सोमवार, 26 मार्च 2018

👉 गुरुगीता (भाग 72)

👉 एक ही यज्ञ-अहं को भस्म कर देना
  
🔷 ध्यान की इस पवित्र प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माता जगदम्बा से कहते हैं-

आनन्दमानन्दकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधयुक्तम्। योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद््गुरुंनित्यमहम् नमामि॥९३
यस्मिन् सृष्टिस्थितिध्वंसनिग्रहानुग्रहात्मकम्। कृत्यं पञ्चविधं शश्वद्भासते तं नमाम्यहम्॥ ९४॥
प्रातः शिरसि शुक्लाब्जे द्विनेत्रं द्विभुजं गुरुम्।     वराभययुतं शान्तं स्मरेत्तं नामपूर्वकम्॥ ९५॥

🔶 गुरुदेव आनन्दमय रूप हैं। वे शिष्यों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं। वे प्रभु प्रसन्नमुख एवं ज्ञानमय हैं। वे सदा आत्मबोध में निमग्न रहते हैं। योगीजन सदा उनकी स्तुति करते हैं। संसार रूपी रोग के वही एक मात्र वैद्य हैं। मैं उन गुरुदेव का नित्य नमन करता हूँ॥ ९३॥ जिनकी चेतना में उत्पत्ति, स्थिति, ध्वंस, निग्रह एवं अनुग्रह ये पाँच कार्य सदा होते रहते हैं, उन गुरुदेव को मेरा नमन है॥ ९४॥ इस भाव से गुरुदेव को नमन करते हुए प्रातःकाल सहस्रारदल कमल में शान्त, वराभय मुद्रा वाले, कृपा-करुणा रूपी दोनों नेत्रों वाले, रक्षण-पोषण रूपी दो भुजाओं वाले गुरुदेव का नाम सहित स्मरण करना चाहिए॥ ९५॥
  
🔷 गुरुगीता के इन मंत्रों में सद्गुरु स्मरण एवं उनके ध्यान की महिमा है। गुणों के बिना स्मरण एवं रूप के बिना ध्यान आसान नहीं है। इसलिए शिष्यों को अपने गुरुदेव के नाम का स्मरण उनके गुणों के चिन्तन के साथ करना चाहिए। इसी तरह उन प्रभु का ध्यान उनके स्वरूप को याद करते हुए भक्तिपूर्वक करना चाहिए। शिष्य के जीवन में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहनी चाहिए। ऐसा होते रहने पर शिष्य का अस्तित्व स्वयं ही गुरुदेव की चेतना में घुलता रहता है। जिन्होंने ऐसा किया है या फिर कर रहे हैं, वे इससे होने वाली अनुभूतियों व उपलब्धियों के स्वाद से परिचित हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 114

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