सोमवार, 26 मार्च 2018

👉 जैसा अन्न वैसा मन!!

🔶 एक साधु ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए जा रहे थे और एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। ग्रामसीमा पर स्थित पहले ही घर में आश्रय मांगा,वहां एक पुरुष था जिसने रात्री विश्राम की अनुमति दे दी। और भोजन के लिये भी कहा। साधु भोजन कर बरामदे में पडी खाट पर सो गया। चौगान में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा बंधा था। साधु सोते हुए उसे निहारने लगा। साधु के मन में दुर्विचार नें डेरा जमाया, ‘यदि यह घोडा मेरा हो जाय तो मेरा ग्रामानुग्राम विचरण सरल हो जाय’। वह सोचने लगा, जब गृहस्वामी सो जायेगा आधी रात को मैं घोडा लेकर चुपके से चल पडुंगा। कुछ ही समय बाद गृहस्वामी को सोया जानकर, साधु घोडा ले उडा।
              
🔷 कोई एक कोस जाने पर साधु ,पेड से घोडा बांधकर सो गया। प्रातः उठकर  उसने नित्यकर्म निपटाया और वापस घोडे के पास आते हुए उसके विचारों ने फ़िर गति पकडी-‘अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्यों कर सुझी?’ उसने घोडा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा।
             
🔶 उसी घर में पहूँच कर गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोडा लौटा दिया। साधु नें सोचा कल मैने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं?, जिज्ञासा से उसगृहस्वामी  को पूछा- ‘आप काम क्या करते है,आपकी आजिविका क्या है?’ अचकाते हुए गृहस्वामी नें, साधु जानकर सच्चाई बता दी– ‘महात्मा मैं चोर हूँ,और चोरी करके अपना जीवनयापन करता हूँ’। साधु का समाधान हो गया, चोरी से उपार्जित अन्न काआहार पेट में जाते ही उस के मन में कुबुद्धि पैदा हो गई थी। जो प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के निहार हो जाने पर ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

🔷 नीति-अनीति से उपार्जित आहार का प्रभावप्रत्यक्ष था।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 27 March 2018


👉 कहिए कम-करिये ज्यादा (अन्तिम भाग)

🔶 इसे हम बराबर देखते हैं कि केवल बातें बनाने वाला व्यक्ति जनता की नजरों से गिर जाता है। पहले तो उसकी बात का कुछ असर ही नहीं होता। कदाचित उसकी ललित एवं आकर्षक कथन शैली से कोई प्रभावित भी हो जाय तो बाद में अनुभव होने पर वह सब प्रभाव जाता रहता है। वाकशूर के पीछे यदि कर्मवीरता का बल नहीं तो वह पंगु हैं। जो बात कहनी हो उसको पहिले तोलिए फिर बोलिए। शब्दों को बाण की उपमा दी गई। एक बार बाण के छूट जाने पर उसे रोकना बस की बात नहीं। लोहे का बाण तो एक ही जन्म और शरीर को नष्ट करता है पर शब्द बाण तो भविष्य की युग युगीन परम्परा को भी नष्ट कर देता है।

🔷 यह सब ठीक होते हुए भी प्रश्न उठता है कि विश्व में वाकशूर ही क्यों अधिक दिखाई देते हैं। उत्तर स्पष्ट है-बोलना सरल है। इसमें किसी तरह का कष्ट नहीं होता। कार्य करने में कष्ट होता है अपनी रुचि वृत्ति-स्वभाव बुरी आदतों पर अंकुश लगाना पड़ता है। और यह बड़ा कठिन कार्य है इन्द्रियाँ स्वच्छंद हो रही हैं, विषय वासनाओं की ओर लपलपाकर बढ़ना चाहती हैं। इनका दमन किये बिना इच्छित और उपयोगी कार्य नहीं किया जा सकता। कष्ट एवं कठिनता होने पर भी जो हमारे व विश्व के लिये आवश्यक है वह तो करना ही चाहिये। अतः सच्चे कर्म योग का अभ्यास करने की आदत डालना आवश्यक है। अभ्यास ही सिद्धि का मूलमंत्र है।

🔶 कहना हम सब को बहुत आता है। पर करना नहीं आता या चाहते नहीं। केवल दूसरों की आलोचना एवं अपनी बातें बघारना ही हमारा मनसूबा बन गया है। हमारे पांडित्य में परोपदेश और विद्या ‘विवादाय’ चरितार्थ हो रहे हैं। इन्हें हमें आत्मसुधार और विश्व उद्धार में लगाना है। अन्यथा हमारा अध्ययन ‘आप बाबाजी बैंगन खावे औरों को प्रबोध सुनावें’ सा ही रहेगा।

