सोमवार, 11 दिसंबर 2017

👉 लक्ष्मीजी का निवास

🔶 एक बूढे सेठ थे। वे खानदानी रईस थे, धन-ऐश्वर्य प्रचुर मात्रा में था परंतु लक्ष्मीजी का तो है चंचल स्वभाव। आज यहाँ तो कल वहाँ!!

🔷 सेठ ने एक रात को स्वप्न में देखा कि एक स्त्री उनके घर के दरवाजे से निकलकर बाहर जा रही है।

🔶 उन्होंने पूछा : ‘‘हे देवी आप कौन हैं ? मेरे घर में आप कब आयीं और मेरा घर छोडकर आप क्यों और कहाँ जा रही हैं?

🔷 वह स्त्री बोली : ‘‘मैं तुम्हारे घर की वैभव लक्ष्मी हूँ। कई पीढयों से मैं यहाँ निवास कर रही हूँ किन्तु अब मेरा समय यहाँ पर समाप्त हो गया है इसलिए मैं यह घर छोडकर जा रही हूँ। मैं तुम पर अत्यंत प्रसन्न हूँ क्योंकि जितना समय मैं तुम्हारे पास रही, तुमने मेरा सदुपयोग किया। संतों को घर पर आमंत्रित करके उनकी सेवा की, गरीबों को भोजन कराया, धर्मार्थ कुएँ-तालाब बनवाये, गौशाला व प्याऊ बनवायी। तुमने लोक-कल्याण के कई कार्य किये। अब जाते समय मैं तुम्हें वरदान देना चाहती हूँ। जो चाहे मुझसे माँग लो।

🔶 सेठ ने कहा : ‘‘मेरी चार बहुएँ है, मैं उनसे सलाह-मशवरा करके आपको बताऊँगा। आप कृपया कल रात को पधारें।

🔷 सेठ ने चारों बहुओं की सलाह ली। उनमें से एक ने अन्न के गोदाम तो दूसरी ने सोने-चाँदी से तिजोरियाँ भरवाने के लिए कहा।

🔶 किन्तु सबसे छोटी बहू धार्मिक कुटुंब से आयी थी। बचपन से ही सत्संग में जाया करती थी।

🔷 उसने कहा : ‘‘पिताजी! लक्ष्मीजी को जाना है तो जायेंगी ही और जो भी वस्तुएँ हम उनसे माँगेंगे वे भी सदा नहीं टिकेंगी। यदि सोने-चाँदी, रुपये-पैसों के ढेर माँगेगें तो हमारी आनेवाली पीढी के बच्चे अहंकार और आलस में अपना जीवन बिगाड देंगे। इसलिए आप लक्ष्मीजी से कहना कि वे जाना चाहती हैं तो अवश्य जायें किन्तु हमें यह वरदान दें कि हमारे घर में सज्जनों की सेवा-पूजा, हरि-कथा सदा होती रहे तथा हमारे परिवार के सदस्यों में आपसी प्रेम बना रहे क्योंकि परिवार में प्रेम होगा तो विपत्ति के दिन भी आसानी से कट जायेंगे।

🔶 दूसरे दिन रात को लक्ष्मीजी ने स्वप्न में आकर सेठ से पूछा : ‘‘तुमने अपनी बहुओं से सलाह-मशवरा कर लिया? क्या चाहिए तुम्हें?

🔷 सेठ ने कहा : ‘‘हे माँ लक्ष्मी! आपको जाना है तो प्रसन्नता से जाइये परंतु मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे घर में हरि-कथा तथा संतो की सेवा होती रहे तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रेम बना रहे।

🔶 यह सुनकर लक्ष्मीजी चौंक गयीं और बोलीं : ‘‘यह तुमने क्या माँग लिया। जिस घर में हरि-कथा और संतो की सेवा होती हो तथा परिवार के सदस्यों में परस्पर प्रीति रहे वहाँ तो साक्षात् नारायण का निवास होता है और जहाँ नारायण रहते हैं वहाँ मैं तो उनके चरण पलोटती (दबाती) हूँ और मैं चाहकर भी उस घर को छोडकर नहीं जा सकती। यह वरदान माँगकर तुमने मुझे यहाँ रहने के लिए विवश कर दिया है.!

