सोमवार, 21 अक्टूबर 2019
शनिवार, 19 अक्टूबर 2019
शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019
👉 जानवर कौन?
एक बकरी थी, जाे की माँ बनने वाली थी। माँ बनने से पहले ही मधू ने भगवान् से दुआएं मांगने शुरू कर दी। कि “हे भगवान् मुझे बेटी देना बेटा नही”। पर किस्मत काे ये मंजूर ना था, मधू ने एक बकरे काे जन्म दिया, उसे देखते ही मधू राेने लगी। साथ की बकरियां मधू के राेने की वजह जानती थी, पर क्या कहती। माँ चुप हाे गई और अपने बच्चे काे चाटने लगी। दिन बीतते चले गए और माँ के दिल मे अपने बच्चे के लिए प्यार उमडता चला गया। धीरे- धीरे माँ अपने बेटे में सारी दुनियाँ काे भूल गई, और भूल गई भविष्य की उस सच्चाई काे जाे एक दिन सच हाेनी थी। मधू राेज अपने बच्चे काे चाट कर दिन की शुरूआत करती, और उसकी रात बच्चे से चिपक कर साे कर ही हाेती।
एक दिन बकरी के मालिक के घर भी बेटे जन्म लिया। घर में आते महमानाे आैर पड़ोसियों की भीड देख बकरी ने साथी बकरी से पूछा “बहन क्या हुआ आज बहुत भीड है इनके घर पर” ये सुन साथी बकरी ने कहा की “अरे हमारे मालिक के घर बेटा हुआ है, इसलिए काफी चहल पहल है” मधू बकरी मालिक के लिए बहुत खुश हुई और उसके बेटे को बहुत दुआए दी। फिर मधू अपने बच्चे से चुपक कर साे गई। मधू साे ही रही थी के तभी उसके पास एक आदमी आया, सारी बकरियां डर कर सिमट गई, मधू ने भी अपने बच्चे काे खुद से चिपका लिया। के तभी उस आदमी ने मधू के बेटे काे पकड लिया और ले जाने लगा। मधू बहुत चिल्लाई पर उसकी सुनी ना गई, बच्चे काे बकरियां जहाँ बंधी थी उसके सामने वाले कमरे में ले जाया गया।
बच्चा बहुत चिल्ला रहा था, बुला रहा था अपनी माँ काे, मधू भी रस्सी काे खाेलने के लिए पूरे पूरे पाँव रगड दिए पर रस्सी ना खुली। थाेडी देर तक बच्चा चिल्लाया पर उसके बाद बच्चा चुप हाे गया, अब उसकी आवाज नही आ रही थी। मधू जान चुकी थी केे बच्चे के साथ क्या हुआ है, पर वह फिर भी अपने बच्चे के लिए आँख बंद कर दुआए मांगती रही। पर अब देर हाे चुकी थी बेटे का सर धड से अलग कर दिया गया था। बेटे का सर मा के सामने पडा था, आज भी बेटे की नजर माँ की तरफ थी, पर आज वह नजरे पथरा चुकी थी, बेटे का मुह आज भी खुला था, पर उसके मुह से आज माँ के लिए पुकार नही निकल रही थी, बेटे का मूह सामने पडा था माँ उसे आखरी बार चूम भी नही पा रही थी इस वजह से एक आँख से दस दस आँसू बह रहे थे।
बेटे काे काट कर उसे पका खा लिया गया। और माँ देखती रह गई, साथ में बेठी हर बकरियाँ इस घटना से अवगत थी पर काेई कुछ कर भी क्या सकती थी। दाे माह बीत चुके थे मधू बेटे के जाने के गम में पहले से आधी हाे चुकी थी, के तभी एक दिन मालिक अपने बेटे काे खिलाते हुए बकरियाें के सामने आया, ये देख एक बकरी बाेली “ये है वाे बच्चा जिसके हाेने पर तेरे बच्चे काे काटा गया” मधू आँखाें में आँसू भरे अपने बच्चे की याद में खाेई उस मालिक के बच्चे काे देखने लगी।
वह बकरी फिर बाेली “देख कितना खुश है, अपने बालक काे खिला कर, पर कभी ये नही साेचता की हमें भी हमारे बालक प्राण प्रिय हाेते है, मैं ताे कहू जैसे हम अपने बच्चाे के वियोग में तडप जीते है वैसे ही ये भी जिए, इसका पुत्र भी मरे” ये सुनते ही मधू उस बकरी पर चिल्लाई कहा “उस बेगुनाह बालक ने क्या बिगाडा है, जाे उसे मारने की कहती हाें, वाे ताे अभी धरा पर आया है, ऐसा ना कहाे भगवान् उसे लम्बी उम्र दे, क्यू की एक बालक के मरने से जाे पीडा हाेती है मैं उससे अवगत हूँ, मैं नही चाहती जाे पीडा मुझे हाे रही है वाे किसी और काे हाे” ये सुन साथी बकरी बाेली कैसी है तू उसने तेरे बालक काे मारा और तू फिर भी उसी के बालक काे दुआ दे रही है।” मधू हँसी और कहा “हाँ, क्याेकी मेरा दिल एक जानवर का है इंसान का नही।
ये कहना मात्र ही उस बकरी के लिए जवाब हाे गया था कि मधू ने ऐसा क्यू कहा। मधू ने फिर कहा “ना जाने किस जन्म के पापाे की वजह से आज इस याेनी में जन्म मिला, ना जाने किस के बालक काे छीना था जाे पुत्र वियोग मिला, अब किसी को बालक काे बद्दुआ दे उसे मारे फिर पाप पुण्य जन्म मृत्यु के चक्कर में नही फंसना, इसके कर्माे का दण्ड भगवान् देगा मैं नही। बकरी की यह बात सुन साथी बकरी चुप हाे गई, क्याे की वह समझ चुकी थी के करनी की भरनी सबकी हाेती है मालिक की भी हाेगी।।
(कई बार सच समझ नही आता की जानवर असल में है काैन)
एक दिन बकरी के मालिक के घर भी बेटे जन्म लिया। घर में आते महमानाे आैर पड़ोसियों की भीड देख बकरी ने साथी बकरी से पूछा “बहन क्या हुआ आज बहुत भीड है इनके घर पर” ये सुन साथी बकरी ने कहा की “अरे हमारे मालिक के घर बेटा हुआ है, इसलिए काफी चहल पहल है” मधू बकरी मालिक के लिए बहुत खुश हुई और उसके बेटे को बहुत दुआए दी। फिर मधू अपने बच्चे से चुपक कर साे गई। मधू साे ही रही थी के तभी उसके पास एक आदमी आया, सारी बकरियां डर कर सिमट गई, मधू ने भी अपने बच्चे काे खुद से चिपका लिया। के तभी उस आदमी ने मधू के बेटे काे पकड लिया और ले जाने लगा। मधू बहुत चिल्लाई पर उसकी सुनी ना गई, बच्चे काे बकरियां जहाँ बंधी थी उसके सामने वाले कमरे में ले जाया गया।
बच्चा बहुत चिल्ला रहा था, बुला रहा था अपनी माँ काे, मधू भी रस्सी काे खाेलने के लिए पूरे पूरे पाँव रगड दिए पर रस्सी ना खुली। थाेडी देर तक बच्चा चिल्लाया पर उसके बाद बच्चा चुप हाे गया, अब उसकी आवाज नही आ रही थी। मधू जान चुकी थी केे बच्चे के साथ क्या हुआ है, पर वह फिर भी अपने बच्चे के लिए आँख बंद कर दुआए मांगती रही। पर अब देर हाे चुकी थी बेटे का सर धड से अलग कर दिया गया था। बेटे का सर मा के सामने पडा था, आज भी बेटे की नजर माँ की तरफ थी, पर आज वह नजरे पथरा चुकी थी, बेटे का मुह आज भी खुला था, पर उसके मुह से आज माँ के लिए पुकार नही निकल रही थी, बेटे का मूह सामने पडा था माँ उसे आखरी बार चूम भी नही पा रही थी इस वजह से एक आँख से दस दस आँसू बह रहे थे।
बेटे काे काट कर उसे पका खा लिया गया। और माँ देखती रह गई, साथ में बेठी हर बकरियाँ इस घटना से अवगत थी पर काेई कुछ कर भी क्या सकती थी। दाे माह बीत चुके थे मधू बेटे के जाने के गम में पहले से आधी हाे चुकी थी, के तभी एक दिन मालिक अपने बेटे काे खिलाते हुए बकरियाें के सामने आया, ये देख एक बकरी बाेली “ये है वाे बच्चा जिसके हाेने पर तेरे बच्चे काे काटा गया” मधू आँखाें में आँसू भरे अपने बच्चे की याद में खाेई उस मालिक के बच्चे काे देखने लगी।
वह बकरी फिर बाेली “देख कितना खुश है, अपने बालक काे खिला कर, पर कभी ये नही साेचता की हमें भी हमारे बालक प्राण प्रिय हाेते है, मैं ताे कहू जैसे हम अपने बच्चाे के वियोग में तडप जीते है वैसे ही ये भी जिए, इसका पुत्र भी मरे” ये सुनते ही मधू उस बकरी पर चिल्लाई कहा “उस बेगुनाह बालक ने क्या बिगाडा है, जाे उसे मारने की कहती हाें, वाे ताे अभी धरा पर आया है, ऐसा ना कहाे भगवान् उसे लम्बी उम्र दे, क्यू की एक बालक के मरने से जाे पीडा हाेती है मैं उससे अवगत हूँ, मैं नही चाहती जाे पीडा मुझे हाे रही है वाे किसी और काे हाे” ये सुन साथी बकरी बाेली कैसी है तू उसने तेरे बालक काे मारा और तू फिर भी उसी के बालक काे दुआ दे रही है।” मधू हँसी और कहा “हाँ, क्याेकी मेरा दिल एक जानवर का है इंसान का नही।
