बुधवार, 6 अक्टूबर 2021
👉 भक्तिगाथा (भाग ७२)
महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव
ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने अपने प्रिय शिष्य को यूँ पुलकित होकर आते हुए देखा तो उन्होंने समझ लिया, कि आज उनके प्रिय अम्बरीश को उनका मनचाहा मिल गया है। उन्होंने सभी ऋषिगणों के साथ भगवान नारायण की अर्चना की। एकादशी के पारायण का यह महोत्सव सरयू नदी के किनारे हो रहा था। भगवान सूर्यदेव का बिम्ब नदी के जल में कुछ इस तरह से पड़ रहा था, जैसे कि सूर्यनारायण अयोध्यावासियों पर कृपालु होकर स्वयं सरयू में उतर आए हों। भगवान नारायण के नाम के मधुर संकीर्तन के साथ यह पारायण उत्सव सचमुच ही मोहक था। दूर-दूर से आए तपस्वी भक्त, साधक, सिद्ध जनों का सम्मिलन अयोध्या के नगर जनों के लिए परम सौभाग्य की बात थी। उन्हें गर्व था अपने प्रजापालक, न्यायप्रिय नरेश पर, जिन्होंने उनको संरक्षण एवं संसाधन के साथ सुसंस्कार भी दिए थे। उन्होंने अपने इन प्रियजनों को साधनों के अर्जन के साथ साधना के अर्जन की भी शिक्षा दी थी।
भावों की इसी पुलकन-सिहरन के साथ सभी भक्ति की लहरों में भीग रहे थे। इन्हीं भीगी भावनाओं के साथ महाराज अम्बरीश सबको लेकर वहाँ पहुँचे- जहाँ भोजन की व्यवस्था की गयी थी। उन्होंने ऋषि विद्रुम एवं ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ को एक विशिष्ट आसन पर बिठाया। पास में ही उन्होंने अन्य ऋषियों-महर्षियों के साथ ऋषि विद्रुम के शिष्य शील एवं सुभूति को आसन दिया। राजकर्मचारी सभी अभ्यागतों के स्वागत में लगे थे। परन्तु इन ऋषि-तपस्वियों की सेवा महाराज स्वयं ही कर रहे थे। ऐसा करते हुए उनके हर्ष-उत्साह के अतिरेक का पारावार न था। वह सब कुछ बड़े मनोयोग से कर रहे थे। यह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पल था, जिसे हर कोई अपने नयनों में कैद कर लेना चाहता था।
सुखद एवं सुखप्रद राजपरितोष एवं क्षुधा की शान्ति, दोनों का अनुभव सभी को एक साथ हो रहा था। सुस्वादु भोजन का प्रथम ग्रास मुख में लेते समय ऋषि विद्रुम के शिष्यों शील एवं सुभूति को अचानक कुछ याद आ गया। वे दोनों एक दूसरे को देखते हुए मुस्कराए। उनकी इस मुस्कराहट को ऋषि विद्रुम के साथ महर्षि वशिष्ठ ने भी देखा। अपने इन शिष्यों को यूँ मुस्कराते हुए देख महातपस्वी विद्रुम के होठों पर हल्का सा स्मित उभरा। ऋषिश्रेष्ठ वशिष्ठ को भी इस कौतुक का रहस्य जानने की जिज्ञासा हो आयी। पर वह बोले कुछ नहीं, बस मौन ही भोजन करते रहे। भोजन के पश्चात् आचमन आदि करके उन्होंने विद्रुम से उनके स्मित का कारण जानना चाहा। उत्तर में वह प्रसन्न होकर बोले- ‘‘इस हँसी और स्मित में ही तो मेरे आगमन का कारण छुपा है।’’ ऐसा कहते हुए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ को काफी दिन पुरानी एक घटना सुनायी।
उन्होंने कहा कि काफी समय पूर्व जब वे अपने शिष्यों को भक्ति-भक्त एवं भगवान का स्वरूप-सत्य समझा रहे थे, तो उन्होंने प्रसंगवश कहा था कि भक्ति का स्वाद ऐसा है जिसे कहकर नहीं, बल्कि अनुभव करके ही जाना जा सकता है। यदि लौकिक सत्यों से इसकी तुलना की जाय तो यह राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति की भांति है। जिसे चर्चा करके नहीं बल्कि स्वयं अनुभव करके जाना जा सकता है। यहाँ पर अपने शिष्यों को मैं इसी सत्य का अनुभव कराने आया था। उनकी उस हँसी में उनकी प्रगाढ़ अनुभूति की प्रसन्नता छलक रही थी। उन्होंने यहाँ आकर भक्ति का स्वाद जाना, अनुभव किया भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की भक्ति को। साथ ही इस भक्ति एवं भक्त में उन्होंने भगवान् की अनुभूति पायी। इस अनुभूति के साथ उन्होंने राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति को भी एक साथ अनुभव किया। अपने शिष्यों को यही अनुभव देने के लिए ही मैं यहाँ आया था। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के इस संस्मरण ने न केवल महर्षि विद्रुम के अयोध्या आगमन के रहस्य की कथा कही, बल्कि उन्हें देवर्षि को नए सूत्र के लिए प्रेरित किया और देवर्षि कह उठे-
‘न तेन राजपरितोषः क्षुधा शान्तिर्वा’॥ ३२॥
सचमुच ही मात्र जान लेने से न तो राजा की प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३३
मंगलवार, 5 अक्टूबर 2021
👉 भक्तिगाथा (भाग ७१)
महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव
महातपस्वी विद्रुम के अयोध्या आगमन का रहस्य कोई यदि सही ढंग से जानता था तो वह थे स्वयं महातापस विद्रुम, जबकि वे तो अन्तर्लीन-आत्ममग्न दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि वे स्वयं में खोए हों। इस सम्पूर्ण समारम्भ-सम्भार में कोई आकर्षण न था, फिर भी वहाँ पर आए थे, क्यों? यह एक प्रश्नचिह्न था। महाराज अम्बरीश के स्वागत-शिष्टाचार में भी वह सर्वथा स्थितप्रज्ञ दिखे। हाँ! ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से अवश्य वह पूरी आत्मीयता से मिले। इस अवसर पर उनके होठों पर मुस्कराहट और आँखों में एक विशेष चमक दिखी। हालांकि, यह कुछ ही क्षणों के लिए था, फिर वे स्वयं में अन्तर्लीन-भावलीन होने लगे। महर्षि विद्रुम के साथ दो नवयुवक भी थे, जिनके मुख पर साधना का तेज था, तप की प्रभा थी। उनकी आँखों में एक पवित्र दैवी भाव की लहरें उमड़ रही थीं। सम्भवतः वे महर्षि विद्रुम के शिष्य-सेवक थे। उनके मुखमण्डल पर उमड़ते भावों की प्रभा कुछ यही कह रही थी।
शील एवं सुभूति, महर्षि विद्रुम ने उन दोनों का यही परिचय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को दिया था। विद्रुम के संकेत से इन दोनों ने वशिष्ठ को प्रणाम किया। प्रणाम करते समय इन दोनों का शील-विनय एवं भावमयता सराहनीय थी। प्रणाम के अनन्तर जब इन्होंने शीश ऊपर उठाया, तो इनके नेत्र भीगे हुए थे। पूछने पर उन्होंने केवल इतना कहा कि ‘‘महाभागवत महाराज अम्बरीश के कुलगुरु से हम दोनों भी भक्ति का सूत्र-सत्य सीखने के लिए आए हैं।’’ इनकी ऐसी भावनाएँ निहार कर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ बस केवल इतना ही कह सके- ‘‘अवश्य वत्स! क्यों नहीं, तुम सुयोग्य हो, सत्पात्र हो, तुम्हारी इस विनयशीलता के कारण ही तुम्हें महर्षि विद्रुम का संग प्राप्त हुआ है। यह संग-सान्निध्य देवों के लिए भी दुर्लभ है वत्स! इसके प्रभाव से तुम सब कुछ जान सकोगे, सीख सकोगे।’’
वशिष्ठ से अपने मनोरथ पूर्ण होने का आशीष लेकर वे पुनः अपने गुरु महर्षि विद्रुम के पास आ गए। अभी भी वह सबसे अलग सर्वथा वीतराग भाव से बैठे हुए थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उन्हें देखते हुए पुनः महाराज अम्बरीश को कुछ संकेत किया। इस संकेत को समझकर महाराज अम्बरीश ऋषि विद्रुम के पास पहुँचकर बोले- ‘‘हे देव! एकादशी के परायण का मुहूर्त हो आया है। आइए हम सब भगवान् नारायण की अर्चना करते हुए व्रत का पारायण करें।’’ नारायण का नाम सुनते ही महर्षि विद्रुम के हृदय में भावों का ज्वार उमड़ आया। उनके उठने में बालकों जैसी चपलता एवं त्वरा दिखी। भावों से भीगे मन से उठते हुए वह बस केवल इतना ही कह सके, ‘‘अवश्य पुत्र। इसीलिए तो हम यहाँ आए हैं, ताकि तुम्हारे जैसे परम भक्त के साथ भगवान नारायण की अर्चना कर सकें, भगवद्भक्ति के सूत्रों का सत्य जान सकें।’’
महर्षि विद्रुम के ये वाक्य, उनके द्वारा किया गया पुत्र सम्बोधन सुनकर अयोध्या नरेश अम्बरीश को ऐसा लगा, जैसे कि उन्हें आज जीवन भर की सम्पूर्ण एकादशियों का सुफल, आज एक पल में मिल गया हो। वह पुलकित, गद्गद एवं भाव विह्वल हो गए। उन्होंने भीगे मन एवं गीले नयनों के साथ ऋषि विद्रुम के पाँव पकड़ लिये। महर्षि ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और बोले- ‘‘पुत्र! तुम सब भाँति योग्य हो। अभी तक मैं तुमसे न मिल सका, इसके पीछे भी सम्भवतः भगवान् नारायण का कोई विधान है।’’ महर्षि का यह सुकोमल व्यवहार अम्बरीश को अपने जन्म भर के पुण्यों का सुफल लगा। वह अपने अन्तर्भावों में कुछ इतना डूब गए कि कुछ कह न सके। बस महर्षि विद्रुम और उनके शिष्यों को साथ लेकर उस ओर चल पड़े, जिधर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ खड़े थे।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३१
सोमवार, 4 अक्टूबर 2021
👉 भक्तिगाथा (भाग ७०)
भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा