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 Dec 2017


👉 The Art Of Living

🔶 We may look at it either from philosophical viewpoint or from a scientific one, human life is accepted as a most valuable possession. Physical, mental and spiritual fields are full of such miraculous capacities that they can not even be imagined by an ordinary intellect. If we can acquire the knowledge of developing them and inculcate the attitude of putting them to proper use, life can be full of heaps of mundane and divine acquisitions.

🔷 Man has been bestowed with not only human but also godly means of leading his life. Inspite of this, he has to lead a miserable animal like life because he neither pays any attention to fundamental principles which make life full and vital nor put them into practice. Knowledge of leading life properly and artistically is called the ‘art of living’.

🔶 Proper planning of life makes it attractive & beautiful, where as its maladjustment makes it ugly & unprofitable. Gods are beautiful, pure and systematic. Evil spirits are frightful & unsystematic. Man acquires godly status by accomplishment of life whereas he reaches devilish state by ignoring it. Godly spirits produce happiness, contentment & evil spirits always raise fresh problems.

🔷 The art of living consists in making one’s personality pure and beautiful by solving the problems of life & decorating it with desired accquisitions. Constant practice of adopting this art in practical life is called accomphishment of life. Devotion is the means by adopting which the ugliest becomes most beautiful & attractive.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (अन्तिम भाग)

🔶 आध्यात्मिक अनुभूतियों से प्राप्त सुख ही जीवन का सच्चा सुख है। दयावान् व्यक्ति दूसरों के दुःख दूर करने में अलौकिक सुख का आनन्द लूटते हैं। असहाय व्यक्तियों की सहायता करने वाले शक्तिमान् व्यक्ति परमात्मा का ध्यान-सान्निध्य प्राप्त करने वाले योगी की ही तरह जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करते हैं। जो इस जीवन में ऐसा सुख प्राप्त कर सका वह परलोक में भी सुख प्राप्त करेगा, ऐसा मानना चाहिए। कई लोगों की यह मान्यता है कि जितना यहां कष्ट भोग लें उतना ही स्वर्ग में सुख मिलता है। यह भावना नितान्त भ्रामक है। परलोक में स्वर्ग और मुक्ति का आधार यह है कि मनुष्य इस जीवन में भी सच्चा सुख—आध्यात्मिक सुख—प्राप्त करें। स्वर्ग की सद्गति उन्हें ही मिलती है जो उसे प्राप्त कर लेते हैं।
   
🔷 यहां यह समझ लेना नितान्त आवश्यक है कि सुख, चित्त का वह भाव है जो मनुष्य के हृदय में उसकी अभिलाषाओं के पूरा होने से या जिस कार्य में वह लगा हो उसमें सफलता प्राप्त कर लेने या उद्देश्य की सफलता से उत्पन्न होता है। गणितज्ञ को सच्चा सुख किसी प्रमेय या साध्य को हल करने में मिलता है। अनुसन्धान कर्त्ताओं को सबसे बड़ी प्रसन्नता उस समय मिलती है जब वह कोई नया आविष्कार करता है। अपने विषय की सफलता को ही जीवन का सुख कह सकते हैं।

 🔶 आत्मा का विषय है—आनन्द की प्राप्ति। मानव-जीवन का उद्देश्य भी यही है। यह सुख अपने जीवन को समष्टि में घुलाने से होता है। सबके हित में अपना हित समाहित कर देने से जिस दिव्य-ज्योति के दर्शन होते हैं आत्मा को उससे बड़ा सुख अन्यत्र नहीं मिलता। इसलिये आध्यात्मिक-जीवन सुखों का मूल कहकर पुकारा गया है। लौकिक कामनाओं की पूर्ति से आंशिक सुख मिलता है। किन्तु सबके कल्याण की भावना से सर्वाङ्गपूर्ण सुख की अनुभूति होती है।