ये कहना मात्र ही उस बकरी के लिए जवाब हाे गया था कि मधू ने ऐसा क्यू कहा। मधू ने फिर कहा “ना जाने किस जन्म के पापाे की वजह से आज इस याेनी में जन्म मिला, ना जाने किस के बालक काे छीना था जाे पुत्र वियोग मिला, अब किसी को बालक काे बद्दुआ दे उसे मारे फिर पाप पुण्य जन्म मृत्यु के चक्कर में नही फंसना, इसके कर्माे का दण्ड भगवान् देगा मैं नही। बकरी की यह बात सुन साथी बकरी चुप हाे गई, क्याे की वह समझ चुकी थी के करनी की भरनी सबकी हाेती है मालिक की भी हाेगी।।
(कई बार सच समझ नही आता की जानवर असल में है काैन)
👉 कर्ज से छुटकारा पाना ही ठीक है। (भाग १)
निर्धनता मनुष्य को कई तरह से परेशान करती है इसमें कुछ भी सन्देह की बात नहीं है। धन से ही मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। धन न हुआ तो जरूरी है कि कठिन समस्यायें सामने आयें। पर यदि मनुष्य निर्धन होकर भी कर्जदार है तो वह सबसे बड़े दुःख का कारण हैं। गरीबी स्वयं एक बड़ा बोझ है, कर्ज और बढ़ जाता है तो जीवन व्यवस्था की रीढ़ ही झुक जाती है। मनुष्य का सारा उल्लास समाप्त हो जाता है।
धन-हीन होने पर भी स्वच्छन्द मन के आध्यात्मिक पुरुषों के जीवन में एक प्रकार का आनन्द बना रहता है। पारिवारिक संगठन, प्रेम, साहस और शक्ति का स्वभाव हो तो मनुष्य थोड़े से धन के द्वारा भी सुखमय जीवन की आनन्द प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु कर्ज लेकर सुखोपभोग का सामग्री उपलब्ध करना एक प्रकार से भावी जीवन के सुख शान्ति को ही दाव पर चढ़ा देना है। ऋणी होकर मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता। डॉ. रसर का यह कथन कि “मनुष्य ऋण लेने नहीं जाता, दुख खरीदने जाता है” सत्य ही है। कर्ज लेकर सुख की कल्पना सचमुच भ्रामक है।
विश्व कवि शेक्सपियर ने लिखा है-”न हो ऋणी, न हो महाजन, क्योंकि ऋण लिया हुआ धन अपने को भी खो देता है और देने वाले मित्रों को भी। ऋण लेने की आदत मितव्ययिता की धार को मोटी कर देती है।” उचित रीति से धन खर्च करने की बुद्धि मनुष्य में तब आती है जब वह धन ईमानदारी और परिश्रम से कमाया गया हो। मेहनत से कमाया एक पैसा भी खर्च करते हुये दर्द पैदा करता है। उससे वही करम लेना उपयुक्त समझते हैं जिससे किसी तरह का पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण होता है। जो धन बिना परिश्रम के प्राप्त हो जाता है उससे किसी प्रकार का मोह नहीं होता, इसलिये उसका अधिकाँश उपयोग भी उड़ाने-खाने या झूठी शान-शौकत दिखाने में चला जाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/April/v1.44
धन-हीन होने पर भी स्वच्छन्द मन के आध्यात्मिक पुरुषों के जीवन में एक प्रकार का आनन्द बना रहता है। पारिवारिक संगठन, प्रेम, साहस और शक्ति का स्वभाव हो तो मनुष्य थोड़े से धन के द्वारा भी सुखमय जीवन की आनन्द प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु कर्ज लेकर सुखोपभोग का सामग्री उपलब्ध करना एक प्रकार से भावी जीवन के सुख शान्ति को ही दाव पर चढ़ा देना है। ऋणी होकर मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता। डॉ. रसर का यह कथन कि “मनुष्य ऋण लेने नहीं जाता, दुख खरीदने जाता है” सत्य ही है। कर्ज लेकर सुख की कल्पना सचमुच भ्रामक है।
विश्व कवि शेक्सपियर ने लिखा है-”न हो ऋणी, न हो महाजन, क्योंकि ऋण लिया हुआ धन अपने को भी खो देता है और देने वाले मित्रों को भी। ऋण लेने की आदत मितव्ययिता की धार को मोटी कर देती है।” उचित रीति से धन खर्च करने की बुद्धि मनुष्य में तब आती है जब वह धन ईमानदारी और परिश्रम से कमाया गया हो। मेहनत से कमाया एक पैसा भी खर्च करते हुये दर्द पैदा करता है। उससे वही करम लेना उपयुक्त समझते हैं जिससे किसी तरह का पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण होता है। जो धन बिना परिश्रम के प्राप्त हो जाता है उससे किसी प्रकार का मोह नहीं होता, इसलिये उसका अधिकाँश उपयोग भी उड़ाने-खाने या झूठी शान-शौकत दिखाने में चला जाता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1966 पृष्ठ 44
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/April/v1.44
👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८३)
👉 भविष्य का सम्पूर्ण व समग्र विज्ञान अध्यात्म
इनमें से कुछ ने तो इस बिन्दु पर अपने विचारोत्तेजक निष्कर्ष भी प्रकाशित किए हैं। इन्हीं निष्कर्षों में से एक है, मर्टिन रूथ चाइल्ड की पुस्तक ‘स्प्रिचुयैलिटी एण्ड इट्स साइन्टिफिक डामेन्शन्स’ यानि कि आध्यात्मिकता और इसके वैज्ञानिक आयाम। मर्टिन रूथ चाइल्ड प्रख्यात् न्यूरोलॉजिस्ट हैं। उनके द्वारा किए शोध कार्यों को विज्ञान जगत् में सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाता है। उन्होंने अपनी पुस्तक में आध्यात्मिक दृष्टि, सिद्धान्त व प्रयोगों से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा की है। उनका कहना है, जो आध्यात्मिक सिद्धान्तों की वैज्ञानिकता पर बिना किसी प्रायोगिक निष्कर्षों के प्रश्र खड़ा करते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने वैज्ञानिक होने की जाँच करनी चाहिए।
रूथ चाइल्ड का कहना है कि विज्ञान किसी पुस्तक या विषय का नाम नहीं है। यह एक विशिष्ट शोध विधि है। जो एक खास तरह से अध्ययन करके किसी सत्य या सिद्धान्त को प्रमाणित करती है। यह कहते हुए मर्टिन रूथ चाइल्ड एक सवाल उठाते हैं कि आध्यात्मिक सिद्धान्तों को क्या किसी ने वैज्ञानिक शोध विधि के आधार पर परखने की कोशिश की है। यदि हाँ, तो फिर उनके शोध पत्रों पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए। यदि नहीं तो फिर इन्हें किसी को अवैज्ञानिक कहने के क्या आधार हैं। इस तरह से तो अवैज्ञानिकता की बातें करना स्वयं ही अवैज्ञानिक है।
रूथ चाइल्ड अपनी इसी पुस्तक के एक अन्य हिस्से में कहते हैं कि इन दिनों आध्यात्मिक चिकित्सा की ध्यान आदि जो भी तकनीकें प्रयोग में लायी जा रही हैं, उनके परिणाम उत्साहवर्धक हैं। ये न केवल चिकित्सा जगत् के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी हैं। योग और अध्यात्म की जो भी तकनीकें शारीरिक व मानसिक रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग में लायी जा रही हैं, उनके परिणाम किसी भी वैज्ञानिक को यह कहने पर विवश कर सकती हैं कि ‘स्प्रिचुयैलिटी इस द इन्टीग्रल साइन्स ऑफ द फ्यूचर’। यानि कि अध्यात्म भविष्य का सम्पूर्ण विज्ञान है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११६