भक्त और भगवान् के सान्निध्य की बात महर्षि वसिष्ठ को बहुत भायी और वे प्रसन्न मन से अयोध्या के राजकुल के पुरोहित हो गए। इसी कुल में भक्त श्रेष्ठ अम्बरीश का जन्म हुआ और वे अयोध्या के अधिपति हुए। विशाल साम्राज्य के चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी उनकी भक्ति में तनिक सी भी न्यूनता नहीं आयी। सम्राट अम्बरीश नियमित एकादशी का व्रत करते थे, भगवन्नाम जप में उनकी अटूट निष्ठा थी। वह हमेशा ही विराट् यज्ञों का आयोजन कर यज्ञपति भगवान् विष्णु का यजन-पूजन करते थे। महर्षि वसिष्ठ ने बहुत ही पुलकित मन से आज अपने यजमान एवं प्रिय शिष्य महाराज अम्बरीश का स्मरण किया और कहने लगे- अयोध्या के साम्राज्य में एकादशी सदा ही अद्भुत रही है। परन्तु जब अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे, तब एकादशी की विशिष्टता कुछ अधिक ही विशिष्ट थी। महाराज बड़े ही दिव्य एंव भव्य ढंग से एकादशी का परायण करते थे।
उनके इस परायण में वह और उनका राजपरिवार ही नहीं, बल्कि अयोध्या का प्रत्येक परिवार भागीदार होता था। जहाँ तक कि एकादशी व्रत की बात है तो यह व्रत तो उन दिनों महाराज के विशाल साम्राज्य का प्रत्येक नागरिक करता था, भले ही उसके ईष्ट आराध्य देव कोई भी क्यों न हो। यह एकादशी का व्रत तो अयोध्या के साम्राज्यवासियों का अपने महाराज की भक्ति के प्रति सजल श्रद्धा थी। और इस श्रद्धा से अयोध्या के जन-जन का मन अभिभूत था। उस दिन भी महाराज एकादशी के व्रत का पारायण कर रहे थे। सदा ही की भांति अयोध्यावासी इसमें भागीदार थे। आमंत्रित ऋषिगण भी विपुल संख्या में थे। राजकर्मचारी आगन्तुक साधु-तपस्वियों का भावपूर्ण सत्कार कर रहे थे।
इन आगन्तुक तपस्वियों में ऋषि विदू्रम भी थे। इनके तप की चर्चा उन दिनों सम्पूर्ण अयोध्या राज्य में होती रहती थी। विद्रूम का कठोर तप आश्चर्यजनक था। उनके इस अलौकिक तप की कथा धरती के मानव ही नहीं देवलोक के देवी-देवता भी करते थे। सामान्यतया तपस्वी श्रेष्ठ कहीं भी न आने-जाने के लिए विख्यात् थे। आज उनका यहाँ आना सर्वथा विस्मयकारी था। जो अपने सम्पूर्ण जीवन राजगृह एवं भोजन आदि से दूर रहा हो, उसका इस तरह राजगृह में आना एवं भोजन की पंक्ति में बैठना सर्वथा विस्मयकारी था। चकित तो स्वयं सम्राट अम्बरीश थी थे। उन्हें भी विद्रूम का आना कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इसके पहले कितने ही अवसरों पर सम्राट विद्रूम की कुटिया में गए थे। परन्तु उन्होंने तो उनसे मिलने से ही इन्कार कर दिया था। उन्हें आमंत्रित करके राजभवन बुलाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।
कई बार सम्राट अम्बरीश ने इस की चर्चा ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से की थी। कई बार तो इस चर्चा को करते हुए सम्राट व्यथित हो जाते थे। वह कहते- गुरुदेव! मुझे इस धरती के सभी महर्षियों, साधु-तपस्वियों का आशीर्वाद मिल चुका है। परन्तु न जाने क्यों मैं महातपस्वी विद्रूम की कृपा से अभी तक वंचित हूँ। अवश्य ही मेरी भगवद्भक्ति में कहीं कोई खोट है, तभी अपने तप से सर्वलोकों को प्रकाशित करने वाले महर्षि विद्रूम मुझसे मिलना तक नहीं पसन्द करते। जब-जब महाराज अम्बरीश ने विद्रूम की चर्चा की, उनसे न मिल पाने की अपनी व्यथा कही, वसिष्ठ ने उन्हें सान्त्वना प्रदान की, उनको समझाया और कहा- पुत्र! विद्रूम तपस्वी हैं पर निष्करूण नहीं। एक न एक दिन किसी न किसी अवसर पर वह तुम्हारे पास अवश्य आएँगे। तुम इस सत्य को सुनिश्चित रूप से जान लो कि वे कहीं भी हों, अपने तप की किन्हीं भी प्रक्रियाओं में क्यों न लीन हों, पर तुम्हारे हृदय से वह देर तक अपरिचित नहीं रह सकते। तुम्हें उनकी कृपा अवश्य मिलेगी। पर कब और किस अवसर पर? इसका उत्तर तो या तो वह स्वयं दे सकते हैं, अथवा उनकी रचना करने वाला विधाता। वही तपस्वी विद्रूम आज महाराज के राजभवन में एकादशी परायण के भोजन के अवसर पर पधारे थे। हालांकि उनके इस आगमन का प्रयोजन अभी तक रहस्यमय था।’’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२९
शनिवार, 2 अक्टूबर 2021
👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (अन्तिम भाग)
बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?
इस दुर्गति में पड़े रहने से आज का समय किसी प्रकार कट भी सकता है, पर भविष्य तो अन्धकार से ही भरा रहेगा। विवेक की एक किरण भी कभी चमक सके तो उसकी प्रतिक्रिया परिवर्तन के लिये तड़पन उठने के रूप में ही होगी। प्रस्तुत दुर्दशा की विडम्बना और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का तुलनात्मक विवेचन करने पर निश्चित रूप से यही उमंग उभरेगी कि परिवर्तन के लिये साहस जुटाया जाय। इसी उभार के द्वारा अध्यात्म जीवन में प्रवेश और साधना प्रयोजनों का अवलम्बन आरम्भ होता है।
परिवर्तन का प्रथम चरण है, बन्धनों का शिथिल करना। आकर्षणों के अवरोधों से विमुख होना। आसक्ति को वैराग्य की मनःस्थिति में बदलना। इसके लिये कई तरह के संयम परक उपायों का अवलम्बन करना पड़ता है। साधना रुचि परिवर्तन की प्रवृत्ति को उकसाने से आरम्भ होती है। इस संदर्भ में महर्षि पातंजलि का कथन है।
बन्धकारण शैथिल्यात्प्राचार सम्वेदनस्य ।
चित्तस्य पर शरीरावेशः ।।
—योग दर्शन 3-38
बन्धनों के कारण डीले हो जाने पर चित्त की सीमा, परिधि और सम्वेदना व्यापक हो जाती है।
मोक्षस्य नहि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ।।
—शिव गीता 13।32
अर्थात्—मोक्ष किसी स्थान विशेष में निवास करने की स्थिति नहीं है। न उसके लिये किसी अन्य नगर या लोक में जाना पड़ता है। हृदय के अज्ञानांधकार का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है।
मोक्ष में परमात्मा की प्राप्ति होती है। अथवा परमात्मा की प्राप्ति ही मोक्ष है। यह मोक्ष क्या है? भव बन्धनों से मुक्ति। भव-बन्धन क्या हैं? वासना, तृष्णा और अहंता के—काम, लोभ और क्रोध के नागपाश। इनसे बंध हुआ प्राणी ही माया ग्रसित कहलाता है। यही नारकीय दुर्दशा का दल-दल है। इससे उबरते ही आत्मज्ञान का आलोक और आत्म-दर्शन का आनन्द मिलता है। इस स्थिति में पहुंचा हुआ व्यक्ति परमात्मा का सच्चा सान्निध्य प्राप्त करता है और ज्ञान तथा सामर्थ्य में उसी के समतुल्य बन जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है—
ये पुरुषे ब्रह्मविदुः तेविदुः परमेष्ठितम् ।
अर्थात्—जो आत्मा को जान लेता है, उसी के लिये परमात्मा का जान लेना भी सम्भव है। ऋग्वेद में आत्मज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान कहा गया है। ग्रन्थों के पढ़ने से जानकारियां बढ़ती हैं, आत्मानुभूति से अपने आपे को और परमतत्व को जाना जाता है। श्रद्धा-विहीन शब्दचर्चा का ऊहापोह करते रहने से तो आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। एक ऋचा है—यः तद् न वेदकिम् ऋचा करिष्यति।’’
जो उस आत्मा तत्व को नहीं जान पाया वह मन्त्र, बात या विवेचन करते रहने भर से क्या पा सकेगा? उपनिषद् का कथन है—‘‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’’ अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही बन जाता है।
यह स्थिति जीवन और जगत के पीछे छिपी हुई कारण सत्ता को देखने तथा उसे समझने, बोध प्राप्त करने के लिये साधना स्तर के प्रयासों से ही सम्भव है। भारतीय मनीषियों ने इसीलिये तत्व दर्शन को ही बन्धन मुक्ति का उपाय बताया है यह दृष्टि अपने मन, बुद्धि चित्त और अहंकार के परिष्कार पूर्वक ही विकसित की जा सकती है। योग तप, ब्रह्मविद्या, साधना, उपासना, अभ्यास, मनन, चिन्तन और ध्यान निदिध्यासन द्वारा चित्त वृत्ति को इतना निर्मल परिष्कृत बनाया जाता है कि यह तत्व दृष्टि विकसित की जा सके।
.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ११०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी
👉 भक्तिगाथा (भाग ६९)
भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा
ब्रह्मर्षि क्रतु के मुख से भीलकुमार कणप्प की भक्तिगाथा सुनकर सभी के अन्तःकरण भावों से भीग गए। भक्ति स्वयं ही साधना और सिद्धि को अपने में समाविष्ट कर लेती है। यहाँ तक कि इसमें भक्ति की साधना करने वाले साधक का अस्तित्त्व भी समा जाता है। अन्य साधना विधियों को अपनाकर इनकी साधना करते हुए साधक यदा-कदा थकान, बेचैनी की अनुभूति करने लगता है। यदि इनके प्रयोग सुदीर्घकाल तक करने पडें़ तो साधना के फल की आकांक्षा भी साधक को विचलित करती है। परन्तु भक्ति की साधना में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तो अपने ईष्ट-आराध्य की भक्ति करते हुए भक्त का मन पल-पल पुलकित और हर्षित होता रहता है। उसे तो बस हर क्षण यही लगता रहता है और क्या, और कितना, और कैसे, अपने प्रभु को दे डालूँ? कुछ पाना है, ऐसी चाहत तो कभी भी भक्त के मन-अन्तःकरण में अंकुरित ही नहीं होती। इन विचार कणों में सभी के मन देर तक सिक्त होते रहे।