🔷 शास्त्रकार का कथन है:—

अपहृत्यार्तिमार्तानाम् सुखं यदुपजायते । तस्य स्वर्गोपवर्गो वा कलां नहित षोडशीम् ।।
अर्थात्—परोपकार से, दुःखियों के दुःख दूर करने से जो सुख मिलता है, वह चिरस्थायी और सच्चा होता है। इस सुख की कोई सीमा नहीं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.27

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 3)

🔶 लेकिन आप ऊपर की ओर सिर उठाकर देखेंगे, हमें आपसे यह उम्मीद है। यह उम्मीद है कि ऐसे भयंकर समय में अपना सारा वक्त केवल पेट पालने के लिए और सन्तान पैदा करने के लिए जाया नहीं करेंगे। अगर आप चाहें तो ढेरों समय बचा हैं, बीस घण्टे में अपना, अपने शरीर व कुटुम्ब का आराम से आप गुजारा कर सकते हैं। आठ घण्टा काम करने के लिए, सात घण्टा विश्राम के लिए और पाँच घण्टा घरेलू काम के लिए। फिर भी चार घण्टा आप समाज के लिए आई हुई परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए, समय को ऊँचा उठाने के लिए इनसान का भाग्य और भविष्य शानदार बनाने के लिए आप लगा सकते हैं। करना ही पड़ेगा यह आपको।
                 
🔷 इसमें तो नुकसान पड़ेगा? नहीं, मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि नुकसान नहीं पड़ेगा। जिन्होंने भी अपने समय को लोकसेवा में लगाया है, वे चाहे गाँधी रहे हों या नेहरू, विनोबा रहे हों या विवेकानन्द किसी भी तरह वे नुकसान में नहीं रहे हैं। वे ऊँचा उठे हैं, आगे बढ़े हैं और उन्होंने हजारों आदमियों को ऊँचा उठाया व आगे बढ़ाया है। स्वयं भी नफे में रहे हैं। वे नुकसान में रहे? क्या नुकसान में रहे आप बताइए? किसी एक का नाम तो बताइए।
    
🔶 गाँधीजी ने वकालत की होती तो वकालत में कितना कमा लेते? लेकिन जब उन्होंने अपना समय सेवा में लगा दिया तो आप बताइए, क्या कमी रह गई उनके पास। उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया। यह उनकी इच्छा पर है। ब्राह्मण अपने लिए कभी इस्तेमाल नहीं करते। गाँधी ब्राह्मण थे, बड़े शानदार आदमी थे और शानदार सिर्फ इसलिए कि उन्होंने अपने समय को पेट-पालन और जानवर के तरीके से औलाद पैदा करने में नहीं, बल्कि इनसान के तरीके से खर्च किया।

🔷 यह समय ठीक ऐसा ही है। इस विषम समय में मेरी आप लोगों से, प्रत्येक से यही प्रार्थना है कि आप अपने समय का थोड़ा अंश निकालें। हमने कितनी बार कहा व छापा है कि आप समयदान कीजिए। चन्द्रमा पर ग्रहण जब पड़ता है तब कितने ही लोग आते हैं व पुकार करते हैं कि चन्द्रमा पर ग्रहण पड़ा है, पुण्य कमाना हो तो दान करो। इस खराब समय में हमारी भी एक रट है—महाकाल की भी एक ही पुकार है—आप समय दीजिए, समय खर्च कीजिए। किस काम के लिए? आप इस काम के लिए समय लगाइए जिससे आप लोगों के दिमागों और विचारों को ठीक कर सकें। इनसान के अन्दर क्या है? वस्तुतः न हाड़ है, न माँस है, न मिट्टी, न पखाना, जो भी कुछ काम की चीज है वह है विचार।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 SPIRITUALISM DURING EMERGENCY

🔶 A new era is going to take birth. Two things will happen— first, reconstruction of this world, second, destruction before this construction. Destruction must happen. When a building is raised, the land is hollowed out for its foundation. After that soil is buried and it is made even and thorough by powerful force of heavy stones. Then only walls are raised.

