शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ६९)

भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा

ब्रह्मर्षि क्रतु के मुख से भीलकुमार कणप्प की भक्तिगाथा सुनकर सभी के अन्तःकरण भावों से भीग गए। भक्ति स्वयं ही साधना और सिद्धि को अपने में समाविष्ट कर लेती है। यहाँ तक कि इसमें भक्ति की साधना करने वाले साधक का अस्तित्त्व भी समा जाता है। अन्य साधना विधियों को अपनाकर इनकी साधना करते हुए साधक यदा-कदा थकान, बेचैनी की अनुभूति करने लगता है। यदि इनके प्रयोग सुदीर्घकाल तक करने पडें़ तो साधना के फल की आकांक्षा भी साधक को विचलित करती है। परन्तु भक्ति की साधना में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तो अपने ईष्ट-आराध्य की भक्ति करते हुए भक्त का मन पल-पल पुलकित और हर्षित होता रहता है। उसे तो बस हर क्षण यही लगता रहता है और क्या, और कितना, और कैसे, अपने प्रभु को दे डालूँ? कुछ पाना है, ऐसी चाहत तो कभी भी भक्त के मन-अन्तःकरण में अंकुरित ही नहीं होती। इन विचार कणों में सभी के मन देर तक सिक्त होते रहे।

समय का तो किसी को होश ही न रहा। चेत तो तब आया जब देवर्षि नारद ने अपनी वीणा की मधुर झंकृति की ही भांति एक सूत्र सत्य का उच्चारण करते हुए कहा-
‘राजगृैहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्’॥ ३१॥

राजगृह और भोजनादि में ऐसा ही देखा जाता है। भक्ति को स्वयं ही फलरूपा कहने के बाद देवर्षि के मुख से भक्ति की तुलना राजगृह एवं भोजन आदि से करने पर महर्षि वसिष्ठ के अधरों पर हलका सा स्मित झलक आया। ऐसा लगा वह कुछ पलों के लिए अपनी ही किन्हीं स्मृतियों में खो गए। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वसिष्ठ की यह भावभंगिमा वहाँ किसी से छिपी न रही। इसे औरों के साथ स्वयं देवर्षि ने भी देखा और उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से भावपूर्ण निवेदन करते हुए कहा- ‘‘इस सूत्र की तत्त्वकथा आप ही कहें भगवन्!’’ उत्तर में एक मधुर हास्य के साथ वसिष्ठ बोले- ‘‘देवर्षि! आपके मुख से राजगृह एवं भोजन की बात सुनकर मेरे मन मे कुछ पुरानी स्मृतियाँ उभर आयीं।’’

ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ के इस कथन ने सभी की जिज्ञासा व उत्सुकता को शतगुणित कर दिया। अब तो देवर्षि के साथ अन्य सबने भी अनुरोध किया, ‘‘अपनी पावन स्मृतियों से हम सबको भी पवित्र करें महर्षि!’’ उत्तर में महर्षि कुछ और कहते तभी हिमप्रपात एवं हिम पक्षियों की ध्वनियों ने वातावरण में एक अद्भुत संगीत घोल दिया। ऐसा लगा कि इस नयी भक्तिगाथा के श्रवण के पूर्व स्वयं प्रकृति ने मंगलाचरण पढ़ा हो। इस शुभ मंगल ध्वनि के साथ मौन हो रहे महर्षि मुखरित हुए और बोले- ‘‘मेरी यह स्मृतियाँ उन दिनों की हैं, जब भक्त प्रवर अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे। महाराज अम्बरीश की भक्ति एवं उनके व्यक्तित्व के विविध शीलगुणों की अनेकों अनोखी कथाएँ पुराणकारों ने कही हैं, इन सभी कथा प्रसंगों में महाराज अम्बरीश की भावपूर्ण भक्ति झलकती है। परन्तु जिस स्मृति कथा को मैं सुना रहा हूँ, उसे किसी भी पुराण ने नहीं कहा। यह सर्वथा अछूता कथा प्रसंग है।

हिमवान के आंगन में बैठे सभी महर्षिगण, देवता, सिद्ध, चारण एवं गन्धर्वों को यह तथ्य सुविदित था कि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सुदीर्घ काल तक अयोध्या के राजपुरोहित रहे हैं। उन्होंने युगों तक अयोध्या के राजघराने का पौरोहित्य कार्य किया है। ऋषियों के मध्य इसकी भी सदा चर्चा रही है- यह कार्य उन्हें स्वयं ब्रह्मा जी ने सौंपा था। इस चर्चा में यह तथ्य भी सुविदित रहा है कि परम वीतरागी महर्षि वसिष्ठ जब अयोध्या के राजपुरोहित नहीं बनना चाहते थे, तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा था- पुत्र! यह सामान्य राजकुल नहीं है। इस कुल में अनेकों श्रेष्ठ महामानव जन्म लेंगे। अनेक भगवद्भक्तों को इस कुल में जन्म मिलेगा। उनकी भक्ति की शक्ति से अन्ततः स्वयं भगवान मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में इस कुल में अवतरित होंगे। तुम्हें इन सभी के पुरोहित होने का, इन्हें मार्गदर्शन देने का सुअवसर मिलेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२७

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