समय का तो किसी को होश ही न रहा। चेत तो तब आया जब देवर्षि नारद ने अपनी वीणा की मधुर झंकृति की ही भांति एक सूत्र सत्य का उच्चारण करते हुए कहा-
‘राजगृैहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्’॥ ३१॥
राजगृह और भोजनादि में ऐसा ही देखा जाता है। भक्ति को स्वयं ही फलरूपा कहने के बाद देवर्षि के मुख से भक्ति की तुलना राजगृह एवं भोजन आदि से करने पर महर्षि वसिष्ठ के अधरों पर हलका सा स्मित झलक आया। ऐसा लगा वह कुछ पलों के लिए अपनी ही किन्हीं स्मृतियों में खो गए। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वसिष्ठ की यह भावभंगिमा वहाँ किसी से छिपी न रही। इसे औरों के साथ स्वयं देवर्षि ने भी देखा और उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से भावपूर्ण निवेदन करते हुए कहा- ‘‘इस सूत्र की तत्त्वकथा आप ही कहें भगवन्!’’ उत्तर में एक मधुर हास्य के साथ वसिष्ठ बोले- ‘‘देवर्षि! आपके मुख से राजगृह एवं भोजन की बात सुनकर मेरे मन मे कुछ पुरानी स्मृतियाँ उभर आयीं।’’
ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ के इस कथन ने सभी की जिज्ञासा व उत्सुकता को शतगुणित कर दिया। अब तो देवर्षि के साथ अन्य सबने भी अनुरोध किया, ‘‘अपनी पावन स्मृतियों से हम सबको भी पवित्र करें महर्षि!’’ उत्तर में महर्षि कुछ और कहते तभी हिमप्रपात एवं हिम पक्षियों की ध्वनियों ने वातावरण में एक अद्भुत संगीत घोल दिया। ऐसा लगा कि इस नयी भक्तिगाथा के श्रवण के पूर्व स्वयं प्रकृति ने मंगलाचरण पढ़ा हो। इस शुभ मंगल ध्वनि के साथ मौन हो रहे महर्षि मुखरित हुए और बोले- ‘‘मेरी यह स्मृतियाँ उन दिनों की हैं, जब भक्त प्रवर अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे। महाराज अम्बरीश की भक्ति एवं उनके व्यक्तित्व के विविध शीलगुणों की अनेकों अनोखी कथाएँ पुराणकारों ने कही हैं, इन सभी कथा प्रसंगों में महाराज अम्बरीश की भावपूर्ण भक्ति झलकती है। परन्तु जिस स्मृति कथा को मैं सुना रहा हूँ, उसे किसी भी पुराण ने नहीं कहा। यह सर्वथा अछूता कथा प्रसंग है।
हिमवान के आंगन में बैठे सभी महर्षिगण, देवता, सिद्ध, चारण एवं गन्धर्वों को यह तथ्य सुविदित था कि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सुदीर्घ काल तक अयोध्या के राजपुरोहित रहे हैं। उन्होंने युगों तक अयोध्या के राजघराने का पौरोहित्य कार्य किया है। ऋषियों के मध्य इसकी भी सदा चर्चा रही है- यह कार्य उन्हें स्वयं ब्रह्मा जी ने सौंपा था। इस चर्चा में यह तथ्य भी सुविदित रहा है कि परम वीतरागी महर्षि वसिष्ठ जब अयोध्या के राजपुरोहित नहीं बनना चाहते थे, तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा था- पुत्र! यह सामान्य राजकुल नहीं है। इस कुल में अनेकों श्रेष्ठ महामानव जन्म लेंगे। अनेक भगवद्भक्तों को इस कुल में जन्म मिलेगा। उनकी भक्ति की शक्ति से अन्ततः स्वयं भगवान मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में इस कुल में अवतरित होंगे। तुम्हें इन सभी के पुरोहित होने का, इन्हें मार्गदर्शन देने का सुअवसर मिलेगा।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२७
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021
👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ७०)
बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?
लालची मक्खी और चींटी की आसक्ति, आतुरता उसे विपत्ति के बन्धनों में जकड़ देती है और प्राण संकट उपस्थित करती है। चासनी को आतुरतापूर्वक निगल जाने के लोभ में यह अबोध प्राणी उस पर बेतरह टूट पड़ते हैं और अपने पंख, पैर उसी में फंसा कर जान गंवाते हैं। मछली के आटे की गोली निगलने और पक्षी के जाल में जा फंसने के पीछे भी वह आतुर अशक्ति ही कारण होती है, जिसके कारण आगा-पीछा सोचने की विवेक बुद्धि को काम कर सकने का अवसर ही नहीं मिलता।
शरीर के साथ जीव का अत्यधिक तादात्म्य बन जाना ही आसक्ति एवं माया है। होना यह चाहिए कि आत्मा और शरीर के साथ स्वामी सेवक का—शिल्पी उपकरण का भाव बना रहे। जीव समझता रहे कि मेरी स्वतन्त्र सत्ता है। शरीर के वाहन, साधन, प्रकृति यात्रा की सुविधा भर के लिए मिले हैं। साधन की सुरक्षा उचित है। किन्तु शिल्पी अपने को—अपने सृजन प्रयोजन को भूल कर—उपकरणों में खिलवाड़ करते रहने में सारी सुधि-बुद्धि खोकर तल्लीन बन जाया तो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण हो होगी। तीनों शरीर तीन बन्धनों में बंधते हैं। स्थूल शरीर इन्द्रिय लिप्सा में, वासना में। सूक्ष्म शरीर (मस्तिष्क) सम्बन्धियों तथा सम्पदा के व्यामोह में। कारण शरीर-अहंता के आतंक फैलाने वाले उद्धत प्रदर्शनों में। इस प्रकार तीनों शरीर—तीन बन्धनों में बंधते हैं और आत्मा उन्हीं में तन्मय रहने की स्थिति में स्वयं ही भव बंधनों में बंध जाता है। यह लिप्सा लालसायें इतनी मादक होती है कि जीव उन्हें छोड़कर अपने स्वरूप एवं लक्ष्य को ही विस्मृति के गर्त में फेंक देता है। वेणुनाद पर मोहित होने वाले मृग वधिक के हाथों पड़ते हैं। पराग लोलुप भ्रमर-कमल में कैद होकर दम घुटने का कष्ट सहता है। दीपक की चमक से आकर्षित पतंगे की जो दुर्गति होती है व सर्वविदित है। लगभग ऐसी ही स्थिति व्यामोह ग्रसित जीव की भी होती है। उसे इस बात की न तो इच्छा उठती है और न फुरसत होती है कि अपने स्वरूप और लक्ष्य को पहचाने। उत्कर्ष के लिए आवश्यक संकल्प शक्ति जगाई जा सकती तो इस महान प्रयोजन के लिये मिली हुई विशिष्ट क्षमताओं को भी खोजा जगाया जा सकता था। किन्तु उसके लिये प्रयत्न कौन करे? क्यों करे? जब विषयानन्द की ललक ही मदिरा की तरह नस-नस पर छाई हुई है तो ब्रह्मानन्द की बात कौन सोचे? क्यों सोचे?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी
👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)
भगवान को भावनाएँ अर्पित करने वाला कहलाता है भक्त
इस अनुभूति के साथ उन्होंने ब्रह्मर्षि क्रतु से बड़े विनम्र स्वर में कहा- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! इस सूत्र का अनुभव कथन आप स्वयं अपने मुख से कहें।’’ नारद के इस आग्रह को क्रतु अस्वीकार न कर सके और बोले- ‘‘भक्ति एक ऐसा तत्त्व है, जो कहने वाले को और सुनने वाले को, दोनों ही को कृतार्थ करता है। जो इसे कहता है अथवा जो इसे सुनता है, दोनों ही इसके रस से स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मेरी इस प्रकरण में विशेषज्ञता नहीं है। परन्तु हाँ, मुझे ऐसे ही एक भक्त का सान्निध्य मिला है। यदि आप सभी की अनुमति हो तो मैं उस अनपढ़ भील की कथा अवश्य सुना सकता हूँ।’’ क्रतु के इन वचनों ने सभी के भावों को विभोर करके उनके अन्तर्मन को हर्षित किया। सभी ने एक स्वर में अनुरोध किया कि महर्षि उस भील भक्त की कथा कहें।
अनुरोध के इन स्वरों के साथ महर्षि के अन्तःसरोवर में भावउर्मियाँ थिरक उठीं। उनमे मन में स्मृति की कई रेखाएँ उभर आयीं और उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘उसका नाम कणप्प था। जाति का भील था वह, उसका कबीला विन्ध्यांचल के जंगल में रहता था। अपने कबीले के सरदार का इकलौता पुत्र था वह। कृष्ण वर्ण की बलिष्ठ काया, मुख पर एक ऊर्जा बसा सात्त्विक आकर्षण। उसके उज्ज्वल नेत्रों से सदा ही एक सात्त्विक प्रकाश झरता रहता था। भीलकुमार होते हुए भी उसका रहन-सहन, खान-पान सतोगुणी था। अन्य भीलकुमारों की तरह वह मांसाहारी न था। हालांकि, उसकी कर्मठता एवं बलिष्ठता की कोई भी तुलना न थी। बलवान होने पर भी वह अहंकारी न था। सेवा परायणता उसमें कूट-कूट कर भरी थी। कबीले के कामों एवं पिता की सहायता से उसे जो भी समय मिलता वह उस समय का उपयोग, वनवासी साधु-तपस्वियों की सेवा में करता।
इस सेवापरायणता का ही सुफल उसे भक्ति के रूप में मिला था। विन्ध्यांचल के वन में रहने वाले एक तपस्वी साधु ने प्रसन्न होकर उसे पञ्चाक्षर मंत्र प्रदान किया था। ‘ॐ नमः शिवाय’ के उपदेश के साथ उन्होंने उसे भगवान सदाशिव की लीलाकथाएँ सुनाते हुए कहा- पुत्र! भावों की गहराई में डूबकर अपने आराध्य का स्मरण और उन्हीं को अपना सर्वस्व समर्पण ही भक्ति है। जो अपने स्मरण व समर्पण की साधना में जितनी प्रगाढ़ता, प्रखरता एवं परिपक्वता लाता है उसमें भक्ति उतनी ही तीव्रता से प्रकट होती है। इस भक्ति के साधन से कुछ भी असम्भव नहीं है। हाँ! इतना अवश्य ध्यान रखना कि अनन्यता भक्त का अनिवार्य गुण है। जो अपने ईष्ट में अनन्य भाव से डूबा रहता है, वह जीवन के तत्त्व और सत्य को पा जाता है। उसके लिए लोक में कुछ भी असम्भव नहीं है। हालांकि भक्ति अपना फल स्वयं ही है।