🔷 When God incarnates, He doesn’t do single thing. He doesn’t come only with the establishment of religion and divinity, but also destructing and ruining the evil. No doubt, He will come taking and bestowing peace all around, but keep this in mind too, He will bring agonies and lamentation for millions of us. On one hand He will bestow blessings, then on the other one, He will shed His immense anger.

🔶 At the juncture of this transition and change, neither you behold the specific demand of time nor listen the call of responsibilities and duties. What’s happening all around, you should perceive this. If you remain ignorant, remain indulged in the cycle of eating, earning and reproducing (giving births), then what to say anything about that!


✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya 

👉 प्रज्ञायुग में दुनिया का कायाकल्प

🔷 प्रज्ञा युग में चिन्तन, आचरण एवं व्यवहार के सभी पक्षों में काया-कल्प जैसा हेर-फेर होगा। यही युग परिवर्तन है। इस परिवर्तन का आधार दूरदर्शी विवेकशीलता का कसौटी पर कसकर अपनाया गया औचित्य ही होगा। पिछले दिनों का क्या सोचा माना या किया जाता रहा है। इसे भावी रीति-नीति का आधार नहीं माना जायेगा वरन् तर्क, तथ्य, प्रमाण न्याय एवं लोकहित की हर कसौटी पर कसने के उपरान्त जो खरा पाया जायेगा उसी को अपनाया जायेगा। न किसी को भूत का आग्रह होगा और न कोई भविष्य की अवज्ञा करेगा। वर्तमान का निर्धारण करते समय आज की आवश्यकता और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को ही महत्व दिया जायेगा। यह निर्धारण पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाये हुए अन्तःकरण ही कर सकेंगे। अगले दिनों उन्हीं को युग ऋषि माना जायेगा और उन्हीं का निर्धारण लोक-मानस द्वारा श्रद्धापूर्वक अपनाया जायेगा।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1984 पृष्ठ 27

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 164)

🌹  जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण

🔷 परिवर्तन और निर्माण दोनों ही कष्टसाध्य हैं। भ्रूण जब शिशु रूप में धरती पर आता है तो प्रसव पीड़ा के साथ होने वाला खून खच्चर दिल दहला देता है। प्रस्तुत परिस्थितियों के दृश्य और अदृश्य दोनों ही पक्ष ऐसे हैं, जिनके कण-कण से महाविनाश का परिचय मिलता है। समय की आवश्यकताएँ इतनी बड़ी हैं जिन्हें पूरा करने के लिए बहुतों को बहुत कुछ करना चाहिए। विनाश से निपटने और विकास प्रत्यक्ष करने के लिए असामान्य व्यक्तित्व, असामान्य कौशल और असीम साधन चाहिए। इतने असीम जिन्हें जुटा सकना किसी व्यक्ति या समुदाय के लिए कठिन है। उस सारे सरंजाम को जुटाना मात्र परमेश्वर के हाथ है। हाँ इतना अवश्य है कि निराकार को साकार जीवधारियों में नियोजित रणनीति की और कौशल भरी व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। सो भी परिमाण में।

🔶 ऐसे कार्यों का संयोजन तो सृष्टा की विधि व्यवस्था ही करती है, पर उसका श्रेय श्रद्धावान साहसियों को मिल जाता है। हनुमान और अर्जुन की शक्ति उनकी निज की उपार्जित नहीं थी वे सृष्टा का काम करते हुए उसी की सामर्थ्य को प्राप्त कर सके। अर्जुन को सारथी का यदि समर्थन न रहा होता, तो महाभारत कैसे जीता जाता? हनुमान स्वयं बलवान रहे होते तो सुग्रीव सहित ऋष्यमूक पर्वत पर छिपे-छिपे न फिरते। समुद्र छलांगने, लंका जलाने, पर्वत उखाड़ने की सामर्थ्य उन्हें धरोहर में इसलिए मिली थी कि वह राम काज में समर्पित हों। यदि निजी मनोवाँछनाओं के लिए किसी भक्त ने माँगा है तो नारद मोह के समय पर मिले उपहास की तरह तिरस्कृत होना पड़ा है।