इनमें से कुछ ने तो इस बिन्दु पर अपने विचारोत्तेजक निष्कर्ष भी प्रकाशित किए हैं। इन्हीं निष्कर्षों में से एक है, मर्टिन रूथ चाइल्ड की पुस्तक ‘स्प्रिचुयैलिटी एण्ड इट्स साइन्टिफिक डामेन्शन्स’ यानि कि आध्यात्मिकता और इसके वैज्ञानिक आयाम। मर्टिन रूथ चाइल्ड प्रख्यात् न्यूरोलॉजिस्ट हैं। उनके द्वारा किए शोध कार्यों को विज्ञान जगत् में सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाता है। उन्होंने अपनी पुस्तक में आध्यात्मिक दृष्टि, सिद्धान्त व प्रयोगों से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा की है। उनका कहना है, जो आध्यात्मिक सिद्धान्तों की वैज्ञानिकता पर बिना किसी प्रायोगिक निष्कर्षों के प्रश्र खड़ा करते हैं, उन्हें सबसे पहले अपने वैज्ञानिक होने की जाँच करनी चाहिए।
रूथ चाइल्ड का कहना है कि विज्ञान किसी पुस्तक या विषय का नाम नहीं है। यह एक विशिष्ट शोध विधि है। जो एक खास तरह से अध्ययन करके किसी सत्य या सिद्धान्त को प्रमाणित करती है। यह कहते हुए मर्टिन रूथ चाइल्ड एक सवाल उठाते हैं कि आध्यात्मिक सिद्धान्तों को क्या किसी ने वैज्ञानिक शोध विधि के आधार पर परखने की कोशिश की है। यदि हाँ, तो फिर उनके शोध पत्रों पर सार्थक चर्चा होनी चाहिए। यदि नहीं तो फिर इन्हें किसी को अवैज्ञानिक कहने के क्या आधार हैं। इस तरह से तो अवैज्ञानिकता की बातें करना स्वयं ही अवैज्ञानिक है।
रूथ चाइल्ड अपनी इसी पुस्तक के एक अन्य हिस्से में कहते हैं कि इन दिनों आध्यात्मिक चिकित्सा की ध्यान आदि जो भी तकनीकें प्रयोग में लायी जा रही हैं, उनके परिणाम उत्साहवर्धक हैं। ये न केवल चिकित्सा जगत् के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी हैं। योग और अध्यात्म की जो भी तकनीकें शारीरिक व मानसिक रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग में लायी जा रही हैं, उनके परिणाम किसी भी वैज्ञानिक को यह कहने पर विवश कर सकती हैं कि ‘स्प्रिचुयैलिटी इस द इन्टीग्रल साइन्स ऑफ द फ्यूचर’। यानि कि अध्यात्म भविष्य का सम्पूर्ण विज्ञान है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११६
👉 गुरुवर की वाणी
★ छोटे-छोटे मकान, पुलों को मामूली ओवरसियर बना लेते हैं, पर जब बड़ा बांध बनाना होता है तो बड़े इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। मेजर आपरेशन छोटे अनुभवहीन डॉक्टरों के बस की बात नहीं। उसे सिद्धहस्त सर्जन ही करते हैं। समाज में मामूली गड़बड़ियां तो बार-बार होती, उठती रहती है। उनका सुधार कार्य सामान्य स्तर के सुधार ही कर लेते हैं, जब पाप अपनी सीमा का उल्लंघन कर देता है, मर्यादाएं टूटने लगती हैं, तो महासुधारक की आवश्यकता होती है, तब इस कार्य को महाकाल स्वयं करते हैं।
(प्रज्ञा अभियान-1983, जून)
◆ आज आदर्शवादिता कहने-सुनने भर की वस्तु रह गई है। उसका उपयोग कथा, प्रवचनों और स्वाध्याय-सत्संगों तक ही सीमित है। आदर्शों की दुहाई देने और प्रचलनों की लकीर पीटने से कुछ बनता नहीं। इन दिनों वैसा ही हो रहा है। अस्तु, दीपक तले अंधेरा होने जैसी उपहासास्पद स्थिति बन रही है। आवश्यकता इस बात की है कि सांस्कृतिक आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में प्रवेश मिले। हम ऋषि परम्परा के अनुगामी हैं, उन नर वीरों की संतानें हैं, यह ध्यान में रखते हुए आदर्शों की प्रवंचना से बचा ही जाना चाहिए।
(वाङ्मय क्रमांक- 35, पेज-1.12)
■ इन दिनों सामाजिक प्रचलनों में अनैतिकता, मूढ़ मान्यता और अवांछनीयता की भरमार है। हमें उलटे को उलटा करके सीधा करने की नीति अपनानी चाहिए। इसके लिए नैतिक, बौद्धिक और समाजिक क्रान्ति आवश्यक अनुभव करें और उसे पूरा करने में कुछ उठा न रखें। आत्म-सुधार में तपस्वी, परिवार निर्माण में मनस्वी और समाज निर्माण में तेजस्वी की भूमिका निबाहें। अनीति के वातावरण में मूक-दर्शक बनकर न रहें। शौर्य, साहस के धनी बनें और अनीति उन्मूलन तथा उत्कृष्टता अभिवर्धन में प्रखर पराक्रम का परिचय दें।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप-40)
★ 20 वीं सदी का अंत और 21 वीं सदी का आरम्भ युग सन्धि का ऐसा अवसर है, जिसे अभूतपूर्व कहा जा सकता है। शायद भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति कभी न हो। अपने मतलब से मतलब रखने का आदिमकालीन सोच अब चल न सकेगा। इन दिनों महाविनाश एवं महासृजन आमने-सामने खड़े हैं। इनमें से एक का चयन सामूहिक मानवी चेतना को ही करना पड़ेगा। देखना इतना भर है कि इस परिवर्तन काल में युग शिल्पी की भूमिका संपादन के लिए श्रेय कौन पाता है?
(अखण्ड ज्योति-1988, सितम्बर)
(प्रज्ञा अभियान-1983, जून)
◆ आज आदर्शवादिता कहने-सुनने भर की वस्तु रह गई है। उसका उपयोग कथा, प्रवचनों और स्वाध्याय-सत्संगों तक ही सीमित है। आदर्शों की दुहाई देने और प्रचलनों की लकीर पीटने से कुछ बनता नहीं। इन दिनों वैसा ही हो रहा है। अस्तु, दीपक तले अंधेरा होने जैसी उपहासास्पद स्थिति बन रही है। आवश्यकता इस बात की है कि सांस्कृतिक आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में प्रवेश मिले। हम ऋषि परम्परा के अनुगामी हैं, उन नर वीरों की संतानें हैं, यह ध्यान में रखते हुए आदर्शों की प्रवंचना से बचा ही जाना चाहिए।
(वाङ्मय क्रमांक- 35, पेज-1.12)
■ इन दिनों सामाजिक प्रचलनों में अनैतिकता, मूढ़ मान्यता और अवांछनीयता की भरमार है। हमें उलटे को उलटा करके सीधा करने की नीति अपनानी चाहिए। इसके लिए नैतिक, बौद्धिक और समाजिक क्रान्ति आवश्यक अनुभव करें और उसे पूरा करने में कुछ उठा न रखें। आत्म-सुधार में तपस्वी, परिवार निर्माण में मनस्वी और समाज निर्माण में तेजस्वी की भूमिका निबाहें। अनीति के वातावरण में मूक-दर्शक बनकर न रहें। शौर्य, साहस के धनी बनें और अनीति उन्मूलन तथा उत्कृष्टता अभिवर्धन में प्रखर पराक्रम का परिचय दें।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप-40)
★ 20 वीं सदी का अंत और 21 वीं सदी का आरम्भ युग सन्धि का ऐसा अवसर है, जिसे अभूतपूर्व कहा जा सकता है। शायद भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति कभी न हो। अपने मतलब से मतलब रखने का आदिमकालीन सोच अब चल न सकेगा। इन दिनों महाविनाश एवं महासृजन आमने-सामने खड़े हैं। इनमें से एक का चयन सामूहिक मानवी चेतना को ही करना पड़ेगा। देखना इतना भर है कि इस परिवर्तन काल में युग शिल्पी की भूमिका संपादन के लिए श्रेय कौन पाता है?
(अखण्ड ज्योति-1988, सितम्बर)
बुधवार, 16 अक्टूबर 2019
👉 अर्थपूर्ण केक:-
एक लड़की अपनी माँ के पास अपनी परेशानियों का बखान कर रही थीl वो परीक्षा में फेल हो गई थी।
सहेली से झगड़ा हो गया।
मनपसंद ड्रेस प्रैस कर रही थी वो जल गई।
वह रोते हुए बोली, "मम्मी, देखो ना, मेरी जिन्दगी के साथ सब कुछ उलटा -पुल्टा हो रहा है"।
माँ ने मुस्कराते हुए कहा:- "यह उदासी और रोना छोड़ो, चलो मेरे साथ रसोई में, तुम्हारा मनपसंद केक बनाकर खिलाती हूँ"। लड़की का रोना बंद हो गया और हंसते हुये बोली, "केक तो मेरी मनपसंद मिठाई है"। कितनी देर में बनेगा"
कन्या ने चहकते हुए पूछा।
माँ ने सबसे पहले मैदे का डिब्बा उठाया और प्यार से कहा, ले पहले मैदा खा लेl लड़की मुंह बनाते हुए बोली, इसे कोई खाता है भला। माँ ने फिर मुस्कराते हुये कहा "तो ले सौ ग्राम चीनी ही खा ले"। एसेंस और मिल्कमेड का डिब्बा दिखाया और कहा लो इसका भी स्वाद चख लो।"
"माँ"आज तुम्हें क्या हो गया है ? जो मुझे इस तरह की चीजें खाने को दे रही हो"?