इन वनवासी साधु वेदव्रत की बात कणप्प को भा गयी। उसने भगवान् शिव के नाम-रूप-गुण एवं उनकी लीलाओं में अपने मन-अन्तःकरण को भिगोना प्रारम्भ कर दिया। वह प्रातः से उठकर सायं तक जो भी करता, केवल अपने प्रभु के लिए करता। कर्त्तव्य संसार के लिए, भावनाएँ भगवान् के लिए। यह उसके जीवन का महामंत्र बन गया। प्रातः सायं वन में जाकर सरिता के किनारे वट वृक्ष की छाया में वह पार्थिव पूजन करता। स्मरण व समर्पण की साधना उसके रोम-रोम में बसने लगी। उसे साधु वेदव्रत का यह कथन हमेशा याद रहता, जो उन्होंने उसे शिव नाम देते हुए कहा था- पुत्र! भक्त वह है जो अपनी भावनाएँ केवल भगवान को देता है। अपनी साधन सम्पत्ति तुम भले ही किसी को दे दो, परन्तु भावनाओं में अन्य किसी की हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए। जिसकी भावनाओं में किसी की भी हिस्सेदारी है, वह कभी भी भक्त नहीं हो सकता। उससे भक्ति की साधना सम्भव नहीं।
सरल हृदय भीलकुमार कणप्प को यह बात दिल में लग गयी। उसकी मेधा भले ही प्रखर न थी, परन्तु भाव पवित्र थे। सो शीघ्र ही वह भावों के समर्पण की कला सीख गया। इस भाव अर्पण की निपुणता ने उसके लिए अपने आप ही भावसमाधि के द्वार खोल दिए। भावसमाधि में वह अपने आराध्य के साथ एकाकार होने लगा। भगवान् सदाशिव उसके मन मन्दिर में प्रकट होने लगे। उसकी भक्ति प्रबल होती गयी और भगवान अपने इस अनूठे भक्त के लिए विकल होते गए। एक दिन जब वह निशाकाल में अपने भगवान् के ध्यान में डूबा था- तो भोलेनाथ अपने प्रिय भक्त के सम्मुख प्रकट हो गए। शूलपाणि प्रभु का रूप अनोखा था। परन्तु भक्त कणप्प तो अपनी भक्ति में खोया था। भगवान ने स्वयं उसके शीष पर हाथ रखकर चेताया और कहा- पुत्र! मांगो तुम क्या चाहते हो। अपने भगवान को सम्मुख पाकर कणप्प के आँखों से आँसू बह निकले- बड़ी मुश्किल से वह बोल सका- भक्ति का वरदान दे भगवान! जीवन और परिस्थितियों का स्वरूप जो भी हो, पर मैं भक्ति में डूबा रहूँ। भोलेनाथ ने एवम्वस्तु कहकर उसे आशीष दिया। भक्त और भगवान दोनों ही अनुभव कर रहे थे कि भक्ति स्वयं ही फलरूपा है।’’
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२४
बुधवार, 29 सितंबर 2021
👉 अपना दीपक स्वयं बनें: -
एक गांव मे अंधे पति-पत्नी रहते थे । इनके यहाँ एक सुन्दर बेटा पैदा हुआ जो अंधा नही था।
एक बार पत्नी रोटी बना रही थी उस समय बिल्ली रसोई मे घूस कर बनाई रोटियां खा गई।
बिल्ली की रसोई मे आने की रोज की आदत बन गई इस कारण दोनों को कई दिनों तक भूखा सोना पङा।
एक दिन किसी प्रकार से मालूम पङा कि रोटियां बिल्ली खा जाती है।
अब पत्नी जब रोटी बनाती उस समय पति दरवाजे के पास बांस का फटका लेकर जमीन पर पटकता।
इससे बिल्ली का आना बंद हो गया।
जब लङका बङा हुआ ओर शादी हुई। बहु जब पहली बार रोटी बना रही थी तो उसका पति बांस का फटका लेकर बैठ गया औऱ फट फट करने लगा।
कई दिन बीत जाने के बाद पत्नी ने उससे पुछा की तुम रोज रसोई के दरवाजे पर बैठ कर बांस का फटका क्यों पीटते हो?
पति ने जवाब दिया कि
ये हमारे घर की परम्परा है इस मैं रोज ऐसा कर रहा हुँ।
माँ बाप अंधे थे बिल्ली को देख नही पाते उनकी मजबूरी थी इसलिये फटका लगाते थे। बेटा तो आँख का अंधा नही था पर अकल का अंधा था। इसलिये वह भी ऐसा करता जैसा माँ बाप करते थे।
ऐसी ही दशा आज के समाज की है। पहले शिक्षा का अभाव था इसलिए पाखंड वादी लोग जिनका स्वयं का भला हो रहा था उनके पाखंड वादी मूल्यों को माना औऱ अपनाया। जिनके पिछे किसी प्रकार का लौजिक नही है। लेकिन आज के पढे लिखे हम वही पाखंडता भरी परम्पराओं व रूढी वादिता के वशीभूत हो कर जीवन जी रहे हैं।
इसलिये सबसे पहले समझौ,जानो ओर तब मानो तो समाज मे परिवर्तन होगा ।
"अपना दीपक स्वयं बनें"
👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६९)
बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?
अधिकांश क्षमता तो भव बन्धनों में ही पड़ी जकड़ी रहती है। भ्ज्ञव बन्धन क्या है? व्यामोह ही भव बन्धन है। भव बन्धनों में पड़ा हुआ प्राणी कराहता रहता है और हाथ पैर बंधे होने के कारण प्रगति पथ पर बढ़ सकने में असमर्थ रहता है। व्यामोह का माया कहते हैं।माया का अर्थ है नशे जैसी खुमारी जिसमें एक विशेष प्रकार की मस्ती होती है। साथ ही अपनी मूल स्थिति की विस्मृति भी जुड़ी रहती है। संक्षेप में विस्मृति और मस्ती के समन्वय को नशे की पिनक कहा जा सकता है, चेतना की इसी विचित्र स्थिति को माया, मूढ़ता, अविद्या, भव बन्धन आदि नामों से पुकारा जाता है।
ऐसी विडम्बना में किस कारण प्राणी बंधता, फंसता है? इस प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए आत्म दृष्टाओं ने विषयवती वृत्ति को इसका दोषी बताया है। विषयवती वृत्ति की प्रबलता को बन्धन का मूल कारण बताते हुये महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन के कुछ सूत्रों में वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला है।
विषयवती वा प्रवृत्तित्पत्रा मनसः स्थिति निबंधिनि ।
—यो. द. 1-35
सत्व पुरुषायोरत्यन्ता संकीर्णयोः प्रत्यया विशेषो भोगः । परार्धात्स्वार्थ संयतात्पुरुषा ज्ञानम् ।
—यो. द. 3-35
ततः प्रतिम श्रावण वेदनादर्शी स्वाद वार्ता जायन्ते ।
—यो. द. 3-36
उपरोक्त सूत्रीं में यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि शारीरिक विषय विकारों में आसक्ति बढ़ जाने से जीव अपनी मूल स्थिति को भूल जाता है और उन रसास्वादनों में निमग्न होकर भव बन्धनों में बंधता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी
👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)
भगवान को भावनाएँ अर्पित करने वाला कहलाता है भक्त
प्रतीक्षा के क्षणों में क्रमिक वृद्धि होती गयी। ऋषियों, देवों, सिद्धों, गन्धर्वों का समुदाय अपने मन, अन्तःकरण को भक्ति के भावप्रवाह में भिगोता रहा। बड़ा रसमय अनुभव हो रहा था सभी को। भक्ति, भक्त एवं भगवान की भावचर्चा जहाँ कहीं भी, जिस रूप में भी, जिस किसी के द्वारा भी होती है, वहाँ स्वयं ही भावों का अमृत प्रवाह उमगने लगता है। वहाँ अपने आप ही मन, अन्तःकरण शान्ति सुधा रस का अनुभव करने लगते हैं। तृप्ति, तुष्टि और शान्ति का जैसा अनुभव यहाँ होता है, वैसा और कहीं भी, किसी को भी नहीं होता। भावों का सरोवर ही एक ऐसा सरोवर है, जहाँ पर सभी का जी करता है कि डूबते रहें और डूबे ही रहें। हिमालय के सुपावन सान्निध्य में कुछ ऐसा ही सब अनुभव कर रहे थे। नीरवता और निःस्तब्धता अपनी परिभाषा को परिभाषित कर रही थी। काल बीत तो रहा था, परन्तु उसका ज्ञान किसी को नहीं था। सभी उसके प्रति निरपेक्ष, तटस्थ थे, परन्तु स्वयं काल भला कब किसी की ओर से निरपेक्ष रहा करता है।
उस सदा सजग, सचेष्ट एवं सक्रिय रहने वाले काल ने ब्रह्मर्षि क्रतु की भावसमाधि को भंग किया। ऋषियों में श्रेष्ठ क्रतु, बाह्य जगत् की ओर उन्मुख हुए। तभी एक हिमपक्षी ने सुरीली ध्वनि से निस्तब्धता-नीरवता में अपना स्वर घोला। इस स्वर में कुछ ऐसा था जैसे कि वह हिमपक्षी भी अगले सूत्र की जिज्ञासा को उजागर कर रहा हो। महर्षि क्रतु का ध्यान उस ओर गया। वह कुछ पलों तक मौन रहे, फिर उन्होंने देवर्षि नारद की ओर देखा। देवर्षि ने महर्षि क्रतु के नेत्रों में उनके अभिप्राय को पढ़ लिया। वह समझ गए कि वीतराग महर्षि अगले सूत्र के उच्चारण का संकेत कर रहे हैं। वैसे भी अब तक सभी के मन, भावों के अगम प्रवाह से बाहर आ चुके हैं। उन सबको अगले सूत्र के प्रकट होने की त्वरा थी।
इन शुभ क्षणों को पहचान कर देवर्षि ने अपनी संगीतमयी स्वर लहरियों के साथ उच्चारित किया-
‘स्वयं फलरूपतेति ब्रह्मकुमाराः’॥ ३०॥
ब्रह्मकुमारों (सनत्कुमारादि) के मत से भक्ति स्वयं फलरूपा है। इस सूत्र का उच्चारण करके देवर्षि पुनः मौन हो गए। उन्हें इस तरह शान्त देखकर ब्रह्मर्षि क्रतु ने कहा- ‘‘निःसन्देह देवर्षि! ब्रह्मकुमारों का कथन सत्य है। भक्ति में साधना, साधन एवं सिद्धि तीनों ही अन्तर्लीन हैं। जो भक्ति करते हैं- उन्हें किसी अन्य तत्त्व एवं सत्य की आवश्यकता नहीं रहती। वह भक्ति में सब कुछ पा लेते हैं।’’ क्रतु के इस कथन पर सप्तर्षियों ने अपनी सहमति जतायी। अन्य ऋषियों एवं देवगणों ने भी प्रसन्नता जाहिर की। हालांकि, अब भी सबको इस सूत्र के सत्य को विस्तार से जानने का मन था। उत्सुकता थी कि ब्रह्मकुमारों के मत का और देवर्षि के कथन का रहस्यार्थ जानें। भक्ति का सत्य एवं भक्त की गाथा सुनें। सभी के इन मनोभावों को देवर्षि ने अपने मन में अनुभव किया।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२३
मंगलवार, 28 सितंबर 2021
👉 😇स्वमूल्यांकन - अंतिम बार कब किया था?