🔷 महान् परिवर्तन के साथ जुड़े हुए नवसृजन का उभय पक्षीय कार्य ऐसा है कि जिसे सम्पन्न किए जाने के लिए उतने साधन चाहिए जिनका विवरण शब्दों में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वह जुटाए जाने हैं, जुटेंगे भी।

🔶 अभीष्ट प्रयोजन की महानता को समग्र रूप से आँका जाना कठिन है। इसकी किस्तें ही शृंखला की कड़ियों की तरह प्रादुर्भूत होती हैं। प्रस्तुत संकट या संकल्प इसी प्रकार का है जो अवतरण पर्व पर विगत वसंत पंचमी को प्रकट हुआ। उस एक को पाँच भागों की सुविधा की दृष्टि से विभाजित किया गया है। १-एक लाख यज्ञ, २-एक लाख नर रत्न, ३-एक लाख अशोक वाटिका, ४-एक लाख ग्राम्य तीर्थ, ५-एक लाख वर्ष का समयदान संकलन। यह पाँचों ही काम इतने भारी लगते हैं मानों शेषनाग के सिर पर धरती का बोझ लादने वाले का अनुशासन ही प्रत्यक्ष हुआ हो। यह सभी कार्य ऐसे हैं जिन्हें मानवी सत्ता न सोच सकती है, न उनकी योजना बना सकती है और न पूरी करने का दुस्साहस ही सँजो सकती है। ये अतिमानवी कार्य हैं जिन्हें हमारे जैसा तुच्छ व्यक्ति अपने निज के बलबूते किसी भी प्रकार वहन एवं सम्पन्न नहीं कर सकता। यह परम सत्ता का कार्य है और वही बाजीगर की तरह कठपुतलियों को नचा-कुदा रही है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.188

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.22

रविवार, 10 दिसंबर 2017

👉 उपयोगिता की समझ

🔶 एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था। उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था।

🔷 कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था।

🔶 वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था। मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी।

🔷 वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा। परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था। ऐसी स्थिति देखकर बादशाह भी गुस्से में था। पर, कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।

🔶 नाव में बैठे दार्शनिक से रहा नहीं गया। वह बादशाह के पास गया और बोला - "सरकार! अगर आप इजाजत दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ।"

🔷 बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी। दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया।

🔶 कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा। उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे। कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया।

🔷 वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया। नाव के यात्रियों के साथ बादशाह को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

🔶 बादशाह ने दार्शनिक से पूछा - "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था, अब देखो कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है?"

🔷 दार्शनिक बोला - "खुद तकलीफ का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है। इस कुत्ते को जब मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी ।"

👉 आज का सद्चिंतन 11 Dec 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Dec 2017


👉 अन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दोष

🔷 सम्पत्ति मात्र एक सीमित मात्रा में अपने पास रखी जा सकती है। उससे अधिक रखने के लिए गोदाम अपने पास है ही नहीं। फिर तृष्णाजन्य उपार्जन से संकट यह खड़ा हो जाता है कि जो चाहा गया है, यदि उतना मिल भी जाय, तो वह संचित न रखा जा सकेगा। चीज चाही हुई हो, प्रिय भी हो और मूल्यवान भी, पर उसे रखने का प्रबन्ध किये बिना, उसे जहाँ- तहाँ कैसे फेंक दिया जाय? स्थान बनाये बिना संग्रह कर लेना मुसीबत मोल लेने के समान है। पेट में चार रोटी का स्थान है।      

🔶 मिष्ठान्न सामने अधिक मात्रा में उपस्थित हों और उन्हें छोड़ देने का मन न हो, रखने की जगह नहीं, ऐसी दशा में खाये जाने पर पेट में दर्द उठेगा ही। बाहर कहीं रखेंगे, तो चोरी होने या सड़ जाने का संकट खड़ा होगा। यह है सांसारिक मुसीबतों की जड़। साधनों की कमी नहीं, पचाने की क्षमता नहीं। ऐसी दशा में तृष्णा अपनी ही होते हुए भी अपने लिए ही संकट उत्पन्न करती है।