🔷 कई कहते हैं- “हमारी कोई सुनता ही नहीं, कहते-कहते थक गये पर सुनने वाले कोई सुनते नहीं अर्थात् उन पर कुछ असर ही नहीं होता”। मेरी राय में इसमें सुनने वालों से अधिक दोष कहने वालों का है। कहने वाले करना नहीं जानते। वे अपनी ओर देखें। आत्मनिरीक्षण कार्य की शून्यता की साक्षी दे देगा। वचन की सफलता का सारा दारोमदार कर्मशीलता में है। आप चाहे बोलें नहीं, थोड़ा ही बोलें पर कार्य में जुट जाइये। आप थोड़े ही दिनों में देखेंगे कि लोग बिना कहे आपकी ओर खिंचे जा रहे हैं। अतः कहिये कम, करिये अधिक। क्योंकि बोलने का प्रभाव तो क्षणिक होगा पर कार्य का स्थायी होता है। जैन योगी चिदानन्द जी ने क्या ही सुन्दर कहा है-
कथनी कथै कोई। रहणी अति दुर्लभ होई॥

🔶 अन्य कवियों ने भी कहा है-
कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै, विष से अमृत होय।1।

कथनी बदनी छांडी के, करनी सों चितलाय।
नरहिं नीर पिये बिना, करनी प्यास न जाय।2।

करनी बिन  कथनी कथै, अज्ञानी दिन रात।
कूकर ज्यों भूँसत, फिरै, सुनी सुनाई बात।3।

📖 अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 16

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/June/v1.16

👉 Service is Superior to Worship

🔶 A monk had two disciples. Both were totally dedicated worshippers of God. After the worship they used to help their Guru in treating the patients who visited their monastery.

🔷 One day, a patient arrived in the early morning. It was the time of worship. The monk called for his disciples for attending to the patient. The disciples replied, "Our worship is still not complete. We will come after sometime." But, the monk called them again. This time, they did come grumbling about the incomplete worship. The monk said very seriously, "I have called you to serve this suffering man. Prayers can be performed even by the angels, but only men can help other men in need. Service has higher priority over worship, since angels can not perform service." The two disciples were ashamed of their behavior and from that day they gave higher priority to service over worship."
                                       
📖 From Pragya Puran

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 6)

🔶 आप यहाँ रहिए, हम आपको पका देते हैं। आप आये थे, तब कच्चे बर्तन के रूप में थे और आप जब जाना तब हमारे अवे में पके हुए होकर जाना। मुर्गी अपने बच्चे को छाती से लगाये हुए बैठी रहती है, कछुवी अपने अण्डे को बालू में रख देती है; लेकिन देख−भाल करती रहती है। हम आपको कछुए के अण्डे की तरह कोठरी में बिठा तो गये हैं; पर आप यह मत सोचिए कि हम आपकी तरफ गौर नहीं करते और ध्यान नहीं देते। हम बराबर आपकी तरफ ध्यान दे रहे हैं। किस बात पर ध्यान दे रहे हैं? कि आपका मनःसंस्थान ऊँचा हो जाए, आपकी भावनाओं का स्तर ऊँचा हो जाए, आपके जीवन का लक्ष्य ऊँचा हो जाए, जिससे आपके व्यक्तित्व की गरिमा आगे बढ़ती हुई चली जाए।

🔷 हम केवल यही विचार करते हैं और कुछ विचार नहीं करते—आप सुन सकते हो, तो सुन लेना; नहीं सुन सकते, तो आप फिर हैं ही चिकने घड़ों की तरह; वैसे ही बने रहना, जैसे आए थे, वैसे ही चले जाना। मुर्गी अपने अण्डे को पकाने के लिए छाती से लगाये बैठी रहती है और आपको भी हम मुर्गी की तरह छाती से लगाये हुए हैं कि जब आप पकें, जब आप फूटें और जब आप फुदकना शुरू करें, चूजे की तरह, तो आपका बहुत शानदार जीवन होगा—हमारी भी महत्त्वाकांक्षा यही है। आप भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी तरह गला पाएँ, तो मजा आ जाए! यहाँ क्या-क्या काम कराये जाते हैं? कई चीजें कराई जाती हैं—संयम करा रहे हैं, वास्तविक बात यह है।