माँ ने बड़े प्यार और शांति से जवाब दिया,
"बेटा"केक इन सभी बेस्वादी चीजों से ही बनता है और ये सभी मिलकर ही तो केक को स्वादिष्ट बनाती हैं . मैं तुम्हें सिखाना चाह रही थी कि "जिंदगी का केक" भी इसी प्रकार की बेस्वाद घटनाओं को मिलाकर बनाया जाता है।"
"फेल हो गई हो तो इसे चुनौती समझो मेहनत करके पास हो जाओ। सहेली से झगड़ा हो गया है तो अपना व्यवहार इतना मीठा बनाओ कि फिर कभी किसी से झगड़ा न हो। यदि मानसिक तनाव के कारण "ड्रेस" जल गई तो आगे से सदा ध्यान रखो कि मन की स्थिति हर परिस्थिति में अच्छी हो। बिगड़े मन से काम भी तो बिगड़ेंगेl कार्यों को कुशलता से करने के लिए मन के चिंतनको कुशल बनाना अनिवार्य है।"
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सहेली से झगड़ा हो गया।
मनपसंद ड्रेस प्रैस कर रही थी वो जल गई।
वह रोते हुए बोली, "मम्मी, देखो ना, मेरी जिन्दगी के साथ सब कुछ उलटा -पुल्टा हो रहा है"।
माँ ने मुस्कराते हुए कहा:- "यह उदासी और रोना छोड़ो, चलो मेरे साथ रसोई में, तुम्हारा मनपसंद केक बनाकर खिलाती हूँ"। लड़की का रोना बंद हो गया और हंसते हुये बोली, "केक तो मेरी मनपसंद मिठाई है"। कितनी देर में बनेगा"
कन्या ने चहकते हुए पूछा।
माँ ने सबसे पहले मैदे का डिब्बा उठाया और प्यार से कहा, ले पहले मैदा खा लेl लड़की मुंह बनाते हुए बोली, इसे कोई खाता है भला। माँ ने फिर मुस्कराते हुये कहा "तो ले सौ ग्राम चीनी ही खा ले"। एसेंस और मिल्कमेड का डिब्बा दिखाया और कहा लो इसका भी स्वाद चख लो।"
"माँ"आज तुम्हें क्या हो गया है ? जो मुझे इस तरह की चीजें खाने को दे रही हो"?
माँ ने बड़े प्यार और शांति से जवाब दिया,
"बेटा"केक इन सभी बेस्वादी चीजों से ही बनता है और ये सभी मिलकर ही तो केक को स्वादिष्ट बनाती हैं . मैं तुम्हें सिखाना चाह रही थी कि "जिंदगी का केक" भी इसी प्रकार की बेस्वाद घटनाओं को मिलाकर बनाया जाता है।"
"फेल हो गई हो तो इसे चुनौती समझो मेहनत करके पास हो जाओ। सहेली से झगड़ा हो गया है तो अपना व्यवहार इतना मीठा बनाओ कि फिर कभी किसी से झगड़ा न हो। यदि मानसिक तनाव के कारण "ड्रेस" जल गई तो आगे से सदा ध्यान रखो कि मन की स्थिति हर परिस्थिति में अच्छी हो। बिगड़े मन से काम भी तो बिगड़ेंगेl कार्यों को कुशलता से करने के लिए मन के चिंतनको कुशल बनाना अनिवार्य है।"
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👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (अंतिम भाग)
दरिद्रता भयानक अभिशाप है। इससे मनुष्य के शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, मानसिक एवं आत्मिक स्तर का पतन हो जाता है। कहने को कोई कितना भी सन्तोषी, त्यागी एवं निस्पृह क्यों न बने किन्तु जब दरिद्रता जन्य अभावों के थपेड़े लगते हैं तब कदाचित् ही कोई ऐसा धीर-गम्भीर निकले जिसका अस्तित्व काँप न उठता हो। यह दरिद्रता की स्थिति का जन्म मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक आलस्य से ही होता है। गरीबी, दीनता, हीनता आदि कुफल आलस्यरूपी विषबेलि पर ही फला करते हैं।
आलसी व्यक्ति परावलम्बी एवं पर भाग भोगी ही होता है। इस धरती पर परिश्रम करके ही अन्न-वस्त्र की व्यवस्था हो सकती है। यदि परमात्मा को मनुष्य की परिश्रमशीलता वाँछनीय न होती तो वह मनुष्य का आहार रोटी वृक्षों पर उगाता। बने बनाए वस्त्रों को घास-फूस की तरह पैदा कर देता। मनुष्य को पेट भरने और शरीर ढकने के लिये भोजन-वस्त्र कड़ी मेहनत करके ही पैदा करना होता है। नियम है कि जब सब खाते-पहनते हैं तो सबको ही मेहनत तथा काम करना चाहिए। इसका कोई अर्थ नहीं कि एक कमाये और दूसरा बैठा-बैठा खाये। कोई काम किये बिना भोजन-वस्त्र का उपयोग करने वाला दूसरे के परिश्रम का चोर कहा गया है। अवश्य ही उसने हराम की तोड़कर संसार के किसी कोने में श्रम करते हुए किसी व्यक्ति का भाग हरण किया है। दूसरे का भाग चुराना नैतिक, सामाजिक तथा आत्मिक रूप से पाप है और अकर्मण्य आलसी इस पाप को निर्लज्ज होकर करते ही रहते हैं।
जो खाली ठाली रहकर निठल्ला बैठा रहता है उसका शारीरिक ही नहीं मानसिक तथा आध्यात्मिक पतन भी हो जाता है। “खाली आदमी शैतान का साथी” वाली कहावत आलसी पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। जो निठल्ला बैठा रहता है उसे तरह-तराह की खुराफातें सूझती रहती हैं। यह विशेषता परिश्रमशीलता में ही है कि वह मनुष्य के मस्तिष्क में विकारपूर्ण विचार नहीं आने देती पुरुषार्थी व्यक्ति को इतना समय ही नहीं रहता कि वह काम से फुरसत पाकर बेकार के ऊहापोह में लगा रहेगा और अकर्मण्य आलसी के पास इसके सिवाय कोई काम नहीं रहता, निदान उसे अनेक प्रकार की ऐसी विकृतियाँ तथा दुर्गुण घेर लेते हैं जिससे उसके चरित्र का अधःपतन हो जाता है।
लोग इस अभिशाप से दुराचारी तथा अपराधी बन जाया करते हैं। निठल्ले और निष्क्रिय बैठे रहने वाले व्यक्तियों का विचार-सन्तुलन बिगड़ जाता है जिससे उन्हें ऐसी-ऐसी अनेक सनकें सूझा करती हैं जो व्यवहार-जगत में पागलपन की संज्ञा पा सकती हैं। शेखचिल्ली की तरह वह न जानें किस प्रकार के मानस-महल बनाया और गिराया करता है। प्रमाद पूर्ण ऊहापोह ने संसार में जाने कितने उन्मादी पैदा कर दिये हैं। प्रमाद तथा आलस्य को उन्माद तथा पागलपन का प्रारम्भिक रूप समझकर उससे दूर ही रहना चाहिए। क्या आर्थिक क्या सामाजिक, क्या आत्मिक अथवा क्या आध्यात्मिक कोई भी उन्नति चाहने वाले को आलस्य के पाप का परित्याग कर श्रम एवं पुरुषार्थ का पुण्य करना चाहिए तभी वे अपनी वाँछित स्थिति पा सकेंगे, अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे अन्य कोई नहीं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.24
आलसी व्यक्ति परावलम्बी एवं पर भाग भोगी ही होता है। इस धरती पर परिश्रम करके ही अन्न-वस्त्र की व्यवस्था हो सकती है। यदि परमात्मा को मनुष्य की परिश्रमशीलता वाँछनीय न होती तो वह मनुष्य का आहार रोटी वृक्षों पर उगाता। बने बनाए वस्त्रों को घास-फूस की तरह पैदा कर देता। मनुष्य को पेट भरने और शरीर ढकने के लिये भोजन-वस्त्र कड़ी मेहनत करके ही पैदा करना होता है। नियम है कि जब सब खाते-पहनते हैं तो सबको ही मेहनत तथा काम करना चाहिए। इसका कोई अर्थ नहीं कि एक कमाये और दूसरा बैठा-बैठा खाये। कोई काम किये बिना भोजन-वस्त्र का उपयोग करने वाला दूसरे के परिश्रम का चोर कहा गया है। अवश्य ही उसने हराम की तोड़कर संसार के किसी कोने में श्रम करते हुए किसी व्यक्ति का भाग हरण किया है। दूसरे का भाग चुराना नैतिक, सामाजिक तथा आत्मिक रूप से पाप है और अकर्मण्य आलसी इस पाप को निर्लज्ज होकर करते ही रहते हैं।