अपनी कमजोरियों की लास्ट टाइम लिस्ट कब बनाई थी, और कमजोरी को अपनी ताकत बनाने की चेकलिस्ट लास्ट कब चेक की थी?
अपनी ताकतों (strength) की अंतिम बार लिस्ट कब बनाई थी? क्या वो ताकत अभी भी है या नहीं।
पढ़ने की आदत अभी है या अभ्यास छूट गया?
स्वयं पर कितना नियंत्रण कर पाते हैं? पहले ज्यादा कर पाते थे या अब?
अपनी पूरी दिनचर्या पर कड़ी नज़र कब रखी थी अंतिम बार?
अपने विचारों पर पूरे दिन अंतिम बार कब नज़र रखी थी, किस प्रकार के विचार मन मष्तिष्क में सबसे ज्यादा आते है? क्या ये हमें पता है? किस प्रकार की आदतें और संस्कार रोज बन रहे हैं? किस प्रकार हमारे चरित्र का निर्माण हो रहा है? क्या हमें पता है?
किसी अप्रिय विचार को दूर करने के लिए क्या शसक्त विचारों की फ़ौज, ज्ञान के हथियार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है या नहीं।
स्वयं विचार करें और ईश्वर और स्वयं को जवाब दें।
अपनी ताकतों (strength) की अंतिम बार लिस्ट कब बनाई थी? क्या वो ताकत अभी भी है या नहीं।
पढ़ने की आदत अभी है या अभ्यास छूट गया?
स्वयं पर कितना नियंत्रण कर पाते हैं? पहले ज्यादा कर पाते थे या अब?
अपनी पूरी दिनचर्या पर कड़ी नज़र कब रखी थी अंतिम बार?
अपने विचारों पर पूरे दिन अंतिम बार कब नज़र रखी थी, किस प्रकार के विचार मन मष्तिष्क में सबसे ज्यादा आते है? क्या ये हमें पता है? किस प्रकार की आदतें और संस्कार रोज बन रहे हैं? किस प्रकार हमारे चरित्र का निर्माण हो रहा है? क्या हमें पता है?
किसी अप्रिय विचार को दूर करने के लिए क्या शसक्त विचारों की फ़ौज, ज्ञान के हथियार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है या नहीं।
स्वयं विचार करें और ईश्वर और स्वयं को जवाब दें।
शनिवार, 25 सितंबर 2021
👉 पीहर या ससुराल
तीज का त्यौहार आने वाला था। तुलसी जी की दोनों बहुओं के पीहर से तीज का सामान भर भर के उनके भाइयों द्वारा पहुंचा दिया गया था। छोटी बहू मीरा का यह शादी के बाद पहला त्यौहार था। चूँकि मीरा के माता पिता का बचपन में ही देहांत हो जाने के कारण, उसके चाचा चाची ने ही उसे पाला था इसलिए और हमेशा हॉस्टल में रहने के कारण उसे यह सब रीति-रिवाजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। पढ़ने में होशियार मीरा को कॉलेज के तुरंत बाद जॉब मिल गई। आकाश और वो दोनों एक ही कंपनी में थे। जहां दोनों ने एक दूसरे को पसंद किया और घरवालों ने भी बिना किसी आपत्ति के दोनों की शादी करवा दी। आज जब मीरा ने देखा कि उसकी जेठानियों के पीहर से शगुन में ढ़ेर सारा सुहाग का सामान, साड़ियां, मेहंदी, मिठाईयां इत्यादि आया है तो उसे अपना कद बहुत छोटा लगने लगा। पीहर के नाम पर उसके चाचा चाची का घर तो था, परंतु उन्होंने मीरा के पिता के पैसों से बचपन में ही हॉस्टल में एडमिशन करवा कर अपनी जिम्मेदारी निभा ली थी और अब शादी करवा कर उसकी इतिश्री कर ली थी। आखिर उसका शगुन का सामान कौन लाएगा, ये सोच सोचकर मीरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। जेठानियों को हंसी ठहाका करते देख उसे लगता शायद दोनों मिलकर उसका ही मजाक उड़ा रही हैं। आज उसे पहली बार मां बाप की सबसे ज्यादा कमी खल रही थी।
अगले दिन मीरा की सास तुलसी जी ने उसे आवाज लगाते हुए कहा, "मीरा बहू, जल्दी से नीचे आ जाओ, देखो तुम्हारे पीहर से तीज का शगुन आया है।" यह सुनकर मीरा भागी भागी नीचे उतरकर आँगन में आई और बोली, "चाचा चाची आए हैं क्या मम्मी जी? कहां हैं? मुझे बताया भी नहीं कि वे लोग आने वाले हैं!"मीरा एक सांस में बोलती चली गई। उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसके चाचा चाची भी कभी आ सकते हैं। तभी तुलसी जी बोलींं, "अरे नहीं, तुम्हारे चाचा चाची नहीं आए बल्कि भाई और भाभियां सब कुछ लेकर आए हैं।" मीरा चौंंककर बोली, "पर मम्मी जी मेरे तो कोई भाई नहीं हैं फिर...??"
"ड्रॉइंग रूम में जाकर देखो, वो लोग तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं"। तुलसी जी ने फिर आँखे चमकाते हुए कहा। मीरा कशमकश में उलझी धीरे धीरे कदम बढ़ाती हुई, ड्रॉइंग रूम में घुसी तो देखा उसके दोनों जेठ जेठानी वहां पर सारे सामान के साथ बैठे हुए थे। पीछे-पीछे तुलसी जी भी आ गईंं और बोलींं, "भई तुम्हारे पीहर वाले आए हैं, खातिरदारी नहीं करोगी क्या?" मीरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो कभी सास को देखती तो कभी बाकी सभी लोगों को। उसके मासूम चेहरे को देख कर सबकी हंसी छूट पड़ी।
तुलसी जी बोलींं, "कल जब तुम्हारी जेठानियों के पीहर से शगुन आया था तो हम सबने ही तुम्हारी आंखों में वह नमी देख ली थी। जिसमें माता पिता के ना होने का गहरा दुःख समाया था। पीहर की महत्ता हम औरतों से ज्यादा कौन समझ सकता है भला! इसलिए हम सबने तभी तय कर लिया था कि आज हम सब एक नया रिश्ता कायम करेंगे और तुम्हें तुम्हारे पीहर का सुख जरूर देंगे। "मीरा को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिन रिश्तोंं से उसे कल तक मजाक बनने का डर सता रहा था। उन्हीं रिश्तों ने आज उसे एक नई सोच अपनाकर उसका पीहर लौटा दिया था। मीरा की आंखों से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह रहे थे।।
समाज में एक नई सोच को जन्म देने वाले उसके ससुराल वालों ने मीरा का कद बहुत ऊंचा कर दिया था। साथ ही साथ अपनी बहू के ससुराल को ही अपना पीहर बनाकर समाज में उनका कद बहुत ऊंचा उठ चूका था।
👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६८)
एक ही सत्ता ओत-प्रोत है
विकासवाद के सिद्धान्त के समर्थक यह कहते हैं कि अपने सुविधापूर्ण जीवन के लिए इच्छा ने उन जीवों के शरीर संस्थानों में अन्तर किया और यह अन्तर स्पष्ट होते-होते एक जीव से दूसरी किस्म का उसी से मिलता हुआ जीव विकसित होता गया। थोड़ी देर के लिये यह बात मान लें और मनुष्य शरीर को इस कसौटी पर कसें तो भी बात विकासवाद के विपरीत ही बैठेगी। मनुष्य कब से पक्षियों को देखकर आकाश में स्वतन्त्र उड़ने को लालायित है किन्तु उसके शरीर में कहीं कोई पंख उगा क्या, समुद्र में तैरते जहाज देखकर हर किसी का मन करने लगता है कि हम भी गोता लगायें और मछलियों की तरह कहीं से कहीं जाकर घूम आयें, पर वह डूबने से बच पायेगा क्या?
यह प्रश्न अब उन लोगों को भी विपरीत दिशा में सोचने और परमात्म-सत्ता के अस्तित्व में होने की बात मानने को विवश करते हैं जो कभी इस सिद्धान्त के समर्थक रहे हैं। राबर्ट ए मिल्लीकान का कथन है—विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में ही वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा पैदा करती है आम के बीज से इमली पैदा करने की शक्ति प्रकृति में नहीं है। इस तरह के बीज और ऊपर वर्णित विलक्षण रचनायें पैदा करने वाली सत्ता एकमात्र परमात्मा ही हो सकता है। वही अपने आप में एक परिपूर्ण सत्ता है और वही विभिन्न इच्छाओं, अनुभूतियों, गुण तथा धर्म वाली परिपूर्ण रचनायें सृजन करता है।
क्रमिक विकास को नहीं भारतीय दर्शन पूर्णता-पूर्णता की उत्पत्ति मानता है। श्रुति कहती है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते ।।
अर्थात्—पूर्ण परम ब्रह्म परमात्मा से पूर्ण जगत—पूर्ण मानव की उत्पत्ति हुई। पूर्ण से पूर्ण निकाल देने से पूर्ण ही शेष रहता है।
नदी का एक किनारा समुद्र से जुड़ा रहता है और दूसरा किनारा उससे दूर होता है। दूर होते हुए भी नदी समुद्र से अलग नहीं। नदी को जल समुद्र द्वारा प्राप्त होता है और पुनः समुद्र में मिल जाता है। जगत उस पूर्ण ब्रह्म से अलग नहीं। मनुष्य उसी पूर्ण ब्रह्म से उत्पन्न हुआ इसलिये अपने में स्वयं पूर्ण है यदि इस पूर्णता का भान नहीं होता, यदि मनुष्य कष्ट और दुःखों से त्राण नहीं पाता तो इसका एकमात्र कारण उसका अज्ञान और अहंकार में पड़े रहना ही हो सकता है। इतने पर भी पूर्णता हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा है और वह नैसर्गिक रूप से हर किसी में विद्यमान रहती है।
क्षुद्रता की परिधि को तोड़कर पूर्णता प्राप्त कर लेना हर किस के लिये सम्भव है। मनुष्य की चेतन सत्ता में वह क्षमता मौजूद है, जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का उपयोग कर देवोपम जीवन जी सकता है। यह क्षमता उसने खो दी है। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर का लाभ उस क्षमता से उठा सकना सम्भव होता है। यह उस प्रचण्ड क्षमता का एक स्वरूप अंश मात्र है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी
👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)
भक्ति और ज्ञान में विरोध कैसा?