🔶 आपको हमने कितनी बार कहा है कि आप आहार के बारे में संयम कीजिए और न सिर्फ आहार के बारे में, बल्कि विचारों के भी बारे में और न सिर्फ विचारों के बारे में, बल्कि उनके व्यवहार के बारे में भी। आपसे चार तपों का जिक्र किया था न, आपको चार तप यहाँ बराबर करते रहने चाहिए। धन के बारे में रोक है—आपको बाजार जाने की, इधर-उधर घूमने की, सैर-सपाटे करने की, मनसादेवी के पहाड़ पर चढ़ने की। पैसा खराब करने पर हमने रोक लगा दी है। जो पैसा आपको, निरन्तर जीवन के लिए नितान्त आवश्यक नहीं है, उसको खर्च मत कीजिए। कंजूसी करें, जमा करें। ना बाबा! कंजूसी के लिए कौन कहता है आपसे? अच्छे काम के लिए कोई खर्च नहीं है क्या? आप फिजूलखर्च जरा भी मत कीजिए और जो कुछ भी आपके पास धन है, उसको लगा दीजिए अच्छे कामों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 73)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔶 ऐसे ही एक सिद्ध तपस्वी हुए हैं— बाबा माधवदास। गंगा किनारे बसे गाँव वेणुपुर में उन्होंने गहन साधना की। गाँव वाले उनके बारे में बस इतना बता पाते हैं कि बाबा जब गाँव में आए थे, तब उनकी आयु लगभग ४० साल की रही होगी। सामान के नाम पर उनके पास कुछ खास था नहीं। बस आए और गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे जम गए। बाद में गाँव वालों ने उनके लिए कुटिया बना दी। बाबा माधवदास की एक ही साधना थी-गुरुभक्ति। इसी ने उन्हें साधना के शिखर तक पहुँचाया था। जब तक उनके गुरुदेव थे, उन्होंने उनकी सेवा की। उनकी आज्ञा का पालन किया। बाद में उनके शरीर छोड़ने पर उन्हीं की आज्ञा से इस गाँव में चले आए।
  
🔷 चर्चा में गाँव वालों को उन्होंने बताया कि उनके गुरुदेव कहा करते थे कि साधु पर भी समाज का ऋण होता है। सो उसे चुकाना चाहिए। क्या ही अच्छा हो कि एक-एक साधु एक-एक गाँव में जाकर ज्ञान की अलख जगाए। गाँव के लोगों को शिक्षा और संस्कार दे। उन्हें आध्यात्मिक जीवन दृष्टि प्रदान करे। अपने गुरु के आदेश  के अनुसार वे सदा इन्हीं कामों में लगे रहते थे। जब गाँव वाले उनसे पूछते कि वह इतना परिश्रम क्यों करते हैं? तो वे कहा करते कि गुरु का आदेश मानना ही उनकी सच्ची सेवा होती है। बस, मैंने सारे जीवन उनके आदेश के अनुसार ही जीने का संकल्प लिया है।
  
🔶 बाबा माधवदास वेणुपुर में लोगों से कहा करते थे, श्रद्धा का मतलब है-समर्पण। यानि कि निमित्त मात्र हो जाना। मन में इस अनुभूति को बसा लेना कि मैं नहीं तू। गुरुभक्ति का मतलब है कि हे गुरुदेव अब मैंने स्वयं को समाप्त कर दिया है, अब तुम आओ और मेरे हृदय में विराजमान हो जाओ। अब मैं वैसे ही जीऊँगा, जैसे कि तुम जिलाओगे। अब मेरी कोई मरजी नहीं, तुम्हारी मरजी ही मेरी मरजी है। माधवदास जैसा कहते थे, वैसा ही उनका जीवन भी था। उनका कहना था कि शिष्य जिस दिन अपने आप को शव बना लेता है, उसी दिन उसके गुरुदेव उसमें प्रवेश कर उसे शिव बना देते हैं।
  
🔷 जिस क्षण शिष्य का अस्तित्व मिट जाता है, उसमें सद्गुरु प्रकट हो जाते हैं। फिर सारी साधनाएँ स्वयं होने लगती हैं। सभी तप स्वयं होने लगते हैं। शिष्य को यह बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि सत्कर्म एक ही है, जिसे हमने न किया हो, बल्कि हमारे माध्यम से स्वयं गुरुदेव ने किया हो। जो भक्ति अहंकार को लेकर बहता है, वह कभी पवित्र नहीं हो सकता। उसके प्रवाह के सान्निध्य में कभी तीर्थ नहीं बन सकते। शिष्य के करने लायक एक ही यज्ञ है- अपने अहं को भस्म कर देना। समझने की बात यह है कि धूप में खड़े होना अथवा भूखे मरने का नाम तपस्या नहीं है, यह तो स्वयं को मिटाने का साहस है। यही तपस्या करना है। शिष्य धर्म को निभाने वाले बाबा माधवदास सारे जीवन यही तप करते रहे। इसी महातप से उनका अस्तित्व जन-जन के लिए वरदान बन गया। पर यदि कोई उनसे उनकी उपलब्धियों की बात करते, तो वे हँस पड़ते और कहते और मैं हूँ ही कहाँ, ये तो गुरुदेव हैं, जो इस शरीर को चला रहे हैं और अपने कर्म कर रहे हैं। इस सत्य के नूतन आयामों को अगले मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 115