🔷 संसार में असीम वैभव भरा पड़ा है, पर वह पात्रता के अनुरूप ही उपलब्ध है। भगवान सुख इतना देता है, जितना हजम हो सके। बिना पचे भी दर्द होता है। यही है तृष्णाजन्य दुःख अन्यथा इस वैभव से भरे संसार में हमें अकारण दुःख क्यों उठाना पड़े?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 3)

🔶 ऐसे व्यक्तियों को दो श्रेणी में विभक्त कर सकते हैं—
     

🔷 (1) विचारों से दुःखी— ऐसे लोग 90 प्रतिशत होते हैं, जिन्हें केवल मानसिक दुःख होता है। भविष्य के प्रति गलत निर्णय कर लेने से लोग अकारण ही दुःखी बने रहते हैं। पुत्री की शादी की चिन्ता, तरक्की न मिलने का दुःख, चोरों का भय, हानि का आशा का, मित्रों से विश्वास-घात की आशंका, गृह-नक्षत्र द्वारा हानि पहुंचने का डर पाये जाते हैं। ऐसे दुःखों का कारण वस्तुतः इतना बड़ा नहीं होता जितना कि वे उद्विग्न और संतप्त रहते हैं।

🔶 (2) शारीरिक दुःखी— इनके दुःख को दुःख कहा जा सकता है। शरीर रोगी है तो सुख कहां मिलेगा? पाचन-क्रिया खराब हो रही हो तो बहु स्वाद युक्त भोजन भी फीका जान पड़ेगा। ऐसे लोगों को एक हद तक वास्तविक दुःखी मान सकते हैं।

🔷 किन्तु यदि भावनाओं में परिष्कार किया जा सके तो अरुचिकर कारणों को भी सुख में बदला जा सकता है। तपस्वी लोग घर के सुखों को त्याग कर जंगल का जीवन अधिक व्यतीत करते हैं। देखने में वनवासी जीवन नितान्त अभावपूर्ण लगता है। आहार, विहार और आमोद-प्रमोद की जो सुविधा गृहस्थ जीवन में सम्भव है वह भला वन के जीवन में कहां मिलेगी? फिर भी एकान्त वासियों को आनन्द-पूर्ण जीवन बिताते देखा जाता है, इसका कारण भावनाओं का परिष्कार ही है।

🔶 स्वार्थी मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति को सुख मानते हैं किन्तु परमार्थी व्यक्तियों को परोपकार में सुख मिलता है। परोपकार देखने में घाटे का सौदा है। बाह्य दृष्टि से माप करें तो दूसरों के हित के लिये सदैव ही अपने हितों को होम देना होता है। समय, श्रम और कभी-कभी धन भी लगाना पड़ता है, किन्तु परोपकारी को अपनी उच्च भावनाओं में ही अतीव सुख प्राप्त होता है। देखने वाला उसे बेवकूफ मान सकता है किन्तु उसके आन्तरिक सुख को वह स्वयं ही जान सकता है। भावनाओं का सुख ही सच्चा है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.27

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

👉 Solution Of Today’s Problems

🔶 Every body is worried today on account of internal conflict. A person has adequate wealth & means of livelihood, even then, he appears to be unhappy & worried. Another person looks lost inspite of being highly educated & well placed. Businessmen, scholars, leaders, religious persons & highly placed officers appear to be worried only for a solution of this problem. Most people complain of conflict, unhappiness, anguish & distress. Majority of people ‘both small & great, are worried only on account’ of these problems & make various efforts to get rid of them, even then, no solution is found.

🔷 In fact, the solution of these problems of life does not lie in the world of external achievements. The solution lies within the man.

🔶 The pride of prosperity, beauty, scholarship, intelligence, post, etc. is the boundary wall which has kept us apart from the realities of life. Pride, egoism may be of any quality, beauty or article, keeps man distant from real happiness & spiritual peace. How can he, whose mind & heart are caught in the siege of this vanity, remain contented.