महान भक्त एवं परम ज्ञानी ऋषि श्वेताक्ष के साधना जीवन की एक और भी विशेषता थी- उन्होंने ज्ञान और भक्ति में परस्पर अभेद का अनुभव किया था। वह कहते थे कि सभी विचारधाराएँ, विविध सरिताओं की भांति हैं, जो कहीं न कहीं परस्पर मिलती हैं। भले ही यह मिलन, सरिता का सरिता में हो अथवा फिर सरिता का सागर में। ज्ञान हो या भक्ति, इसके विविध पथों या मतों में परस्पर विरोध सम्भव नहीं। विरोध वही करते हैं जो अनुभव से रीते हैं, जो केवल तर्कों एवं विचारों तक सीमित हैं। यही वजह थी कि ऋषि श्वेताक्ष जब मुखर होते थे, तो सभी मतों एवं पथों का, ज्ञान एवं भक्ति की विविध धाराओं का स्वाभाविक संगम हो जाता था। उनका यह अनूठापन सभी को बहुत भाता था।
देवर्षि के वह परम प्रिय थे। उन्हें सर्वप्रथम मार्गदर्शन उन्हीं से मिला था। उन दिनों वह विन्ध्याचल में तप कर रहे थे। विन्ध्याचल के वनप्रान्त में एकाकी-निराहार रहकर भगवती की आराधना कर रहे इस बालक के प्रेम ने माँ को द्रवित कर दिया। उन्होंने ही देवर्षि से कहा- विन्ध्य के भीषण महाअरण्य में निराहार रहकर तप कर रहे इस पाँच साल के बालक को तुम्हारी आवश्यकता है। जगदम्बा के आदेश को शिरोधार्य करके वह उनसे मिले थे। इस प्रथम भेंट में देवर्षि को बीते युगों की याद ताजा हो आयी। जब वह कभी धु्रव-प्रह्लाद से मिले थे, श्वेताक्ष भी उन्हें उन्हीं का प्रतिरूप एवं समरूप मिले। देवर्षि के मार्गदर्शन ने उन्हें भावमय अन्तर्विवेक दिया। फिर क्या था श्वेताक्ष की प्रगाढ़ पुकार से जगन्माता ने उन्हें अपने आंचल की छांव में ले लिया। भगवान् दक्षिणामूर्ति महेश्वर के मुख से उन्हें शास्त्रों का अनुभव पूर्णज्ञान हुआ। आज वही श्वेताक्ष भक्ति की इस महासभा में थे और देवर्षि को निहारे जा रहे थे। सम्भवतः कुछ कहने को उत्सुक थे।
उनकी विचार उर्मियों ने देवर्षि के अन्तस को स्पर्श किया। उनकी चेतना किंचित बहिर्मुख हुई। अन्तरिक्ष को निहारती उनकी आँखों ने श्वेताक्ष की ओर देखा और वह थोड़े मुस्कराए, फिर बोले, ‘‘कुछ कहना चाहते हो पुत्र?’’ उत्तर में श्वेताक्ष कुछ बोल न सके, बस विनम्र भाव से सप्तर्षिमण्डल के परमर्षियों की ओर देखते रहे। इन महिमामय महर्षियों ने उनकी भावमुद्रा परख ली। वह समझ गए कि श्वेताक्ष को अपनी बात कहने में संकोच हो रहा है, सम्भवतः यह उनकी विनम्रता के कारण था। ऐसे में ब्रह्मर्षि वसिष्ठ, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र सहित सभी सप्तर्षियों ने कहा- ‘‘पुत्र! देवर्षि नारद की ही भांति हम सभी को तुम प्रिय हो। अतः जो कहना चाहते हो, निःसंकोच कहो।’’
देवर्षि सहित सभी सप्तर्षियों व महर्षियों से आश्वस्ति पाकर श्वेताक्ष विनम्र स्वर में बोले- ‘‘आप सभी के समक्ष मैं बालक हूँ, मेरा अनुभव भी थोड़ा है। फिर भी जो भी अनुभव है, वह यही कहता है कि भक्ति और ज्ञान विलग नहीं रह सकते। वह अन्तःकरण में साथ ही साथ प्रकट होते हैं और इनका विकास भी साथ-साथ ही होता है।’’ श्वेताक्ष के इस कथन ने ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के ध्यान को आकर्षित किया। वह बोले- ‘‘पुत्र! तुम अपने कथन का विस्तार करो।’’ उत्तर में श्वेताक्ष ने कहा- ‘‘भगवन! हृदय में प्राथमिक आध्यात्मिक जिज्ञासा के साथ भाव एवं विवेक का उदय प्रायः एक साथ ही होता है। फिर साधक की साधना के अनुसार जब उसका चित्त शुद्ध होता है, तब उसी के अनुरूप भक्ति एवं ज्ञान भी परिपक्व होते जाते हैं।
जब तक चित्त अशुद्ध है, तब तक न तो यथार्थ ज्ञान का उदय होता है और न यथार्थ भक्ति का। ज्ञान के नाम पर केवल शब्द, विचार एवं तर्कों का केवल आडम्बर होता है और भाव के नाम पर केवल आवेग उभरते हैं। अनुभवहीनजन इन्हें ही ज्ञान एवं भक्ति मानकर सन्तोष कर लेते हैं। यही नहीं, वे अपनी अज्ञानता के कारण भक्ति एवं ज्ञान में भेद भी करते हैं। जबकि यथार्थ स्थिति में भेद तो विचार, तर्क एवं आवेगपूर्ण भावों में होता है। ऐसी स्थिति में इनमें परस्पर का सम्बन्ध होता भी नहीं।
परन्तु जब साधक अपनी साधना की डगर में चलते हुए चित्तशुद्धि की दिशा में बढ़ता है, तो उसमें स्वाभाविक ही शुद्ध भाव अंकुरित होते हैं और साथ ही उदय होती है समाधिजा प्रज्ञा। ये दोनों ही साधक को चित्तशुद्धि के प्रसाद के रूप में मिलती हैं। जैसे-जैसे चित्तशुद्धि परिपक्व एवं प्रगाढ़ होती है, वैसे-वैसे इनका विकास भी होता है- शिवज्ञान बनकर। जिस तरह शिव एवं शक्ति, भव एवं भवानी अभेद हैं, ठीक उसी तरह से भक्ति एवं ज्ञान में भी भेद नहीं है। क्योंकि दोनों ही एक साथ शुद्ध चित्त से प्रकट होते हैं।’’
ऋषि श्वेताक्ष की बातें सभी को प्रिय लगी। सभी को उनके व्यक्तित्व की विशिष्टता का अनुभव हुआ। देवर्षि ने पुलकित होकर उन्हें गले से लगाया और सिर पर हाथ फेरा। श्वेताक्ष भी देवर्षि का यह स्नेह पाकर धन्य हो गए। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘पुत्र! तुम्हारे बारे में सुना तो बहुत था, परन्तु आज देखा भी। सचमुच ही तुम सब अवस्थाओं में, भेद में अभेद को अनुभव करते हो। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं तुरीय में अभेद का एक जैसा अनुभव होने से ही ये बातें कही जा सकती हैं।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन के उत्तर में श्वेताक्ष केवल इतना कह सके, ‘‘आपके आशीष से मैं अनुग्रहीत हुआ भगवन्!’’ इसके बाद उन्होंने चुप्पी साध ली। सम्भवतः उन्हें एक नये सूत्र सत्य की प्रतीक्षा थी।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२१
शुक्रवार, 24 सितंबर 2021
👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६७)
एक ही सत्ता ओत-प्रोत है
जीवन की सार्थकता पूर्णता प्राप्ति में है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि अभी हम अपूर्ण हैं, असत्य हैं, अन्धकार में हैं। हमारे सामने मृत्यु मुंह बांये खड़ी है। अन्धकार, असत्य और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये हम प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर अग्रसर होना चाहते हैं। पर हो कोई नहीं पाता। हर कोई अपने आपको अशक्त और असहाय पाता है, अज्ञान के अन्धकार में हाथ-पैर पटकता रहता है।
इस अपूर्णता पर जब कभी विचार जाता है तब एक ही तथ्य सामने आता है और वह है ‘‘परमात्मा’’ अर्थात् एक ऐसी सर्वोपरि सर्वशक्तिमान सत्ता जिसके लिए कुछ भी अपूर्ण नहीं है। वह सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा, नियामक और एकमात्र अपनी इच्छा से सम्पूर्ण सृष्टि में संचरण कर सकने की क्षमता से ओत-प्रोत है।
विकासवाद के जनक डार्विन ने यह सिद्धान्त तो प्रतिपादित कर दिया कि प्रारम्भ में एक कोशीय जीव-अमीबा की उत्पत्ति हुई यही अमीबा फिर ‘‘हाइड्रो’’ में विकसित हुआ, हाइड्रा मछली, मण्डूक, समर्पणशील पक्षी, स्तनधारी जीवों आदि की श्रेणियों में विकसित होता हुआ वह बन्दर की शक्ल तक पहुंचा, आज का विकसित मनुष्य शरीर इसी बन्दर की सन्तान है। इसके लिए शरीर रचना के कुछ खांचे भी मिलाये गये। जहां नहीं मिले वहां यह मान लिया गया कि वह कड़ियां लुप्त हैं और कभी समय पर उसकी भी जानकारी हो सकती है।
इस प्रतिपादन में डार्विन और इस सिद्धान्त के अध्येता यह भूल गये कि अमीबा से ही नर-मादा दो श्रेणियां कैसे विकसित हुईं। अमीबा एक कोशीय था उससे दो कोशीय हाइड्रा पैदा हुआ क्या अन्य सभी जीव इसी गुणोत्तर श्रेणी में आ सकते हैं यदि सर्पणशील जीवों से परधारी जीव विकसित हुये तो वह कृमि जैसे चींटे, पतिंगे, मच्छर आदि कृमि जो उड़ लेते हैं वे किस विकास प्रक्रिया में रखे जायेंगे? पक्षी, जल-जन्तु और कीड़े सभी मांस खाते हैं। स्तनधारी उन्हीं से विकसित हुए तो गाय, भैंस, बकरी, हाथी आदि मांस क्यों नहीं खाते। हाथी के दांत होते हैं हथनियों के नहीं, मुर्गे में कलंगी होती है मुर्गी में नहीं। मोर के रंग-बिरंगे पंख और मोरनियां बिना पंख वाली, विकास प्रक्रिया में एक ही जीव श्रेणी में यह अन्तर क्यों? प्राणियों में दांतों की संख्या, आकृति, प्रकृति में अन्तर पाया जाता है। घोड़े के स्तन नहीं होते बैल के अण्डकोश के पास स्तन होते हैं। पक्षियों की अपेक्षा सर्प और कछुये हजारों वर्ष की आयु वाले होते हैं, यह सभी असमानतायें इस बात का प्रमाण हैं कि सृष्टि रचना किसी विकास का परिणाम नहीं अपितु किसी स्वयम्भू सत्ता द्वारा विधिवत् रची गई कलाकृति है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी
👉 भक्तिगाथा (भाग ६७)
भक्ति और ज्ञान में विरोध कैसा?