जो खाली ठाली रहकर निठल्ला बैठा रहता है उसका शारीरिक ही नहीं मानसिक तथा आध्यात्मिक पतन भी हो जाता है। “खाली आदमी शैतान का साथी” वाली कहावत आलसी पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। जो निठल्ला बैठा रहता है उसे तरह-तराह की खुराफातें सूझती रहती हैं। यह विशेषता परिश्रमशीलता में ही है कि वह मनुष्य के मस्तिष्क में विकारपूर्ण विचार नहीं आने देती पुरुषार्थी व्यक्ति को इतना समय ही नहीं रहता कि वह काम से फुरसत पाकर बेकार के ऊहापोह में लगा रहेगा और अकर्मण्य आलसी के पास इसके सिवाय कोई काम नहीं रहता, निदान उसे अनेक प्रकार की ऐसी विकृतियाँ तथा दुर्गुण घेर लेते हैं जिससे उसके चरित्र का अधःपतन हो जाता है।
लोग इस अभिशाप से दुराचारी तथा अपराधी बन जाया करते हैं। निठल्ले और निष्क्रिय बैठे रहने वाले व्यक्तियों का विचार-सन्तुलन बिगड़ जाता है जिससे उन्हें ऐसी-ऐसी अनेक सनकें सूझा करती हैं जो व्यवहार-जगत में पागलपन की संज्ञा पा सकती हैं। शेखचिल्ली की तरह वह न जानें किस प्रकार के मानस-महल बनाया और गिराया करता है। प्रमाद पूर्ण ऊहापोह ने संसार में जाने कितने उन्मादी पैदा कर दिये हैं। प्रमाद तथा आलस्य को उन्माद तथा पागलपन का प्रारम्भिक रूप समझकर उससे दूर ही रहना चाहिए। क्या आर्थिक क्या सामाजिक, क्या आत्मिक अथवा क्या आध्यात्मिक कोई भी उन्नति चाहने वाले को आलस्य के पाप का परित्याग कर श्रम एवं पुरुषार्थ का पुण्य करना चाहिए तभी वे अपनी वाँछित स्थिति पा सकेंगे, अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे अन्य कोई नहीं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24
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👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८२)
👉 भविष्य का सम्पूर्ण व समग्र विज्ञान अध्यात्म
आध्यात्मिक चिकित्सा के सम्बन्ध में विश्व दृष्टि इन दिनों सार्थक ढंग से बदली है। विश्व भर के मनीषियों के दृष्टिकोण आश्चर्यजनक ढंग से परिवर्तित हुए हैं। लोकदृष्टि भी इस सम्बन्ध में परिमार्जित व परिवर्तित हुई है। आज से कुछ सालों पहले आध्यात्मिक सिद्धान्तों, तकनीकों व प्रयोगों को अवैज्ञानिक कहकर खारिज कर दिया जाता था। लोकमानस भी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से मिली जानकारियों को जीवन के सर्वोच्च सन्देश के रूप में सुनता व स्वीकारता था। पर इक्कीसवी सदी के इन चार सालों में स्थिति काफी कुछ बदली है। विश्व मनीषियों को लगने लगा है कि प्रायोगिक पड़ताल के बिना आध्यात्मिक दृष्टिकोण व तकनीकों को नकारना अवैज्ञानिकता की पराकाष्ठा है। इसी तरह से लोकमानस को यह अनुभूति हुई है कि प्रयोगशालाओं से मिली जानकारियों में शुभ के साथ अशुभ भी मिला हुआ है। और इनके अन्धे उपयोग से हानियाँ भी सम्भव है।
अनुभवों की इस शृंखला में कुछ और अनुभव भी हुए हैं। वैज्ञानिक चिकित्सा के सभी आयामों की अनेकों असफलताएँ व भारी दुष्प्रभाव भी सामने आए। इस सच को सभी जानते हैं कि सभी ने प्रायः सम्पूर्ण बीसवीं सदी साइड इफेक्ट्स से लड़ते- झगड़ते व पटखनी खाते गुजारी है। इस साइड इफेक्ट्स की वजह से न जाने कितने मासूम मौत की नींद सोए हैं। एक बीमारी ठीक करने के चक्कर में कितनी ही नयी बीमारियाँ उपहार में मिली हैं। दुनिया भर के कर्णधारों ने इस पर चर्चा भी की, चिन्ता भी जतायी परन्तु समाधान न खोज सके। अन्त में हार- थक कर सभी का ध्यान वैकल्पिक चिकित्सा की ओर गया। चुम्बक चिकित्सा, रंग चिकित्सा, एक्यूप्रेशर न जाने कितनी ही तकनीकें आजमायी गयीं। इसी क्रम में आध्यात्मिक तकनीकों को भी परखा गया। इससे जो नतीजे मिले, उससे सभी को भारी अचरज हुआ। क्योंकि इनमें आशातीत सफलता मिली थी।
और इसमें सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये आध्यात्मिक तकनीकें अभी तक केवल आधे- अधूरे ढंग से ही जाँची- परखी गयी हैं। इन्हें अव्यवस्थित एवं अस्त- व्यस्त तरीके से ही प्रयोग में लाया गया है। इनके प्रयोगिक क्रम में अभी इनकी वास्तविक और सम्पूर्ण विधि- व्यवस्था तो अपनायी ही नहीं गयी। इसके बावजूद मिलने वाले नतीजों ने वैज्ञानिकों को हैरान कर रखा है। इनसे मिलने वाली विश्रान्ति, घटने वाला तनाव, जीवनी शक्ति में भारी अभिवृद्धि आदि कुछ ऐसे परिणाम हैं, जिन्होंने सभी के दृष्टिकोण को परिवर्तित किया है। कभी इसे अवैज्ञानिक कहने वाले वैज्ञानिक इसकी वैज्ञानिकता को स्वीकारने पर विवश हुए हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११५
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आध्यात्मिक चिकित्सा के सम्बन्ध में विश्व दृष्टि इन दिनों सार्थक ढंग से बदली है। विश्व भर के मनीषियों के दृष्टिकोण आश्चर्यजनक ढंग से परिवर्तित हुए हैं। लोकदृष्टि भी इस सम्बन्ध में परिमार्जित व परिवर्तित हुई है। आज से कुछ सालों पहले आध्यात्मिक सिद्धान्तों, तकनीकों व प्रयोगों को अवैज्ञानिक कहकर खारिज कर दिया जाता था। लोकमानस भी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से मिली जानकारियों को जीवन के सर्वोच्च सन्देश के रूप में सुनता व स्वीकारता था। पर इक्कीसवी सदी के इन चार सालों में स्थिति काफी कुछ बदली है। विश्व मनीषियों को लगने लगा है कि प्रायोगिक पड़ताल के बिना आध्यात्मिक दृष्टिकोण व तकनीकों को नकारना अवैज्ञानिकता की पराकाष्ठा है। इसी तरह से लोकमानस को यह अनुभूति हुई है कि प्रयोगशालाओं से मिली जानकारियों में शुभ के साथ अशुभ भी मिला हुआ है। और इनके अन्धे उपयोग से हानियाँ भी सम्भव है।
अनुभवों की इस शृंखला में कुछ और अनुभव भी हुए हैं। वैज्ञानिक चिकित्सा के सभी आयामों की अनेकों असफलताएँ व भारी दुष्प्रभाव भी सामने आए। इस सच को सभी जानते हैं कि सभी ने प्रायः सम्पूर्ण बीसवीं सदी साइड इफेक्ट्स से लड़ते- झगड़ते व पटखनी खाते गुजारी है। इस साइड इफेक्ट्स की वजह से न जाने कितने मासूम मौत की नींद सोए हैं। एक बीमारी ठीक करने के चक्कर में कितनी ही नयी बीमारियाँ उपहार में मिली हैं। दुनिया भर के कर्णधारों ने इस पर चर्चा भी की, चिन्ता भी जतायी परन्तु समाधान न खोज सके। अन्त में हार- थक कर सभी का ध्यान वैकल्पिक चिकित्सा की ओर गया। चुम्बक चिकित्सा, रंग चिकित्सा, एक्यूप्रेशर न जाने कितनी ही तकनीकें आजमायी गयीं। इसी क्रम में आध्यात्मिक तकनीकों को भी परखा गया। इससे जो नतीजे मिले, उससे सभी को भारी अचरज हुआ। क्योंकि इनमें आशातीत सफलता मिली थी।
और इसमें सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये आध्यात्मिक तकनीकें अभी तक केवल आधे- अधूरे ढंग से ही जाँची- परखी गयी हैं। इन्हें अव्यवस्थित एवं अस्त- व्यस्त तरीके से ही प्रयोग में लाया गया है। इनके प्रयोगिक क्रम में अभी इनकी वास्तविक और सम्पूर्ण विधि- व्यवस्था तो अपनायी ही नहीं गयी। इसके बावजूद मिलने वाले नतीजों ने वैज्ञानिकों को हैरान कर रखा है। इनसे मिलने वाली विश्रान्ति, घटने वाला तनाव, जीवनी शक्ति में भारी अभिवृद्धि आदि कुछ ऐसे परिणाम हैं, जिन्होंने सभी के दृष्टिकोण को परिवर्तित किया है। कभी इसे अवैज्ञानिक कहने वाले वैज्ञानिक इसकी वैज्ञानिकता को स्वीकारने पर विवश हुए हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११५
