शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

👉 गुरुवर की वाणी

★ छोटे-छोटे मकान, पुलों को मामूली ओवरसियर बना लेते हैं, पर जब बड़ा बांध बनाना होता है तो बड़े इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। मेजर आपरेशन छोटे अनुभवहीन डॉक्टरों के बस की बात नहीं। उसे सिद्धहस्त सर्जन ही करते हैं। समाज में मामूली गड़बड़ियां तो बार-बार होती, उठती रहती है। उनका सुधार कार्य सामान्य स्तर के सुधार ही कर लेते हैं, जब पाप अपनी सीमा का उल्लंघन कर देता है, मर्यादाएं टूटने लगती हैं, तो महासुधारक की आवश्यकता होती है, तब इस कार्य को महाकाल स्वयं करते हैं।
(प्रज्ञा अभियान-1983, जून)

◆ आज आदर्शवादिता कहने-सुनने भर की वस्तु रह गई है। उसका उपयोग कथा, प्रवचनों और स्वाध्याय-सत्संगों तक ही सीमित है। आदर्शों की दुहाई देने और प्रचलनों की लकीर पीटने से कुछ बनता नहीं। इन दिनों वैसा ही हो रहा है। अस्तु, दीपक तले अंधेरा होने जैसी उपहासास्पद स्थिति बन रही है। आवश्यकता इस बात की है कि सांस्कृतिक आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में प्रवेश मिले। हम ऋषि परम्परा के अनुगामी हैं, उन नर वीरों की संतानें हैं, यह ध्यान में रखते हुए आदर्शों की प्रवंचना से बचा ही जाना चाहिए।
(वाङ्मय क्रमांक- 35, पेज-1.12)

■ इन दिनों सामाजिक प्रचलनों में अनैतिकता, मूढ़ मान्यता और अवांछनीयता की भरमार है। हमें उलटे को उलटा करके सीधा करने की नीति अपनानी चाहिए। इसके लिए नैतिक, बौद्धिक और समाजिक क्रान्ति आवश्यक अनुभव करें और उसे पूरा करने में कुछ उठा न रखें। आत्म-सुधार में तपस्वी, परिवार निर्माण में मनस्वी और समाज निर्माण में तेजस्वी की भूमिका निबाहें। अनीति के वातावरण में मूक-दर्शक बनकर न रहें। शौर्य, साहस के धनी बनें और अनीति उन्मूलन तथा उत्कृष्टता अभिवर्धन में प्रखर पराक्रम का परिचय दें।
(प्रज्ञा अभियान का दर्शन, स्वरूप-40)

★ 20 वीं सदी का अंत और 21 वीं सदी का आरम्भ युग सन्धि का ऐसा अवसर है, जिसे अभूतपूर्व कहा जा सकता है। शायद भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति कभी न हो। अपने मतलब से मतलब रखने का आदिमकालीन सोच अब चल न सकेगा। इन दिनों महाविनाश एवं महासृजन आमने-सामने खड़े हैं। इनमें से एक का चयन सामूहिक मानवी चेतना को ही करना पड़ेगा। देखना इतना भर है कि इस परिवर्तन काल में युग शिल्पी की भूमिका संपादन के लिए श्रेय कौन पाता है?
(अखण्ड ज्योति-1988, सितम्बर)

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