इन मौन के क्षणों में देवर्षि मुखर हुए। उन्होंने बड़े ही मधुर स्वरों में अपना नया सूत्रोच्चार किया-
‘अन्योन्याश्रयत्वमित्यन्ये’॥२९॥
किन्हीं दूसरे आचार्यों का मत है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर एक दूसरे के आश्रित हैं। देवर्षि के इस सूत्र ने सभी को चिन्तन के एक नए आयाम की झलक दिखाई। ऋषिगण-देवगण, गन्धर्व, सिद्ध सभी विचार करने लगे। उनकी चिन्तन चेतना विचार वीथियों में भ्रमण करने लगी। भक्ति का क्षेत्र भाव है, जबकि ज्ञान विचारों की प्रखरता से सम्बन्धित है। कैसे सम्बन्धित हैं ये दोनों? यह सत्य और तत्त्व कहीं स्पष्ट नहीं हो रहा था। प्रायः सभी को देवर्षि के वचनों की प्रतीक्षा थी, परन्तु वह अभी कहीं खोए थे। उनका मुख शान्त था, अधरों पर मधुर स्मित रेखा थी, परन्तु नेत्रों से अपूर्व ज्योत्सना बिखर रही थी। न तो वह कुछ कह रहे थे और न दूसरा कोई उन्हें टोक रहा था।
तभी ऋषियों की पंक्ति में बैठे अपेक्षाकृत युवा ऋषि श्वेताक्ष ने देवर्षि की ओर देखा। उनके मुख पर प्रकाश का वलय था। तरूण होते हुए भी वह अपनी तप साधना, योग विभूतियों, विचारों की प्रखरता व भावप्रवण भक्ति के लिए ऋषियों-महर्षियों के बीच सुपरिचित एवं सुचर्चित थे। हिमालय उनका अपना घर था। कभी-कभी वे विनोद के स्वर में कहा करते थे कि हिमवान का आंगन मेरा ननिहाल है। आखिर यह मेरी माँ का मायका जो है। पर्वतसुता पार्वती- माता जगदम्बा के प्रति उनकी भक्ति अवर्णनीय थी। माँ का स्मरण उनकी प्रत्येक आती-जाती श्वास में रमा था। उनके रोम-रोम में भगवती की भावचेतना विराजती थी।
इस अनूठी भक्ति के साथ उनकी ज्ञाननिष्ठा भी अद्भुत थी। भगवती के भाव भरे आग्रह के कारण भगवान भोलेनाथ ने उन्हें शिष्य के रूप में स्वीकारा था। जिसके सद्गुरु स्वयं जगदीश्वर हों, उसके ज्ञान की प्रखरता का वर्णन भला कौन कर सकता है। उनके ज्ञान के इस अक्षयकोष में शब्द नहीं, अनुभव संचित थे। वह कहा करते थे कि कोरे विचारों के विश्लेषण एवं तर्कों के संजाल से ज्ञान को अभिव्यक्त तो किया जा सकता है पर इनके आधार पर ज्ञान का अर्जन सम्भव नहीं। ज्ञान तो समाधिजा प्रज्ञा का परिणाम है। समाधि के इन विभिन्न स्तरों पर जो प्रज्ञा विकसित होती है, उसी की प्रदीप्ति में ज्ञान का प्राकट्य होता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११९
गुरुवार, 23 सितंबर 2021
👉 शोरगुल किसलिये
मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई आवाज की, और कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’
हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के विदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना, तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं, कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी सन्त कहते हैं, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है। हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी?
वह चाहती थी कि हाथी स्वीकार करे, तू भी है,,,,, तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछना चाहती थी। हमारा अहंकार अकेले नहीं जी सकता,,,,,,, दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है।
इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें और हमारी उपेक्षा न हो।
सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिये,,,,, स्नान करते हैं सजाते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें सुंदर समझें,,,,,,, धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों को दिखाने के लिये,,,,,,,, दूसरे देखें और स्वीकार करें कि हम कुछ विशिष्ट हैं, ना कि साधारण।
हम मिट्टी से ही बने हैं और फिर मिट्टी में मिल जाएंगे,,,,,,,,
हम अज्ञान के कारण खुद को खास दिखाना चाहते हैं,,, वरना तो हम बस एक मिट्टी के पुतले हैं और कुछ नहीं।
अहंकार सदा इस तलाश में रहता है कि वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।
याद रखना चाहिए आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए हमे झूठा अहंकार त्याग कर,,, जब तक जीवन है सदभावना पूर्वक जीना चाहिए और सब का सम्मान करना चाहिए,,,, क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा है।
👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६६)
एक ही सत्ता ओत-प्रोत है
ब्रह्माण्ड की शक्तियों का और पिण्ड की—मनुष्य की शक्तियों का एकीकरण कहां होता है शरीर शास्त्री इसके लिए सुषुम्ना शीर्षक, मेडुला आवलांगाटा—की ओर इशारा करते हैं। पर वस्तुतः वह वहां है नहीं। मस्तिष्क स्थित ब्रह्मरन्ध्र को ही वह केन्द्र मानना पड़ेगा, जहां ब्राह्मी और जैवी चेतना का समन्वय सम्मिलन होता है।
ऊपर के तथ्यों पर विचार करने से यह एकांगी मान्यता ही सीमित नहीं रहती कि जड़ से ही चेतन उत्पन्न होता है इन्हीं तथ्यों से यह भी प्रमाणित होता है कि चेतन भी जड़ की उत्पत्ति का कारण है। मुर्गी से अण्डा या अण्डे से मुर्गी—नर से नारी या नारी से नर—बीज से वृक्ष या वृक्ष से बीज जैसे प्रश्न अभी भी अनिर्णीत पड़े हैं। उनका हल न मिलने पर भी किसी को कोई परेशानी नहीं। दोनों को अन्योन्याश्रित मानकर भी काम चल सकता है। ठीक इसी प्रकार जड़ और चेतन में कौन प्रमुख है इस बात पर जोर न देकर यही मानना उचित है कि दोनों एक ही ब्रह्म सत्ता की दो परिस्थितियां मात्र हैं। द्वैत दीखता भर है वस्तुतः यह अद्वैत ही बिखरा पड़ा है।
न केवल चेतन समुदाय अपितु सृष्टि का प्रत्येक कण पूर्णता के लिये लालायित और गतिशील है। भौतिक-जीवन में जिसके पास स्वल्प सम्पदा है वह और अधिक की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है, पर जो धनाढ्य हैं उन्हें भी सन्तोष नहीं। उसी के परिमाण में बह और अधिक प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील दिखाई देता है। बड़े-बड़े सम्राट तक अपनी इस अपूर्णता को पाटने के लिये आपाधापी मचाते और दूसरे साम्राज्यों की लूटपाट करते पाये जाते हैं तो लगता है सृष्टि का हर प्राणी साधनों की दृष्टि से अपूर्ण है इस दिशा में पूर्णता प्राप्त करने की हुड़क हर किसी में चढ़ी बैठी दिखाई देती है।
इतिहास का विद्यार्थी अपने आपको गणित में शून्य पाता है तो वह अपने आपको अपूर्ण अनुभव करता है, भूगोल का चप्पा छान डालने वाले को संगीत के स्वर बेचैन कर देते हैं उसे अपना ज्ञान थोथा दिखाई देने लगता है, बड़े-बड़े चतुर वकील और बैरिस्टरों को जब रोग बीमारी के कारण डाक्टरों की शरण जाना पड़ता है तो उनका अपने ज्ञान का—अभिमान चकनाचूर हो जाता है। बौद्धिक दृष्टि से हर प्राणी सीमित है और हर कोई अगाध ज्ञान का पण्डित बनने की तत्पर दिखाई देता है।
नदियां अपनी अपूर्णता को दूर करने के लिये सागर की ओर भागती हैं, वृक्ष आकाश छूने दौड़ते हैं, धरती स्वयं भी अपने आपको नचाती हुई न जाने किस गन्तव्य की ओर अधर आकाश में भागी जा रही है, अपूर्णता की इस दौड़ में समूचा सौर-मण्डल और उससे परे का अदृश्य संसार सम्मिलित है। पूर्णता प्राप्ति की बेचैनी न होती तो सम्भवतः संसार में रत्ती भर भी सक्रियता न होती सर्वत्र नीरव सुनसान पड़ा होता, न समुद्र उबलता, न मेघ बरसते, न वृक्ष उगते, न तारागण चमकते और न ही वे विराट् की प्रदक्षिणा में मारे-मारे घूमते?
