर डालो। जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में देखो और तब तुम समझ पाओगे कि यह माया है।

🔴 यह न तो अच्छा है और न ही बुरा। किन्तु यह सर्वथा त्याज्य वस्तु है, क्योंकि यह शरीर तथा शरीरबोध से ही उत्पन्न होता है। अपने उच्च स्वभाव के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनो। अपनी आत्मा के प्रत्येक सन्देश को आग्रहपूर्वक पकड़ो। क्योंकि आध्यात्मिक अवसर एक अत्यन्त विरल सुयोग है तथा जब यह आध्यात्मिक वाणी मन के मौन में प्रवेश करती है उस समय यदि तुम इन्द्रिय- लिप्साओं में व्यस्त रही और इसे न सुनो तो तुम्हारा व्यक्तित्व उन आदतों के पंजे में पड़ जायेगा जो तुम्हारे विनाश के कारण होंगे।   

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 दृष्टिकोण बदलो

🔴 अपनी कठिनाइयाँ हमें पर्वत के समान दुर्भेद्य, सिंह के समान भयंकर और अंधकार के समान डरावनी प्रतीत होती हैं, परंतु यह सब यथार्थ में कुछ नहीं, केवल भ्रम की भावना मात्र है, इनसे डरने का कोई कारण नहीं है। इस बात का शोक मत करो कि मुझे बार-बार असफल होना पड़ता है। परवाह मत करो, क्योंकि समय अनंत है। बार-बार प्रयत्न करो और आगे की ओर कदम बढ़ाओ। निरंतर कर्त्तव्य करते रहो, तुम्हारा एक-एक पग सफलता की ओर बढ़ रहा है, आज नहीं तो कल तुम सफल होकर रहोगे, क्योंकि कर्त्तव्य का निश्चित परिणाम सफलता है।

🔵 सहायता के लिए दूसरों के सामने मत गिड़गिड़ाओ, क्योंकि यथार्थ में किसी में भी इतनी शक्ति नहीं है, जो तुम्हारी सहायता कर सके। किसी कष्ट के लिए दूसरों पर दोषारोपण मत करो, क्योंकि यथार्थ में कोई भी दूसरा तुम्हें दु:ख नहीं पहुँचा सकता। तुम स्वयं ही अपने मित्र हो और तुम स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो कुछ भली-बुरी स्थितियाँ सामनें हैं, वह तुम्हारी पैदा की हुई हैं। अपना दृष्टिकोण बदल दोगे तो दूसरे ही क्षण यह भय के भूत अंतरिक्ष में तिरोहित हो जाएँगे।

🔴 मित्रों किसी से मत डरो। क्योंकि तुम तुच्छ जीव नहीं हो। अपनी ओर देखे, अपनी आत्मा की ओर देखे। मिमियाना छोड़ो और दहाड़ते हुए कहो ‘सोSहम’ ‘मैं वह हूँ’ जिसकी सत्ता से यह सब कुछ हो रहा है।

🔵 ईश्वर चाहता है कि प्राणी इस जगत् में अच्छे-अच्छे कार्य करें और अंत में परम मोक्ष को प्राप्त हो।

🌹 -अखण्ड ज्योति -मार्च 1941


👉 Watch Your Attitude
🔵 To most of us the hardships, adversities and challenges of life seem to be intractable like gigantic mountains, dreadful like wild giants, and frightening like impenetrable darkness. But this is all subject to how we take them. In reality nothing is so hard or to tackle; it is mostly our delusion that regards it so and suffers the pains and fears.

🔴 Just change your attitude and you will find hope, courage and enthusiasm in all circumstances. Don’t lose your morale that you failed in your repeated attempts. Don’t worry. There are many other avenues. Look at them. There is no dead-end to trying harder again with better preparation. Move ahead. You just have to try your level best in transacting your duties. Every sincere effort is a step towards the goal; if not today, tomorrow you will succeed. This is the law of Nature. There is always certain consequence, some result of every action. Don’t feel helpless. Don’t count upon other’s support. No one really would have the capacity to help you if you can’t help yourself. Never blame anyone for anything wrong or harmful happening to you. Because no one can rule over you and make you suffer. You alone are the friend and the enemy of yourself. The circumstances around you are in fact your own creation. They are neither supportive nor obstructive in reality; this all depends upon your own attitude, how you accept and make use of them.

🔵 Refine your attitude, your thinking and your aspirations and let virtuous instincts awaken in yourself. It is the accumulation of the inscriptions of positive thinking and good actions over several lives that awaken devotion in the human self.
🌹 -Akhand Jyoti, March 1941

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

👉 कर्त्तव्य-पालन 👉 Transacting the Duties

🔴 जिन कार्यों को करने की हृदय स्वीकृति दे, वही मनुष्य का कर्त्तव्य अथवा धर्म है और हृदय जिन कार्यों को करने की सलाह न दे, उन्हें नहीं करना चाहिए क्योंकि वे अधर्म या अकर्त्तव्य हैं।

🔵 जो मनुष्य अपने कर्त्तव्यों का यथोचित रीति से पालन करता है, उस सदाचारी मनुष्य को कभी भी कोई दु:ख नहीं सहन करना पड़ता। क्योंकि वह ईश्वर की इच्छानुसार कार्य करता है, इसलिए ईश्वर सदैव उस पर दया दृष्टि रखते हैं। प्राय: ऊपर से देखने पर सदाचारी पुरुष निर्धन और दु:खी मालूम होते हैं, पर वास्तव में यह बात नहीं है। सदाचारी पुरुष में असाधारण दैवी शक्ति है, वह दु:खी कैसा। सदाचारी पुरुष निर्धन तो हो ही नहीं सकता।

🔴 सच पूछा जाए तो सच्चा खजाना सदाचारी के ही पास है। उसका वह खजाना कभी खाली नहीं होता, उसे खर्च करने पर बढ़ता ही जाता है। सदाचार के विचारों का चिंतन करने से ही आत्मा को अपार शांति और शीतलता प्राप्त होती है। दुष्टों को सदा अपने दुश्मनों का भय बना रहता है कि कहीं कोई हमारा अनिष्ट न कर दे, पर सदाचारी के पास ये सब बाते कहाँ? वहाँ न कोई दोस्त है न दुश्मन। उसके लिए तो सारा संसार एक-सा है।

🔵 ईश्वर चाहता है कि प्राणी इस जगत् में अच्छे-अच्छे कार्य करें और अंत में परम मोक्ष को प्राप्त हो।

🌹 -अखण्ड ज्योति -फरवरी 1941


👉 Transacting the Duties

🔵 That which is unambiguously permitted by your conscience is righteous, worth doing. That which is prevented or is doubted by your inner self should not be done. This is how duties and the ‘faux pas’ could be defined in simplest terms for those whose hearts are pure and minds are enlightened enough to grasp the impulse of the inner self.

🔴 One who is sincere in transacting his duties is worthy of God’s grace. He will never be helpless or sorry in any circumstance. He is a beloved disciple of God who bears the responsibilities selflessly as per thy will. Such morally refined, virtuous persons might be found lacking in wealth or in worldly (materialistic) possessions, but this would be only in the gross terms. In reality, such devotees possess immense spiritual power. How could they have any worry or scarcity? Austerity of life is their choice… Indeed the greatest treasure of the world lies with such saintly people only. This limitless treasure never empties; rather, it expands more and more with spending…

🔵 A vicious man always has a threat of being counter-attacked by the enemies; his own evils and negativity ruin all the peace and joy from his life. But the whole world is benevolent for a moral, duty-bond altruistic fellow. No one is his enemy; neither he has any attachment with anybody. Everything, everyone, is alike for him. His heart is full of love for everyone.

🔴 A thought of morality and saintly virtues itself inspires a unique feeling of peace, hope and enlightenment in the inner self. God wants each one of us to experience it and follow it towards sublime evolution of our lives…

🌹 -Akhand Jyoti, Feb. 1941

👉 Samadhi Ke Sopan 👉 समाधि के सोपान (भाग 29)

जब मेरा मन ध्यान की शांति में पहुँचा तब श्री गुरुदेव की वाणी ने कहा-

🔴 वत्स! क्या मैं तुम्हारी दुर्बलताओं को नहीं जानता हूँ? फिर तुम चिन्ता क्यों करते हो ? क्या जीवन परीक्षा और क्लेशों से आक्रान्त नहीं हैं? पर तुम मनुष्य हो। मन में कापुरुषता न आने दो। स्मरण रखो तुम्हारे भीतर सर्वशक्तिमान आत्मा है। तुम जो होना चाहो वही हो सकते हो। इसमें केवल एक ही बाधा है और वह तुम स्वयं हो। शरीर विद्रोह करता है मन चंचल हो उठता उठता है, किन्तु लक्ष्य के संबंध में निश्चित रहो। क्योंकि अन्ततः आत्मा की शक्ति के आगे कोई नहीं टिक सकता। यदि तुम स्वयं वो प्रति निष्ठावान हो, यदि तुम्हारे हृदय की गहराइयों में समग्रता है तो सब कुछ ठीक हैं तुम पर कुछ भी पूर्णत: या आंशिक रूप में अधिकार नहीं कर सकता।