👉 आज का सद्चिंतन 26 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 26 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (अन्तिम भाग)

🔷 दहेज की समस्या कोई स्वतंत्र समस्या नहीं, नारी की अयोग्यता की ही समस्या है। दहेज वे लोग माँगते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है। उनका कहना है कि हमारे घर की अच्छी आर्थिक स्थिति का लाभ तुम्हारी लड़की उपयोग करे इसके बदले में हमें दहेज की कीमत मिलनी चाहिए। इस माँग का दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि दहेज का पैसा लड़की की योग्यता बढ़ाने में खर्च कर दिया जाए और उसे किसी गरीब किन्तु योग्य लड़के के साथ ब्याह दिया जाए।

🔶 लड़की अपनी योग्यता से कुछ उपार्जन करके उस लड़के की आय को बढ़ा सकती है और उससे अधिक आनन्द में रह सकती है जितनी किसी अमीर घर में-केवल उन लोगों के अनुग्रह और अपनी दीनता के बल पर सुखी रहती है। यदि लड़कियाँ सुशिक्षित हो जाएं तो माँगने वालों को सौदा पटाने की हिम्मत ही न पड़े। फिर भी यदि दहेज का राक्षस न मरे तो लड़कियाँ अपनी शिक्षा के बल पर आर्थिक स्वावलम्बन प्राप्त करके अविवाहित जीवन भी व्यतीत कर सकती हैं।

🔷 किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया जाए यह नितान्त आवश्यक है कि नारी को वर्तमान दुरावस्था में न पड़ा रहने देकर उसे ऊपर उठाया जाए, आगे बढ़ाया जाए। उसकी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ने से हानि किसी की नहीं, लाभ सभी का है। पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर प्रत्येक क्षेत्र में उसे सहयोग देने वाली नारी, इस वंचित, अशिक्षित, अनुभवहीन, अयोग्य एवं भार रूप नारी की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होगी। विवेक की पुकार यही है कि स्वार्थ और परमार्थ की दृष्टि से, न्याय और कर्त्तव्य की दृष्टि से, नारी के विकास में सहयोग दें- बाधक न बनें

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.29

👉 The Spirituality & its Reality. (Last Part)

🔷 The dirty and dry berries soaked in spittle of a sweeper were eaten by BHAGWAN, why, why he ate those berries? BHAGWAN said, ‘‘I do not eat berry but the soul, the soul and the honesty. The thinking-style, the greatness is the only things I eat. I feel obliged to receive this dose from anyone. I only eat and drink love and love.’’
                                
🔶 Where is love with humans? Soaked in attachments, lust and avarice and where is shame with such humans? Had there been the shame, their souls would have been saturated; they would have been felt coolness, merriment would have taken place in their life. They would have given merriment to others. O helpless! O man engulfed in fire! Where is shame with them? Girls of BRIJ offered one cup of buttermilk to compel KRISHAN to dance over the whole courtyard.
                                         
🔷 Friends! Very this is the story of my life; very this is the spirituality of my life. Very this is how I do my UPASANA. Very this is the impressions of SADHANA. Finished, today’s session.
                                       
===OM SHANTI===

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 5)

🔷 आप एक और अनुभव कर लीजिए कि आप गुरुजी के अवे में बैठे हुए हैं। अवा क्या? कुम्हार अपने बर्तन बनाता है और बर्तन बना करके उन बर्तनों को अवे के भीतर कैद कर देता है। बस, सब बर्तन चुपचाप बैठे रहते हैं और पकते रहते हैं। आप भी चुपचाप बैठे रहिए और पकते रहिए। हम आपको प्रेरणा भेजेंगे, हम आपको विचार भेजेंगे, उसको भी तो सुनिए! बस, अपनी-अपनी ही बकते रहते हैं, हमारी नहीं सुनेंगे क्या? हमारी प्रेरणा पर आप ध्यान नहीं देंगे? हम क्या कहना चाहते हैं, उस पर गौर नहीं करेंगे? उसकी कोई उपयोगिता नहीं है? अपने आपको ही हमारे ऊपर हावी रखेंगे? हमारी मनोकामना पूरी कर दीजिए। ऐसे कौन आपकी मनोकामना पूरी कर देगा, बताइए?