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👉 गुरुवर की वाणी
★ हम आत्मीयता का क्षेत्र व्यापक करें। कुछ लोगों को ही अपना मानने और उन्हीं की फरमाइशें पूरी करने, उपहार लादते रहने के व्यामोह दलदल में न फंसें। अपनी सामर्थ्य को सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाएं। देश, धर्म, समाज और संस्कृति को प्यार करें। आत्मीयता को व्यापक बनाएं। सबको अपना और अपने को सबका समझें। इस आत्म-विस्तार का व्यावहारिक स्वरूप लोकमंगल की सेवा-साधना से ही निखरता है। उदारता बरतें और बदले में आत्म-संतोष, लोक सम्मान तथा दैवी अनुग्रह की विभूतियां कमाएं।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप-39)
◆ संत, सुधारक और शहीद सामान्य जन जीवन से ऊंचे स्तर के होने के कारण छोटे-बड़े अवतारों की गिनती में आते हैं। संत अपनी सज्जनता से मानव जीवन के सदुपयोगों का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। जनजीवन पर छाये निकृष्ट चिंतन और दुराचरण से जूझने का प्रबल पराक्रम सुधारकों को करना होता है। शहीद वे होते हैं, जो स्वार्थ और परमार्थ में उत्सर्ग कर देते हैं। अपने दायरे को वे शरीर, परिवार तक सीमित न रख विश्व नागरिक जैसा बना लेते हैं।
(प्रज्ञा अभियान-1983, जुलाई)
■ उपदेश तो बहुत पा चुके हो, किन्तु उसके अनुसार क्या तुम कार्य करते हो? अपने चरित्र का संशोधन करने में अभी भी क्या किसी अन्य की राह देख रहे हो? तुम तो अब श्रेष्ठ कार्य करने की योग्यता प्राप्त करो। विवेक बुद्धि की किसी प्रकार अब उपेक्षा न करो। अपने चरित्र का संशोधन करने में लापरवाही करोगे या प्रयत्न में ढिलाई करोगे तो उन्नति कैसे हो सकती है? अपने शुभ अवसरों को न खोकर जीवन रणक्षेत्र में प्रबल पराक्रम से निरन्तर अग्रसर होकर विजयी प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहना सीखो।
(अखण्ड ज्योति-1964)
★ हमारी अभिलाषा है कि गायत्री परिवार का हर सदस्य उत्कृष्ट प्रकार के व्यक्तित्व से सम्पन्न भारतीय धर्म और संस्कृति का सिर ऊंचा करने वाला सज्जन व्यक्ति बने। उसका जीवन उलझनों और कुंठाओं से भरा हुआ नहीं, वरन् आशा, उत्साह, संतोष एवं मस्ती से भरा हुआ बीते। अपनी श्रेष्ठता का अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करना—इस कसौटी पर हमारी वास्तविकता अब परखी जानी है। अब तक उपदेशों का कितना प्रभाव अंतःकरण पर हुआ? इस प्रश्न का उत्तर अब हमें आचरण द्वारा ही देना पड़ेगा।
(अखण्ड ज्योति-1964)
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप-39)
◆ संत, सुधारक और शहीद सामान्य जन जीवन से ऊंचे स्तर के होने के कारण छोटे-बड़े अवतारों की गिनती में आते हैं। संत अपनी सज्जनता से मानव जीवन के सदुपयोगों का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। जनजीवन पर छाये निकृष्ट चिंतन और दुराचरण से जूझने का प्रबल पराक्रम सुधारकों को करना होता है। शहीद वे होते हैं, जो स्वार्थ और परमार्थ में उत्सर्ग कर देते हैं। अपने दायरे को वे शरीर, परिवार तक सीमित न रख विश्व नागरिक जैसा बना लेते हैं।
(प्रज्ञा अभियान-1983, जुलाई)
■ उपदेश तो बहुत पा चुके हो, किन्तु उसके अनुसार क्या तुम कार्य करते हो? अपने चरित्र का संशोधन करने में अभी भी क्या किसी अन्य की राह देख रहे हो? तुम तो अब श्रेष्ठ कार्य करने की योग्यता प्राप्त करो। विवेक बुद्धि की किसी प्रकार अब उपेक्षा न करो। अपने चरित्र का संशोधन करने में लापरवाही करोगे या प्रयत्न में ढिलाई करोगे तो उन्नति कैसे हो सकती है? अपने शुभ अवसरों को न खोकर जीवन रणक्षेत्र में प्रबल पराक्रम से निरन्तर अग्रसर होकर विजयी प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहना सीखो।
(अखण्ड ज्योति-1964)
★ हमारी अभिलाषा है कि गायत्री परिवार का हर सदस्य उत्कृष्ट प्रकार के व्यक्तित्व से सम्पन्न भारतीय धर्म और संस्कृति का सिर ऊंचा करने वाला सज्जन व्यक्ति बने। उसका जीवन उलझनों और कुंठाओं से भरा हुआ नहीं, वरन् आशा, उत्साह, संतोष एवं मस्ती से भरा हुआ बीते। अपनी श्रेष्ठता का अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करना—इस कसौटी पर हमारी वास्तविकता अब परखी जानी है। अब तक उपदेशों का कितना प्रभाव अंतःकरण पर हुआ? इस प्रश्न का उत्तर अब हमें आचरण द्वारा ही देना पड़ेगा।
(अखण्ड ज्योति-1964)
मंगलवार, 15 अक्टूबर 2019
👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)
👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि
युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि असाध्य रोग, भयंकर दुर्घटना, मारण, कृत्या आदि अभिचार कर्म दुर्भाग्य, दैत्य और प्रेतबाधा, पागलपन को आध्यात्म चिकित्सा का मर्मज्ञ केवल सिर पर जल छिड़कर या सिर पर हाथ रखकर अथवा मणियां बांधकर दूर कर सकता है। जो इन प्रयोगों को जानते हैं, उन्हें इस सत्य का ज्ञान है कि अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा कोई चमत्कार न होकर एक प्रायोगिक व वैज्ञानिक व्यवस्था है।
परम पूज्य गुरुदेव के ज्येष्ठ पुत्र श्री ओमप्रकाश जो अपनी किशोरावस्था में उनके साथ रहा करते थे, गुरुदेव की आध्यात्मिक चिकित्सा से जुड़ी अनेकों अनुभूतियाँ सुनाते हैं। उन्हें अभी भी हैरानी होती है कि कैसे एक ही पत्ती, जड़ अथवा किसी छोटी सी आटे से बनी गोली से वे असाध्य रोगों को ठीक कर दिया करते थे। श्री ओमप्रकाश जी बताते हैं कि चिकित्सा के नाम पर हम उन दिनों आयुर्वेद जानते थे। गुरुदेव के एक ज्येष्ठ भ्राता भी वैद्य थे। उनके द्वारा दी जाने वाली दवाओं का स्वरूप, प्रकार व उनकी विविधता अलग ढंग की होती थी। पर गुरुदेव का तो सभी कुछ अद्भुत था। यहाँ तो वे सामान्य सी पत्ती द्वारा मरणासन्न को जीवनदान देते थे।
श्री ओमप्रकाश जी का कहना है कि उनके प्रयोगों में एक विचित्रता और भी थी। वह यह कि जरूरी नहीं कि रोगी उनके समीप ही हो, उसके हजारों किलोमीटर दूर होने से भी उनकी चिकित्सा में कोई कमी नहीं आती थी। एक सामान्य से धागे को उसके पास भेजकर वह उसे भला- चंगा बना देते थे। वह कहते हैं कि उन दिनों तो मैं अनजान था। पर आज लगता है कि सचमुच ही यह अथर्ववेदीय आध्यात्मिक चिकित्सा थी। शान्तिकुञ्ज में तप की अवधि में परम पूज्य गुरुदेव अपने विश्व कल्याण सम्बन्धी उच्चस्तरीय प्रयोगों में संलग्र हो गए थे। और उनकी चिकित्सा का स्वरूप संकल्प प्रयोगों व इच्छाशक्ति तक ही सिमट गया था। रोगी अभी भी ठीक होते थे। उनकी संख्या भी पहले से अनेकों गुना बढ़ गयी थी। किन्तु अब प्रयोग- प्रक्रियाएँ बदली हुई थी। अब इन अनेकों के लिए उनका संकल्प ही पर्याप्त था।