🔵 हृदय तथा मन के खुलेपन का विकास करो अपने संबंध में मुझसे कुछ न छिपाओ। अपने? मन का उसी प्रकार अध्ययन करो मानो वह तुमसे भिन्न कोई वस्तु है। जिससे हार्दिक संबंध है उससे अपनी मन की बातें अकफट भाव से कहो क्योंकि निष्ठावान व्यक्ति कसामने स्वयं नरक के द्वार भी नहीं टिक सकते। दृढ़ निष्ठा ही आवश्यक वस्तु है।

🔴 अन्ततः शरीरबोध के कारण ही तो तुम्हारी अधिकांश भूलें होती हैं। शरीर को मिट्टी के एक लोंदे के समान समझो। इसे अपनी इच्छाशक्ति के अधीन करलो। चरित्र ही सब कुछ है और चरित्र का बल इच्छाशक्ति ही है। यही आध्यात्मिक जीवन का संपूर्ण रहस्य है। यही धार्मिक- साधना का अर्थ है। सभ्यताओं को देखो, इन्द्रियशक्ति तथा इन्द्रियजन्य यथार्थताओं की तड़क भड़क पर मनुष्य कितना गौरवान्वित होता है, किन्तु उसके मूल में कामवासना और भोजनलिप्सा के अतिरिक्त और क्या है ? अधिकांश लोगों के मन इन दोनों सर्वग्राही वृत्तियों से ही तो बने हैं।


🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 28) (In The Hours Of Meditation)


और मेरी आत्मा में ये शब्द आये:-

🔴 मैं सर्वदा तुम्हारे पास हूँ। जब तुम्हारे पापों के जाल कसने लगें तथा गहन अंधकार में कष्ट पा रहे होओ तब यह जान रखो कि वहाँ मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे महापराधों के कष्टों को भोगने में सहभागी हूँ। तुम्हारी अन्तरात्मा के कार्यों को भली भाँति जानने के कारण मैं तुम्हारी अन्तरात्मा के संबंध में सजग हूँ। मैं, जो सर्वव्यापी हूँ उससे तुम कुछ भी नहीं छिपा सकते, अपने गोपन विचारों का अत्यल्प अंश भी नहीं। मैं तुम में हूँ। मैं तुम्हें भली भाँति जानता हूँ। मेरे बिना न तो तुम हिल ही सकते हो, न ही साँस ले सकते हो। स्मरण रखो मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। तुम जहाँ जाते हो वहाँ मैं जाता हूँ तुम जहाँ रुकते हो वहाँ मैं रुकता हूँ। आओ मेरे हृदय से अपना हृदय मिला लो, उसे अपना बना लो, तब सब ठीक हो जायेगा। हारी हृदय- गुहा की छाया और शांति में मेरा निवास है।

🔵 अब जाओ संसार में निकल पड़ो और मेरी वाणी का इतना व्यापक प्रचार करो जितना व्यापक कि आत्मा है, क्योंकि वही उसका जीवन है। मेरा सर्वसमन्वित प्रेम तथा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम माँ के प्रेम के समान है। जैसा एक कबूतरी का प्रेम अपने नवजात बच्वों के लिए होता है, वैसा ही प्रेम मेरा तुम्हारे प्रति है। जब कष्ट आते हैं या विपत्तियाँ तुम्हें भयभीत करती हैं तब स्मरण रखना कि मैं तुम्हारा सहायक हूँ। तुम्हारी आत्मा का प्रेमी हूँ।  

🔴 जब ये शब्द समाप्त हुए तब मैंने समझ लिया कि यह गुरुदेव की वाणी थी जिसने मेरे सभी पापों को धो दिया था और तब मैं कह उठा- मेरे प्रभु के सान्निध्य में, उनसे ऐक्यबोध में ध्यानानन्द की कितनी तीव्रता होती है यह मेरा हृदय जानता हैं। अहो! उन दिव्य ईश्वरीय विचारों का प्रवाह कितना मधुर है! और ऋषियों के साथ मैं भी स्वयं से कह उठा! सच्चिदानन्द - सागर में कूदपड़ो! ओ मूर्ख, ईश्वर- सागर में कूद पडो!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 सच्चा धर्मात्मा कौन? 👉 Who is Religious?

🔴 सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति के हृदय में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, उदारता, दया श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के भाव उत्पन्न होते हैं। ये सब आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं। ये ही मनुष्य की स्थायी शक्तियाँ हैं। इनको प्राप्त करने का उस समय तक प्रयत्न करते रहना चाहिए, जब तक कि समस्त जीवन पूरी तरह इनमें रॅग न जाए। जिस आदमी में ये सब गुण मौजूद हैं, वास्तव में वही आध्यात्मिक व्यक्ति है। इसी सत्य के आधार पर वह परमात्मा से मिल सकता है।
🔵 ईश्वर-भक्ति का मार्ग किसी धर्म विशेष या किसी कर्मकांड में सीमित नहीं है, यह तो आत्मा की गंभीरता में विद्यमान है।

🔴 केवल ईश्वर-ईश्वर रटने वाले धर्मात्मा नहीं होते, वरन् वे ही व्यक्ति धर्मात्मा होते हैं, जो परमात्मा के आदेशों पर अथवा उनके बताये हुए मार्ग पर चलते हैं। आत्मा की परमात्मा से एकता कर देना ही सब धर्मों का मूल है। धन्य हैं वे आदमी जो परमात्मा का उपदेश सुनते हैं और उसके अनुसार आचरण करते हैं
🔵 जो आत्मा इस सुंदर जीवन में पदार्पण कर चुकी, उसके लिए अंर्तज्ञान का दरवाजा खुला हुआ है। शुद्ध हृदय वाले आदमी धन्य हैं, क्योंकि वे ही परमात्मा का दर्शन करेंगे। इस दर्शन में जो आनंद है, उसका वर्णन कौन कर सकता है। परमेश्वर का अस्तित्व अपने आप में अनुभव करने से ही आपका काम बन जाएगा।

🌹 -अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941

👉 Who is Religious?

🔵 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natural virtues of the soul. Their presence in a person is the sign of his/her spirituality. These alone are the source of spiritual elevation. These are also the perennial means of inner strength. Your endeavors for cultivating these qualities in your character must continue with greater intensity till your personality is fully imbibed with them. One who achieves this, he/she alone is truly spiritual and religious; he/she alone is worthy of meeting God – being beatified by thy grace.

🔴 Devotion of God is not confined to a specific religious cult or rituals. It lies in the deepest core of the inner emotions. Those who chant God’s name need not be religious; truly religious are those who follow the divine disciplines, adopt divine values in their conduct. Guiding the path to unification of the soul with God – inculcation of divinity in the human-self, is the foundational purpose of religion. Blessed are those who grasp this noble truth of religion and devotion.

🔵 Those who have reached this state of devotion would deserve attaining the eternal light of ultimate knowledge. They can realize God in their pure hearts and experience the absolute bliss forever…

🌹 -Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 समाधि के सोपान (भाग 27) (In The Hours Of Meditation)


ध्यान के क्षणों में पुन: यह कहते हुए गुरुदेव उपस्थित हुए-

🔴 सभी शब्दों के पार मौन में, शाश्वत शांति में तुम्हारी आत्मा का निवास है। इन्द्रियों के तुमुल कोलाहल से दूर, जीवन की यातना और दु:खों से दूर, पाप और संताप की भावना से दूर तथापि उन सभी के मध्य दिव्यता का निवास है जो कि अस्तिमात्र है। संसारस्वप्न के ताने बाने कितने आश्चर्यजनक है! किन्तु स्वप्नद्रष्टा उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है। हे आत्मन! तुम अमर, मृत्यु की सीमा के पार, जघन्य कलुषों के मध्य भी निष्कलंक हो। तुम्हारी जड़ें दिव्यता में समायी हुई हैं। शुभ और अशुभ- ये विचारों के मापदण्ड हैं। तुम विचारों के परे सर्वोपरि ज्योति:स्वरूप हो। तुम्हारे स्वरूप का प्रताप सभी वस्तुओं के पार पहुँचा हुआ है। तुम अतुलनीय, शब्दातीत हो।

🔵  हे स्वर्गीय दिव्यज्योति! हे देव, ध्यान और अनुभूति के शीर्ष मुकुट! कौन तुम्हें पापी कहेगा! या महात्मा कहेगा। कौन तुम्हारा वर्णन कर सकेगा या तुम्हारे विषय में सोच भी सकेगा। सभी में एक, सभी में समान, तुम वही अमर आत्मा हो। मर्त्यजीवन के शब्दो में कौन तुम्हें व्यक्त कर सकता है ? तुम उन सभी के परे अमर्त्य हो। और यह जान रखो कि तूफानी विचारों के उपद्रवों के बीच भी उन सबको देखने वाला एक मौन द्रष्टा है। उसके प्रकाश को इन्द्रियों का तुच्छ कच्छ- प्रकाश कभी मंद नहीं कर सकता न ही उसकी शांति को जीवन के सभी कलह दबा सकते हैं। वह चन्द्र, सूर्य, तारों से परे कूटस्थ तथा विचारों की सीमा के बाहर है। वही आत्मा है! आत्मा वही है!! इन्द्रियों के युद्ध में विजयी वही है।

🔴 अज्ञान के पहाड़ कितने भी क्यों न दीख पड़ते हों, पाप और संताप की गहराइयों कितनी भी गहरी क्यों न हों, उसमें सभी ऊँचाई और गहराइयाँ समा जाती हैं। उन सभी विविधताओं को जानो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

सोमवार, 29 अगस्त 2016

क्यों दे रहे हैं तलाक???*।


🔵 कल रात करीब 7 बजे शाम को  मोबाइल बजा। उठाया तो उधर से रोने की आवाज... मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?

