सहनशीलता में अद्भुत शक्ति है। इसमें आत्मचेतना की अजेयता है, अमरत्व है। जिसमें सहनशीलता नहीं है, वह जल्दी टूट जाता है। जबकि जिसने सहनशीलता के अभेद्य सुरक्षाकवच को ओढ़ लिया है, उसे जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें और भी मजबूत और दृढ़ करती है।
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१
सन्त तिलोपा अपने शिष्यों को एक सच्ची घटना सुनाते थे; एक युवक किसी लुहार के घर के पास से गुजरता था। उसने निहाई पर पड़ते हथौड़ों की चोटों की आवाज सुनी। कौतुकवश उसने लुहार के घर के भीतर झाँक कर देखा। उसे दिखाई दिया कि एक कोने में बहुत से हथौड़े टूटकर विकृत होकर पड़े हैं। उसे थोड़ा अचरज तो हुआ, फिर भी उसने सोचा कि समय और उपयोग ने उनकी ऐसी गति बनायी होगी। उस युवक ने जिज्ञासावश लुहार से पूछा; इतने सारे हथौड़ों को इस दशा तक पहुँचाने के लिए आपको कितनी निहाइयों की जरूरत पड़ी?
इस सवाल के जवाब में लुहार जोर से हँस पड़ा और बोला; अरे भाई, एक ही निहाई केवल एक ही। अब तो वह युवक और भी गहरे अचरज में डूब गया। उसके गणितीय मन में सवालों के अनेकों समीकरण उभरे। निहाई एक और वह भी सर्वथा अविजित और सुरक्षित। जबकि हथौड़े अनेक और वे सबके सब टूटे हुए। आखिर इस अचरज भरे सच का रहस्यात्मक आधार क्या है? युवक अभी कुछ और सोच पाता इतने में वह लुहार बोल पड़ा, ऐसा इसलिए है मित्र क्योंकि हथौड़े चोट करते हैं और निहाई धैर्य से, सर्वथा अविचलित भाव से सभी चोटों को सहती है। इसीलिए एक ही निहाई सैकड़ों हथौड़ों को तोड़ डालती है।
इस कथा का समापन करते हुए सन्त तिलोपा ने अपने शिष्यों से कहा; जीवन का सत्य सहनशीलता है। अन्त में वही जीतता है जो चोटों को धैर्यपूर्वक सहता और स्वीकार करता है।
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १८१


















