बुधवार, 6 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७२)

महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने अपने प्रिय शिष्य को यूँ पुलकित होकर आते हुए देखा तो उन्होंने समझ लिया, कि आज उनके प्रिय अम्बरीश को उनका मनचाहा मिल गया है। उन्होंने सभी ऋषिगणों के साथ भगवान नारायण की अर्चना की। एकादशी के पारायण का यह महोत्सव सरयू नदी के किनारे हो रहा था। भगवान सूर्यदेव का बिम्ब नदी के जल में कुछ इस तरह से पड़ रहा था, जैसे कि सूर्यनारायण अयोध्यावासियों पर कृपालु होकर स्वयं सरयू में उतर आए हों। भगवान नारायण के नाम के मधुर संकीर्तन के साथ यह पारायण उत्सव सचमुच ही मोहक था। दूर-दूर से आए तपस्वी भक्त, साधक, सिद्ध जनों का सम्मिलन अयोध्या के नगर जनों के लिए परम सौभाग्य की बात थी। उन्हें गर्व था अपने प्रजापालक, न्यायप्रिय नरेश पर, जिन्होंने उनको संरक्षण एवं संसाधन के साथ सुसंस्कार भी दिए थे। उन्होंने अपने इन प्रियजनों को साधनों के अर्जन के साथ साधना के अर्जन की भी शिक्षा दी थी।

भावों की इसी पुलकन-सिहरन के साथ सभी भक्ति की लहरों में भीग रहे थे। इन्हीं भीगी भावनाओं के साथ महाराज अम्बरीश सबको लेकर वहाँ पहुँचे- जहाँ भोजन की व्यवस्था की गयी थी। उन्होंने ऋषि विद्रुम एवं ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ को एक विशिष्ट आसन पर बिठाया। पास में ही उन्होंने अन्य ऋषियों-महर्षियों के साथ ऋषि विद्रुम के शिष्य शील एवं सुभूति को आसन दिया। राजकर्मचारी सभी अभ्यागतों के स्वागत में लगे थे। परन्तु इन ऋषि-तपस्वियों की सेवा महाराज स्वयं ही कर रहे थे। ऐसा करते हुए उनके हर्ष-उत्साह के अतिरेक का पारावार न था। वह सब कुछ बड़े मनोयोग से कर रहे थे। यह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पल था, जिसे हर कोई अपने नयनों में कैद कर लेना चाहता था।

सुखद एवं सुखप्रद राजपरितोष एवं क्षुधा की शान्ति, दोनों का अनुभव सभी को एक साथ हो रहा था। सुस्वादु भोजन का प्रथम ग्रास मुख में लेते समय ऋषि विद्रुम के शिष्यों शील एवं सुभूति को अचानक कुछ याद आ गया। वे दोनों एक दूसरे को देखते हुए मुस्कराए। उनकी इस मुस्कराहट को ऋषि विद्रुम के साथ महर्षि वशिष्ठ ने भी देखा। अपने इन शिष्यों को यूँ मुस्कराते हुए देख महातपस्वी विद्रुम के होठों पर हल्का सा स्मित उभरा। ऋषिश्रेष्ठ वशिष्ठ को भी इस कौतुक का रहस्य जानने की जिज्ञासा हो आयी। पर वह बोले कुछ नहीं, बस मौन ही भोजन करते रहे। भोजन के पश्चात् आचमन आदि करके उन्होंने विद्रुम से उनके स्मित का कारण जानना चाहा। उत्तर में वह प्रसन्न होकर बोले- ‘‘इस हँसी और स्मित में ही तो मेरे आगमन का कारण छुपा है।’’ ऐसा कहते हुए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ को काफी दिन पुरानी एक घटना सुनायी।

उन्होंने कहा कि काफी समय पूर्व जब वे अपने शिष्यों को भक्ति-भक्त एवं भगवान का स्वरूप-सत्य समझा रहे थे, तो उन्होंने प्रसंगवश कहा था कि भक्ति का स्वाद ऐसा है जिसे कहकर नहीं, बल्कि अनुभव करके ही जाना जा सकता है। यदि लौकिक सत्यों से इसकी तुलना की जाय तो यह राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति की भांति है। जिसे चर्चा करके नहीं बल्कि स्वयं अनुभव करके जाना जा सकता है। यहाँ पर अपने शिष्यों को मैं इसी सत्य का अनुभव कराने आया था। उनकी उस हँसी में उनकी प्रगाढ़ अनुभूति की प्रसन्नता छलक रही थी। उन्होंने यहाँ आकर भक्ति का स्वाद जाना, अनुभव किया भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की भक्ति को। साथ ही इस भक्ति एवं भक्त में उन्होंने भगवान् की अनुभूति पायी। इस अनुभूति के साथ उन्होंने राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति को भी एक साथ अनुभव किया। अपने शिष्यों को यही अनुभव देने के लिए ही मैं यहाँ आया था। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के इस संस्मरण ने न केवल महर्षि विद्रुम के अयोध्या आगमन के रहस्य की कथा कही, बल्कि उन्हें देवर्षि को नए सूत्र के लिए प्रेरित किया और देवर्षि कह उठे-
‘न तेन राजपरितोषः क्षुधा शान्तिर्वा’॥ ३२॥

सचमुच ही मात्र जान लेने से न तो राजा की प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३३

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