🔶 रावण की मनोकामना पूरी करने में कौन समर्थ हो गया? सिकन्दर की मनोकामना कही पूरी हुई? नेपोलियन बोनापोर्ट की कहीं पूरी हुई? हिरण्यकश्यपु ने अपनी मनोकामना पूरी कर पाई? न कर पाई। आप तो बेकार आदमी हो, बार-बार बच्चों की तरह मनोकामना, मनोकामना माँगते रहते हैं? यहाँ तो आप बड़ों की तरह रवैया अख्यियार कीजिए। बच्चे ही बने रहेंगे जिन्दगी भर बड़े भी होंगे! अगर यहाँ आप बड़े हो गए हैं, तो मनोकामना वाले जंजाल को छोड़ दीजिए। मनोकामना तो भगवान ने आपकी पूरी कर दी है। हाथ-पाँव दिए हैं, आप पेट भर के रोटी कमा सकते हैं। अक्ल भगवान ने दी है आपको, आप तन ढकने के लिए कपड़े या पारिवारिक जो छोटी-मोटी जिम्मेदारियाँ हैं, भली प्रकार पूरी कर सकते हैं। यह कौन-सी मनोकामना है सिवाय हविश के! बताइए?

🔷 हविश के अलावा कोई मनोकामना नहीं है। हविश को आप हल्की नहीं कर सकते। हविश को जिस दिन आप हल्की कर लेंगे, आपकी कोई भी मनोकामना बाकी नहीं रह जाएगी, यह आप देखेंगे कि आप कितने खुश और प्रसन्न रह सकते हैं। इसलिए आप इस डायन को मार भगाइये न? दुनिया भर का माँगते फिरते हैं—नाक रगड़ते-फिरते हैं—वासनाओं के लिए, तृष्णाओं के लिए, अहंकार के लिए। इसके आगे पल्ला पसारना, उसके आगे पल्ला पसारना, इसके आगे नाक रगड़ना, उसके आगे नाक रगड़ना। आप अपने आप में हेर-फेर कीजिए, अपने आप में हेर-फेर करेंगे, तो आपको इस कायाकल्प-शिविर में आने का मानसिक लाभ मिल जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 72)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔷 ध्यान की इस पवित्र प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा से कहते हैं-

आनन्दमानन्दकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधयुक्तम्। योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद््गुरुंनित्यमहम् नमामि॥९३
यस्मिन् सृष्टिस्थितिध्वंसनिग्रहानुग्रहात्मकम्। कृत्यं पञ्चविधं शश्वद्भासते तं नमाम्यहम्॥ ९४॥
प्रातः शिरसि शुक्लाब्जे द्विनेत्रं द्विभुजं गुरुम्।     वराभययुतं शान्तं स्मरेत्तं नामपूर्वकम्॥ ९५॥

🔶 गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। वे शिष्यों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं। वे सदा आत्मबोध में निमग्न रहते हैं। योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं। संसार रूपी रोग के वही एक मात्र वैद्य हैं। मैं उन गुरुदेव का नित्य नमन करता हूँ॥ ९३॥ जिनकी चेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह ये पाँच कार्य सदा होते रहते हैं, उन गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ९४॥ इस भाव से गुरुदेव को नमन करते हुए प्रातःकाल सहस्रारदल कमल में शान्त, वराभय मुद्रा वाले, कृपा-करुणा रूपी दोनों नेत्रों वाले, रक्षण-पोषण रूपी दो भुजाओं वाले गुरुदेव का नाम सहित स्मरण करना चाहिए॥ ९५॥
  
🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु स्मरण एवं उनके ध्यान की महिमा है। गुणों के बिना स्मरण एवं रूप के बिना ध्यान आसान नहीं है। इसलिए शिष्यों को अपने गुरुदेव के नाम का स्मरण उनके गुणों के चिन्तन के साथ करना चाहिए। इसी तरह उन प्रभु का ध्यान उनके स्वरूप को याद करते हुए भक्तिपूर्वक करना चाहिए। शिष्य के जीवन में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए। ऐसा होते रहने पर शिष्य का अस्तित्व स्वयं ही गुरुदेव की चेतना में घुलता रहता है। जिन्होंने ऐसा किया है या फिर कर रहे हैं, वे इससे होने वाली अनुभूतियों व उपलब्धियों के स्वाद से परिचित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 114

शनिवार, 24 मार्च 2018

👉 जटायु व गिलहरी चुप नहीं बैठे

🔶 पंख कटे जटायु को गोद में लेकर भगवान् राम ने उसका अभिषेक आँसुओं से किया। स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए भगवान् राम ने कहा-तात्। तुम जानते थे रावण दुर्द्धर्ष और महाबलवान है, फिर उससे तुमने युद्ध क्यों किया ?