🔴 उधर से आवाज़ आई.. आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?

🔵 मैंने कहा:- "आप परेशानी बताइये"। और "भाई साहब कहाँ हैं...? माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन

🔴 उधर से केवल एक रट कि "आप आ जाइए"*, मैंने आश्वाशन दिया कि *कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा*. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;

🔵 देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;

🔴 भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं* 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।

🔵 मैंने भाई साहब से पूछा कि *""आखिर क्या बात है""*???

🔴 ""भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे ""*.

🔵 फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये *तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं*, मुझे तलाक देना चाहते हैं, मैंने पूछा - *ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. ""प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है""*.

🔴 लेकिन मैंने बच्चों से पूछा *दादी किधर है*,

🔵 बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले *नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट* कर दिया है।

🔴 मैंने घर के नौकर से कहा। मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ; कुछ देर में चाय आई. भाई साहब को *बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की*.

🔵 लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक *"मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे "*बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ.

🔴 पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली*. कि *""मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती""*ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. *रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी*. नौकर तक भी *अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे*

🔵 माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे *ओल्ड ऐज होम* में शिफ्ट कर दे.

🔴 मैंने बहुत *कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की*, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की*.

🔵 जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके *""मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ""*. लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं.

🔴 उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ*. पिछले 3 दिनों से मैं *अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ,*जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।

🔵 मुझे आज भी याद है जब..
*""मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती""*.


🔴 एक बार *माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था*. उसका *शरीर गर्म था, तप रहा था*. मैंने कहा *माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है*.

🔵 लोगों से *उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया*. मुझे *ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं*कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए.

🔴 कहते-कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे""*.

🔵 हम जिनके *शरीर के टुकड़े हैं*,आज हम उनको *ऐसे लोगों के हवाले कर आये, ""जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते""*, जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो *"मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ".*

🔴 आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और *माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ*

🔵 जब *मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे*. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।

🔴 सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले* करके उस *ओल्ड ऐज होम* में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।


🔵 और अगर *इतना सब कुछ कर के ""माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है"", तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा*.

🔴 माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी. *माँ की तरह तकलीफ* तो नहीं होगी.

🔵 जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे*.

🔴 बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।

🔵 मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा. उनके *भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि* से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।

🔴 भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे.

🔵 बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला*. भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए*, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ, चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब, भाई साहब ने कहा *मैं जज हूँ,*

उस चौकीदार ने कहा:-

🔴 ""जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये, औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब"*।

🔵 इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया. अन्दर से एक महिला आई जो *वार्डन* थी. उसने *बड़े कातर शब्दों में कहा*:- "2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो *मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..*?"

🔴 मैंने सिस्टर से कहा *आप विश्वास करिये*. ये लोग *बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं*.

🔵 अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. *कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ.*

🔴 केवल एक फ़ोटो जिसमें *पूरी फैमिली* है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है. मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए लेकिन जब मैंने कहा *हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी*

🔵 आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए. *उनकी भी आँखें नम थीं*

🔴 कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये.

🔵 सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि *शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे*.......

🔴 लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की *भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे*.घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.

🔵  💐 *भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी मैं भी चल दिया. लेकिन *रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे*.

🔴  💐*""माँ केवल माँ है""* 💐 उसको मरने से पहले ना मारें.*

🔵 माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें, अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की ""रीढ़ कमज़ोर"" हो जाएगी*, बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं

🔴 अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, *बात को प्रभावी ढंग से समझायें , कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें*, अगर *माँ की आँख से आँसू गिर गए तो *"ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा"*, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर *""सुकून नहीं होगा""* , सुकून सिर्फ *माँ के आँचल* में होता है उस *आँचल को बिखरने मत देना*।

👉 समाधि के सोपान (भाग 26) (In The Hours Of Meditation)


🔴 तब मैंने सुना वाणी मानो प्रार्थना के स्वर में कह रही है- हे इन्द्रिय और विचारों के निर्माता! जिसका तुमने निर्माण किया है उसे नष्ट कर दो। भय-, काग, आहार, निद्रा तथा उससे उठने वाले किचारों के पिंजरे में बद्ध मानो तुमने इच्छापूर्वक स्वयं को अज्ञान के घनत्व से ढक लिया ह है और स्वप्न देखे जा रहे हो। तुम्हारे स्वयं का अज्ञान ही तुम्हारा अभिशाप है। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। सुख तथा दुःख की धारणाओं को नष्ट कर दो और तब देहात्म- बुद्धि की यह लौह अर्गला छिटक कर एक ओर गिर जायेगी। इसलिये हमारे सामने जो कार्य है वह विलक्षण है। माया का जाल मकड़ी के जाले के समान पतला है किन्तु वह वज्र के समान कठोर भी है।

🔵 हे जीव, स्वयं का उद्धार करो। इस घर को तुम्हीं ने बनाया है, तुम्हीं उसे तोड़ो और इस घर को तोड़ने की प्रक्रिया है आत्मसाक्षात्कार। यह एकत्व की दैवी चेतना से संबंधित है। क्या सूर्य, तारे, नहीं! आकाश स्वयं भी तुम्हारे स्वरूप को निगल सकेगा ? आत्मा का तुम्हारे साथ एकत्व है। अज्ञान से, अंधकार से, बाहर आ जाओ। हे जीव! यह अज्ञान तुम्हारा स्व- आवृत है। सुख से पीड़ा अच्छी है, आनंद से दु:ख अच्छा है, क्योंकि ये हमारे विचारों तथा बुद्धि को वह रूप देते हैं जो कि आत्म- साक्षात्कार का उपयुक्त साधन बन जाता है। भीषण के प्रेमी बनो। यद्यपि भीषण के दर्शन में तुम मृत्यु को देखोगे किन्तु तुम अमरत्व का भी दर्शन करोगे। जीवन अधिक से अधिक स्वप्न। परम तत्त्व तो जीवन के परे है। अन्त में सभी जगह एकत्व है! दिव्य सर्वव्यापी एकत्व ! रश्मियाँ भिन्न भिन्न हो सकती है किन्तु सूर्य वही एक है तथा सूर्य ही और रश्मि है रश्मि ही सूर्य है। तुम हो तथा अंधकार भी आलोक है।  

🔴 यह सुन कर मेरी आत्मा ध्यान और भी' गहन से गहनतर स्तर में पहुँच गई और मैं सचमुच जान गया कि किरण ही सूर्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शनिवार, 27 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 25) (In The Hours Of Meditation)



🔴 जब आत्मा अन्तरतम की शांति मे उठी तब उस वाणी ने कहा, अच्छाई, पाप तथा दोष से अधिक गहरी है। विश्व का ताना बाना, उसका सारतत्व उच्छाई ही है। असीम अतुलनीय अच्छाई। जहाँ ईश्वर है वहाँ अशुभ मिट जाता है। अशुभ आभास मात्र है, सत्यं नहीं। आत्मसमुद्र की गहराइयों में ज्ञान और सत्य की अटल चट्टानें हैं। इन चट्टानों के सामने सभी भूल, सभी अंधकार तथा सभी दोष निश्चय नष्ट हो जाते हैं। यह ठीक है कि सतह पर इच्छाओं की आँधी के तुमुल शब्द हो सकते हैं उत्तेजित वासनाओं के तूफान हो सकते है, दोष तथा अंधकार की घड़ियाँ हो सकती हैं, किन्तु अनुभूति!