जीवन के अन्तिम वर्षों में उनकी दृष्टि भविष्य की ओर थी। सन् १९८९ में जाड़ों में जब वह अपने कमरे के बगल वाले आंगन में पलंग पर बैठे हुए थे। उन्होंने पास बैठे हुए अपने शिष्यों से पूछा- क्यों जी मेरे जाने के बाद तुम लोग आने वालों का किस तरह कल्याण करोगे? उत्तर में सन्नाटा छाया रहा। कोई कुछ न बोला। तब वह स्वयं बोले, देखो देह छोड़ने के बाद भी मेरी चेतना हमेशा ही शान्तिकुञ्ज परिसर में व्याप्त रहेगी। भविष्य में जो लोग यहाँ आएँ उनसे कहना कि गुरुदेव ने केवल शरीर छोड़ा है, वे कहीं गए नहीं हैं, यहीं पर हैं। उनका तप प्राण यहाँ के कण- कण में व्याप्त है। तुम लोग इसे अपने मन, प्राण में अनुभव करो। और जितने समय यहाँ रहो, यह सोचो कि मैं अपने रोम- रोम से प्रत्येक श्वास से गुरुदेव के तप प्राण को धारण कर रहा हूँ। इससे उनकी सभी तरह की चिकित्सा हो जाएगी। गुरुदेव के द्वारा कहा हुआ यह सच आज भी प्रामाणित हो रहा है। उन्होंने आध्यात्मिक चिकित्सा का जो प्रवर्तन किया आज उसे विश्वदृष्टि में मान्यता मिल रही है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ ११३
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युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि असाध्य रोग, भयंकर दुर्घटना, मारण, कृत्या आदि अभिचार कर्म दुर्भाग्य, दैत्य और प्रेतबाधा, पागलपन को आध्यात्म चिकित्सा का मर्मज्ञ केवल सिर पर जल छिड़कर या सिर पर हाथ रखकर अथवा मणियां बांधकर दूर कर सकता है। जो इन प्रयोगों को जानते हैं, उन्हें इस सत्य का ज्ञान है कि अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा कोई चमत्कार न होकर एक प्रायोगिक व वैज्ञानिक व्यवस्था है।
परम पूज्य गुरुदेव के ज्येष्ठ पुत्र श्री ओमप्रकाश जो अपनी किशोरावस्था में उनके साथ रहा करते थे, गुरुदेव की आध्यात्मिक चिकित्सा से जुड़ी अनेकों अनुभूतियाँ सुनाते हैं। उन्हें अभी भी हैरानी होती है कि कैसे एक ही पत्ती, जड़ अथवा किसी छोटी सी आटे से बनी गोली से वे असाध्य रोगों को ठीक कर दिया करते थे। श्री ओमप्रकाश जी बताते हैं कि चिकित्सा के नाम पर हम उन दिनों आयुर्वेद जानते थे। गुरुदेव के एक ज्येष्ठ भ्राता भी वैद्य थे। उनके द्वारा दी जाने वाली दवाओं का स्वरूप, प्रकार व उनकी विविधता अलग ढंग की होती थी। पर गुरुदेव का तो सभी कुछ अद्भुत था। यहाँ तो वे सामान्य सी पत्ती द्वारा मरणासन्न को जीवनदान देते थे।
श्री ओमप्रकाश जी का कहना है कि उनके प्रयोगों में एक विचित्रता और भी थी। वह यह कि जरूरी नहीं कि रोगी उनके समीप ही हो, उसके हजारों किलोमीटर दूर होने से भी उनकी चिकित्सा में कोई कमी नहीं आती थी। एक सामान्य से धागे को उसके पास भेजकर वह उसे भला- चंगा बना देते थे। वह कहते हैं कि उन दिनों तो मैं अनजान था। पर आज लगता है कि सचमुच ही यह अथर्ववेदीय आध्यात्मिक चिकित्सा थी। शान्तिकुञ्ज में तप की अवधि में परम पूज्य गुरुदेव अपने विश्व कल्याण सम्बन्धी उच्चस्तरीय प्रयोगों में संलग्र हो गए थे। और उनकी चिकित्सा का स्वरूप संकल्प प्रयोगों व इच्छाशक्ति तक ही सिमट गया था। रोगी अभी भी ठीक होते थे। उनकी संख्या भी पहले से अनेकों गुना बढ़ गयी थी। किन्तु अब प्रयोग- प्रक्रियाएँ बदली हुई थी। अब इन अनेकों के लिए उनका संकल्प ही पर्याप्त था।
जीवन के अन्तिम वर्षों में उनकी दृष्टि भविष्य की ओर थी। सन् १९८९ में जाड़ों में जब वह अपने कमरे के बगल वाले आंगन में पलंग पर बैठे हुए थे। उन्होंने पास बैठे हुए अपने शिष्यों से पूछा- क्यों जी मेरे जाने के बाद तुम लोग आने वालों का किस तरह कल्याण करोगे? उत्तर में सन्नाटा छाया रहा। कोई कुछ न बोला। तब वह स्वयं बोले, देखो देह छोड़ने के बाद भी मेरी चेतना हमेशा ही शान्तिकुञ्ज परिसर में व्याप्त रहेगी। भविष्य में जो लोग यहाँ आएँ उनसे कहना कि गुरुदेव ने केवल शरीर छोड़ा है, वे कहीं गए नहीं हैं, यहीं पर हैं। उनका तप प्राण यहाँ के कण- कण में व्याप्त है। तुम लोग इसे अपने मन, प्राण में अनुभव करो। और जितने समय यहाँ रहो, यह सोचो कि मैं अपने रोम- रोम से प्रत्येक श्वास से गुरुदेव के तप प्राण को धारण कर रहा हूँ। इससे उनकी सभी तरह की चिकित्सा हो जाएगी। गुरुदेव के द्वारा कहा हुआ यह सच आज भी प्रामाणित हो रहा है। उन्होंने आध्यात्मिक चिकित्सा का जो प्रवर्तन किया आज उसे विश्वदृष्टि में मान्यता मिल रही है।
.... क्रमशः जारी
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👉 आलस्य एक प्रकार की आत्म-हत्या ही है (भाग ३)
आलसी का हठ रहता है कि शरीर उसका अपना है। मान लो उसका है तब भी तो उसे नष्ट करने का अधिकार उसे नहीं हो सकता है। शरीर उसका है तो शरीर जन्य सन्तानें भी तो उसकी ही होती हैं और उनका भी उसके शरीर पर कुछ अधिकार होता है। शरीर नष्ट कर वह उनके शरीर का हनन तो नहीं कर सकता। शरीर से उपार्जन होता है और उपार्जन से बच्चों का पालन-पोषण। शिथिल एवं अशक्त शरीर आलसी उपार्जन से ऐसे घबराता है जैसे भेड़ भेड़िये से दूर भागती है। धन तो परिश्रम का मीठा फल है आलसी जिसे लाकर परिवार को नहीं दे पाता और रो-झींक कर, मर-खप कर विवश हो कर लाता भी है वह अपर्याप्त तो होता ही है साथ ही उसकी कुढ़न उसके साथ जुड़ी रहती है जो कि बच्चों के संस्कारों एवं शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालती है। इस प्रकार आलसी बच्चों का पालन करने के स्थान पर परोक्ष रूप से उनका भावनात्मक हनन ही किया करता है, जो एक अक्षम्य अपराध तथा पाप है। यदि बच्चों का सम्बन्ध न भी जोड़ा जाये तो भी अपने कर्मों से शरीर का सत्यानाश करना आत्महत्या के समान है जो उसी तरह पाप ही माना जायेगा।
आलस्य के कुठार द्वारा कल्पवृक्ष के समान उस शरीर की जड़ काटते रहना, उसकी शक्ति , क्षमताओं एवं योग्यताओं को नष्ट करते रहना पाप ही है जो मानव के महान से महान मनोरथों को चूर कर सकता है। शक्ति , सम्पन्नता, गौरव, ज्ञान, मान, प्रतिष्ठा, यश, कीर्ति आदि ऐसी कौन-सी समृद्धि अथवा ऐश्वर्य है जो शरीररूपी देवता को प्रसन्न करने पर नहीं मिल सकता। ऐसा कौन-सा पुण्य-परमार्थ है जो आत्मा की मुक्ति में सहायक हो और शरीर द्वारा सम्पन्न न किया जा सकता हो। मनुष्य श्रम-साधना द्वारा इस पंच-तात्विक देवता को प्रसन्न करने, समृद्धिय पाने, पुण्य-परमार्थ करके आत्मा को मुक्त करने के लिए है, वचन-बाध्य है। “मैं नहीं चाहता”—कहकर मनुष्य इस उद्देश्य से मुक्त नहीं हो सकता।
उसका जन्म, उसकी नियुक्ति इस कर्तव्य के लिये ही की गई है और उसने जीवन-लाभ के लिए सर्व समर्थ को यह वचन दिया था कि वह उसके दिये जीवन को सुन्दर एवं समृद्ध बनाकर संसार की शोभा बढ़ायेगा और उसके आत्मा रूपी प्रकाश की किरणें आवरण से मुक्त कर उसमें ही मिला देने की लिए किसी परिश्रम, पुरुषार्थ तथा परमार्थ से विमुख न होगा। परमात्मा ने उसके इसी वचन पर विश्वास करके उसे सृष्टि की सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। बल, बुद्धि एवं विवेक सब योग्य बना दिया। अब वचन से फिरकर कर्तव्य से विमुख हो जाना कहाँ तक उचित है? यह भयंकर पाप है, विश्वासघात के समान ही पाप है और आलसी इस पाप को जान-बूझकर किया करता है। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी और जीव-जगत का राजा है। संसार की व्यवस्था एवं सुन्दरता का भार उसके परिश्रम एवं पुरुषार्थ पर निर्भर है। किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह उत्तरदायित्व से फिरकर आलस्य, प्रमाद अथवा निष्क्रियता द्वारा पृथ्वी का भार बने और उसे असुन्दर, अव्यवस्थित, अशाँत अथवा असुखकर बनाने की दुरभिसन्धि किया करे। आलसी एवं अकर्मण्य लोग निश्चय ही यह अपराध किया करते हैं जबकि उन्हें अपना सुधार कर ऐसा नहीं करना चाहिए। उनकी यह दुष्प्रवृत्ति अपरिमार्जन किसी प्रकार भी शोभनीय अथवा वाँछनीय नहीं है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.24