🔷 अपनी आँखों से मोती ढुलकाते हुए जटायु ने गर्वोन्नत वाणी में कहा-' प्रभो! मुझे मृत्यु का भय नहीं है, भय तो तब था जब अन्याय के प्रतिकार की शक्ति नहीं जागती?

🔶 भगवान् राम ने कहा- तात्! तुम धन्य हो! तुम्हारी जैसी संस्कारवान् आत्माओं से संसार को कल्याण का मार्गदर्शन मिलेगा।

🔷 गिलहरी पूँछ में धूल लाती और समुद्र में डाल आती। वानरों ने पूछा-देवि! तुम्हारी पूँछ की मिट्टी से समुद्र का क्या बिगडे़गा। तभी वहाँ पहुँचे भगवान् राम ने उसे अपनी गोद में उठाकर कहा 'एक-एक कण धूल एक-एक बूँद पानी सुखा देने के मर्म को समझो वानरो। यह गिलहरी चिरकाल तक सत्कर्म में सहयोग के प्रतीक रूप में सुपूजित रहेगी। '

🔶 जो सोये रहते हैं वे तो प्रत्यक्ष सौभाग्य सामने आने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। जागृतात्माओं की तुलना में उनका जीवन जीवित-मृतकों के समान ही होता है।

👉 कहिए कम-करिये ज्यादा (भाग 1)

🔶 मानव स्वभाव की एक बड़ी कमजोरी प्रदर्शन प्रियता है। बाहरी दिखावे को वह बहुत ज्यादा पसन्द करता है। यद्यपि वह जानता और मानता है कि मनुष्य की वास्तविक कीमत उसकी कर्मशीलता, कर्मठता है। ठोस और रचनात्मक कार्य ही स्थायी लाभ, प्रतिष्ठा का कारण होता है। दिखावा और वाक शूरता नहीं। यह जानते हुये भी उसे अपनाता नहीं। इसीलिये उसे एक कमजोरी के नाम से सम्बोधित करना पड़ता है।

🔷 प्रकृति ने मनुष्य को कई अंगोपाँग दिये हैं और उनसे उचित काम लेते रहने से ही मनुष्य एवं विश्व की स्थिति रह सकती है। पर मानव स्वभाव कुछ ऐसा बन गया है कि सब अंगों का उपयोग ठीक से न कर केवल वाक्शक्ति का ही अधिक उपयोग करता है। इससे बातें तो बहुत हो जाती हैं, पर तदनुसार कार्य कुछ भी नहीं हो पाता। हो भी कैसे वह करना भी नहीं चाहता और इसीलिये दिनों दिन वाक्शक्ति का प्रभाव क्षीण होता जाता है। कार्य करने वाले को बोलना प्रिय नहीं होता, उसे व्यर्थ की बातें बनाने को अवकाश ही कहाँ होता है? वह तो अपनी वाक्शक्ति का उपयोग आवश्यकता होने पर ही करता है। अधिक बोलने से वाक्शक्ति का महत्व घट जाता है। जिसकी जबान के पीछे धर्म शक्ति का बल होता है उसी का प्रभाव पड़ता है।

🔶 वस्तुतः कार्य करना एक साधना है। इससे साधित वाक्शक्ति मंत्रवत् बलशाली बन जाती है। साधक के प्रत्येक वाक्य में अनुभव एवं कर्म साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।

🔷 वर्तमान युग के महापुरुष महात्मा गाँधी के जबरदस्त प्रभाव का कारण उनका कर्मयोग ही है। वे जो कुछ कहते उसे करके बताते थे। इसी में सचाई का बल रहता है। इस सचाई और कर्मठता के कारण ही गाँधी जी के हजारों लाखों करोड़ों अनुयायी विश्व में फैले हुये हैं। गाँधी जी अपने एक क्षण को भी व्यर्थ न खोकर किसी न किसी कार्य में लगे रहते थे। और आवश्यकता होने पर कार्य की बातें भी कर लेते थे। इसी का प्रभाव है कि बड़े-बड़े विद्वान-बुद्धिमान एवं श्रीमान् उनके भक्त बन गये।