🔵 अनुभूति का एक क्षण! सर्व शक्तिमान है। वह सभी प्रकार के दोषों को दूर कर देता है। वह सूर्य के प्रकाश के समान है। वह सभी अंधकार को छिन्न भिन्न कर देता है। अत: अंधकार के क्षणों में भी इस ज्योति का स्मरण करो। यहाँ तक कि दोष होने पर भी प्रभु का नाम स्मरण करो! प्रभु तुम्हारी प्रार्थना सुनेंगे । वे तुम्हारी सहायता के लिए दूत भेजेंगे। आत्मा की शक्ति से बड़ी और कोई शक्ति नहीं है। हमारे अन्तरतम में एकीभूत दिव्यता का अनंत प्रवाह है। उस दिव्यता की एक झलक से ही यह विविधताबोध जो दोषों तथा अज्ञान का निवास स्थान है तिरोहित हो जायेगा। मौलिक रूप में तुम मुक्त हो, शुद्ध हो, दिव्य हो। विश्व की सभी शक्तियाँ तुम्हारे अधीन हैं।

🔴 जब तुम मुक्त ही तो भी क्या तुम मुक्ति के लिए संघर्ष करोगे ? तुम्हारा लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिये। उस सौंदर्य शिखा की एक किरण मात्र का दर्शन दोष की सूक्ष्मतम रेखा को भी नष्ट कर देता है, मिटा देता है। जान लो कि शक्ति तथा शाश्वत ज्योति के ही बने हुए हो। तुम्हारा जीवन न इहलोक में है न परलोक में, वह तो अनंत में अवस्थित है। गहरे अर्थ में यह पाप की धारणा अज्ञान ही तो है। यह एक स्वप्न है। पाप का स्वभाव दुर्बलता है। तुम शक्तिशाली बनो। वह, जो तुम हो, उसकी एक झलक और तुम वही ज्योति: स्वरूप सर्वशक्तिमान हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 समाधि के सोपान (भाग 24) (In The Hours Of Meditation)


🔴 उस वाणी ने और भी कहा-

🔵 आत्मा में जीवात्मा से भिन्न बोध नहीं है। वह असीम शाश्वत तथा पूर्ण मुक्त है। वह विविधता रहित ऐक्य है। आत्मा के राज्य में मैं, तुम, वह आदि भेद के लिए कोई स्थान नहीं है। वह तत् मात्र है। ओम् तत् सत्। अतुलनीय, अनिर्वचनीय। उस आत्मा को कौन जानता है! वास्तव में वही तुम्हें जानता है। असीम में समाहित हो जाने की आकांक्षा, मुक्ति की इच्छा ही वास्तविक प्रेम है। उस महत् शांति की इच्छा ही सच्चा प्रेम है।

🔴 यह विचलित नहीं होगा। यह शांति पूर्कक किन्तु समग्ररूप में बढ़ता है। यह अजेय है। यह लक्ष्य पर पहुँच कर ही रहता है। जिसमें सभी देवी देवता विलीन हो जाते हैं जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है, जिसमें सभी रूप समा जाते हैं जहाँ विचार अविचा रहो जाते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु का अस्तित्व नहीं रहता उसे ही आत्मा जानो। जहाँ सघर्ष समाप्त हो जाते हैं जहाँ अनुभूति है, जहाँ सभी सापेक्ष विचार मिट जाते हैं जहाँ सौंदर्य, पवित्रता, पाप, आतंक, शुभ, अशुभ सभी का भेद समाप्त हो जाता है, जहाँ ध्यान में मन सर्वज्ञ हो जाता है, उसे ही आत्मा जानो।

🔵 वत्स ! सभी ऊँचाइयों के परे एक ऊँचाई है, महान देवताओं के परे भी एक दिव्यता है। अविनाशी ही सब का आधार है। सभी तिरोहित हो जाते हैं। सभी मिट जाते हैं, केवल आत्मा ही सर्वदा रहता है।

🔴 और जब वह वाणी शांत हुई तब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मेरी आत्मा विशालता में उठ गई। तब मैं नहीं था वहाँ केवल ज्योति थी! ज्योति!!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

👉 तुम ईश्वर को पूजते हो या शैतान को

🔴 मनुष्य, शरीर को `मैं’ समझता है। उसने एक जनश्रुति ऐसी अवश्य सुन रखी होती है कि आत्मा शरीर से भिन्न है, परंतु इस पर उसका विश्वास नहीं होता। हम सब शरीर को ही यदि आत्मा न मानते होते, तो यह भारतभूमि दुराचारों का केंद्र न बन गई होती। गीता में भगवान कृष्ण ने अपना उपदेश आरंभ करते हुए अर्जुन को यही दिव्य ज्ञान दिया है, ``तू देह नहीं है।’’ आत्मस्वरूप को जिस प्रकार विस्मण कर दिया गया है, उसी प्रकार ईश्वर को भी दृष्टि से ओझल कर दिया गया है।

🔵 हमारे चारों ओर जो घोर अज्ञाननांधकार छाया हुआ है, उसके तम में कुछ और ही वस्तुएँ हमारे हाथ लगी हैं और उन्हें ईश्वर मान लिया है। रस्सी को साँप मान लेने का उदाहरण प्रसिद्ध है। रस्सी का स्वरूप कुछ-कुछ सर्प से मिलता जुलता है। अंधेरे के कारण ज्ञान ठीक प्रकार काम नहीं करता, फलस्वरूप भ्रम सच्चा मालूम होता है। रस्सी सर्प का प्रतिनिधित्व भली प्रकार करती है। इस गड़बड़ी के समय में ईश्वर के स्थान पर शैतान विराजमान हो गया है और उसी को हम लोग पूजते हैं। आत्मा पंच तत्त्वों से सूक्ष्म है। पंच तत्त्व के रसों को इन्हीं तत्त्वों से बना हुआ शरीर भोग सकता है।

🔴 आत्मा तक कडुआ मीठा कुछ नहीं पहुँचता। यह तो केवल इंद्रियों की तृप्ति-अतृप्ति को अपनी तृप्ति मानना भर है।

🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1940

👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

🔵 Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the
Omnipresent Self, the God?

🔴  We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look
alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

🔵 Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

🌹 -Akhand Jyoti, May 1940

बुधवार, 24 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 23) (In The Hours Of Meditation)


🔴 वह वाणी जिसका निवास मौन में है, ध्यान के क्षणों में उसने मेरी आत्मा से कहा: -

🔵 वत्स! गंभीर! गहन गम्भीर शांति में आओ। व्यक्तित्व के कोलाहल के परे, उसके विविध अनुभवों के परे महान् शांति में आओ। वासनाओं या इच्छाओं की आँधी से सतह पर ही विक्षुब्ध न होओ! यद्यपि घने के बादल छा जाते हैं किन्तु उनके ऊपर सूर्य चमकता ही रहता है । शांति के क्षणों में ही हमारा हृदय दिव्यानन्द में सर्वोत्तम स्पन्दित होता है। सर्वव्यापी प्रेम के सम्मुख स्वयं को अनावृत कर दो। वह स्थिरता कितना संगीतमय है। वह कैसी शांति प्रदान करता है। ओ! वह अनन्त स्थिरता! अनन्त शांति!!

🔴 एक भी सत् विचार, आध्यात्मिक विचार, कभी नष्ट नहीं होता। इसलिए तुम समय की सीमा के बाहर चले जाओ। वहाँ महत् विचारों पर मनन करो तथा उसमें तुम्हारी आत्मा अनंत को पाने की इच्छा करे। तुम्हारे मन में ही तुम्हारे संसार का अस्तित्व है। तथा तुम समय के प्रवाह के भीतर भी अनन्त को प्रगट कर सकते हो । अपने विचारों के द्वारा तुम आकाश की सीमा को लांध सकते हो।

🔵 आत्मा मुक्त है उसे कोई बाँध नहीं सकता। तुम आओ या जाओ, तुम कुछ करो या न करो, यह सब क्या है? ये सब जीवन स्वप्न की घटनाएँ मात्र हैं । ये सब काल प्रवाह में बहती धारायें मात्र हैं जब कि आला शाश्वत है। ओह् ! इस ज्ञान के साथ कितनी शक्ति, कितनी उच्चता, कितनी अपरिमेय विशालता का बोध जागता है।

🔴 शांति गहरी है! अतल गहरी!! वह अपरिमेय है!! द्धन्द्रिय तथा विचारों की सभी कल्पनाओं को मिटा दो। वे प्रकाश के प्रत्यावर्तन मात्र हैं। तुम स्वयं प्रकाश में लीन हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 समाधि के सोपान (भाग 22) (In The Hours Of Meditation)


🔴 मेरी आत्मा ने गुरुदेव से निवेदन किया- महाभाग, कितना अद्भुत है! वहाँ मृत्यु नहीं!

