शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

👉 वासन्ती हूक, उमंग और उल्लास यदि आ जाए जीवन में (भाग ५)

आज के दिन मेरे मन में एक ही विचार आता है कि यहाँ जो भी लोग आते हैं, उनको मेरे कीमती सौभाग्य का एक हिस्सा मिल जाता तो उनका नाम, यश अजर-अमर हो जाता। इतिहास के पन्नों पर उनका नाम रहता। अभी आपको जैसा घिनौना, मुसीबतों से भरा समस्याओं से भरा जीना पड़ता है, तब जीना न पड़े। आप अपनी समस्याओं का समाधान करने के साथ-साथ हजारों की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ बनें। फिर आपको न कहना पड़े कि गुरुजी हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए। फिर क्या करना पड़े? गुरुजी को ही आपके पास आना पड़े और कहना पड़े कि हमारी मुसीबत दूर कर सकते हो तो कर दीजिए। विवेकानन्द के पास रामकृष्ण परमहंस जाते थे और कहते थे कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए और हमारे पास भी हमारा गुरु आया था यह कहने कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए। उन्होंने कहा—हम चाहते हैं कि दुनिया का रूप बदल जाए, नक्शा बदल जाए, दुनिया का कायाकल्प हो जाए। तो आप खुद नहीं कर सकते नहीं, खुद नहीं कर सकते। जीभ माइक का काम नहीं कर सकती और माइक जीभ का काम नहीं कर सकता। जीभ और माइक दोनों के सम्पर्क से कितनी दूर तक आवाज फैलती है? हमारा गुरु जीभ है और हम माइक हैं, उनके विचारों को फैलाते हैं। हम चाहते हैं कि आप भी ‘लायक’ हो जाइए। अगर आपके भीतर ‘लायकी’ पैदा हो जाए तो मजा आ जाए। तब दोनों चीजें शक्तिपात और कुण्डलिनी जो भगवान के दोनों हाथों में रखी हुई हैं, आपको मिल जाएगी। शर्त केवल एक ही है कि अपने आपको ‘लायक’ बना लें, पात्र बना लें। यदि लायक नहीं बने तो मुश्किल पड़ जाएगी। कुण्डलिनी जागरण के लिए पात्रता और श्रद्धा का होना पहली शर्त है।

आज का दिन ऊँचे उद्देश्यों से भरा पड़ा है। हमारे जीवन का इतिहास पढ़ते हुए चले जाइए, हर कदम वसन्त पंचमी के दिन ही उठे हैं। हर वसन्त पंचमी पर हमारे भीतर एक हूक उठती है, एक उमंग उठती है। उस उमंग ने कुछ ऐसा काम नहीं कराया, जिससे हमारा व्यक्तिगत फायदा होता हो। समाज के लिए, लोकमंगल के लिए, धर्म और संस्कृति की सेवा के लिए ही हमने प्रत्येक वसन्त पंचमी पर कदम उठाए हैं। आज फिर इसी पर्व पर तीन कदम उठाते हैं। पहला कदम सारे विश्व में आस्तिकता का वातावरण बनाने का है। आस्तिकता के वातावरण का अर्थ है—नैतिकता, धार्मिकता, कर्तव्यपरायणता के वातावरण का विस्तार। ईश्वर की मान्यता के साथ बहुत सारी समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। ईश्वर एक अंकुश है। उस अंकुश को हम स्वीकार करें, कर्मफल के सिद्धान्त को स्वीकार करें और अनुभव करें कि एक ऐसी सत्ता दुनिया में काम कर रही है जो सुपीरियर है, अच्छी है नेक है, पवित्र है। उसी का अंकुश है और उसी के साथ चलने में भलाई है। यह आस्तिकता का सिद्धान्त है। इसी को अग्रगामी बनाने के लिए हमने गायत्री माता के मन्दिर बनाए हैं। गायत्री माता का अर्थ है—विवेकशीलता, करुणा, पवित्रता, श्रद्धा। इन्हीं सब चीजों का विस्तार करने के लिए आपसे भी कहा गया है कि आप अपने घरों में, पड़ोस के घरों में गायत्री माता का एक चित्र अवश्य रखें। घर-परिवार में आस्तिकता का वातावरण बनाएँ।

यज्ञ और गायत्री की परम्परा को हम जिन्दा रखना चाहते हैं। इसके विस्तार के लिए चल पुस्तकालय चलाने से लेकर ढकेल गाड़ी—ज्ञानरथ चलाने के लिए दो घण्टे का समय प्रत्येक परिजन को निकालना चाहिए। यही दो घण्टे भगवान का भजन है। भगवान के भजन का अर्थ है—भगवान की विचारणा को व्यापक रूप में फैलाना। हमने यही सीखा है और चाहते हैं कि आपका भी कुछ समय गायत्री माता की पूजा में लगे। जैसे हमारे गुरुजी ने हमसे समय माँगा था और हमें निहाल किया था, वही बात आज आपसे भी कही जा रही है कि अपने समय का कुछ अंश आप हमें भी दीजिए आस्तिकता को फैलाने के लिए। पाने के लिए कुछ न कुछ तो देना ही पड़ता है। पाने की उम्मीद करते हैं तो त्याग करना भी सीखना होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

आज कल गुरु चतना मेरे अनुभव में काफी सक्रिय है ग्रहे -ग्रहे का सरूप परिजनों की शमरथ के अशानुसर आपने गृह ग्राम में यज्ञ आदि सृजन के कार्य
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