🔷 When the rich will give up pride of wealth & will link their heart with poverty; when the scholars will sit in the line of ordinary being; when high officers will start worshipping common man, their egoism will vanish easily by itself & they will be able to find the solution of this important problem of life. Real happiness of life is only possible by making the heart free & comprehensive.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 2)

🔶 यह ऐसा समय है जिसमें किसी को किसी पर विश्वास नहीं रह गया है। आतंक और आशंकाओं से वातावरण चारों ओर घिरा हुआ है। सड़क पर जब आप निकलते हैं तो मालूम नहीं कि आपके साथ पड़ोस में चलने वाला आपके चाकू भोंककर कब आपकी सम्पत्ति छीन लेगा, इसका क्या विश्वास है? इनसान का चाल-चलन, इनसान का विचार इतना गन्दा-घटिया हो गया है कि यह स्थिति अगर बनी रही तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा, न भाई-भाई पर विश्वास करेगा, न स्त्री पुरुष पर विश्वास करेगी, न पुरुष स्त्री पर विश्वास करेगा, ऐसा गन्दा, ऐसा वाहियात समय है यह।
                 
🔷 यह समय इसलिए भी घटिया और वाहियात है कि नेचर हमसे आप सबसे नाराज हो गई है। जब उसकी मौज आती है तो अन्धाधुन्ध पानी बरसा देती है और जब मूड आता है तो सूखा नजर आता है। कहीं मौसम का ठिकाना नहीं कि मौसम पर पानी बरसेगा कि नहीं, ठण्ड के समय ठण्ड ही पड़ेगी कि गर्मी पड़ेगी, कोई नहीं कह सकता। भूकम्प कब आ जाए, कोई नहीं कह सकता? बाढ़ कब आ जाए, कोई ठिकाना नहीं? प्रकृति हम सबसे बिल्कुल नाराज हो गई है, इसलिए उसने काम करना बन्द कर दिया है। यह ऐसा भयंकर समय है।
    
🔶 ऐसे भयंकर समय में आपके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या आपके कोई कर्तव्य नहीं है? क्या आपके अन्दर भावनाएँ नहीं हैं? क्या आपका हृदय पत्थर और लोहे का हो गया है? नहीं, मेरा ख्याल है कि सब आदमियों का ऐसा नहीं हुआ होगा। ज्यादातर लोगों का तो ऐसा ही हुआ है कि वे घटते-घटते जानवर की तरीके से बनते चले जा रहे हैं। जवान आदमी जब ज्यादा बुड्ढा हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, आँखें नीची हो जाती हैं, लाठी टेककर चलता है। इनसान की जवानी चली जाती है तो वह बौना हो जाता है, घटिया हो जाता है, कमर झुक जाती है, उसका आसमान की ओर देखने का न मन होता है, न उसकी बनावट ही ऐसी रह जाती है कि वह ऊपर देखे। अधिकांश आदमी आज ऐसे हो गए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 तड़फ

🔶 एक बार एक छोटा सा बच्चा अपने बेहद अमीर पिता की ऊँगली थामे नदी के किनारे सैर कर रहा था। नदी का पानी धीरे धीरे बह रहा था। बच्चे की नज़रें ढूंढ रही थीं नदी में रहने वाली मछलियों को, बच्चा कभी आगे जाता तो कभी पीछे आता। मछलियों से उसका सामना नहीं हो पता।

🔷 अचानक थोड़ी दूर चलकर उस बच्चे को नदी के किनारे एक मछली मिल ही गयी, मछली गलती से नदी के किनारे पे चली आयी थी और बुरी तरह से तड़फ रही थी। मछली की तड़फ बच्चे से देखी नही गयी वो फौरन अपने पापा से बोला - पापा मछली शायद भूखी होगी, चलो इसे फाइव स्टार होटल में खाना खिलाते हैं पापा मुस्कराये, बच्चा परेशान हो गया। वो बोला- पापा मछली को शायद नींद आ रही होगी, चलो इसे ले जाकर सोने के पलंग पर सुलाते हैं।