🔵
और तब गुरुदेव ने कहा-वत्स! वहाँ वासनासंभूत जीवन भी नहीं है। क्योंकि लोग जिसके भूखे हैं वह संसार कीच ही तो है। दूषित वासनाओं में आनंद लेने वाले लोग कीचड़ में सने शरीर में आनंद से लोटने वाले बैल के समान ही तौ हैं उनके लिए यह पथ बहुत लम्बा है क्योंकि इच्छाओं के ताने बाने से बनी माया उनके पथ में आड़े आती है। तुम उसके परे जाओ। तुम्हारा समय आयेगा। ऊपर की ओर देखो। वहाँ अनन्त ज्योति है। ऊपर देखो और वह ज्योति तुम्हारे मन की अपारदर्शिता को अवश्य भेद जायेगी।

🔴 इन शब्दों को सुनकर मुझे स्मरण हो आया कि चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है तथा मुक्ति ही लक्ष्य है। और वह लक्ष्य यहाँ और अभी है, मरणोपरान्त नहीं, तथा जीवात्मा का भाग्य निश्चित है और वह है आत्म- साक्षात्कार, जहाँ समय मिट जाता है। जहाँ भौतिक और मर्त्य चेतना विलुप्त हो जाती है। जहाँ ज्योति जो कि जीवन है, सत्य है, शांति है, वह प्रकाशित होती हैं। जहाँ सभी स्वप्न समाप्त हो जाते हैं वासनायें असीम अनुभूति में विलीन हो जाती हैं। जो कि महत् विस्तार का क्षेत्र है। उस अनन्त की अनुभूति के लिए, समय का अवसान कर देने के लिए इन्द्रिय प्रभूत कल्पनाओं की समाप्ति के लिए अनंत की मुक्ति के लिए ही यह अनुभूति है।

हरि ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 21) (In The Hours Of Meditation)



🔴 गुरूदेव की वाणी कितनी आश्चर्य जनक है। मेरी आत्मा पुकार उठती है। हे महाभाग, आप स्वयं ईश्वर हैं। आप जिसका उपदेश देते हैं आप स्वयं वही हैं। आप विश्व की आत्मा है। आप सर्वस्व हैं। यद्यपि आपकी माया विविध रूप का आभास देती है तथापि आप स्वयं एकम् अद्वितीयम् हैं। आपके एकत्व की महिमा महान है, क्योंकि आत्मा एक है। आत्मा सारभूत है जिसमें अंश या विभाग नहीं है। आत्मा एक ही ज्योति है जो विभिन्न रंगों के काँचों से देखी जा रही है। हे गुरुदेव, मुझे कृप्या उस जीवन में ले चलिये जो आपका जीवन है। आप ब्रह्मा हैं! आपविष्णु हैं ! आप सदाशिव हैं! आप ब्रह्म हैं! परम ब्रह्म हैं!!

हर हर बम बम महादेव!

🔵 उसके पश्चात मेरी आत्मा मानो सातवें आसमान में पहुँच गई। और मैंने मनुष्य की दिव्यता के दर्शन किए। मनुष्य की दुर्बलता के महत्त्व को भी समझा। मैंने देखा वहाँ सभ कुछ दिव्य है। तथा इस दिव्य ज्योति के भीतर मैंने देखा कि इस अन्तर्जगत में अनुभूति के पर्वत पर गुरुदेव मानो दूसरे कृष्ण हो कर विराजमान हैं। गहन! समय से गहन! आकाश से भी अधिक -सर्वव्यापी हैं ध्यान राज्य का यह अन्तर्जगत। वहाँ अंधकार हो ही नहीं सकता। क्योंकि वहाँ केवल ज्योति है। वहाँ अज्ञान हो ही नहीं सकता क्योंकि वहाँ केवल ज्ञान है। वहाँ मृत्यु का वश नहीं चलता। अग्नि जला नहीं सकती, जल  भीगा नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती। वह उस पुराण पुरुष का राज्य है। जीवन की सभी छलनाओं के पार असीम और कूटस्थ है।

🔴 और उस महिमा में अंतरतम से बोलते हुये गुरुकी वाणी ने कहा वत्स! यह तुम्हारी विरासत है। अनन्तशक्ति तुम्हारी है। जब सभी शक्ति तुम्हारी है कब क्या तुम दुर्बल हो सकते हो ? इन्द्रियों के दिखावे से तुम संतुष्ट नहीं रह सकते। इस बाह्य जगत् की तड़क भड़क के पीछे मृत्यु तथा विस्मृति ही है। जब मृत्यु आती है यह शरीर शव हो जाता है किन्तु आत्मा सदैव मुक्त है। वह अशरीरी है। साक्षी है, क्योंकि शरीरों का नाश हो सकता है किन्तु आत्मा अनश्वर है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 उठो! हिम्मत करो

 स्मरण रखिए, रुकावट और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रूकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान् आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।
 

 उठो! उदासीनता त्यागो, प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दु:खमय दीखता है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्भव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं। सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नही सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आतंरिक शक्तियों का विकास करेगा। -

🌹 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1940

👉 Rise! Have Courage

🔵 Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life.

🔴 Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.

🔵 So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.

🔴 So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.

🌹 Akhand Jyoti, Feb. 1940

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 20) (In The Hours Of Meditation)


🔴 ध्यान के क्षणों में गुरुदेव की वाणी ने कहा- देखो, जैसा बाह्यजगत है वैसा ही -एक अन्तर्जगत भी है। एक आत्मा का संसार है, एक नाम-रूप का संसार है। और वत्स, यदि बाह्य जगत में आश्चर्य है, रहस्य है, विशालता है, सौंदर्य है, महान् गौरव है तो अन्तर्जगत में भी अमेय महानता और शक्ति, अवर्णनीय आनंद तथा शांति और सत्य का अचल आधार है । हे वत्स ! बाह्यजगत अन्तर्जगत का आभास मात्र है; और इस अन्तर्जगत में तुम्हारा सत्यस्वरूप स्थित है। वहाँ तुम शाश्वतता में जीते हो जब कि बाह्यजगत समय की सीमा में ही आबद्ध है। वहाँ अनन्त और अपरिमेय आनन्द है, जबकि बाह्यजगत में संवेदनायें, सुख तथा दु:ख से जुड़ी हुई हैं। वहाँ भी वेदना है किन्तु अहो, कितनी आनंददायी वेदना है। सत्य का पूर्णत: साक्षात्कार न कर पाने के विरह की अलौकिक वेदना! और ऐसी विपुल आनंद का पथ है।

🔵 आओ, अपनी वृत्ति को इस अन्तर्जगत की ओर प्रस्तुत करो। आओ, मेरे प्रति उत्कट प्रेम के पंखों से उड़कर आओ। गुरु और शिष्य के संबंध से अधिक घनिष्ठ और भी कोई संबंध है क्या? हे वत्स, मौन! अनिर्वचनीयता!! यही प्रेम का लक्षण है। तथा मौन की गहन गहराइयों में भगवान विराजमान हैं। सभी बाहरी झंझटों को छोड़ो। जहाँ भी मैं जाऊँ, तुम आओ। मैं जो बनूँ तुम भी वही बनो। भगवत् पवित्रता के लिए भक्तों के हूदय विभिन्न मदिर हैं, जहाँ सुगंधित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो उसका अध्यात्मीकरण करलो। रूप अरूप सभी में ब्रह्म का, देवत्व का दर्शन करो । ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ झुक भी नहीं है।

🔴 अन्तर्जगत् की अन्तरतम गुहा में जिसमें व्यक्ति उत्कट प्रेम या कातर प्रार्थना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ अनुभूति में आध्यात्मिक जगत के ब्रह्माण्ड के बाद ब्रह्माण्ड भरे हुये हैं तथा ईश्वर सर्वदा सन्निकट हैं। वह भौतिक अर्थ में निकट नहीं किन्तु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रूप में। वे हमारी आत्मा के सार तत्व हैं। वे हमारे सभी विचारों तथा अंतरतम में छिपे अति गोपन आकांक्षाओं के भी ज्ञाता हैं। स्वयं को समर्पित करदो। प्रेम के लिए प्रेम ! जितना अधिक तुम अन्तर में प्रविष्ट करते हो उतना ही तुम मेरे निकट आते हो क्योंकि मैं अन्तरतम का निवासी हूँ। क्योंकि मैं ही वह चुम्बक हूँ जो तुम्हारी अनुभूति तथा आत्मा की महिमा को प्रगट करता है। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अविनश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रह्म हूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

बुधवार, 17 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 19) (In The Hours Of Meditation)


🔴 गहराई में जाओ और तुम पाओगे कि तुम शक्तिमान हो। अपने स्वभाव के अंतरतम में प्रवेश करो '' वहाँ तुम पाओगे कि तुम अपने आध्यात्मिक प्रयत्नों में खरे हो। कुछ असफलताओं से क्या होता है ? समझ लो भय और दुर्बलता भौतिक मात्र हैं। वे स्वप्न के नीड़ शरीर से ही उत्पन्न होते हैं। किन्तु तुम अपने सत्यस्वरूप में मुक्त और निर्भय हो। वत्स शक्ति के गीत गाओ! गाओ ! गाओ! तुम अमृत की संतान हो ! तुम्हारा गंतव्य सत्य है। दिन के क्षण- भंगुर अनुभव विशाल मृगतृष्णा में भ्रान्तियों के अतिरिक्त और क्या हैं ? या तो जीवन को तुच्छ समझो या उसे नकार दो। चाहे जैसे भी हो यह करो। आध्यात्मिकता का साक्षात्कार करो। उपाय चाहे विधेयात्मक हो या निषेधात्मक, सभी एक हैं।