.... क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति-जून 1950 पृष्ठ 15
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/June/v1.15

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 25 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 25 March 2018


👉 नारी को विकसित किया जाना आवश्यक है। (भाग 6)

🔶 हमारा व्यक्तिगत और राष्ट्रीय भविष्य इस बात पर निर्भर है कि भावी पीढ़ियाँ सुसंस्कृत हों। स्कूली शिक्षा से आजीविका उपार्जन करने तथा विविध क्षेत्रों की साधारण जानकारी मिलने की बात पूरी हो सकती है, पर वे सद्गुण जो मानव की प्रधान सम्पत्ति हैं और जिनके ऊपर व्यक्ति तथा राष्ट्र की श्रेष्ठता निर्भर करती है, स्कूलों में नहीं सीखे जा सकते। उनके शिक्षण का सही स्थान है- घर का वातावरण और उसका निर्माण करती है- गृहिणी व्यक्ति और राष्ट्र की उन्नति के लिए हो रहे अनेकों प्रयत्नों में सुगृहिणी निर्माण कार्य अत्यधिक आवश्यक है। उपेक्षा करने पर बड़ी से बड़ी प्रगति भी व्यर्थ सिद्ध होगी। क्योंकि जब आगामी पीढ़ियों का व्यक्तित्व ही विकसित न हो सका तो बढ़ी हुई समृद्धि का भी कुछ लाभ न उठाया जा सकेगा वरन् बन्दर के हाथ में पड़ी हुई तलवार की तरह उसका दुरुपयोग एवं दुष्परिणाम ही हाथ लगेगा।

🔷 56 लाख साधुओं एवं भिखारियों का प्रश्न राष्ट्रीय प्रश्न है। इतने लोगों की उपार्जन क्षमता कुण्ठित पड़ी रहे और उनका निर्वाह भार जनता को वहन करना पड़े तो यह अर्थ संतुलन को बिगाड़ने वाली बात है। उससे भी बढ़कर चिंता की बात यह है कि हमारी आधी आबादी-नारी, कैदियों की भाँति घरों की चार-दीवारी में कलंकियों की तरह मुँह पर पर्दा डाले, घर वालों के लिए एक भार बनी बैठी रहे। इससे भी हमारा पारिवारिक एवं राष्ट्रीय अर्थ तंत्र असंतुलित ही होगा। यदि उनकी सामर्थ्य को विकसित किया जाए तो राष्ट्र के अर्थ तंत्र को समुन्नत बनाने में इतना योग मिल सकता है जितना कितनी ही विशालकाय योजनाएं भी नहीं दे सकती। इस समस्या के सामने भिखारियों की समस्या तुच्छ है। यदि हम नारी के विकास की समस्या को हल कर लें तो भिखारियों से भी अनेकों गुनी समस्या का हल हुआ समझना चाहिए।

🔶 जिन नारियों को हम माता, पत्नी, बहिन या पुत्री के रूप में प्यार करते हैं, जिन्हें सुखी बनाने की कुछ चिन्ता करते हैं उनके लिये रूढ़िवादी मान्यताओं द्वारा हम अपकार भी पूरा-पूरा करते है। किसी स्त्री का जब सूर्य अस्त हो जाता है और घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं होती तो उस बेचारी पर कैसी बीतती है इसे हममें से हर कोई जानता है। पर्दा प्रथा के कारण जो नारी बाजार से साग खरीदकर लाना भी नहीं सीख सकी, किसी के बात करना भी जिसे नहीं आता वह मुसीबत के समय पति या बच्चों के लिये दवा खरीदने या चिकित्सक को बुलाकर लाने में भी समर्थ नहीं हो सकती।

🔷 ऐसी स्त्रियों को जब अपने और अपने बच्चों के गुजारे की समस्या सामने आती है तब आगे केवल अंधकार ही दीखता है। किसी के दरवाजे पर भिखारी की तरह अपमान पूर्वक टुकड़ों से पेट भरते हुए उन्हें जिस व्यथा का सामना करना पड़ता है उसकी कल्पना यदि नारी को बन्धन में रखने वाले करें तो उनकी छाती पसीजे बिना न रहेगी। मानवता का दृष्टिकोण अपनाया जाए तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि नारी का भविष्य अंधेरे में लटकता हुआ छोड़ना अभीष्ट न हो तो उसे स्वावलंबी, अपने पैरों पर खड़ी होने योग्य बनाना ही चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति -दिसंबर 1960 पृष्ठ 28

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/December/v1.28

👉 The Spirituality & its Reality. (Part 3)