आलस्य के कुठार द्वारा कल्पवृक्ष के समान उस शरीर की जड़ काटते रहना, उसकी शक्ति , क्षमताओं एवं योग्यताओं को नष्ट करते रहना पाप ही है जो मानव के महान से महान मनोरथों को चूर कर सकता है। शक्ति , सम्पन्नता, गौरव, ज्ञान, मान, प्रतिष्ठा, यश, कीर्ति आदि ऐसी कौन-सी समृद्धि अथवा ऐश्वर्य है जो शरीररूपी देवता को प्रसन्न करने पर नहीं मिल सकता। ऐसा कौन-सा पुण्य-परमार्थ है जो आत्मा की मुक्ति में सहायक हो और शरीर द्वारा सम्पन्न न किया जा सकता हो। मनुष्य श्रम-साधना द्वारा इस पंच-तात्विक देवता को प्रसन्न करने, समृद्धिय पाने, पुण्य-परमार्थ करके आत्मा को मुक्त करने के लिए है, वचन-बाध्य है। “मैं नहीं चाहता”—कहकर मनुष्य इस उद्देश्य से मुक्त नहीं हो सकता।
उसका जन्म, उसकी नियुक्ति इस कर्तव्य के लिये ही की गई है और उसने जीवन-लाभ के लिए सर्व समर्थ को यह वचन दिया था कि वह उसके दिये जीवन को सुन्दर एवं समृद्ध बनाकर संसार की शोभा बढ़ायेगा और उसके आत्मा रूपी प्रकाश की किरणें आवरण से मुक्त कर उसमें ही मिला देने की लिए किसी परिश्रम, पुरुषार्थ तथा परमार्थ से विमुख न होगा। परमात्मा ने उसके इसी वचन पर विश्वास करके उसे सृष्टि की सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। बल, बुद्धि एवं विवेक सब योग्य बना दिया। अब वचन से फिरकर कर्तव्य से विमुख हो जाना कहाँ तक उचित है? यह भयंकर पाप है, विश्वासघात के समान ही पाप है और आलसी इस पाप को जान-बूझकर किया करता है। मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी और जीव-जगत का राजा है। संसार की व्यवस्था एवं सुन्दरता का भार उसके परिश्रम एवं पुरुषार्थ पर निर्भर है। किसी को कोई अधिकार नहीं कि वह उत्तरदायित्व से फिरकर आलस्य, प्रमाद अथवा निष्क्रियता द्वारा पृथ्वी का भार बने और उसे असुन्दर, अव्यवस्थित, अशाँत अथवा असुखकर बनाने की दुरभिसन्धि किया करे। आलसी एवं अकर्मण्य लोग निश्चय ही यह अपराध किया करते हैं जबकि उन्हें अपना सुधार कर ऐसा नहीं करना चाहिए। उनकी यह दुष्प्रवृत्ति अपरिमार्जन किसी प्रकार भी शोभनीय अथवा वाँछनीय नहीं है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1966 पृष्ठ 24
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/November/v1.24
👉 गुरुवर की वाणी
★ गायत्री परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता का लबादा झटककर महानता का परिधान पहना दिया था। इस काया कल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के परामर्शों—आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा।
(हमारी वसीयत और विरासत-174)
◆ इस समय जो भगवान के भक्त हैं, जिन्हें इस संसार के प्रति दर्द है, उनके नाम हमारा यही सन्देश है कि वे अपने व्यक्तिगत लाभ के कार्यों में कटौती करें एवं भगवान् का काम करने के लिए आगे आएं। अगर इस समय भी आप अपना मतलब सिद्ध करते रहे और मालदार बनते रहे, तो पीछे आपको बहुत पछताना पड़ेगा। अब आपकी इज्जत- आपकी इज्जत नहीं, हमारी इज्जत है। हमारी और मिशन की इज्जत की रक्षा करना अब आपका काम है।
(गुरु पूर्णिमा संदेश-1980)
■ भगवान् कृष्ण ने महाभारत के उपरान्त राजसूय यज्ञ में आग्रहपूर्वक आगन्तुकों के पैर धोने का काम अपने जिम्मे लिया था और सज्जनोचित विनम्रता का परिचय दिया था। गांधीजी कांग्रेस के पदाधिकारी नहीं रहे, किन्तु फिर भी सबसे अधिक सेवा करने और मान पाने में समर्थ हुए। चाणक्य झोपड़ी में रहते थे, ताकि राजमद उनके ऊपर न चढ़े और किसी साथी के मन में प्रधानमन्त्री का ठाट-बाट देखकर वैसी ही ललक न उठे। राजा जनक हल जोतते थे। बादशाह नसीरुद्दीन टोपी सीकर गुजारा करते थे। यह वे उदाहरण हैं जिनसे साथियों को अधिक विनम्र और संयमी बनने की प्रेरणा मिलती है।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन स्वरूप-32)
★ हनुमान ने कितनी उपासना की थी, नल-नील, जामवन्त, अर्जुन ने कितनी पूजा एवं तीर्थयात्रा की थी? यह हम नहीं कह सकते, परन्तु उन्होंने भगवान् का काम किया था। ये लोग घाटे में नहीं रहे। इस समय महाकाल कुछ गलाई-ढलाई करने जा रहे हैं। अब नये व्यक्ति, नयी परम्पराएं, नये चिन्तन उभरकर आयेंगे। अगले दिनों यह सोचकर अचम्भा करेंगे कितने कम समय में इतना परिवर्तन कैसे हो गया। अगर हम समय को पहचान पाये तो आप सच्चे अर्थों में भाग्यवान बन सकते हैं।
(गुरु पूर्णिमा संदेश-1980)
(हमारी वसीयत और विरासत-174)
◆ इस समय जो भगवान के भक्त हैं, जिन्हें इस संसार के प्रति दर्द है, उनके नाम हमारा यही सन्देश है कि वे अपने व्यक्तिगत लाभ के कार्यों में कटौती करें एवं भगवान् का काम करने के लिए आगे आएं। अगर इस समय भी आप अपना मतलब सिद्ध करते रहे और मालदार बनते रहे, तो पीछे आपको बहुत पछताना पड़ेगा। अब आपकी इज्जत- आपकी इज्जत नहीं, हमारी इज्जत है। हमारी और मिशन की इज्जत की रक्षा करना अब आपका काम है।
(गुरु पूर्णिमा संदेश-1980)
■ भगवान् कृष्ण ने महाभारत के उपरान्त राजसूय यज्ञ में आग्रहपूर्वक आगन्तुकों के पैर धोने का काम अपने जिम्मे लिया था और सज्जनोचित विनम्रता का परिचय दिया था। गांधीजी कांग्रेस के पदाधिकारी नहीं रहे, किन्तु फिर भी सबसे अधिक सेवा करने और मान पाने में समर्थ हुए। चाणक्य झोपड़ी में रहते थे, ताकि राजमद उनके ऊपर न चढ़े और किसी साथी के मन में प्रधानमन्त्री का ठाट-बाट देखकर वैसी ही ललक न उठे। राजा जनक हल जोतते थे। बादशाह नसीरुद्दीन टोपी सीकर गुजारा करते थे। यह वे उदाहरण हैं जिनसे साथियों को अधिक विनम्र और संयमी बनने की प्रेरणा मिलती है।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन स्वरूप-32)
★ हनुमान ने कितनी उपासना की थी, नल-नील, जामवन्त, अर्जुन ने कितनी पूजा एवं तीर्थयात्रा की थी? यह हम नहीं कह सकते, परन्तु उन्होंने भगवान् का काम किया था। ये लोग घाटे में नहीं रहे। इस समय महाकाल कुछ गलाई-ढलाई करने जा रहे हैं। अब नये व्यक्ति, नयी परम्पराएं, नये चिन्तन उभरकर आयेंगे। अगले दिनों यह सोचकर अचम्भा करेंगे कितने कम समय में इतना परिवर्तन कैसे हो गया। अगर हम समय को पहचान पाये तो आप सच्चे अर्थों में भाग्यवान बन सकते हैं।
(गुरु पूर्णिमा संदेश-1980)
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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026
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