🔵 और तब मेरी आत्मा में एक शांति का भाव उठा। एक महान शांति उदित तथा उस शांति में अक्रिय सर्वव्यापी सर्वज्ञ महाशक्ति ने हठात् स्वयं को प्रगट किया। वह एक शक्ति थी जिसने मेरी आत्मा को शक्ति दी। मन की इस चेतन अवस्था में गुरुदेव की वाणी सुनाई पड़ी और उसने कहा, समय के भीतर तथा समय के परे शाश्वत में मैं ही हूँ। शरीरी अशरीरी सभी कुछ आत्मा ही है। हृदय में सर्वदा एकत्व हैं। हृदय में सर्वदा शांति है। सतह पर के तूफान के नीचे, विविधता की लहरों के नीचे तथा इनसे उत्पन्न होने वाले सभी संघर्षों और संतापों के नीचे सत्य की अन्त: धारा प्रवाहित है।
तत् त्वम् असि !
तत् त्वम् असि !!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

👉 एक सैल्यूट इन्हें भी


🔴 जहां यह तैनात रहते हैं वहां की हवा आदमखोर कहलाती है। पारा माइनस 70 डिग्री से कम रहता है और यह इस तापमान से जूझने वाले सुपरमैन कहलाते हैं। जी हां यही कहानी है सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात रहने वाले भारतीय जवानों की। जवानों की पल्टन की तैनाती तीन-तीन माह के लिए की जाती है। 


🔵 इन तीन माह में यह नहाने से एकदम दूर रहते हैं। क्योंकि नहाने के लिए यदि बहादुरी दिखाने की कोशिश की तो शरीर का कोई ना कोई अंग गलकर वहीं गिर जाएगा। खाना भरपूर रहता है पर यह जानते हैं कि खाने के बाद उन्हें कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बर्फीले हवाएं इन्हें निगलने के लिए हर पल इनके सिर पर मंडराती रहती हैं। बर्फ के नीचे सैनिक दफन होते हैं और उनकी बर्फ में बनी कब्र के ऊपर मोर्चा लेने के दूसरी पौध खड़ी हो जाती है। 


🔴 इसके बाद भी यहां सैनिक मुस्तैदी से हर पल तैनात रहते हैं। मौसम से लड़ते हैं और पाकिस्तान से होनी वाली घुसपैठ पर भी नजर रखते हैं। बहुत कम पल्टन ऐसी होती हैं जिसमें उतने सैनिक ही वापस लौट आएं जितने सियाचिन पर मोर्चा संभालने पहुंचते हैं। यहां तैनात सैनिकों के सिर पर कोई ताज नहीं होता। इनके जान गंवाने की खबर भी सैनिकों परिजनों तक चिट्ठी से पहुंचती है। इसका मजमून हर भाषा में तैयार रहता है क्योंकि सैनिक के परिजनों की भाषा अलग-अलग होती है। बस सैनिक का नाम और नंबर खाली रहता है, जिसे सैनिक के जान गंवाने के बाद रिक्त स्थान में लिख दिया जाता है। 

🔵 यह पांच-पांच की संख्या में बर्फ पर कमर में रस्सी बांधकर गश्त करते हैं। ताकि कोई एक खाई में जाए तो बाकी उसे बचा सकें पर कई बार यह पांच के पांचों की बर्फ में समा जाते हैं और इनके बर्फ में समाने की जानकारी जब तक मिलती है, तब तक इनके ऊपर कई फुट मोटी बर्फ जम चुकी होती है।

फिऱ भी यह सब सहते हैं।
देश के लिए जीते और देश के लिए मरते हैं।
सलाम और सैल्यूट इन जवानों को।
इनकी जांबाजी को। इनके जज्बे को।

👉 समाधि के सोपान (भाग 18) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और गुरु की वाणी ने मेरी आत्मा से कहा-तुम मनुष्य हो फिर तुम्हारा विश्वास कहाँ है ? क्या तुम पशु हो जो प्रत्येक खतरे के सामने काँपते हो! जब तक तुम देहबुद्धि को जीत नहीं लेते तब तक तुम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। क्या तुम शव हो ? क्या तुम भौतिक धूल की कीचड़ में सदैव नाचते रहोगे ? अपनी क्षुद्रता से बाहर आओ। सामने आओ। मनुष्य बनो। यदि वह सदैव दबी रहे तो तुम्हारी दिव्यता कहाँ है ? तब क्या तुम इतने महत्त्वपूर्ण हो कि संसार तुम्हारे लिए रुका पड़ा रहे। आत्मा से आत्मा को जीतो। मुक्त हो जाओ। यदि तुम अविनश्वर की उपलब्धि की चेष्टा करो तो मृत्यु तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी क्योंकि मृत्यु क्या है तुम यही भूल चुके होगे। अमरत्व तुम्हारा होगा।

🔵 समस्त संसार -सत्य के प्रगटीकरण के लिए रत है। किन्तु चरित्रगठन ही इस प्रयत्न की सफलता का प्रथम सोपान है। चरित्र ही सब कुछ है। चरित्र का निर्माण करो ! चरित्र का गठन करो !! प्रत्येक मुहूर्त अपने चरित्र का गठन करो। अपनी आत्मा में अमरत्व का चिन्तन करो और तुम अमर हो जाओगे। सत्य को अपना निवासस्थान बना लो और तब जन्म, मृत्यु तथा जीवन के विभिन्न अनुभव तुम्हें भयभीत न कर सकेंगे।

🔴 शरीर को जाने दो। इसके प्रति आसक्ति छोड़ो। स्वयं को मन में मुक्त कर लो। काम, भय, भोजन, तथा निद्रा में सीमित पशु- चेतना को जीतना ही धर्म तथा नैतिकता है। इसे त्यागो। शव के प्रति इस आसक्ति को त्यागो। इसे शव कह कर ही संबोधित करो। सदा इसके साथ शव के समान ही व्यवहार करो। इसके ऊपर सोने का आवरण न चढ़ाओ। यह गंदा है। आत्मा ही सत्य है। आत्मा की चेतना अमर है। अमरता के विचार तुम्हें शाश्वत में ले जाते हैं। वीर बनो! साहसी बनो! वज्र के समान शक्तिशाली बनो। वत्स! यदि तुम ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहते हो तो शरीर की चिन्ता का समय नहीं है। अभी समय है, अभी अवसर है। तुम सत्य की सन्तान हो। सत्य तुम्हारा स्वभाव है। इसीलिए  आत्मा के चैतन्य में डूब जाओ। निर्भीक बनो। जीवन के सुख दु:ख के ऊपर उठना सीखो। स्मरण रखो तुम आत्मा हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

रविवार, 14 अगस्त 2016

छोटी उम्र में महान कार्य करने वाले भारतीय


🔴 विवेकानंद: 39 साल का पूरा जीवन और 32 साल की उम्र मे पूरे विश्व मे हिन्दुत्व का डंका बजाने वाले निर्विवाद भारतीय महापुरुष।

🔵 रानी लक्ष्मी बाई: 30 साल की उम्र मे अंग्रेज़ो के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व करने वाली अमर बलिदानी झाँसी की रानी।

🔴 भगत सिंह: 23 वर्ष की अल्पायु मे बलिदान। भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च, 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।


🔵 खुदीराम बोस: भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र 19 साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये। मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे।

🔴 करतार सिंह साराभा: 19 साल की उम्र मे लाहौर कांड के अग्रदूतों मे एक होने के कारण फांसी की सजा। देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।

🔵 अशफाक़ उल्ला खाँ: 27 साल की उम्र मे देश के लिए प्राणो की आहुती देने वाले वीर हुतात्मा।

🔴 उधम सिंह: 14 साल की उम्र से लिए अपने प्रण को उन्होने 39 साल की उम्र मे पूरा किया और देश के लिए फांसी चढ़े। उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।

🔵 गणेश शंकर विद्यार्थी: 25 साल की उम्र से सक्रिय 40 साल की उम्र मे हिन्दुत्व की रक्षा के लिए बलिदान।

🔴 राजगुरु: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । 23 साल की उम्र मे इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

🔵 सुखदेव: 33 साल की अल्पायु मे 23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।

🔴 चन्द्रशेखर आजाद : 25 साल की उम्र मे बलिदान : चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वरतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के वास्तविक उत्तराधिकारी थे।

🔵 मंगल पांडे: सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। क्रांति के समय और फांसी दिये जाने के समय इनकी उम्र 30 साल थी।
🔴 राम प्रसाद ‘बिस्मिल’: काकोरी कांड के क्रांतिकारी । 28 साल की उम्र मे काकोरी कांड से अंग्रेज़ सत्ता हो हिला के रख दिया और 30 साल की उम्र मे बलिदान।

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी


👉 अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य के इस पक्ष को भी जानिए।

🔵 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हें उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आदेशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी। उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर परावाणी से उनका मार्गदर्शन किया  कि युगधर्म की महत्ता व समय की पुकार देख- सुनकर तुम्हें अन्य आवश्यक कार्यों को छोड़कर अग्निकाण्ड में पानी लेकर दौड़ पड़ने की तरह आवश्यक कार्य भी करने पड़ सकते हैं।