🔶 Friends! If I ever help you on any account either of humanity, spirituality or my soul and BHAGWAN, it is not my any favour extended to you, rather it is a favour done to my own soul which continues to complain me, ‘‘O rude man! Give something to this world, don’t eat up things. Avoid getting burdened with debt as here the man has been born only to give other eligible ones.’’
                                       
🔷 Friends! Each of you will land in above position once BHAGWAN comes to you, GAYTARI mantra comes to you. Each of you will land in the same position as that of mine. Whenever RAM will come to you, you will be living a life of HANUMAN; it means attaining a state of mind of HANUMAN implies RAM approaching to you. The day KRISHAN BHAGWAN comes to you; you will be living like ARJUN. If your approach in life is like that of HANUMAN and ARJUN, it can be said that either RAM or KRISHAN is with you.
                                  
🔶 Friends! It is an education of spirituality, of GAYATRI. You will say, ‘‘GURU JI, I came here to learn the magical tricks of GAYATRI mantra and yours’ other accomplishments. BETA!  There is no magic in the world and there is no importance and value of any ritual. Had it not been so, MARA, MARA of dacoit VALMIKI would not have worked; RAM, RAM of SHABRI would not have worked; your chanting of VISHNU SAHASTRNAM would not have gone in vein; your BHAGWAT-PATH( chanting of BHAGWAT) did not work but of SHABRI, her RAM-RAM continued to do miracles.

📖 From Akhand Jyoti

👉 आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 4)

🔶 माघ के महीने में लोग झोंपड़े लगा लेते हैं, उसी में रहते हैं, बाहर-निकलते ही नहीं, बाहर जाते ही नहीं, घर वालों को बुलाते ही नहीं। घरवाला अगर कोई आता है, तो सिर्फ खुशी के समाचार ही सुनाता है। कोई जरूरत की बात कहने आता है; पर यह नहीं कहने आता कि घर में यह आफत आ रही है कि वह आफत आ रही है। उनके चित्त में चंचलता उत्पन्न न हो, इसलिए वह लोग चिट्ठी-पत्री पर भी रोकथाम रखते हैं। हमारे पास चिट्ठी-पत्री मत भेजना, हमको एक महीने भगवान का नाम लेने देना, चिट्ठी-पत्री भेजकर, हम जो काम नहीं कर सकते हैं, उस काम के लिए हम पर दबाव मत डालना, न हम इधर के रहेंगे, न हम उधर के रहेंगे—न हम भगवान में ध्यान लगा सकेंगे, न घर की कोई सहायता कर सकेंगे। आप डावाँडोल स्थिति को मत रहने दीजिए। कल्प-साधना वालों का यह नियम है। आप भी इन नियमों का पालन कीजिए और अनुभव कीजिए कि हम एकान्तवास में हैं।

🔷 एक दिन मैंने आपसे पिछले समय में कहा भी है कि एक महीने आप यहाँ सिर्फ दो बातों का अनुभव किया कीजिए कि हम यहाँ न सिर्फ एकान्त में रहते हैं, बल्कि माताजी के पेट में निवास करते हैं। आप शान्तिकुञ्ज को यह मानकर चलिए कि यह माताजी का पेट है और पेट में जैसे बच्चा रहता है, भ्रूण रहता है, उसी तरह, भ्रूण की तरह, बच्चे की तरह आप निवास करिए। यह माताजी का आध्यात्मिक पेट है, जिसमें आप बच्चे की तरह निवास कर सकते हैं और यहाँ से जाने के बाद में आप अपने आपके एक नये जन्म का अनुभव कर सकते हैं। माताजी का बेटा—माताजी का बेटा आप नहीं बन सकते? क्या हर्ज है, आपको, बताइए?

🔶 मदालसा के बेटे आप नहीं बन सकते? कुन्ती के बेटे बनने में आपको शर्म आती है, बताइए? सीता के बेटे अगर आप बन जाएँ, तो क्या हर्ज है आपको? नहीं, कुछ हर्ज नहीं होगा आपका। आप अगर ऐसी मनःस्थिति बना लें, तो आपको अपनी गौरव-गरिमा का भान होगा और गौरव-गरिमा का आपको कदाचित् भान हो जाए, तो आप यकीन रखिए, आपका कल्प-साधना में आना सार्थक हो जाएगा। फिर आप ऐसी दिशा, ऐसी प्रेरणा और ऐसा चिन्तन लेकर जाएँगे कि मजा आ जाएगा! इसलिए आप यह अनुभव करते रहिए कि एक महीने तक हम माताजी के पेट में बैठे हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan14 Sep 2026

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