👉 भक्ति के अपूर्व सोपान हैं-श्रवण और कीर्तन
कुन्ती की कथा सभी के दिलों को छू गयी। हिमालय के श्वेत शिखरों की छांव में बैठे ऋषियों, सिद्धों, सन्तों, ज्ञानियों एवं भक्तों के समुदाय की भावनाएँ भीग गयीं। वे सोचने लगे कि एकान्त में, वन में, पर्वतों की गुफाओं-कन्दराओं में रहकर भगवान के नाम का जाप करना सहज है परन्तु लोक में, संसार में, समाज के बीच रहकर भगवान का सतत स्मरण करते रहना कठिन है। घर-परिवार के कर्त्तव्यों एवं दायित्वों के बीच, पीड़ा और परेशानियों के बीच, दारूण शोक-सन्ताप से घिरे रहकर, भगवान का गुणानुवाद करना सहज नहीं है। जो अपमान, तिरस्कार के दंश को, जिन्दगी की हर विपदा को अपने प्यारे प्रभु का उपहार मानते हैं, उनसे श्रेष्ठ भक्त भला और कौन होगा? जो जीवन के कष्टों में भावविह्वल मन से भगवान का कीर्तन करते हैं, वही भगवान के सच्चे भक्त हैं क्योंकि वे जानते हैं कि भगवान अपने प्रिय भक्तों के हैं और भक्त अपने प्यारे भगवान के।
भक्त तो वह है जो जानता है कि भगवत्कृपा ही भगवद्विधान है। वह यह भी जानता है कि भगवान का विधान ही उनकी कृपा है, फिर शिकायत कैसी और किससे? वह जीता है इस अनुभूति में- कि चलते जाना है और शिकायत नहीं करनी है। चलते जाना है और अहोभाव से भरे रहना है। चलते जाना है और धन्यवाद देते जाना है। ओठ पर गीत रहे धन्यवाद का और पैर कभी रुके ही न। ऐसा हो सके तो भक्ति। कुन्ती की कथा में सभी को इस भक्ति का स्वाद लगा। दिल भींगे और आँखें छलकीं, गले रूंधे और वाणी मौन हुई। बस मन में विचारों के आरोह-अवरोह के स्वर उठते रहे। भावों में भक्तिकथा के कण बिखरते रहे। इसमें कब कितना समय बीता किसी को पता ही न चला। यह तो जैसे भावसमाधि की दशा थी जिसमें भक्ति-भक्त एवं भगवान मिल रहे थे। सप्तर्षियों सहित देवों-गन्धर्वोंे व सिद्धों का समूह विभोर होता रहा। देवर्षि नारद को भी जैसे अपनी सुधि न रही।
पर महर्षि वशिष्ठ का अन्तर्मन जैसे कथासूत्र को थामे था। वे इसमें आगे की और कई कड़ियाँ पिरोना चाहते थे। उन्होंने बड़ी सहजता से भावभरे नेत्रों से नारद को देखा। ब्रह्मापुत्र नारद, वशिष्ठ के नेत्रों का संकेत समझ गए। उन्होंने नजर उठाकर सभी की ओर देखा। सभी के मुख पर उत्सुकता की आभा थी, जिज्ञासा का प्रकाश था। वे सुनना चाहते थे देवर्षि की देववाणी को। सब के अन्तस के सकारात्मक संवेदनों ने नारद को भी पुलकित किया और उन्होंने भक्तिसूत्र के नवीन सत्य का उच्चार किया-
‘लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्तनात्’॥ ३७॥
लोक समाज में भी भगवद्गुण ‘श्रवण’ और ‘कीर्तन’ से (भक्ति साधन) सम्पन्न होता है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १५१