🔴 इसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था। १९२७ (1927) से १९३३ (1933) तक का समय उनका एक सक्रिय स्वयं सेवक-स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता, जिसमें घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुँचे, जहाँ शिक्षण दिया जा रहा था, अनेकानेक मित्रों- सखाओं के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये ।। छह-छह माह की उन्हें कई बार जेल हुई ।।

🔵 जेल में भी जेल के निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अँग्रेजी सीखकर लौटै। आसनसोल जेल में वे श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय जी, देवदास गाँधी जैसी हस्तियों के साथ रहे व वहाँ से एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन- जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलाना।

🔴 यही मंत्र आगे चलकर एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से धर्म घट की स्थापना का स्वरूप लेकर लाखों- करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था - प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश।

🔵 स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आये, जिनमें शहीद भगतसिंह को फाँसी दिये जाने पर फैले जन आक्रोश के समय श्री अरविन्द के किशोर काल की क्रान्तिकारी स्थिति की तरह उनने भी वे कार्य किये, जिनसे आक्रान्ता शासकों प्रति असहयोग जाहिर होता था। नमक आन्दोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, वे मारते रहे परन्तु, समाधि स्थिति को प्राप्त राष्ट्र देवता के पुजारी को बेहोश होना स्वीकृत था पर आन्दोलन के दौरान उनने झण्डा छोड़ा नहीं जबकि, फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने का प्रयास करते रहे। उन्होंने मुँह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गये पर झण्डे का टुकड़ा चिकित्सकों द्वारा दाँतों में भींचे गये टुकड़े के रूप में जब निकाला गया तक सब उनकी सहनशक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गये। उन्हें तब से ही आजादी के मतवाले उन्मत्त श्रीराम मत्त नाम मिला।

🔴 अभी भी भी आगरा में उनके साथ रहे या उनसे कुछ सीख लिए अगणित व्यक्ति उन्हें मत्त जी नाम से ही जानते हैं।

🔵 लगानबन्दी के आकड़े एकत्र करने के लिए उन्होंने पूरे आगरा जिले का दौरा किया व उनके द्वारा प्रस्तुत वे आँकड़े तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत द्वार गाँधी जी के समक्ष पेश किये गये। बापू ने अपनी प्रशस्ति के साथ वे प्रामाणिक आँकड़े ब्रिटिश पार्लियामेन्ट भेजे, इसी आधार पर पूरे संयुक्त प्रान्त के लगान माफी के आदेश प्रसारित हुए।

🔴 कभी जिनने अपनी इस लड़ाई के बदले कुछ न चाहा, उन्हें सरकार ने अपने प्रतिनिधि के साथ सारी सुविधाएँ व पेंशन दिया, जिसे उनने प्रधानमंत्री राहत फण्ड के नाम समर्पित कर दी। वैरागी जीवन का, सच्चे राष्ट्र संत होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है?
 

👉 समाधि के सोपान (भाग 17) (In The Hours Of Meditation)


🔴 अहो! एक जीवन है, जो प्रेम है, आनन्द है। मैं- वही जीवन हूँ। उस जीवन को कोई सीमित नहीं कर सकता, परिमित नहीं कर सकता तथा वही अनन्त जीवन है। वही शाश्वत जीवन है और वह जीवन मैं ही हूँ। उसका स्वभाव शांति है और मैं स्वयं शांति हूँ। उसकी समग्रता में कहीं कलह नहीं है। त्वरित आवागमन नहीं है। जीने की निर्दय चेष्टा नहीं है, प्रजनन की इच्छा नहीं है। वह अस्तिमात्र है। मैं वही जीवन हूँ। सूर्य और तारे इसे धारण नहीं कर सकते। इस ज्योति से अधिक प्रकाशमान और कोई ज्योति नहीं है। यह स्वयं- प्रभ है। इस जीवन की गहराइयों को नहीं नापा जा सकता। इसकी ऊँचाइयों को नहीं नापा जा सकता। मैं ही वह जीवन हूँ। तथा तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ।

🔵 स्वयं निरालम्ब हो कर भी मैं सब का अवलम्बन हूँ। सभी रूपों में आत्मा मैं ही हूँ। जीवन की ध्वनि में मैं मौन हूँ। समय के ताने- बाने में बुना हुआ सब कुछ मैं ही हूँ। विचार और रूप के परे आत्मा मैं ही हूँ। मनरहित होकर भी मैं सर्वज्ञ हूँ। अरूप होकर भी मैं सर्वत्र हूँ। अधार्य होकर मैं सभी में विद्यमान हूँ। मैं शक्ति  हूँ ! मैं शांति हूँ। मैं अनंत हूँ।  मैं शाश्वत हूँ। सभी विविधताओं में ऐक्य स्थापन करने वाला सूत्र मैं ही हूँ। सभी जीवधारियों का सारतत्त्व मैं ही हूँ। सभी संघर्षरत अंशों का पूर्ण मैं ही हूँ। जन्म मृत्यु की सीमा के परे, अमर, अजन्मा, बंधनमुक्त में ही विद्यमान हूँ। जो मुझे पा लेता है वही मुक्त है।

🔴 सभी भ्रान्तियों के मध्य में मैं सत्य को देखता हूँ। वह दृश्य सत्य मैं ही हूँ। माया जो कि माँ का ही स्वरूप है, मैं उस मायिक शक्ति का शक्तिधर हूँ। काल के गर्भ से उत्पन्न होकर सभी रूपधारियों में मैं ही रूपधारण करता हूँ। मैं काल का भी जन्मस्थान हूँ। इसलिए शाश्वत हूँ। तथा जीव, तू वही है, जो मुझमें है, वही अन्तरात्मा ! इसलिए उठो, जागो और सभी बंधनों को छिन्न भिन्न कर दो। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। भ्रांतियों को दूर कर दो। तुम्हीं आत्मा हो। आत्मा ही तुम हो। तुच्छता तुम्हारे स्वरूप के अनुभव में बाधा दे सकती है।  उठो ! उठो !! और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय न रुको। लक्ष्य जो आत्मा है, जीवन है, प्रेम है, है, जो कि मुक्त आत्मा का आनन्द, -ज्ञान है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 16) (In The Hours Of Meditation)


🔴 ईश्वर से प्रति ध्वनित हो कर आवाज आई। उसने कहा, अहो ! एक ऐसा प्रेम है जो किसी से नही डरता। जो जीवन से भी महान है। मृत्यु से भी महान है। मैं वही प्रेम हूँ। एक ऐसा प्रेम है जो सीमा नहीं जानता। जो सर्वत्र है, जो मृत्यु की उपस्थिति में तथा है तथा जो केवल कोमलता है। भीषण के मध्य भी जो केवल कोमलता है। मैं वही प्रेम हूँ। वह प्रेम जो अनिर्वचनीय मधुरता है, जो सभी वेदनाओं का, सभी भयों का, स्वागत करता ह, जो सभी प्रकार की उदासीनता को दूर कर देता है, जिसकी खोज तुम कहीं भी कर सकते हो, मैं वही प्रेम हूँ। अहो! मैं उसी प्रेम का सार हूँ। और हे आत्मन्  मैं वह प्रेम हूँ। मैं तुम्हारा आत्मस्वरूप हूँ।  प्रेम ही मेरा स्वभाव है। मैं स्वयं प्रेम हूँ।

 
🔵 ओह! यह एक सर्वग्राही सौंदर्य है। इसमें त्रुटियों और असौन्दर्य के लिए स्थान नहीं है। यह आकाश के समान विस्तृत और समुद्र के समान गंभीर है। यह सौंदर्य सुगंधित उषा तथा अरुणिम संध्या में प्रस्फुटित होता है। पक्षी के कलरव तथा बाघ की गर्जना में यह विद्यमान है। तूफान और शांति में यही सौंदर्य विद्यमान है किन्तु यह इन सबसे अतीत है। ये सब इसके पहलू हैं। मैं वह सौंदर्य हूँ। एक ऐसा सौंदर्य है जो सुख तथा दु:ख से अधिक गहन गभीर हैं। यह आत्मा का सौंदर्य है। मैं वह सोंदर्य हूँ। मैं ही वह सौंदर्य हूँ। सभी प्रकार के आकर्षणों का केन्द्र मैं ही हूँ। मैं चुम्बक हूँ। दूसरी सभी वस्तुएँ लोहे के छोटे-छोटे कण है। कोई इधर आकर्षित होता है तो कोई उधर।  किन्तु सभी आकर्षित होने को बाध्य हैं। मैं ही वह चुम्बक हूँ। मैं ही वह सौंदर्य हूँ। मैं ही वह आकर्षण हूँ तथा आनन्द ही मेरा स्वरूप है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 15) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और यदि प्रभु का स्मरण ही तुम्हारा जीवन- श्रम हो तो एक महान् आनंद तथा निर्विकार शांति तुम्हें प्राप्त होगी; तथा जो बीभत्स लगता था वह सुन्दर प्रतीत होगा और भयंकर- लगता था वह सर्वप्रेममय प्रतीत होगा। और तब उस सन्त के साथ जिसने नाग द्वारा डसे जाने पर कहा था देखो, देखो, मेरे प्रीतम का संदेश वाहक आया है, तुम भी वही कहोगे; या उस सन्त के समान जिसने बाघ के मुँह में भी कहा था, शिवोऽहम् शिवोऽहम्। तुम भी कहोगे, शिवोऽहम्। शिवोऽहम् यही आत्मा की शक्ति है। यही वास्तव में उसका प्रगटीकरण है। यही दिव्यता का भाव है क्योंकि यही दिव्यता का दर्शन है।