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी
👉 भक्तिगाथा (भाग ६६)
ज्ञान ही है भक्ति का साधन
इन सात्त्विक दृश्यावलियों के बीच गायत्री महामन्त्र के द्रष्टा महान् ऋषि विश्वामित्र ने कहा- ‘‘हे महर्षि आश्वालायन! आपकी प्रतिभा, विद्या, ज्ञान की कथाएँ ऋषियों के समूह में सादर कही-सुनी जाती हैं। आप अपने अनुभवों में घोलकर भक्ति एवं ज्ञान के सम्बन्ध का निरूपण करें।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस प्रस्ताव ने आश्वलायन ऋषि को असमंजस में डाल दिया। सम्भवतः वह इसके लिए तैयार नहीं थे। इसीलिए उन्होंने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ कहा भी, ‘‘मैं तो यहाँ आप सब महनीय जनों के संग के लिए आया हूँ, फिर इस भक्ति अमृत के मध्य मेरी वाणी कितनी उपयुक्त एवं सार्थक होगी।’’ आश्वलायन के इन स्वरों के साथ देवों एवं ऋषियों के अनुरोध के स्वर भी तीव्र हो उठे।
इस आग्रह को वे ठुकरा न सके और कहने लगे कि ‘‘मैं आप सभी के आदेशों को शिरोधार्य करके अपना अनुभव सत्य कहने का प्रत्यन कर रहा हूँ। परन्तु इसका निष्कर्ष तय करने की जिम्मेदारी आप सबकी है। मेरी ये अनुभूतियाँ तब की हैं, जबकि मैं युवावस्था को पारकर प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर रहा था। अपने अध्ययन के प्राथमिक चरण से ही मुझे सराहना मिली थी। आचार्यगण मुझे प्रतिभा एवं विद्या का पर्याय मानते थे। अनेकों किम्वदन्तियाँ मेरे बारे में प्रचारित हो रही थीं। युवावस्था आते तक मैंने सभी विद्याओं एवं कलाओं में निपुणता प्राप्त कर लीं परन्तु न जाने क्यों मन बेचैन रहता था। जब-तब एक बैचेनी मुझे घेर लेती थी। इसे हटाने के लिए मेरे सभी तर्क निष्फल थे। सारा शास्त्र ज्ञान अधूरा था।
आखिरकार मैं हिमालय आ गया। सोचा यही था कि हिमवान की शीतलता अवश्य मेरी आन्तरिक ऊष्णता का शमन करेगी। यहाँ आकर मैं यूँ ही सुमेरू की शृखंलाओं के बीच भ्रमण करने लगा। यहाँ भ्रमण करते हुए मुझे परम दीर्घजीवी देवों के भी पूज्य महर्षि लोमश मिले। उन्होंने मेरे सिर पर आशीष का हाथ रखा। उनका वह स्पर्श अतिअलौकिक था। इस स्पर्श ने मेरी सारी क्षुधा, तृषा, थकान व बेचैनी हर ली। एक विचित्र सी शीतल प्रफुल्लता की लहर मेरे अस्तित्त्व में प्रवाहित हो उठी और मेरे रोम-रोम पुलकित हो गये। इस एक क्षण के अनुभव में मेरे अतीत के सम्पूर्ण अनुभव धुल गए।
मेरी प्रतिभा व विद्या का दम्भ जाता रहा। मेरे वे नुकीले तर्क जो सदा औरों को आहत करते रहते थे, आज पिघल गए। मैं तो बस हिमशिखरों के मध्य खड़े कालजयी महर्षि लोमश को निहारता रह गया। मुझे तो यह भी सुधि नहीं रही कि मैं उनके पावन चरणों में माथा नवाऊँ पर उन करूणामय महर्षि ने मेरा हाथ थामा और मुझे एक ओर ले चले। थोड़ी दूर चलने के बाद एक गुफा आ गयी। यहाँ का वातावरण अति सुरम्य था। परम प्रशान्ति यहाँ छायी थी। इस गुफा के पास ही एक सुन्दर जल स्रोत था, जहाँ सुन्दर पक्षी जलक्रीड़ा कर रहे थे। आस-पास के स्थान में मखमली घास उगी थी। इस घास के बीच-बीच पर सुगन्ध बिखेरते पुष्पित पौधे लगे थे। इस वातावरण को मैं देर तक थकित-चकित देखता रह गया। उन क्षणों में मैं भावों से भरा था, और मेरे मुख से एक भी शब्द उच्चारित नहीं हो रहा था, पर महर्षि लोमश बड़े मधुर स्वरों से मुझे कह रहे थे- वत्स आश्वलायन! ज्ञान के दो रूप हैं- पहला है विवेक और दूसरा है बोध। जो ज्ञान इन दोनों रूपों से वंचित हो, उसे ज्ञान नहीं अज्ञान कहेंगे। कोरी बौद्धिकता से जानकारियों का बोध तो बढ़ता है, परन्तु इससे सत्य, सद्वस्तु की झलक नहीं मिलती। ज्ञान के अनुभव की प्रथम झलक विवेक के रूप में मिलती है। फिर वह अक्षरज्ञान से हो अथवा अक्षरातीत अवस्था में पहुँचकर।
यह विवेक हुआ तो वासनाएँ स्वयं ही भावनाओं में रूपान्तरित हो जाती हैं और अन्तःकरण में भक्ति अंकुरित होती है। प्रभु के स्मरण, उनमें समर्पण, विसर्जन से इस भक्ति का परिपाक होता है और तब ज्ञान का दूसरा रूप बोध के रूप में प्रकट होता है। इस अवस्था में मनुष्य को परात्पर तत्त्व का साक्षात्कार होता है। वह सत्य के झरोखे से ऋत् की झांकी देखता है। यह बुद्धि की सीमा से सर्वथा पार व परे है। यहाँ न तर्क है और अनुमान। यहाँ पर तो प्रभु की शाश्वतता का साकार व सम्पूर्ण बोध है। अपने इस कथन को पूरा कहने के पूर्व आश्वलायन की भावनाएँ बरबस आँखों से छलक पड़ीं। जिस-तिस तरह से वह स्वयं को संयत करते हुए बोले- मैं तो यही कह सकता हूँ कि भक्ति ज्ञान का सार है।’’ आश्वलायन के इस वचन को आत्मसात करते हुए देवर्षि नारद ने अपने सूत्र का सत्योच्चार किया-
‘तस्या ज्ञानमेव साधनमित्येके’॥ २८॥
‘‘उसका (भक्ति का) साधन ज्ञान ही है, किन्हीं (आचार्यों) का यह मत है।’’ इस सूत्र को सुनने के साथ सभी के मन मौन में डूब गए। सम्भवतः इस सत्य का कोई अन्य पहलू अवतीर्ण होने की प्रतीक्षा में रत था।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ११७
सोमवार, 20 सितंबर 2021
हमारी माता जी सब जानतीं हैं।
जिला बारां राजस्थान के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ फूलसिंह यादव के जीवन में घटी एक ऐसी घटना जिसने डॉ फूलसिंह यादव का नजरिया बदल दिया। बात उन दिनों की है जब अखिल विश्व गायत्री परिवार के जनक, संस्थापक, आराध्य वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी सूक्ष्मीकरण साधना हेतु एकांतवास में चले गए। पूज्य गुरुदेव के एकांतवास में चले जाने के उपरांत गायत्री परिवार की समस्त जिम्मेदारियां स्नेह सलिला वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा जी पर आ गयी। माता जी ने पहले भी पूज्यवर के हिमालय प्रवास एवं अन्य समय की अनुपस्थिति में गायत्री परिवार को संचालित संगठित एवं विस्तारित किया था।
1984 से माता जी के अनेक रूप दिखाई पड़ने लगे. वात्सल्यमयी माँ का रूप, ससक्त संगठनकर्ता का रूप, प्रकाण्ड विद्वान का रूप, प्रखर वक्ता, भविष्यद्रष्टा, अनेकों रूपों में माता जी के दर्शन लोगों को होने लगे। साधारणतः तो माता जी को परिजन यही मानते रहे कि माता जी गुरुदेव की पत्नी हैं, गुरुमाता हैं, माँ अन्नपूर्णा का आशीर्वाद माता जी को है, माता जी कभी किसी भी आगंतुक को बिना भोजन प्रसाद के जाने नहीं देतीं हैं आदि आदि। पूज्य गुरुदेव के एकांतवास में जाने के उपरांत जगत जननी माँ भगवती ने समस्त संगठन या यूँ कहें की समस्त चराचर जगत का सूत्र सञ्चालन अपने हाथों में ले लिया। उस समय वंदनीया माता जी अनायास ही अपने बच्चों पर कृपा कर अपने जगदम्बा अवतारी स्वरुप का आभास करा देती थीं।
ऐसी ही एक घटना डॉ फूलसिंह यादव के साथ घटी। डॉ फूलसिंह यादव चिकित्सा विभाग में कार्यरत थे, उनका प्रमोशन किन्हीं कारणों से रुका हुआ था। डॉ यादव जी का गुरुदेव के पास मार्गदर्शन, आशीर्वाद के लिए आना-जाना लगातार लगा रहता था। डॉ यादव ने अपने रुके हुए प्रमोशन को पाने के लिए गुरुदेव से प्रार्थना करने का सोचा और हरिद्वार की ओर प्रस्थान कर गए। डॉ यादव शांतिकुंज पहुंचे, दर्शन प्रणाम के क्रम में वंदनीया माता जी के पास पहुँच माता जी के चरणों में जैसे ही शीश झुकाया माता जी ने पुकार लगायी। कब आया फूलसिंह बेटा! तू ठीक तो है? तेरा सफ़र कैसा रहा कोई कठिनाई तो नहीं आई रास्ते में। फिर डॉ यादव की पत्नी और बच्चों का नाम लेकर माता जी ने उन सभी का समाचार पूछा। डॉ यादव अचंभित हो माता जी की ओर देखने लगे, सोचने लगे माता जी से तो कभी मैं इस प्रकार मिला नहीं, माता जी कैसे जानती हैं ये सब। दर असल डॉ फूलसिंह यादव जब भी शांतिकुंज पहुँचते गुरुदेव से ही आशीर्वाद परामर्श पाते थे। माता जी के पास तो भोजन प्रसाद और लड्डू ही पाते थे। इस दफ़ा माता जी को इस रूप में देखा, पहली ही मुलाकात में माता जी ने उनके बारे में, उनके परिवार के बारे सबकुछ नाम सहित पूछा। डॉ यादव सोचने लगे माता जी को मेरा परिचय किसने दिया? तभी माता जी की आवाज उनके कानों में टकराई जिससे उनकी विचार श्रृंखला टूटी। माता जी ने कहा बेटा माँ से उसके बच्चों की पहचान थोड़ी ही करानी पड़ती है, माँ अपने सभी बच्चों के विषय में सब कुछ जानती है। तू चिंता न कर तेरे प्रमोशन का ध्यान है मुझे, तेरा प्रमोशन हो जायेगा। तेरा प्रमोशन मैं कराऊँगी, तू इसके विषय में सोचना छोड़ दे।
डॉ फूलसिंह यादव का मुंह खुला का खुला रह गया। यह क्या, वंदनीया माता जी को किसने बताया कि मैं प्रमोशन के लिए आशीर्वाद मांगने आया हूँ। इसकी चर्चा तो मैंने किसी से करा ही नहीं। डॉ यादव के आँखों से आंसू बहने लगे, माँ को प्रणाम किया अंतस में उठ रहे भावों में उलझे मन के साथ सीढ़ियों से उतरते चले गए। ह्रदय में अनेकों भावों के उठते ज्वार भाटे की उलझन में कहीं खो गए। सोचने लगे, पूज्य गुरुदेव से तो अपने लिए भौतिक उपलब्धियां मांगना पड़ता है, माँ ने बिना मांगे ही दे दिया। पूज्य गुरुदेव के सामने अपनी आवश्यकतायें बताने पर गुरुदेव कृपा करते हैं, माँ ने पुत्र के ह्रदय की बात स्वयं ही जान लिया। मैंने पहले माता जी को क्यूँ नहीं पहचाना। माता जी सबकुछ जानती हैं। माता जी कोई योगमाया जानती हैं? कोई तपस्विनी हैं? डॉ फूलसिंह यादव के अंतस ने कहा नहीं, स्नेह सलिला परम वंदनीया माता जी जगदम्बा की अवतार हैं। मेरी माता जी जगदम्बा हैं। मेरी माता जी सब जानती हैं। माँ जगदम्बा अवतारी माता जी को समस्त रोम कूपों से बारम्बार प्रणाम बारम्बार नमन।
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