🔶 यह सुनकर पापा ने कहा नहीं बेटे मछली को सोना-चांदी, रुपया-पैसा खुश नही कर सकते, यह तो तभी खुश होगी जब इसे वापिस नदी में डाल देंगे और बच्चे ने उसे उठाकर नदी में डाल दिया, मछली झट से खुश होकर नदी में तैरने लगी।

🔷 ठीक इसी मछली की तरह हम और आप भी तड़फ रहे हैं इस भौतिक जगत में भगवान से दूर होकर रुपया-पैसा, धन-दौलत, बड़ी-बड़ी उपलब्धियां बड़े-बड़े सम्मान हमारी तड़फ, हमारे दुखों को कम नहीं कर पाते, थोड़ी समय के लिए ख़ुशी जरूर मिलती है, इन्हें पाकर लेकिन फिर तड़फ और बेचैनी अपने कब्जे में ले लेती है हमें।

🔶 हम भी भगवान के अंश होकर भगवान से बहुत दूर हैं और बहुत बहुत तड़फ रहे हैं भगवान की कृपा से जब कोई दिव्य आत्मा आकर हमारा हाथ भगवान के हाथ में थमा देता है तब हमें हमारी बेचैनी से छुटकारा मिल सकता है वरना ये दुःख, तकलीफ हमेशा यूँ ही जारी रहेंगी।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 10 Dec 2017


👉 सुख की आकांक्षा को बुरी मन कहिए (भाग 2)

🔶 गृहस्थी की सुघड़ व्यवस्था बच्चों का पालन-पोषण, श्रम-उद्योग और क्रियाशीलता का आधार सूत्र मोह होता है। इससे यह बात समझ में आती है कि अपनी मर्यादा के अन्दर संसार की कोई भी वस्तु बुरी नहीं है। सुख प्राप्ति की आकांक्षा भी इसी प्रकार बुरी नहीं। यह स्वाभाविक एवं उचित भी है कि लोग सुखों की कामना करते हैं। जीवन के विभिन्न व्यापार इसी से तो चलते हैं।
   
🔷 सुख की आकांक्षा न हो तो कौन परिश्रम करना चाहेगा? कड़ी धूप में अपनी चमड़ी कौन सुखाना चाहेगा? आठ घण्टे ड्यूटी बजाने में कौन-सा आनन्द रखा है? सुख की आकांक्षा के पीछे संसार की एक बहुत बड़ी व्यवस्था सन्निहित है, किन्तु यह है तभी तक जब तक सुख की प्राप्ति के साधनों में व्यत्तक्रम उत्पन्न न हो। इसे साधन न मानें, आसक्ति न हो। शक्ति के रूप में ही सुख का महत्व है।

🔶 ‘सुख’ एक दृष्टिकोण है—जो लोगों की रुचि के अनुरूप होता है। वस्तुतः संसार की किसी भी वस्तु में न सुख है, न दुःख। जिसके सन्तान नहीं होती है, वह इसके लिए बड़ा व्यग्र, दुःखी तथा बेचैन रहता है, उसकी दृष्टि में पुत्र-प्राप्ति का सुख ही संसार का बड़ा भारी सुख होगा। पर जिसके कई सन्तानें पहले ही हैं, घर में धन का अभाव है, उन्हें सन्तान का होना दुर्भाग्य जान पड़ता है। सुख का प्रधान साधन और आकांक्षा की प्रमुख वस्तु ऐसे लोगों के लिए धन होगी। धन और पुत्र दोनों अवस्थाओं में एक जैसे हैं। किन्तु भिन्न दृष्टिकोणों के कारण एक व्यक्ति धन कसे सुख का सार मानता है दूसरे के लिए ‘पुत्र’ सुख है।

🔷 इससे स्पष्ट हो जाता है कि संसार के किसी भी पदार्थ में सुख नहीं। रुचि के अनुकूल सुख का भाव अपने दृष्टिकोण में होता है। लोगों के दुःख का कारण पदार्थ के सुख की आसक्ति ही है। अधिकांश लोग इसी कारण दुःखी रहते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1964 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1964/December/v1.26

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.2

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