🔵 मातृभूमि की रक्षा के लिए योद्धा तोप के मुँह में दौड़ जाता है। माँ अपने बच्चे की प्राणरक्षा के लिए अग्नि में दौड़ जाती है, गहरे जल में पड़ती है, बाघ के मुँह में समा जाती है। मित्र अपने मित्र के लिए प्राण दे देता है। संन्यासी अपने आदर्श के लिए सभी प्रकार के कष्ट सहता है। तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो, आदर्श का जीवन जिओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। तुम मेरे पुत्र हो।

🔴 जीवन या मृत्यु में, पुण्य या पाप में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में, जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, '' तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। क्योंकि मैं तुमसे बँधा हुआ हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम मुझे तुम्हूारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है।

हरि ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे


🔴 दोस्तों, ये कहावत तो आपने बहुत बार सुनी होंगी और पढ़ी होंगी की “जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे”।

🔵 एक गांव में एक व्यापारी रहता था, उसका नाम था दानी लेकिन वो उसके नाम के बिलकुल उल्टा था मतलब न तो वो स्वंय दान देता था और न ही अपने परिजनों को दान करने देता था जब भी कोई  भिक्षुक या साधु उसके, दहलीज पर भिक्षा मांगने आता तो वो उनका अपमान करके उन्हें कह देता आगे बढ़ो और इतना सा कह कर उन्हें टाल देता था।

🔴 उसकी गांव में किराने की दुकान थी. वो जो भी सामान गाव वालों को बेचता उसमें मिलावट करके बेचता था गाँव वाले लोग वो मिलावट वाली अशुध्द सामग्री खाकर अक्सर बीमार रहते थे।

🔵 दानी का एक पुत्र था उसका नाम था गणेश. वो हमेशा अपने पिताजी को मिलावट करते समय देखता। उसने एक बार अपने पिताजी से पूछा की, – पिताजी आप सामुग्री में मिलावट क्यों करते हो ? तब उस दानी ने उसे कहा की, – “बेटा, शुद्ध सामग्री हानी हानिकारक होती है. इससे गाँव वाले बीमार हो जायेंगे, इसलिये मै मिलावट करके बेचता हूँ। इस तरह उसने अपने बेटे गणेश को भी मिलावट का काम सिखा दिया मगर गणेश ने इसका उपयोग उल्टा किया मतलब दानी अक्सर अपने घर के लिये जो भी सामग्री निकालता था उसमे मिलावट नहीं करता था। गणेश सोचता की अगर हम ये शुद्ध सामग्री खायेंगे तो उससे तो हम बीमार पड़ जायेंगे तो वो घर में आये सामग्री में मिलावट कर देता था इस के बारे में दानी को पता भी नहीं चलता था क्योंकि गणेश मिलावट तो  कर देता था लेकिन बताता  किसी को भी नहीं था।

🔴 इस के कारण दानी अपने घर के लिये शुद्ध सामग्री निकलता मगर खाता मिलावट वाली सामुग्री उसे इसका एहसास खाते समय होता  वो सोचता की मैंने तो शुद्ध सामग्री निकाली थी लेकिन ये तो मिलावट वाली लग रही है। अपनी चोरी पकड़े जाने के डर से वो पूछ भी नहीं सकता था। वही मिलावट वाला खाना खाकर एक दिन दानी इतना बीमार हो गया की बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो गया अब वो बिस्तर पे ही पडे पडे भोजन करता दुध पिता था बीमार दानी को दुध देने की जिम्मेदारी हमेशा उसके बेटे गणेश पर आती थी उसने बचपन से जो देखा उसके अनुसार दुध पूरी तरह शुद्ध है मतलब उसमे मिलावट नहीं की गई है वह सोचता की अगर ये शुद्ध दुध पिताजी को दिया तो वो और अधिक बीमार हो जायेंगे. ये सोच के साथ वह पहले आधा गिलास दुध स्वंय पी जाता और आधे दुध में पानी मिलाकर दानी को दे देता।

🔵 दानी जब दुध पिता था तब दानी को समझ में आता था की दुध बहुत पतला है इसमे पानी की मात्रा अधिक है, मगर तत्काल इससे असहमत भी हो जाता क्योंकि दुध घर का होता था और वो घर के लिये बिना मिलावट वाला दुध निकालता था तब पानी मिलाने का सवाल ही नहीं उठता था। एक दिन उसके दुध पिने का समय हुवा तो उसने खिड़की से पुत्र को देखा तो वो उसका काम देखकर दंग रह गया. बेटा आधा दुध तो खुद पी लेता था और आधे में पानी मिलाकर पिता के पास ले गया और पिताजी को दिया दानी ने उससे कहा की, बेटा गणेश क्या घर में और दुध नहीं है ? क्यों नही. घर में पुरे पांच लीटर दुध रखा है, गणेश ने जवाब दिया। दानी बोला – फिर  तुम्हे दुध पीना था तो उसमे  से क्यों नही पिया मेरा दुध पीकर उसमे  पानी क्यों मिलाया ? पुत्र ने कहा – की पिताजी आप ही तो कहते है न की कोई भी शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है मगर माँ आपके दुध में पानी नहीं मिलाती थी. मैंने सोचा की आपको शुद्ध दुध देने से आपकी बिमारी और बढेंगी. आपकी बिमारी नहीं बढ़े यही सोचकर तो मैंने आपको  शुद्ध दुध न देते हुये उसमे मिलावट करना उचित समझा।

🔴 बुरी शिक्षा का परिणाम दानी ने देख लिया था। तब से उसने मिलावट नहीं करने की शिक्षा ली और अपने दुकान से गाँव वालो को शुद्ध सामग्री भी देने लगा, और इतना ही नहीं उसके दहलीज पर जो भी आता उन्हें भोजन अवश्य देता, और वो भी शुद्ध।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 14) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और तब जीव गुरु की वाणी के उत्तर में कहता है- हे प्रभु, जगतसृष्टा! तुम्हारा स्वभाव अनन्त है। तुम सर्वत्र विराजमान हो। प्रभु इतनी कृपा करो यह धारणा दृढ़तापूर्वक मेरे मन में सदैव बनी रहे। त्रिभुवन में तुम्हें छोड़कर और कोई आशा नहीं है। मृत्यु तथा आतंक सभी जगह  है। सभी ओर दुःख तथा भ्रम है। मर्त्य जीवन का यही तो दृश्य  है। किन्तु तुम यदि भ्रम दूर कर दो तो जहाँ मृत्यु पीछा कर रही है, जहाँ दुःख है वहाँ भी मैं तुम्हारे दर्शन करूँगा। प्रभु, भयंकर में भी मैं तुम्हारे दर्शन करूँ ! हे भ्रम -विनाशक प्रभु, मेरी प्रार्थना सुनो।

और गुरु की वाणी ने उत्तर दिया:-

🔵 वत्स, प्रभु को पुकारो! सदैव प्रभु को पुकारो!! उनके और केवल उनके विषय में ही विचार करो और वह असीम शक्ति तुम्हारे चारों ओर एकत्र हो जायेगी तथा अनन्त प्रेम तुम्हारा आलिंगन करेगा। तथा प्रभु तुम्हारी आत्मा में अनुभव की वाणी बोलेंगे।

🔴 भगवान पर सच्ची निर्भरता सभी कठिनाइयों को दूर कर देती है। व्यक्ति- निर्माण की सच्ची प्रक्रिया परम प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण में है, यह अबाध ध्यान में प्रगट होती है। जब जीवन मिथ्या प्रतीत होता है, जब मृत्यु उपस्थित होती है, जब पीड़ा से हृदय ऐंठता है, तथा मनुष्य का संताप चूड़ान्त हो उठता है, तुम स्मरण रखने की चेष्टा करो, स्मरण रखो कि यह सब बातें शरीर की हैं; तुम आत्मा हो। प्रत्येक दिन को इस प्रकार ग्रहण करो मानो यह जीवन का अंतिम दिन है। जीवन के प्रत्येक क्षण में जप करो। प्रतिदिन अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दो। उनकी इच्छा की सर्वज्ञता को देखो, और तब बाघ के मुँह में भी, मृत्यु की उपस्थिति में भी, नरक द्वार में भी तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

शांतिकुंज हरिद्वार के आधिकारिक डिजिटल परिवार से जुड़े रहें। आध्यात्मिक चिंतन, प्रेरणादायी संदेश, आधिकारिक सूचनाएँ एवं नवीनतम अपडेट प्राप्त ...